जैसे ही बकरे की चाप को दाँतो तले जकड़ा ...भड़ाक से दरवज्जा खुला ...!
उफ्फ्फ्फ्फ्फ ...ऐसा लगा कि अच्छे काम के एवज में जिस हूर का ख्वाब नमाज बाद मौलवी साहब दिखाते है वही सामने खड़ी है ।
लेकिन जमीन पर आ गया जब तुरन्त उसके साइड में खड़े ..भगवा गमछा और पीली धोती में एक तिलकधारी वृद्ध और साड़ी में लिपटी उसकी धर्मपत्नी को देखा ...
अपन की मुस्लिम बस्ती में ये पहला मंजर था जब इस तरह के कोई शख्स इस तरह की वेशभूषा और लिबास में जलवानुमा हुए हो .....
तबियत से बकरे की नली से मींग चूसते अपने भाइयों को मैंने हड्डी नीचे रखने का अंखियों से कर्रा आर्डर दिया ...वो लपक के रकाबी (तश्तरी) अंदर ले गए ..तभी मेरे अब्बू ने घर आये उन शख्सों का इस्तकबाल किया ..एक ने धोती ऊपर कर और दूजे ने साड़ी ऊपर कर हमारे घर की देहलीज लाँघी लेकिन लौंडिया ने दुपट्टा नाक में ठूँस लिया ....
बातो में पता चला उन्हें हमारे वहां एक मकान किराये पर चाहिये ताकि उनकी पोती इस मुहल्ले से सटे इंस्टिट्यूट से एम्,बी.ए कर सके ...
अब्बू ने खराश लेकर हम तीनों निकम्मे भाइयों को देखा और फिर उस लड़की को...अब्बू ने कुछ सम्हल कर कहा कि कमरा तो है लेकिन आप पूजा -पाठ वाले जनाब इस जगह कैसे कर रह लेंगे ....जहाँ न एक भी मन्दिर और एक भी हिन्दुवाना घर नही ....ऊपर से यहाँ का माहौल ..आप क्योंकर यहीँ रहना चाहते है जनाब ...?
पण्डित जी बोले पोती को दमा है हमारी मुल्ला जी ! ज्यादा न चल सकती है ...ज्यादा दूर कमरा लिया तो गाड़ी का धुवाँ -धूल धक्कड़ इससे न सहन हो पायेगा ...हम आप लोगों को डिस्टर्ब नही करेंगे बस अपनी नेम पूजा भी ऐसे करेंगे की आप को जाहिर न हो ... अब्बू ठेठ रुअंटी औरतों वाले सास -बहू के सीरियल के शौकीन आदमी है ..झट ऐ आँखों में आँसू ले आये और तीन बार एक ही जुमले को पॉज मोड में कंटिन्यू बोले ..." ठीक है ""ठीक है" ठीक है "
...
अपने तो दिल की ईद हो गई ...तुरन्त दोनों छोटे भाइयों के पिछवाड़े पर लात देकर एक झाडू ..एक बाल्टी चूना पानी उनको पकड़वाया और आर्डर दिया कि बेटा एक घण्टे में कमरा खुद जुबान से " हैलो "न बोला तो समझ लियो ..गोश्त बन्द और भाजी -सब्जी चरने को दे देंगे..
मुहल्ले के लौंडो को अल्टीमेटम दे दिया कि बेटा तुम्हारी बहन यहाँ पढ़ने आई है इसलिए घर से छत्तीस कोस दूर ही रहियो ...मस्जिद की मीनार का लाउडस्पीकर 360° में घुमा दिया ...गोश्त की खुशबू ऊपर वाले माले में न पहुँचे इसलिए रसोई में फैन लगवा दिया ... चच्ची -भाभियों को नसीहत कर दी कि अपने चिल्लड़ (बच्चे ) अपने घर में ही रखो...
उनकी खिड़की के सामने ही अपने दुकान का शटर उठा लिया ...कभी जब नजर न आएं तो पतंग को उनकी खिड़की में फंसा दिया .....!
लेकिन किस मिट्टी की बनी थी वो न किसी से बात करती न कभी मुस्कुराहती ..न कभी छज्जे पर आती ...पण्डित तो हमारे ही अब्बा से दीन -धर्म मिलाते और पण्डिताइन हमारी अम्मी को सब्जी खाने की सीफत बयान करती ...
लेकिन वो लड़की ...सिर्फ कॉलेज आना जाना करती और वो भी अपने दादा और हमारे पीछा करने के प्रोटेक्शन में...
उसने कभी जाहिर नही होने दिया कि मैं भी उसकी नजर में कोई अहमियत रखता हूँ ...सब बदल रहा था मेरे लिए ..
एक दिन पण्डित ने चीख कर ऊपर से आवाज लगाई ..मुल्ला जी जुनैद को भेजो हमारी पोती की तबियत बहुत खराब है...मैंने पहली बार उसके बेहोश हुए चेहरे को घूर कर देखा ...उसको गोद में उठाया और डॉक्टर कने दौड़ लगा दी ...
देर हो चुकी थी उसका अस्थमा तीन के पहाड़े के आखरी पायदान पर पहुँच चुका था ...वो जा चुकी थी ....
पण्डित ने अब्बू को किनारे बुलाया और बहुत कुछ बातें रोती हुए बयान की ....अब्बू ने फक्र से पण्डित को देखा और उसे गले लगा लिया ...खैर मुझे कुछ पल्ले न पड़ा ....
मुझे अब्बू ने घर जाने का आर्डर दिया ...मैं सीधे उसके कमरे में पहुँचा जहां पण्डिताइन अपना मुख्तसर सा सामान सिसकते ,रोते बिलखते पैक कर रही थी ...जब वो एक टमटम में सामान लाद ले गई तभी पलटते हुए मुझे एक डायरी रोशनदान में रखी हुई दिखी ..जिसमें लिखा था -
" मैं शाइस्ता मलिक वल्द जुबैर मलिक कुछ करना चाहती हूँ ..मेरे अब्बा की मौत के बाद मुझे लगा मेरा सब खत्म हो गया ..क्यूँकि मेरे चचा मेरा निकाह कराना चाहते है ,, लेकिन मुझे दमा है ,, निकाह कर के न मुझसे घर का काम हो सकता है ..और न एक सुकून भरी जिंदगी मयस्सर ..मैं कुछ करना चाहती हूँ ताकि मैं अपनी तीन छोटी बहनों को एक बेहतर जिंदगी और एक बेहतर भविष्य दे सकूँ ..किसी ने मेरी एक न सुनी मगर.. इसलिए आज 10 दिसम्बर को मैंने घर से भागने की सोची ...और ट्रेन में जाकर बैठ गई ..मेरी तबियत हद से जियादह ख़राब हो रही थी तभी सामने बैठे एक बुजुर्ग दम्पति ने मुझे सहारा दिया ....ये लोग औलाद के सितम से और उनके ठुकराने से वृद्धाआश्रम जा रहे थे ..पेंशन से पलने वाले ये दो जन जरूर अल्लाह के भेजे कोई फ़रिश्ते है ..आपबीती सुन इन्होंने मुझे अपनी पोती मान लिया और मेरे सपनों को रंग भरने आज ये ब्राह्मण और पूजा पाठ वाले होकर भी मेरे साथ उस मुहल्ले में रहने लगे है जहाँ सिर्फ मुसलमानी रंग और तहजीब है ...मैंने इनसे विनती की है कि ये किसी को मेरी असलियत न बताये और मुझे अपनी पोती कहकर परवरिश दें ...ये नेक रूह पहनें लोग सब समझ गए सब मान गए ...मैं रहूँ या न रहूँ कुछ बनूँ या बनूँ पर तुम जब ये डायरी पढ़ रहे होगे जुनैद ! तो खुदा के लिए मेरे इन मासूम रहबरों को जरूर कहना कि आप जैसे इंसान दुनिया में जब तलक बनते रहेंगे ...तब तलक बेटियाँ भी बनती रहेंगी ...और उनके सपने भी महफूज रहेंगे ... उनसे कहना कि अल्लाह आप जैसे लोगों को किसी मजहब के लिए जमीन पर नही उतारता बल्कि पूरी इंसानियत पर आपको भेज इंसानियत पर एहसान करता है "
मैंने डायरी बन्द की और बेहिसाब रेलवे स्टेशन को दौड़ लगा दी ....मगर मुझे गुजरती उस ट्रेन का आखरी डिब्बा अभी भी आंसुओं के उतरने से धुंधला दिख रहा था जिसमें वो दो फ़रिश्ते बैठे इंसानियत से दूर बहुत दूर होते जा रहे थे .......नवाजिश
#जुनैद...........
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