Friday, 19 October 2018

निस्वार्थ प्रेम

रूम शिफ्ट किया है ... वो जो मेरे सामने वाली 55 के पार वाली आंटी है ..जिसका तौलिया तभी मेरे सर के ऊपर गिरता है ...जब मैं उसकी बालकनी के नीचे से गुजरता हूँ ..दो बार इस तौलिया गिरने की घटना को इत्तेफाक समझ कर टाल दिया ...लेकिन जब तीसरी बार गिरा और मैंने हमेशा की तरह ऊपर की जानिब सर उठाकर देखा तो पाया फिर वही आंटी खड़ी मुस्कुराह रही थी ...
कक्षा 9th की क्लास के सामने से गुजर रहा था मास्साहब बच्चों को समझा रहे थे पृथ्वी एक बल से सदैव चीजों को अपनी और आकर्षित करती है ....तो क्या आंटी भी ...?
रातों को करवट पे करवट और तकिया सर के नीचे से छाती पर चिपक गया ...दुलाई को जिस्म की गर्मी बढ़ते ही केंचुली की भाँति उतार फेंका ...पसीना कह रिया की आज के बाद न निकलूँगा छेदों से ...यू ट्यूब पर आंटी टाइप करते ही जैसे कपड़े फाड़ जनानियां नजर आने लगी ...और सरकार कहती है सब सफाई कर दी गई है ...और वैसे भी पोर्न सिर्फ न्यूड सेक्स है ....जबकि सेक्स का मतलब की अर्धनग्नता से होता है ...
खैर अपन को क्या अगले दिन वही डियो बॉडी पर छिड़का जिससे युवतियां बिना किसी केरेक्टर और बौद्धिकता को मापे चिपक जाती है ...ये भारत का एडवरटाइजिंग वर्ल्ड भी क्या खूब इज्जत करता है स्त्रियों की तब समझ में आया ...प्रचुर आत्मविश्वास था जब उसी बॉलकनी के नीचे से गुजरा ...लेकिन इस दफा कुछ भी न गिरा ऊपर से ...सोचा टाइम मैनेजमेंट न कर पाई होंगी आंटी सो एक अगेन ट्राई फिर ....लेकिन इस बार भी गौरैया की बीट के सिवा सर पर कुछ न टपका ...इस बार डेढ़ मिनट का जूता उसी लॉन्चिंग जोन में बाँधा लेकिन फिर भी कोई बात न बनी ....तीन दिन तलक यही असफलता मेरा भाग्य बन गई ...न आंटी ही बॉलकनी में दिखी न उनका गुलाबी तौलिया नीचे गिरा ...मेरा हाल.रणभूमि पर पेचिस लगे वीर जैसा था जिसे ये समझ नही थी कि लोटा जरुरी है अथवा तलवार ....?
इसी उधेड़बुन में चौथा दिन मेरे लिए सौगात और सुगन्ध लेकर आया ...मस्ती में गुजर रहा था तभी तपाक से तौलिया सर पर ....उफ्फ्फ्फ़ रोम -रोम में सरगोशी भर गई ...ऊपर नजर उठाई तो आंटी ने फिर कातर स्माइल दी और साथ में खुल्ला निमन्त्रण भी ....उनके इस निमन्त्रण में मुझे कांदे में गुड़ की भेली सा मजा मिला...पीछे चार कदम चलने पर ही मेरे दिल ने 90 बार एक्स्ट्रा ऑर्डनरी बीट्स ली और 53 बार साँस मेरे गले में फंसी ... कँपकपाता हुआ हाथ जैसे ही डोर बेल पर धरा उससे पहले ही एक भद्र जन ने दरवाजा खोला और बड़ी गर्मजोशी से कहा आपका स्वागत है महोदय ...कृपया अंदर प्रवेश करें ...मेरी हालत इस टुच्चे देशी बेवड़े सी थी जिसे ताड़ी के ठेके पर ले जाकर दूध का गिलास हाथ पर थमा दिया हो .... वो भद्र जन मुझे अपने ड्राइंग रूम में ले गए ..बड़ी इज्जत से उन्होंने मुझे सोफे पर तशरीफ धरने को कहा ..,तभी कातर आंटी की चुलबुलाहट पर्दे के पीछे से आधी प्रकट हुई ..,
समझ बिलकुल अटल जी वाले भाषण की पॉज मोड सी हो गई ...
तभी भद्र जन बोले - " ये मेरी धर्मपत्नी हैं ! जो मानसिक रूप से अस्वस्थ्य है ...वजह 29 साल का हमारे इकलौते बेटे का एक सड़क दुर्घटना में मारा जाना ... जब भी ये इसी आयु वर्ग के आसपास का कोई युवा देखती है तो सोचती हैं कि उसका बेटा है ...ये चरित्र से बिलकुल माँ गंगा की तरह पवित्र थी और पवित्र है ....लेकिन आप जैसे युवा जिन्हें अक्सर मुझे इसी स्थान पर ये समझाना पड़ता है कि हर मुस्कुराहट सिर्फ वासना नही अपितु निश्चल प्रेम भी होती है ... उस हेतु मुझे अक्सर अपने आप को मरने नही देना पड़ता ...रिटायरमेंट से पहले सोचता था कि आफ्टर रिटायरमेंट के बाद क्या करूँगा ...थैंक गॉड मुझे काम मिल गया है अक्सर आप जैसे युवाओं को समझाना अब मेरी नियति है ....इनकी हर एक हरकत पर नजर रखना सम्भव नही न ही जियादह घूम फिर सकता हूँ ...दमा है मुझे ...खैर आप कुछ और लेंगे ...?
मैं क्या ले सकता था  बल्कि मैं तो अपना सब कुछ अर्पण कर आया ...सारी हवश सारा खुमार लकवा खा गया ...लेकिन वो देवी जो अब भी पर्दे के पीछे से मुस्कुराहट पहने झांक रही थी ..वो जिसकी आँखों में एक गहरा इन्तेजार था ..वो पूछ रही थी कि जब कल तौलिया गिराऊँ तो रुकोगे न ..? ऊपर सर उठाकर अपनी माँ को देखोगे तो सही न बेटा ....? नवाजिश
#जुनैद........

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