Tuesday, 9 October 2018

मासूम कश्मीरी

" ..चल पेन ले शर्ट  ...तेरी भर्ती न होगी यू आर अनफिट फॉर आर्मी !

" कयों ...?"

" गर्ल फ्रेंड का नाम लिखा है बॉडी पे तूने ....गेट आऊट..........नेक्स्ट ....

" हवलदार..! अमीं अबी घण्टा हिला देंते तुम्हारे थोपड़े का बो तो मुलक की इज्जत और ए वर्दी देख ली जिसम में तुम्हारी..ओये गर्ल फ्रेंड का नाम नही है ओये ... समझा .....जाते है खुदा हाफिज "

" रुको नौजवान ! जवान की तरफ से हम सॉरी कहते है ...हम कर्नल सूरी है ...काश्मीर में भर्ती प्रक्रिया मतलब प्रोसेस का जिम्मा हमारे सर है ...तुम बहादुर दिखते हो ....आओ अंदर ...."

" आप भले इंसान लगते है साहिब ...."

" बैठो ! तुम्हारे मजहब में ये बॉडी पे नाम लिखवाना शायद गलत है ...और फौज के उसूलों में भी ये सही नही ....अगर बता सको कि ये आखिर क्या है तो हमें ख़ुशी होगी !"

" साहिब अमारा नाम जुल्फिकार अली खान है ..अम सरहद से लगी बस्ती में रेते है ... अमारे अब्बू शहजाद अली खान ..बहुत बेहतर आदमी थे ...अमारे अब्बू ने अमें अमेशा सीखाया कि अम्मारा मूलक हिन्दुस्तान है ...अम्म्मारे घर में 132 किलो लोहा और तीन बोरा ग्रेनेड है साहिब ...जो हिंदुस्तान और पाकिस्तान की मिल्कियत है ...जब दोनों ओर से गोलाबारी ओती है तो पेले अम आम आदमी हलाक होते है फिर सिपाही ...  अमने अम्मारी अम्मी का मुँह नही देखा  ..बो क्या है ..अम्मारे पैदा ओते ही वो गुजर गई ..... अम्मारे अब्बू ने हमें दाँतों बीच पाला ... एक दिन अम बकरी चराने गए थे तबी गैर मूलक की जानिब से एक रॉकेट लॉन्चर अम्मारे घर में टकराया ...

कोई न बचा ओये .. अम्मारी दो बहनें ..अम्मारी दादी ...अब्बू सब मौके पर हलाक हो गये ....अमे तो उनका जिसम का पुर्जा भी बरामद न हुआ साहिब ..जो मट्टी नीचे डाल कर कोई कब्र कोई याद बना लेते ...

बस एक सन्दूक को कुछ न हुआ क्यूँकि बो अमारी अम्मी का था और घर की मिट्टी नीचे ही दफन था ...

मीर जादा जो सरहद की आर -पारी का दलाल था बो हमें सरहद पार अपने भाइयों अपने मजहब बीच ले जाने को तैयार हुआ ...अम गए साहिब ...लेकिन जिस मीर जादा को अमनें सोचा था वो अमारी बेहतरी का अलमदार है असल में बो दलाल था ...जो कच्ची उम्र के नौजवान पार करने का पैसा लेता था ...अम्मे पता बी न चला साहिब और अम बिक गए ओये .......

" जुल्फिकार तुम पानी पियो....और आँसू पोंछो ...

" अम ठीक हे साहिब ...उसके बाद अमे पेले रोज नमाज और दरूद का पाबन्द बनाया गया ...जब दो हफ्ते गुजरे तब अमे एक मुबल्लिग ( धर्म वक्ता ) आकर रोज जुनूनी बाते सुनाता वो एक नये इस्लाम से अम्मारा राब्ता करवाता जबकि अम्मारे सरहद पार वाले इस्लाम में ये कुछ भी न था ...वो जान देने को शहादत बोलता ...और उसके बदले जन्नत का ईनआम मिलने की बात बोलता ....अमने एक दिन उससे सवाल किया कि....

" आप को जन्नत से नफरत है आलिम साहिब...?"

" तौबा कर लौंडे ....अल्हम्दुलिल्लाह ...हम सब ये सब कुछ अपनी जन्नत बनाने को ही तो कर रहे है ....

" तो तुमको जब मालूम कि जब  जन्नत सरहद पार जाकर गोलीबारी करने और मासूमों की जान लेकर अपनी जान देने से  से मिलती है तो अब तक आपने अपनी जान क्यूँ नही दी ओये ...? क्या तुम्हारे मूलक में नौजवान नही ...क्या मरद नही ..जो तुम हम कश्मीरियों पर ही ऐतबार करते हो .....अमी ये बाताओ तुम्मारे कितने बच्चे है  ...?

" अल्ह्मदुलिल्लाह 6 बेटे और एक बेटी .."

" ओये उमर भी बयान करो   .."

" सब 18 पार के हो चले है बस बिटिया अभी यही 14 बरस की है ..."

" ओये तो तुम्मारे कितने लौंडो को जन्नत मिल चुकी है  ....?

उसने मेरे गाल पर एक चमाट रशीद किया साहिब और बोला -

" अल्हम्दुलिल्लाह सब हयात (जिन्दा) है ...मरे उनके दुश्मन ..

उस दिन मालूम चला साहिब कि हम कश्मीरी उनके दुश्मन है ...उस रात खूब आँसू छलके और अमने अपनी अम्मी का बो ही सन्दूक खोला ताकि अम्मी की तस्वीर निकाल उसको हाल ए दिल बताये ...तबी उसमें से एक खत मिला ...जिसमें लिखा था ...मैं सना मलिक मेजर अय्यूब की बेटी ...जिसको अपने ही कॉलेज के साथी  शहजाद से प्यार  हो गया ....और अब्बू की डर से  श्रीनगर से भाग कर हम सरहद के पार इस छोटे से गाँव में रहने लगे है ....मैं अपनी मौत के आखरी पड़ाव पर हूँ दो दिन पहले मैंने दो बेटियों के बाद एक बेटे को पैदा किया ...जुल्फिकार नाम रखा है इसका ...आज जब मैं अपनी मौत से मोहलत लेकर ये खत मुकम्मल कर रही हूँ क्यूँकि सरहद के तार के करीब मेरी बकरी चर रही थी उसे वापस खींच रही थी तभी  दूसरी जानिब से एक गोली मेरी पीठ पर आ लगी ...मैं मर रही हूँ लेकिन एक वतनपरस्त फौजी की बेटी हूँ ...और चाहती हूँ मेरा बेटा जुल्फी भी एक फौजी बने .......

उसके बाद कुछ न लिखा था अम्मी खुदा हाफिज भी नही लिख पाई शायद उसका दम निकल गया हो ....लेकिन इतनी जोर से चीखा साहिब की पूरा दहशतगर्द खेमा .. मचल उठा .. मैं नश्तर उठाकर अपनी अम्मी की मौत का बदला ...लेने निकल पड़ा ..लेकिन तब याद आया कि मैं बेवकूफी कर रहा हूँ मैं अकेला इनका कुछ नही बिगाड़ सकता तो उसी चाक़ू से अपने सीने में अपनी अम्मी का नाम लिख लिया ताकि जब तलक जिन्दा रहूँ उठते- बैठते ..जीते -मरते अपनी अम्मी की मौत का बदला ...अपने परिवार की मौत का बदला ...अपने नाना की आन का बदला अपने कश्मीरी भाइयों की कच्ची उम्र का बदला और अपने मूलक में खूँरेजी और कत्लोगारत का बदला  ............

कुछ देर सन्नाटा रहा ....और फिर तालियों का एक रेला निकल पड़ा ....सूरी साहिब उठे उन्होंने मुझे गले लगा लिया और कुछ देर फून पर बात करने के बाद मुझे सीधे वर्दी नज्र की गई .......इतनी ख़ुशी हुई की फिर अम्मी याद आ गई तबी वो नार्थ इंडियन हवलदार मेरे पास आया और बोला -

" हे जुल्फी बॉस सब तो हम समझ गया अब ये भी समझा दो ये थोपड़े का घंटा कैसे हिलता है व्हाट इज थोबड़ा ...?नवाजिश
#जुनैद.........

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