Saturday, 6 October 2018

विश्वास

" हेल्लो अंकल ये मेडिसन शॉप कहाँ है...."

" हें ...क्या कहा बेटा ..?"

" अंकल  ये दवाई की दुकान कहाँ मिलेगी ...?"

" ओह्ह्ह ...बेटा लेकिन वहाँ तुम्हारी ये कार नही जा पाएगी ...वो क्या है न एक ही दुकान है यहाँ ...आबादी भी जियदाह नही तो इस बजह से ...रमेश लाल ने अपने घर में ही छोटी सी दुकान खोल रखी है ...थोड़ा -बहुत जस भी है हाथों में .....

" अबे ये बुड्ढा बहरा होने के साथ चुतिया भी है रॉक ...

" अबे हल्के बोल ....एक काम कर तू हिल्यो मत चुपचाप आँखे बन्द कर ले मैं पत्ता फिट करता हूँ .....

" हाँ तो अंकल मैं पूछ था था कितनी दूर होगी यहां से ...चलना कितना पड़ेगा ...?(ऊँची आवाज में )

" बेटा तुम देशी लगे हो ...तो थोड़ा समय लग जाएगा वो क्या है एक तो सीढियां बहुत है और ऊपर से वो भी उबड़ -खाबड़ .....

" ओह्ह्ह्ह... शिट...?

" क्या हुआ बेटा ...किसकी तबियत ख़राब है ...?

" तबियत ...हाँ अंकल तबियत ख़राब है ये मेरा फ्रेंड रॉक ....बहुत बीमार है ....इसको छोड़ कर जा भी नही सकता ...और बिना दवाई के इसकी हालत और बिगड़ती जा रही है ....ओह्ह गॉड अब क्या करूँ ...हेल्प मी !

" एक काम करो बेटा ...दवाई  मैं ले आता हूँ ...आप उसका नाम लिखकर दे दो ...और ये जरा मेरा तरकारी का झोला अपनी गाड़ी में रख लो ...

उस वृद्ध के जाते ही -

" हा हा हा .....तू नही सुधरेगा जुनैद ...साला क्या चुतिया बनाया बुड्ढे को .....चढाई से भी बचे और रगड़ाई भी करवा दी हा हा हा ......"

आइये पण्डित जी ...आज शाम कैसे दर्शन हो गए सब कुशल मंगल तो है ...अरे मुझे सन्देशा भिजवा देते ...फोन कर देते पण्डित जी ...मैं स्वयं आपके चरणों से आज्ञाग्रहण करने हेतु आ लगता...

" अरे रोशनलाल बेटा ..ये दो बच्चे शहर से आये है परदेशी है बेचारे ...एक की तबियत बड़ी ख़राब है ...मैंने कहा तुम उसका ध्यान रखो मैं दवाई ले आता हूँ ......

" वाह ! पण्डित जी वाह ! आप वास्तव में इंसानियत की एक मिसाल है तभी पूरा गाँव आपके नाम की कसमें खाता है ....लाइए दीजिये वो पर्चा .....

रोशन लाल पर्चे पर लिखे लफ्ज देख ठिठक जाता है ...

" पण्डित जी ...आपको धोखा दिया उन्होंने ...किसी की तबियत नही खराब है बल्कि दोनों की नीयत ख़राब है .....छोड़ेंगे न पण्डित जी ....आइये .

" अरे रोशन ...अरे सुनो बेटा ..अरे हुआ क्या ...अरे .....

रोशनलाल ने गाँव के कुछ एक लोग और जमा किये ...और उन्हें पूरा मुआमला बताया .....एक भीड़ तेजी से सीढियां उतरकर उस गाड़ी तक पहुँची ....किसी अनर्थ की आशंका से भयाकुल पण्डित जी ने भी अपनी उम्र के सम्मिलित प्रभाव से जियादह तेजी इख़्तियार की  ...

" हरामजादों ..नीचों...निकालो सालों को बाहर ...."

" शीशे फोड़ डालो ...."

दोनों लड़के गाड़ी के अंदर कैद हो गए क्यूंकि गाड़ी के आगे और पीछे मन भर बड़े पत्थर टायरों के आगे पटक दिए गए .....तभी एक व्यक्ति ने गाड़ी का शीशा फोड़ा और एक लड़के का गिरेबां पकड़ लिया ......

" दरवाजा खोल वरना तुझे खोल देंगे ....."

दोनों को बाहर निकाला गया ....और कुछ तमाचे लातें और घूँसे शुरू ही हुए थे कि पण्डित जी बीच में आ गए .....

" ये क्या कर रहे हो तुम लोग ....क्या ये हमारे गाँव की परम्परा है ...जला दो पहले गीता रामायण और वेद फिर अथितियों पर इस तरह प्रहार करना ...या एक काम करो मेरी लाश बिछा दो पहले ...

तभी एक व्यक्ति भीड़ के बीच से निकला ....

"पण्डित जी आप जानते भी है कि इन लफंगों ने आपसे क्या मंगवाया ...?

पण्डित जी बोले .....

" क्या मंगवाया ...?'

" पण्डित जी हमें आपसे कहते हुए लाज आ रही है ...और इनको अपने बाप की उम्र से भी बड़े बुजुर्ग से वो मंगवाने में शर्म नही आई ......

" हमें माफ़ कर दो अंकल ...हम आगे से ऐसा दुबारा कभी नही करेंगे ..हमें जाने दो ...प्लीज हमें छोड़ दो ....

तभी रॉक अकेले बोला -

" वैसे भी अंकल से मैंने कुछ नही मंगवाया ...ये ..ये जुनैद ने अंकल से झूठ बोला ...इसी ने मुझसे बीमार का बहाना बनाने को बोला ...मैंने कुछ नही किया ....सब इसका किया धरा है ......

" नही अंकल इसने कहा था कि मजे करने चलते है हिल स्टेशन .....

" मुझे नही पता तुम दोनों ने मुझसे ऐसा क्या मंगवाया ..जो बात यहाँ तक पहुँच गई ...बच्चों जानते हो ये सब लोग क्यूँ गुस्से में हैं ...क्यूँकि मैंने कभी न किसी के ऊपर गुस्सा किया ...न कभी झूठ बोली ...न किसी को धोखा दिया और न किसी भी आयु वर्ग के प्राणी का उपहास या असम्मान किया ....लेकिन जानते हो तुम क्यूँ दया की भीख मांग रहे हो ....क्यूँकि तुमने उन सब चीजों को आत्मसात किया जिसे मैंने त्यागा .... मैं गठिया का मरीज हूँ सीढ़ी चढ़ता हूँ तो हर साँस से चीख निकलती है लेकिन जानते हो आज जब मैं सीढ़ी चढ़ा तो मुझे रत्ती भर भी दर्द नही हुआ ....इसकी दो वजह थी पहली ये कि तुम्हारा दोस्त बीमार था ...और दूसरी ये कि तुम्हारी दोस्ती और एक-दूसरे का एक दूसरे  के प्रति समर्पणभाव ....वास्तव में मित्रता यही है .....परन्तु इंसानियत से तो तुम उसी समय गिर गए जब तुमने एक वृद्ध को धोखा दिया लेकिन उसके साथ -साथ तुम दोनों ने सिद्ध कर दिया कि तुम दोनों किसी कि भी मित्रता के लायक भी नही .....क्यूँकि संपत्ति हो या विपत्ति .....तम कितना गहरा हो ...परीक्षा कितनी भी जटिल ...और मार्ग कितना भी टेढ़ा हो मित्रता ही वो समाधान है जिसके पास हर समस्या और पारस्परिक पीढ़ा का हल है ....जानते हो मित्रता तो वह धर्म है कि अधर्म पर भी मित्र का साथ नही छोड़ती ......दफा हो जाओ यहाँ से.....

और ओंकारनाथ ....इनके जाते ही इसी स्थान पर उन समस्त लोगों का फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुसलमान जिन्होंने इन दोनों को किसी भी प्रकार से स्पर्श किया  ..एकत्र करो सभी को.....सभी का उनके धर्म के धर्मगुरु आकर शुद्दिकरण करें ...

और मैं पण्डित तेजेश्वर शास्त्री जहाँ इन पशुहीन प्राणियों का वाहन खड़ा है ...जिस धरा पर इन्होंने पैर धरा है का स्वयं अपनी जटा खोलकर अपने हाथों में अपना ही गमछा  जल के मांत्रिक प्रभाव में भिगोकर अपने  हाथो से इस धरा का भू- शुद्दिकरण करूँगा और तब अन्न-जल से अपरिचित रहूँगा जब तलक  मैं यह सुनिश्चित न कर लूँ कि मेरा गाँव ...मेरी भूमि ...मेरे लोग ....इन स्वार्थियों ..लोभियों ...भोगियों और मित्रताहीन जन्तुओं के किसी भी आसुरी कुप्रभाव से सुरक्षित हैं... और अपनी मानवता एवं मित्रता के प्रण पर अडिग है .......नवाजिश
#जुनैद...........

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