फौजी हूँ चचा ..मुल्क की हिफाजत करता हूँ !
शकीना की अम्मी अबे खींच लियो बे ..लकड़ी चूल्हे से ..कुछ न पकाइयों ...लौंडा फौजी है फौजी !
चचा मजाक अच्छा करे हो आप ...
अबे मजाक नही कर रिया मियां .,सोलह आने सच्ची बोल रिया हूँ ..समझे ?
क्यों फौजी में क्या खराबी है चचा ?
मियां लौंडिया को बेवा (विधवा ) नही कराना । देखा न काश्मीर में क्या हो रिया है ....?
तभी शकीना की अम्मीजान ने बावर्चीखाने ( रसोईघर) के पर्दे के पीछे से हल्की आवाज में कहा .." मियां सुना है बारात चढ़ाई के दिन भी सरहद से बुलवाई का पैगाम आ जाता है "
व्हील चेयर पर मुंह में पान की सुपारी से लोहा लेती शकीना की 3/4 पोपली दादी ..पहिये खिसकाकर पास आई और कान में हौले से बोली " मियां हमने तो जे तक टापा है कि सुहागरात में चिपकते ही फौजी दरवाजा कूटने लगता है ..की जंग छिड़ी है ..बॉर्डर देखी है मैंने ही ही ही ....
बड़ी बेइज्जती खा- चबा कर जब मैंने शकीना की देहलीज लाँघी तभी फोन पर मेसेज आया ...
" मियां पहले ही कहा था अब्बू को मत बताइयो कि फौजी हो आप ...अब भूल जाइयो मुझे ।"
उसके बाद शकीना का नम्बर कभी स्विच ऑन नही हुआ ...
अजानों के बीच से होता हुआ ..मैं बढ़ता ही गया ..तभी जोर की पेशाब लगी ..मैंने एक सस्ते इत्र और आँखों में सुरमा लगाये लौंडे से पेशाबघर का पता पूछा ..उसने कहा " मियां वो खड़ा जीना (सीढ़ी) देख रिये हो ऊपर हो लियो उससे ही ही ही "
सीढ़ी चढ़के मैं ऊपर एक बरामदे में पहुँचा ..एक औरत हिलते झूले में बैठी पीकदान में पान की पीक थूक रही थी ...
वो औरत बोली " मियां तशरीफ़ रखिये और बताइये कैसा पान लेना पसन्द करेंगे - कच्चा , नरम , पका या फिर विदेशी ?
पान नही खाता मैं !
तो यहाँ क्या अपने अब्बा की बारात में आये हो ?
बदतमीज जलील औरत जानती है कौन हूँ मैं ..,फौजी हूँ फौजी !
और गुस्से से उठकर वहाँ से जाने लगा ...
तभी वो औरत बिजली सी चमक लिये मेरे बढ़ते पैरों पर गिर पड़ी और गिड़गिड़ाकर बोली " मियां एक इल्तिजा कुबूल कर लो कि जो आपने मुझसे कहा वो किसी से अब इस मुहल्ले में मत कहना वगरना किसी को पता चला की फौजी भी कोठे की सीढ़ी चढ़ने लगे है तो लोगों का फौज की अकीदत और अजमत से यकीन उठ जाएगा !"
मैंने एक जिस्मफ़रोश पेशे से गलीच औरत की आँखों में फौज के लिए वो श्रद्धा देखी जो अब मुश्किल से ही देखने को मिलती है ....मैंने उसे अपने कदमों से उठाया और सारी आप बीती एक सांस में सुना दी ।
लेकिन वो अब जल्दीबाजी में नही थी ..बड़े सब्र से बड़े हौले से उसने एक पान की गिलौरी मुँह में डाली और बोली -
"मियां गलती न शकीना ही है न उसके अब्बा की ..सात बरस की थी जब सगा चच्चा बेच गया था इहाँ ..तब से देख रही हूँ इस मुहल्ले के हर चढ़ते -उतरते रंग को ..सब कुछ है यहाँ ..पर दुनयावी इल्म और तालीम नही ...नजाकत और शोखी है लेकिन दुनिया से जुड़ने का शऊर नही ..मदरसे बेशुमार है पर स्कूल नही ..सिनेमा बेपनाह है मगर कम्प्यूटर एनसीटूट ( institute) नही ...इस्लाम के नाम पर ढेर सारे फिरके है यहां ,कारोबार ,दस्तकारी है यहाँ लेकिन उसको मुकाम देने का कोई उरूज नही ..,रंजिशें बेसबब है यहाँ ..और पुलिस की गस्ती भी .,लूट ,कत्ल, दंगे में बरकत है यहाँ लेकिन अम्न पैदा हो सके वो मयार नही ...असल फौज यहाँ के बाशिंदों ने सिर्फ टी वी ,सिनेमा में देखी है या फिर दंगो के दरमियान ..,लेकिन खुदा की कसम हर दिन पाँचो वक्त इस मुहल्ले की मसाजिदों में आवाज उगलता लाऊड स्पीकर मुल्क की बेहतरी और मुल्क के दुश्मनों की बर्बादी की दुआ मांगता है लेकिन इसपर मुल्क वालों को ऐतबार नही.... खबरचियों के कैमरे भी यहाँ नही पहुँचते लेकिन नेता चक्कर लगाते रहते है जो अपने-अपने हिसाब से पूरी कोशिश करते है कि ये मुहल्ला कभी इल्म और बेहतरी से आबाद न हो सके और सवाल पूछने का रुतबा हासिल न करे ..,गैर कौम से डराने या उसपर भड़काने का कारोबार उनके दलाल यहाँ तेजी से चलाते है .. भीड़ बहुत है यहाँ लेकिन रोजगार नही ..फौज तो दूर की बात है मियां ये तो फौज को भी किसी और दुनिया के इंसान समझते है ....
एक बाजारू औरत ने आसान लफ्जों में मुझे शकीना की मजबूरी ,उसके बाप की नासमझी
और फौज की शान बता दी .....
वर्दी में नही था वगरना बूट पटक कर उसे सैलूट करता ..,फ़िलहाल अदब से आदाब कर आया लेकिन उससे पूछना ही भूल गया कि पेशाबघर कहाँ मिलेगा....नवाजिश
#जुनैद
No comments:
Post a Comment