Wednesday, 10 October 2018

सर मुझे आप सा बनना है

सर आप की तरह सेकेंड थोड़ा ही आई हूँ ...!

उसने ये जुमला लंका पति रावण वाले डेशिबल में कहा था ...और गलती मेरी ही थी ...मैंने कभी अपना एकेडमिक रिकॉर्ड छिपाना ही न सीखा ...मतलब सोचिये मुझे ये असफल रिकॉर्ड बखान करने में जब इतनी ख़ुशी मिलती है तो होता फॉर फर्स्ट तो अपनी गंज -भंज खुजा कर सूखी को हरी कर लेता ....जबकि फर्जी फर्स्ट मास्टर आज जब नैतिक पदक ग्रहण करते थे तो मुझे टैगोर याद आते है ...जो कहते थे कि तुम शील बनकर सब साझा करो ...सफल न भी हुए तो सफलता के गवाह बनोगे ....

उसने ये जुमला कुछ साल पहले कहा था...स्कूल की सबसे मेधावी लड़की थी उस दौर की वो ... मैंने अपना सर्वस्व खर्च किया था उसके पीछे ,,मसलन वो तमाम सब्जेक्ट्स जो मेरी पकड़ से बाहिर थे मैंने पहले खुद उनका ऑन लाइन अध्धयन किया ...एक निष्ठावान विधार्थी की भाँति मैं लक्ष्य पर नजर गड़ाये कभी किताबों के सफे अँगुलियों से चाटते रहा तो कभी बफरिंग विडियोज से रातों- दिन भिड़ता रहा तो कभी खाना जला या बासी खाया लेकिन एक सनक और एक पिनक सी लग गई थी कि ...मुझे एक स्टेट नही तो कमोसकम एक जिला  टॉपर पैदा करना है ...

ये सनक हाँलाकि बरसाती नही थी जैसे मेरी और सनक जिनकी उम्र कुछ एक -दो महीने वाली होती है ...जो जितनी जल्दी जगती है उतनी ही जल्दी बुझ भी जाती है ...ये बैराग मेरा ऐतिहासिक बैराग था ...जो यदि मुझे मेरे विद्यार्थी जीवन में लग जाता तो मैं कुछ न कुछ तो टॉप करता ...हांलाकि विधार्थी जीवन में हमेशा रातों को सपने मैंने भी क्लास टॉप करने के देखे है ...लेकिन अगले दिन बजरंग मास्टर  की बेंत की ठुकाई में मैंने उनसे विभिन्न प्रकार के कोणों और दिशाओं में टॉप करने की अनेकानेक डिग्री प्राप्त की है ....

वो  पुल्लिंग और स्त्रीलिंग को याद करने का सबक जियादह  देते जिनका प्रयोग और उच्चारण   स्कूल के सिवा घण्टा भी कहीं नही होता ...न किसी इंटरव्यू ..जॉब, ड्राइविंग ..मेकेनिज्म आदि..आदि  में  और जैसे ही दिमाग से जुबान फिसलती आदमी को औरत या औरत को आदमी बनाने में  वो पिछवाड़े बेनाम की सल्तनत बना देते ...

लेकिन पुल्लिंग से नही मुझे धारा के खिलाफ एक  नॉर्मल पुरुष की तरह स्त्रीलिंग से जियादह मुहब्बत है ...

ये मुहब्बत कैसी भी हो सकती है ...और मैं कयासबाजारी करने वालों को पूरा मौका दूँगा ...लेकिन उस लड़की पर मुझे एक पूरे गांव का सुनहरा भविष्य ..सड़कों का  निर्माण ..स्वास्थ्य की बहाली , विकास के पंजे ..और एक जूनून दिखाई पड़ता था ...इसलिये लोटा लस्सन ..ये पड़ी लकड़ी ले ली ..जबकि सरकार मुझे वेतन इसी जूनून को पॉलिश करने का देती है ...लेकिन अब जूनून गया ..चन्दू की चाची के बाम लगाने..अब तो सेवा बची रहे और वेतन बड़ता रहे ...बच्चे इंग्लिश स्कूल में पढ़े और जमाखोरी से एक मकान बना लो ये ससुरा गोदान से बड़ा सुख है !

हाय ऊपर वाले ने यहाँ भी मुझ पर सन्टी तोड़ी और मेरा एक भी बच्चा पैदा न होने दिया क्यूँकि उसने मुझ कलंक के लिए कोई महाकलंक तूफानी औरत ही न पैदा की ...तो मकान  हाथी का हिलोरा किसके लिए बनाता...तो शरीफ जानवर गधे की दिनचर्या अपना ली ...कि काम और पेशे के नाम जिंदगी तमाम ...

लेकिन बाल्यकाल में मैंने सपने 52 गज ऊँचे बनाये थे ...एक अच्छा विद्यार्थी था मैं.. ये मैं इसलिए बोल रहा हूँ क्यूँकि कभी रट्टू नही रहा ...इसलिए नम्बर जीवन भर कम आये ...लेकिन कक्षा 8 के बाद मैं फिर महाग्रेजवेशन तक कभी फर्स्ट न आया... अब क्यूँ न आया ये भी सुनो ..उस दौर बड़ा ट्रेडिशन था कि भांग-झोपड़ा मास्टर जी आज कक्षा में एक मॉक टेस्ट करवा रहे है बिफोर एग्जामिनेशन...फिर उसके बाद जाड़े की गुनगुनी धूप में वो अपनी कुंजी से ये बताएँगे की परीक्षा के पर्चे में क्या फंस सकता है ... और हम रहे इस परिक्षा अश्वमेघ के अछूत क्यूँकि नियति ने ऐसा विधान रचा कि अब्बा के बरकती धन्धे की कमर टूट गई ..और ऐसी टूटी की जब तलक मैंने सरकारी सेवा के मुकम्मल 3 साल पूरे न किये और धंधा बन्द न करवाया तब तक वो सीधी न हुई ....तो सड़कों में आम , अमरुद , नाशपाती और कश्मीरी सेब अल्लाह की झूठी कसमें खा- खाकर बेचने पड़े ..और इसी लिए मुझे सजा मिली और स्कूल से मेरा जाती राब्ता कट गया ...मुझे याद है जिस दिन मेरी हाईस्कूल की परीक्षा का पहला पर्चा था ...उसकी पूर्व संध्या को मैं धंधे में घाटे का हिसाब लगाना सीख रहा था ...मूलधन की ही माँ -बेण हो गई थी तो मिश्रधन  कौनसी छन्गुलि में गिनता....लेकिन किसी ग्राहक को शायद कभी कोई सही माल सस्ते में बेच दिया हो तो उसकी दुआ लगी और मैं हाईस्कूल मैं सेकेंड किन्नारे लग गया  ...

उम्र बड़ रही तो अभिलाषाएं भी बढ़ने लगी और सुना कि पैसा जेब में हो तो बेपढ़ा अकबर भी ज्ञानी बीरबल , टोडरमल और अबुल फजल को अपने अंडर काम पे रख लेता है ....कट गया बुरी तरह से रिश्ता स्कूल से ... लेकिन नॉवल ..कहानी ..और शायरी से नही क्यूँकि इससे स्त्रीलिंग फँसाऊ टोटके जो होते थे .....
वक्त ने फिर वक्त  जरूर बदला ..लेकिन कभी मार्कशीट में वो मेरे सेकेंड क्लास को न बदल पाया ...फिर सरकारी  सेवाओं की  एक के बाद एक बयार आई ...जेब में पैसा आया और सूरत और करतूत बदली तो हलाल किताबों से फिर मौत तलक का रिश्ता बन गया ...
फिर जादू हुआ उसके बाद मैंने जितनी भी परीक्षाएँ दी कभी सेकेंड न आया ...हमेशा फर्स्ट ...हमेशा फर्स्ट ...लेकिन आज जब वो मेरी छात्रा जो एक बिस्कुट फेक्ट्री में कुछ देहाड़ी  रूपयों में काम करती है तो फेसबुक इनबॉक्स में आकर कहती  है कि -

" सर मुझे आप सा बनना है "

तो शक होता है ...अपने शिक्षक होने में क्यूँकि  शिक्षक तो वो होता है जो चाहता है कि उसका विद्यार्थी उसके अधूरे सपने उसकी अधूरी अभिलाषाएं पूरी करे ..और उससे भी बड़ा नाम बनकर चमके ...मैंने भी यही सोचा था ...शायद मैं शिक्षक ही नही बन पाया वरना सबसे पहले एक विद्यार्थी के मन और दिमाग में पलते फर्स्ट के गुरूर को तोड़ उसे आत्मविश्वास में विस्थापित करता ताकि फर्स्ट स्थाई बना रहे  ......लेकिन मैं करता जरूर अगर वो जुमला फेर कुछ देर तो ठहरती ....वो स्कूल छोड़ गई और मैं आज भी अपनी लकीर पर बीन बजा रहा हूँ .....नवाजिश
#जुनैद.........

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