" जितेन्द्र ..अरे ! ओ जितेन्द्र ....
" जी पण्डित जी "
" अबे ! का माँस पका रहे हो ?"
" आज उपवास लिए है पण्डित जी ...रामायण देख रहे थे ...का आवाज बढ़ा दे ..पवन पुत्र,, माँ सीता से सम्पर्क कर लिए है .......
" जय श्री राम !....साधु ..साधु ...जितेन्द्र आज के युग में तुम जैसे युवक एवं पुत्र पैदा ही नही होते ...देखो ..देखो बेटा ...और आवाज रहिने दो ..हम कुछ बिल -हिसाब जोड़ रहे है !
पण्डित ओंकार नाथ शास्त्री बेऔलाद है ,, शादी के तीन महीने बाद ही रंडवे हो गए ..दूसरी इसलिए नही की , कि भारत जागृती एवं निर्माण सभा ज्वाइन कर लिए ...ब्रह्मचर्य , नेम -व्रत , संस्कृति और धर्म के पुनः सनातनी स्वरूप के पुनरुत्थान को जिंदगी समर्पित कर दी ..और जब-जब शरीर में जोश और तपन हुई राम नाम जप लिए और सर पर बाल्टीभर ठंडा पानी उड़ेल लिए ..आज 62 की उम्र में वो इसी संघ के सभापति है ।
हनुमान भक्त है ,, सुरा -सुंदरी और माँस से दूर रहते है ...लेकिन सबसे अधिक अगर उन्हें कट्टर ईर्ष्या है तो विधर्मियों से ...जबकि विधर्मियों से बचपन से ही उनकी दुआ सलाम बन्द है ....लेकिन उनकी नफरत कभी उन्हें हिंसक नही होने देती ..वे हिंसा के सख्त खिलाफ है ..उनका विश्वास है कि जिस दिन सनातन परम्परा एवं संस्कृति अपने गौरव को प्राप्त कर लेगी ...उसी दिन राम राज्य स्थापित होगा !
जितेंद्र जो स्वयं में जूनियर ओंकारनाथ है ..उन्ही की तरह हनुमान भक्त ...आज से तीन महीने पहिले ओंकारनाथ की भेंट जितेंद्र से बस्ती के हनुमान मन्दिर में हुई थी ,, उसका अत्यंत मीठा हनुमान चालीसा का पाठ सुन ओंकारनाथ स्तब्ध हो गए ..और उसके बाद उन्होंने आगे बढ़कर उसे अपने गले लगा लिया ...बेरोजगारी से त्रस्त जितेंद्र ने अपनी आपबीती ओंकारनाथ को सुनाई ...और ओंकारनाथ ने जितेंद्र को बिना किसी प्रमाण -पुष्टि के अपने हृदय और अपने किराने की दुकान में स्थान दिया ।
ये तीन महीने मैं जितेंद्र और ओंकारनाथ का रिश्ता आत्मीय हो चला था...शुक्रवार के दिन जितेंद्र हमेशा एक चक्कर अपने घर हो आया करता था ..जो बस्ती से कुछ मील जी दूरी पर था ,,,,लेकिन आज न जा सका क्यूँकि ओंकारनाथ को कुछ काम आन पड़ा शहर में ।
दिन का काम निपटा कर ओंकारनाथ चिलचिलाती दोपहरी में जब बस मैं बैठे ट्रैफिक का शिकार थे ...तभी उन्हें सामने एक मस्जिद की सीढ़ी में कुछ युवा हँसी -ठिठल्ली करते दिखाई दिए ......ओंकारनाथ की नजर उन की हँसी -ठिठल्ली पर धँसती चली गई ...,और उन्होंने उन विधर्मियों को देख उनसे मुँह फेर अपने सर में राम नाम का दुशाला ओढ़ लिया ।
क्रोधित घर पहुँचे , जितेंद्र को आवाज लगाई ...उससे दुकान की दशा और आज के व्यापार की जानकारी ली ...आज जितेंद्र को उन्होंने अनायास ही फटकार लगा दी ....
रात भर आज उन्हें करवट में रत्ती आराम न था ...कुछ देर राम नाम जाप किया ..फिर उसमें भी मन न लगा ..छत पर गए और टहलते रहे ... रात के तीन पहर कट चुके थे ...तभी उनको एक आवाज सुनाई दी ...वो हल्के पैर तेजी से छत से उतरे और एक खिड़की से जा लगे...
" अम्मी ! रोइये मत मुझे कुछ नही होगा ...पण्डित जी ! मन के बुरे नही है ..अपने बच्चे की तरह पालते है मुझे ..कितने बार कोशिश करता हूँ कि उन्हें सब सच बता दूँ लेकिन डरता हूँ कहीं इंसानियत में धर्म शामिल हो गया तो ...फिर रुकसाना बाजी का निकाह कैसे होगा ..? अब्बू का हर हफ्ते खून कैसे बदला जायेगा ..? मालिक मकान का किराया .. अच्छा अम्मी अभी रखता हूँ पण्डित जी के उठने का वक्त हो रहा है .....
यहाँ पण्डित ओंकारनाथ अब स्तब्ध नही थे क्यूँकि उन्होंने दिन में ही जितेंद्र को मस्जिद की सीढ़ियों में अपने मित्रों के साथ देख लिया था ..अगर वो माँ-बेटे की ये बात नही सुनते तो कल का दिन जितेंद्र की जिंदगी का सबसे बदतर दिन होता ...
खैर उन्होंने एक संकल्प लिया क्यूँकि वो जानना चाहते थे या ये ही एक जिज्ञासा उन्हें जीवन में सबसे अधिक बैचैन कर रही थी.. कि एक मुसलमान का बच्चा इतना अच्छा हिन्दू कैसे हो सकता है जिसे कंठस्थ हनुमान चालीसा ..रामायण की विभिन्न चौपाइयां ..गायत्री मन्त्र , नेम -हवन की विधियां सब आती ही नही अपितु कंठस्थ याद हैं ...खैर वो राज से पर्दा फाश करने हेतु अगले शुक्रवार का इन्तेजार करने लगे ...
अगले शुक्रवार को उन्होंने जितेंद्र का अपनी बासी खटारा कार से पीछा किया ..वो सीधे कस्बे से जाती दोराही सड़क पर पहले पैदल चला उसने पीछे देखा ...फिर वहां खड़ा हो गया ..वहां से एक बस पकड़ी ...आगे जाकर उतरा फिर दूसरी बस पकड़ी ...फिर उतरा और और एक कच्चे रस्ते से में निकल पड़ा ...जैसे -जैसे उसका घर करीब आया ..पण्डित ओंकारनाथ की आँखे फ़टी की फटी रह गई ...मन्दिर और मस्जिद बिलकुल साथ -साथ खड़े थे ..एक दाढ़ी वाला मुल्ला मन्दिर के फर्श की सफाई कर रहा था ...एक भगवाधारी मस्जिद में रंग वार्निश कर रहा था ..परन्तु उनका ध्येय जितेंद्र था ....
जितेंद्र ऐसी ही कई गलियों से गुजरता हुआ ..आगे बढ़ा तो ओंकारनाथ की आँखे फैलती ही चली गई ...गंगा -जमुनी सभ्यता का ये नजारा कभी उन्होंने ख्वाब में भी नही देखा था ... और तो और उन्हें इस पूरे गांव में न कहीं फूहड़ता दिखी ,,न नग्नता ,, न हिंसा , न कोई शराब की दुकान और न कोई मांस का खोमचा ...वो कार वहीं रोककर पैदल ही आगे बढे ...जितेंद्र एक मिटटी पत्थर के घर में घुसा और फिर -
" अल्हम्दुलिल्लाह ! जीतू तू आ गया बेटा.. बैठ ! ..पहले मैं खाना लगा देती हूँ ..."
" नही अम्मी ! खाना बाद में पहिले आप ये पैसा पकड़िये ये हमारी तीन महीने की कमाई है कुछ खर्च कर लिये लेकिन अब वहां काम न करेंगे ...कल शहर जाकर कोई और काम खोजते है ....हम पण्डित जी को और धोखा नही दे सकते !
" किसने कहा तू उन्हें धोखा दे रहा है ,जबकि तू तो मेरा बच्चा इंसानियत की इक मिसाल है ...तेरे माता- पिता जी का जब निधन हुआ था तब 3 साल का था तू.. तभी से तुझे अपनी औलाद मानलिया था बेटा ..मेरी कोख से पैदा नही लेकिन तू मेरे दूध से परवरिश पाया हुआ है ...जब तू पैदा हुआ था तभी तेरे पिता आत्माराम जी कहा करते थे कि एक दिन तू बहुत बड़ा आदमी बनेगा ...और एक बहुत बड़ा इंसान भी ..और देख बेटा तू बन गया !
" नही अम्मी ! मुझे कुछ याद नही बल्कि इंसान तो आप लोग हो जिन्होंने न कभी मेरी प्रकृति , न स्वरूप् बदला ,, न मेरी सोच , न मेरा धर्म ...बल्कि अब्बू ने तो मुझे एक सच्चे सनातनी हिन्दू होने की खुली छूट दी ...उन्होंने मेरा वियोग सहकर सीने में पत्थर रख मुझे गुरुकुल भेजा , मुझे मेरी धार्मिक शिक्षा और संस्कारों में दक्ष करने में अब्बू ने अपना पेट काटा ...आपने मुझे सगी माँ की तरह पाला ...रुकसाना बाजी ने हर साल मुझे राखी बांधकर कभी कुछ अलग लगने ही नही दिया ..इंसान तो आप लोग है ....
जब अंदर तू इंसान, तू इंसान हो रही थी तभी पण्डित जी राम नाम के गमछे से आँसू पोंछते हुए अंदर प्रवेश किये ...और बिना नमस्कार ..सलाम- आदाब किये दो सवाल दागे कि
" क्या तुम माँस खाते हो जितेंद्र ...और हर शुक्रवार मस्जिद क्यूँ जाते हो ...?"
बड़े अचम्भे , भय और सकपकाहट का माहौल बन गया था ....जिसे जितेंद्र के अब्बू ने अंदर से खटिया से खाँस कर तोड़ा -
" माँस नही खाता बच्चा मेरा ...और रही बात मस्जिद की तो कस्बे के उसके सभी मुसलमान दोस्त जिनके साथ वो खेल कर बढ़ा हुआ उनसे मिलने जाता है क्यूँकि शुक्रवार ही वो बहाना है जहाँ एक मस्जिद की सीढ़ियों पर गंगा-जमुनी तहजीब मिलती है.. ठीक वैसे ही जैसे मेरे गांव के मन्दिर -मस्जिदों में मिलती है .....
ओंकारनाथ बदल चुके थे ये तो पता नही लेकिन जितेंद्र के अब्बू का डायलियोसिस खर्चा ..बहन की शादी ..भवन निर्माण ..भोजन पानी की जिम्मेदारी अपने सर ले ली ...और माँगा सिर्फ इतना कि जितेंद्र को मुझे पुत्र कहने अथवा पुत्र समझने का अधिकार दे दो ....
खैर आज सब सुखद चल रहा है लेकिन मैंने अक्सर अब भी ओंकारनाथ को जितेंद्र के किचन में झांकते हुए देखा है ....क्यूँकि उन्हें अब भी शक है कि लौंडा कहीं सच में मांस तो नही खाता ......नवाजिश
#जुनैद.......
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