...हाय माल ...यूँ मटक ..मटक कर मत चल कोई नमक लगा के चख लेगा ....'
शीईईई..इसको देख यार ....क्या आइटम है यार ....
अबे छोड़ इनको तू देख इस जुगाड़ को ...उफ्फ्फ्फ़ क्या टाइट ..क्या कसी हुई जवानी है ...
ये तीनों मेरे शिष्य है ...मेरा नाम जानकर किसी को एक बाल नफे का फायदा नही होगा ....लेकिन ..मैंने अपनी जिंदगी का घण्टा हमेशा आत्मसम्मान ..स्वाभिमान ..और एक और भारी शब्द यानि निष्ठा से बजाया है ,,, ये तीनों हौले -मौले शब्द अगर किसी चिड़ी दुकानदार को गिरवी रखने को दे दूँ ..तो वो बदले में एक माचिस की डब्बी न देगा ... लेकिन मैं इन तीनों विद्यार्थियों को ये तीनों शब्द और इनका वास्तविक मर्म इसलिए नही समझा पाया क्यूँकि ये तीनों बस मेरी ही कक्षा नही पढ़ते थे ....और जितने पढ़ते भी थे उसमें से आधे से जियादह सोते थे ..बाकि कुछ एक जो नम्बर की भूख रखते थे उनको भी इन लफ्जों से कोई मतलब नही बस अपने काम और कोर्स की बात को पकड़ने का लालच था .....
अभी परसों ही मेरा रिटायरमेंट हुआ है ..तीन बेटियों का विवाह करा चुका हूँ सेलेरी से ...बाकि आखरी का फंड मालिक ...एक घर बनाने की तमन्ना थी लेकिन रहूँगा किसके साथ धर्मपत्नी को गुजरे यही कोई 4 साल हो चुके है ...बेटा नही है मेरा कोई ...इसलिए मुझे मुखाग्नि भी मेरा बड़ा दामाद ही देगा ....सुबह ध्यान, भजन और नेम के बाद पुस्तकालय फिर उसके बाद ...बेंत की कुर्सी पर घर के आँगन में बैठ कर कभी पत्राचार तो कभी कोई दार्शनिक तो धार्मिक पुस्तक का अध्ययन ...कुछ दिनों से अस्थमा बढ़ गया है तो बड़ी बेटी ने शहर बुला कर ईलाज करवाने की बात पर जोर दिया ...अगले दिन छुटकी को लेकर शहर निकल गया .....
अस्थमा की आखरी स्टेज है तो अब शहर से गाँव आना सम्भव नही ...चलता -फिरता भी कम हूँ ...एक दिन यूँ ही बड़े दामाद मोटरसाईकिल से अस्पताल ले जा रहे थे तो बोले -
" पिताजी आप थोड़ा यहीं बेंच मैं बैठिये आगे सड़क निर्माण का काम चल रहा है ...और धुंवा उठ रहा है ... मैं बस किनारे से निकल कर तेल भरवाकर अभी आया.....
बैंच में बैठ मुँह और नाक में मॉफरल रख लिया ....तभी उपर्युक्त आवाजें बगल वाली बेंच में बैठे तीन लड़कों के मुँह से सुनाई दी !
हर आती जाती युवती पर फिकरे ..हर उम्र पर कामुकता प्रेषण ...बर्दाश्त नही हुआ तो उठ के उन युवकों के पास गया ....उन तीनों से नजर टकराई ...मैं उनको पहचान गया ...वो मेरे ही गांव के बाशिंदे और मेरे ही छात्र रह चुके थे ......मेरे मुँह में मॉफलर लिपटा था और सर पर वूलन की टोपी इस वजह से वो मुझे न पहचान पाये ....मैं तुरन्त उन्हें देख लौटा ...और उसी बेंच पर आकर बैठ गया ...साँस उखड़ने लगी थी लेकिन पता नही क्यूँ मेरी आँखों से अश्रु का वेग थम ही नही रहा था ...एक शिक्षक के रूप में मेरी पराजय मुझे स्वीकार नही हो रही थी ....मेरा विद्यार्थी इतना भी गिर सकता है ....तभी मेरे बड़े दामाद आते दिखे ....लेकिन हे ! भगवान मेरे पास पहुँचते ही उन्हें किसी मोटरकार ने टक्कर मार दी .....तमाम भीड़ एकत्र हो गई मेरे तो हाथ -पैर वहीं जड़ हो गए ....मदद इतनी सारी थी जितने सर पर बाल लेकिन सारी मदद मात्र दर्शकों में तब्दील हो चुकी थी ....तभी एक आवाज आई-
हटो बे हिजड़ों ...रास्ता दो .... एक युवा मोटरसाईकिल में बैठा था अन्य दो ने दामाद को उठाकर मोटरसाईकिल पे चढाया ....दामाद जी के पीछे फिर एक युवा बैठा ...और वो उड़नछू हो गया ....फिर एक और मोटरसाईकिल आई उसके चालक ने जोर देकर पूछा -
" अरे ! इस आदमी के साथ कोई है ...?
जैसे ही वो कहकर आगे बढ़ने वाला था तभी मैंने साँस बटोरकर कहा --
" मैं ...मैं साथ हूँ ...मेरे दामाद है यें.....
" आइये पीछे बैठिए ...जैसे ही मैं उसके साथ बैठा मुझे चेतना ने पूरी जोर से हिलाया और मैंने मोटरसाईकिल के दर्पण में उस युवा का चेहरा देखा ...ये तो उन तीनों में से मेरा ही एक छात्र अभिमन्यु है ...... मैं उससे घृणा करके मोटरसाईकिल से उतरने ही वाला था तभी ....उसकी मोटरसाईकिल के आगे एक युवा आकर खड़ा हो गया लेकिन अनायास ही अभिमन्यु बोला -
" देख जुनैद भाई ! तूने जो कहा हमने किया ...तेरी रेकिंग के डर से हम तीनों ने आज अपने मास्टरजी की शिक्षा का बलात्कार किया है...माना हमनें हमेशा उनसे दूरी बनाई लेकिन आज जब अन्य शिक्षकों से अपने मास्टरजी की तुलना करते है तो पाते है हम अभागे थे जो मुफ़्त में मिले उस भगवान तुल्य आदर्शवादी व्यक्ति और उसके आदर्श को न समझ पाये ... लेकिन अब नही ...क्यूँकि हमारे मास्टरजी ने जब ये कहा था शिक्षा प्राप्ति हेतु सब सह लो तो हमेशा वो जोर देकर ये भी कहा करते थे कि ......सड़क पर यदि कोई मरता ..या घायल व्यक्ति दिखे तो पहले सब कुछ भूल कर उसकी सहायता करो .......
" बेटा तुम तीनों पछताओगे .....याद रखना मेरा नाम जुनैद है ....!
" तू अब उखाड़ लियो हमारा जुनैद ......."
तालियां तो दबा के पड़ी और मेरा सीना चौड़ा भी हुआ ....लेकिन पता नही क्या चमत्कार हुआ मेरे विद्यार्थी की बात सुन कर कि पब्लिक ने पहले रेकिंग किंग को घेर कर उसकी सल्तनत का ढोल बजाया फिर संकल्प हुआ कि जुलूस की शक्ल में कोतवाली तक रेकिंग नरेश को ले जाया जायेगा ...फिर रेकिंग उन्मूलन हेतु वहीं पर रूपरेखा भी बनी ..इस निमित्त अनशन का डंका एक बुजुर्ग ने बजाया और महिलाओं ने ढोल आदि का प्रबन्ध किया ...बाकि कनात ...माइक और अन्य इंकलाबी सामग्री भी सब चटपट एकत्रित हुई...और मुझे पहली बार लगा कि भीड़ ही भारत का निजाम बदल सकती है बशर्ते उसको जगाने वाला मेरे विद्यार्थी जैसा कोई ओजस्वी वक्ता हो तब......मैंने बिना मुँह से मॉफलर हटाये गर्व से अपने विद्यार्थी के काँधे पर हाथ रखा और उससे कहा-
" धन्यवाद बेटा !"
वो था तो अधीर परन्तु फिर भी मुस्कुराहकर बोला- " नवाजिश"
#जुनैद...........
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