Friday, 19 October 2018

दशहरा

"" ! विजयदशमी   !""
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" जुम्मे की नमाज के ठीक बाद मैं ...जंतर -टोना , खेल-खिलौना  सुलेमान चिच्चा के घर की ओर गिया ....मैं रामपुर से हूँ लेकिन राम से मेरा कोई सरोकार नही ...

अब्बे ! चिच्चा क्या कर रिये हो ...?

" अब्बे मन्नूस तू फिर आ गिया ..दफा होले अबी इहाँ से बरना ये गरम अल्तुआ दाग दूँगा तशरीफ़ में !

" मल्लब सलाम दुआ भी न फेरे अब ...बो क्या है आज छुट्टी है कॉलेज की तो लपक लिए इहाँ ..जरा एक टाँका चेप दो हमारे टीवी में तार टूट गया उसकी पलेट का  ...

" अब्बे ! देख न रिया फूँकनी के बीजी हूँ अबी ...कल आइयो कल ! "

कुछ बड़बड़ाते हुए चिच्चा ..आँखों में एक चमक लेकर अंदर वाले कमरे में दाखिल हुए ...मुझे दाल में कुछ काला लगा ..मैं भी उनके पीछे लपक लिया ...

" या अल्लाह ..ये क्या जंतर है चिच्चा ..अबे ये क्या बवाल बना दिए चिच्चा ....

"भूतनी के तू न गया ....निकल ले बरना हमसे बुरा न होगा कोई "

" मेक लेके पूरे शहर में बता दूँगा कि तुम कुछ लोचा कर रिये हो ..कोई बम बना रिये हो ...और फिर जब पुलिसिये बिन गोश्त की तुम्हारी तशरीफ़ पर डंडे लेकर चढ़ेंगे तो समझ लियो ....

" हे हे हे ...जुनैद बेटा..कमीना तो तू बचपन से था आज जलील भी हो गया ...अच्छा रुक मन्नूस सुन किसी से कहियो मत ये है टेम मशीन ...इससे गुजर चुके दौर में पहुँचा जा सकता है ...!

" ही ..ही..ही.. अब्बे चिच्चा चकललस काट रिये हो ...फ़िल्म चलरी है क्या ...

" तबी के रिया था मन्नूअस निकल ले इहाँ से तू जतिया और घुड़िया अक्ल न समझेगा ....

" ( हँसी रोकते हुए ) अच्छा चिच्चा ये काम कैसे करे है ...मल्लब अकबर से मिलवा देगी ...ग़ालिब से ...मल्लब हुजूर के दौर का  मदीना पहुँचा देगी ...या फिर कर्बला ....

" तू इसका जंतर देखना चाहता है तो घुस इसके अंदर और इसके अंदर घुसते ही लाल बटन दबाने के बाद जो नाम तू लेगा ये मशीन तुझे वहीं पहुँचा देगी ...लेकिन सुन ले मन्नूस वापसी तबी होगी जब तू गुजरे दौर में कोई भला काम कर के लौटेगा ...

" ही...ही...ही... चरस मत फूंकिया करो दिन में ...अच्छा मैं टेस्ट ड्राइविंग लेता हूँ ...

मशीन के अंदर घुसते ही ...मैंने इधर -उधर झाँका और फिर लाल बटन दबाया ..तभी मेरा फोन बजा ...फोन जमील का था ..वो पूछ रिया था आज कॉलेज क्यूँ बन्द है क्या है आज ..?

मैंने कहा -" दशहरा " !

मशीन में हल्का धुंवा उठा ...और चिच्चा ने अपने सर पर हाथ कूट लिया ...

मशीन मुझे लेकर पहुँची एक समुद्र के किनारे ...मेरा मोबाइल ..मेरी घड़ी ...सब अपने आप ऑफ़ और जेम हो गए ...
मैं मशीन से बाहर निकला तो कुछ आवाजें कान में गिरी .....मैं तेजी से उस ओर गया ...और जो देखा देखते ही रह गया ...एक बहुत बड़ी भीड़ ,, इंसानी बन्दर ..भालुओं की लगी थी ...मेरी गीली हो गई ..मैं वहीं एक बड़े पत्थर के पीछे छिप लिया ....

इस भीड़ के मध्य मुझे दो   बहुत ही हसीन चेहरे दिखाई दिये ...जो शक्ल से पूरे इंसानी थे ....मैंने सोचा मेरी तरह बुरे फँस गए बिचारे बन्दर ,भालुओं के बीच  ... लेकिन फिर मुझे लगा शायद कोई शूटिंग चल री है ....और ये सब कुछ मेकअप और सेट का कमाल है ...मैं बाहिर निकला और आवाज दी ...हेल्लो ..हेल्लो...

" तभी दो मजबूत  इंसानी बन्दर मेरे पास आहे और मुझे पकड़ के उन दो खूबसूरत इंसानों के पास ले गए ....बन्दर , भालू मैन मुझे एकटक देखने लगे

"  क्या देख रिये हो कोई हैंडसम लौंडा न देखा कभी किया  ...पठान सूट है ये ..जुनैद रॉयल पठान कहे है पूरा रामपुर मुझे ....

सभी मेरी झूठ सुनकर हँसने लगे ...लेकिन  उन दो इंसानों में सिर्फ एक ही  मन्द -मन्द मुस्कुराह रहे थे दूसरे बिल्कुल शांत थे .....

" आप हँसते नी हो जी ..?"
" तभी वो बहुत ही आजिजी से बोले -

" जुनैद ! अब तुम कलयुग में नही त्रेता युग में खड़े हो ...मैं दशरथ पुत्र राम हूँ और ये मेरे अनुज लक्ष्मण , ये हनुमान ..ये मेरे मित्र सुग्रीव जी , ये विभीषण जी ...ये समूल मेरी सेना है ...जो अब से कुछ क्षणों बाद लंका पर आक्रमण करने वाली है ...

पूरा सीन समझ गया ...टेम मशीन ने अपना पूरा काम किया ....मैं कुछ बोलता इससे पूर्व ही श्रीराम बोले ...

"घबराओ मत तुम युद्ध के उपरांत अपने समय में पहुँच जाओगे ...इसका उत्तदायित्व मेरा है .. तुम शिविर में आराम करो ...हनुमान हमारे अतिथि को शिविर में ससम्मान ले जाओ ......

" हनुमान ने शिविर में ले जाते वक्त मुझे पूरी कहानी सुनाई ...आँखों से आँसू गिरने लगे ...शिविर में मन न लगा ...तो सोचा क्यूँ न एक बार रावण से मिल आऊँ ....और मैं चुपचाप लंका में रावण से मिलने उसे समझाने पहुँच गया ...दबे पैर उसके महल में दाखिल हुआ ....मैंने देखा एक लम्ब -धड़ंग आदमी खड़ा है और युद्ध के लिए तैयार हो रहा है ...एक जनानी उसकी बगल में खड़ी थी तभी वो जनानी सिसकते हुए  बोली -

" युद्ध टाल क्यूँ  नही देते है आप ..समस्त पुत्र ..समस्त वीर, वीरगति को प्राप्त हो चुके है ...हे स्वामी !जानकी को ससम्मान लौटा दीजिये ...मैं श्रीराम को जानती हूँ वो आप को क्षमा ही नही करेंगे अपितु सम्मान भी प्रदान करेंगे "

" जानता हूँ मंदोदरी ...सब ज्ञात है मुझे ...परन्तु अब यदि अपने पुत्रो ..भाइयों ..लंका के वीरों को अपने अहम के कारण जो मैंने काल के गाल में समाहित करवा दिया है ...क्या वो मुझे लोभी ..निर्लज्ज , स्वार्थी और कायर न समझेंगे ...? क्या वो मुझे क्षमा करेंगे ....?.मैं जानता हूँ मेरी मृत्यु अटल है ...राम भी जानते है कि मेरा काल उन्ही के हाथो आ ठहरा है ... वो वहाँ युद्धक्षेत्र में इसी लिए व्याकुल है कि रावण अब अहम के लिए नही बल्कि मोक्ष के लिए युद्ध लड़ रहा है ....तो उसका उसका तारण कैसे करूँ ...समस्त वानरों ..रीछों और उनके भ्राता लक्ष्मण में हर्ष है कि असहाय रावण अब न टिकेगा लेकिन जीत का मद बस राम को नही है ...वो शांत है ..अधीर है ...वो चाहते है कि मैं उनके चरणों में आ लगूँ परन्तु वो  ये भी चाहते है कि मैं अपनी जान का अभय प्राप्त कर अब निर्लज न बनूं और आने वाला युग अवश्य मुझे पापी कहे लेकिन कुलहन्ता एवं कायर न कहे.......!
मैं चलता हूँ मंदोदरी मेरी मृत्यु पश्चात स्वाभिमानी और पावन सीता को ससम्मान  राम को सौंप देना !"

खैर युद्ध हुआ ...और रावण की मृत्यु भी.... सब और राम की जय-जयकार थी ...उत्सव जैसा माहौल था ...सब नाच -गा और झूम रहे थे ...लेकिन एक राम ही गंभीर मुद्रा में खड़े थे ...और रावण को अपलक देख रहे थे ...रावण में अब भी कुछ जान थी ...और वो सस्नेह और अश्रुपूर्ण नेत्रों से राम हो निहार रहा था ....राम ने उसकी नेत्रों की भाषा को समझा और उसे मोक्ष की यात्रा की स्वीकृति दी ।

मेरे दिमाग और दिल में राम की इज्जत इस कदर बढ़ गई थी कि मैंने राम के समीप जाकर उनसे अर्ज किया -

" राम जी ! बाप कसम आप सा नी देखा कोई ...कसम खुदा की वाकई आप इंसान नी हो ...सब कुछ टापा शुरु से अक्खीर तक लेकिन न आपमें चिलबिलाहट देखी ..न देखा गुरूर ...न देखा किसी मासूम पर बाण गेरेते ,,, न किसी निर्दोष को सताते ...और तो और आखिर में अपने भाई को भी आपने रावण के पास नॉलेज  लेने भेज दिया ....अगर आप इतने खामोश ..इतने मीठे ..इतने अहिंसक , इतने शालीन है तो फिर कलयुग में आप हमपर इतने क्रोधित क्यूँ है .....

राम जी बोले -

" जुनैद ! मैं कहाँ किसी पर क्रोधित हूँ ..मैं तो क्रोध का ही दलन करने उत्पन्न हुआ हूँ ..क्रोध की नियति सदा मिटने की होती है ...ये रावण क्रोध ही तो था ..इसकी दुर्गति देख लो ! और बात रही कलयुग की तो ...हर युग में ईश, ..पैगम्बर अवतरित हुए है ..और अपने समय का शुद्धिकरण किया है... मैंने भी तो मात्र वही किया ...कलयुग में सब कुछ मनुष्य के अधीन इस निमित्त सौंपा गया है कि मनुष्य स्वयं को ही ईश और अनश्वर मान चुका है ....उसके पन्थ ..उसके विवेक का बंटवारा हो चुका है ...और जब विवेक का सारथी क्रोध ,मद और अहं बन जाता है तो हिंसा का उदय होता है और जहाँ हिंसा और अहं वहाँ मेरा क्या काम !

राम जी का संवाद् समाप्त होते ही मैं अपने वक्त में पहुँच गया ....चिच्चा सुलेमान बोले कि अब्बे क्या भला काम कर के लौटा मरदूद....

वो क्या समझेंगे जबकि मैं अपने मन का मैल ..गुरुर और स्वयं श्रेष्ठता का रावण त्रेता में ही फूँक आया था ....अब जहां अपने शहर के नाम पर फक्र था वहीँ अपने अल्लाह की जात पर कि उसने मुझे श्री राम से मिलने का मौका दिया ....नवाजिश
#जुनैद......

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