Thursday, 11 October 2018

कहानी

तू जिसको मिल जाए वो हो जाये मालामाल.....

एक तू ही धनवान है गोरी बाकि सब कंगाल .....

और जैसे ही ...हमनें फिर टेट करके इस जुमले हो दोहराया ठुकराईन ने लजिया के हमें आँख मार दी ....सुर जिसने बख्शे उसकी कसम अगर पके हुए गजलख्वां (गजल सिंगर) न होते तो ..ईमान से सुरों की सारी यारी ठुकराईन के होंठो पर वार देते ....और उसी बकत गूंगे हो जाते !

हम बेनाम चुर घराने के उस्ताद चुरबजाई खान के पोते है ...हमारे बारे में हमारे जीते जी ये किवदन्ती मशहूर है कि हम आखिर औलाद किसकी है ...कुछ हमें हमारी कोठी की धोबन से उत्पन्न मानते है तो कुछ कोठे की एक बाई से ...कुछ हमें स्वयंभू कहते है और कुछ कहते है कि हम फ़टे तबले की ठाप का नतीजा है ....हमनें इन कयासबाजियों का कभी खण्डन इसलिए नही किया क्यूँकि इससे हमें मुफत में शोहरत मिलती है ...जिसके दम पर हमें शोहरत वालों के वहां गाने और हराम की हिलाने का मौका मिलता है ...

हमारा अभी निकाह न हुआ ..क्यूँकि हमें अबी हमारे कद के बराबर औरत न मिली ....लेकिन आज मिल गई ..क्या हुआ जो ठुकराईन 50 के पार जा लगी है हमनें भी तो 40 के ऊपर की रबड़ी चाट ली है ...

हमनें एक और चिकनी गजल ठुकराईन पे दाबी और इस बार उन्होंने फिर घूंघट हटा कर फिर हमें आँख मार दी ....मतलब हमनें यही कोई सवा सात गजल सुनाई ...और ठुकराईन ने ठेठ सत्तार की हमें कुल पाँच दफा आँख मारी ....

रात एक तकिया टाँगों के बीच फंसाया और एक कलेजे में लगाया और ठुकराईन को याद कर-कर के आँहें भरी ..इसके बाद हम ठुकराईन के दीदार (दर्शन) को मचल उठे ...सोते -जागते ..उठते -बैठते ..हल्के होते सब जगह ठुकराईन ही ठुकराईन दिखाई देती ...

हमनें मन में 132 दफा ठुकराईन को अंग्रेजी जबान में आई लभ यू भी कह दिया है और अपने होने वाले बच्चे का नाम भी सोच लिया है ...ठाकुर साहिब ..आज मरे कल बरसी की उमर में टहल ही रहें है ...कल कोठी भी हमारी ..ठुकराईन भी हमारी और जब अकड़-रोकड़ जेब में तो फिर न चुराई गजलें अपने नाम से पढ़ेंगे और न किसी को अपनी पैदाइश पर चुटकी लेने देंगे ....

.हम कव्वे , बटेर सबके हाथ अपनी मुहब्बत का पैगाम ठुक ( अब प्यार से हम उन्हें ठुक कहते है ..पूरा नाम लेते है तो ससुरा पान की पीक निकल जाती है और कपड़े   ख़राब हो जाते हैं ) को भेजते है मगर ठुक के भेजे जवाब को हम इसलिए नही समझ पाते क्यूँकि परिंदों की जुबान हमें नही आती ...अब जमाना स्मार्ट फोन और  इंटरनेट का जुरूर है मगर हम बेनाम घराने के हैं और आम आदमी सी मुहब्बत करके अपनी इज्जत और कद को खाक नही करना चाहते ...

.हमनें इस मुहब्बत के चलते प्लान भी बना लिए है ...कल डॉक्टर साहिब मियां पुन्नूलाल से हमनें सम्पर्क करके अपने टेस्ट  भी करवा के कलेजा तर कर लिया है मतलब  हम अभी भी बाप बन सकते हैं ...हम तो चोर-धापी की गा- खाकर टेम निकाल लेते है लेकिन जो हमसे मुहब्बत कर बैठी वो तो मोम सी गलती होगी ....
हम ठाकुर की बुझती जिंदगी पर जुआ खेल कर इन्तेजार कर सकते थे लेकिन ठुक को उस खूंसट  और शराबी ठाकुर का निवाला बनते रोज देखना अब हमें मंजूर न हुआ भाड़ में जाये कोठी और जायदाद ...हम ठुक को अपनी नीलाम कोठी पर भी रख लें तो हमनें गोया मजनू से जियादह और रांझे से ढेढ़ गुना औकात कमा ली ...

लेकिन  ठुक को कैसे खबर करें कि हम उनको आज रात उनकी कोठी से भगाने वाले है ....हमनें अब तक के अपने बाप -दादा -परदादा सबके पायजामे निकाले और उसमें से अब तक के सारे मजबूत नाड़े खींच सबकी एक मोटी रस्सी बनाई ..बाजार से भी रस्सी खरीद सकते थे ...लेकिन आम आदमी सी भगाई लिल्लाह हम को बर्दाश्त नही ...

.रात को अचकन का छींट वाली शेरवानी पहन और  सीधी कलाइयों में  फूल  बाँध हम ठुक की ख्वाबगाह ( बैडरूम) के नीचे पहुँचे ...नाड़े की रस्सी को ऊपर फेंका ...लेकिन ससुरी किसी में अटकी ही न ...37 बार कोशिश की तो पता नही किस हाथी के औजार में फ़ंसी ...खैर ऊपर चढ़े ही थे कि फिसल कर फिर नीचे आ गए ...हम समझ गए माजरा क्या है ...हमनें जेब से इतर निकाला और उसे कपड़ों पर लगाया ..इत्र फूलों वाला था ...हम ये सोच कर लाये थे ...कि जब व्याकुल और पिया विरह में तड़पती  ठुक हमें अपने सामने देखेगी तो धाप के आएगी और गले लग जायेगी ...

लेकिन दो फलांग  ही ऊपर चढ़े थे तभी एक बदमाश आवारा भँवरा हमारी तशरीफ़ में काट गया ...वो हमारी तशरीफ़ को  कोई गुलों का बागीचा समझ बैठा ...और हम तशरीफ़ के बल नीचे आ गिरे ...ऊपर का होंठ कट गया और सुतली भर जुबान भी ....सारा कसूर उस इतर का था जिसने भँवरे को आकर्षित किया हमनें कुर्ता  और शेरवानी दोनों ही उतार फेंकी ..

.इस बार जैसे ही साढ़े तीन फलांग चढे थे कि महसूस हुआ कुछ चीज हमारे पायजामे में सरक रही है  ...तौबा ये साँप हो सकता है ...हमनें एक झटके में पायजामा उतार फेंका जब हमारी इज्जत नीचे गिरी तो हमनें देखा वो ससुरा हमारा लम्बा नाड़ा था जो हम जल्दीबाजी में बाहर की जगह अंदर पेल बैठे .....खैर घिसते-घिसते  और पसीने से तर जब हम  ठुक की ख्वाबगाह की खिड़की पर पहुँचे और आँखे गाड़ी तो पाया एक अंजान आदमी हमारी ठुक के चेहरे को दाबे उन्हें जबरदस्ती चुम्मा देने वाला था ....

" जलील ..हरामी ...दो बाप के ...खुट्टल सरौते ..खोई जवानी के पिस्सू,...हमारी ठुक से जबरदस्ती करने वाला तू होता कौन है बे हरामखोर ...हमनें लपक के एक घूँसा उसकी ठोड़ी पर दे मारा ...वो धराशाई होकर जमीन पर गिर पड़ा ....

" अबे! नालायकों ..कहाँ मर गए बे ..बन्दूक लाओ ..चोर घुस आया है .....ये आवाज ठाकुर साहिब की लगी तो हमनें पीछे मुड़ कर देखा ....ठाकुर ससुरे वहीं खड़े थे ...खिड़की के फ्रेम में नही आये तो न दिखाई दिए थे ....चार लठैत अंदर दाखिल हुए और कोश-कोश के हमें धूना...जब बदन पर सिर्फ फटा जांघिया रह गया तो ठाकुर को रहम आया ...और उसनें हमें ख्याल कमरे में डालने का हुक्म सुनाया ....

" लठैत बहादुर अबे ये तो बता दो बे ....अबे ये सब माजरा क्या था ...अबे कौन आदमी था वो और क्या कर रिया था हमारी ठुक कने ...देखा न कैसे पत्थर बन गई थी ...न आँसू निकले न चीख निकली ...देखा कितनी मुहब्बत करती है तुम्हारी मालकिन हमसे .....

" लठैत ने पिछवाड़े पर दो लात गेरी और कहा -
" अबे चुर घराने के  ....हमारी मालकिन पैदाइशी गूंगी , बहरी और अंधी है ...वो तो ठाकुर साहब ने उनसे इसलिए शादी की क्यूँकि ये हवेली ये जायदाद उनको मिल जाए ...और वो आँखों का डॉक्टर था जो मालकिन का चेकअप कर रहा था क्यूँकि मालकिन को आजकल घड़ी -घड़ी आँख झपकाने की बीमारी लग गई है ...."

" लठैत बहादुर..मेरे यार एक काम करोगे मेरा ...आज के बाद मुझे चुर घराने का नही चूतिया घराने का कहना ....क्यूँकि वो इंसान जो एक औरत के हँसने ..बात करने और किसी अदा को ये समझ लेता है कि औरत उसपे फ़िदा है उसका हाल मुझ जैसा ही होता है....अब ठोको ......नवाज़िश
#जुनैद..........

No comments:

Post a Comment