Saturday, 20 October 2018

राम बनो या रहीम बनो

और जैसे ही मेरी बारी आई ..और मुझे धक्का मार रामलीला के मंच पर  विदूषक (मसखरा) बनाकर   धकेला गया ....मैं सीधा राम के चरणों पर जाकर गिरा ...

राम विश्वामित्र और भैय्या लक्ष्मण के साथ सीता स्वयम्बर में आये हुए थे !!! दर्शक हँसते -हँसते लोटपोट हो गए ...क्यूँकि तब तक मेरा पायजामा भी आकस्मिक सस्ता  नाड़ा टूटने से खुल चुका था ....

राम भी मन्द-मन्द मुस्कुराहने लगे ..संग जनक , माँ सीता ,गुरु विश्वामित्र भी ....मेरी आँखों में आँसू उमड़ आये ...मैं कभी दर्शकों को देखता तो कभी राम को ...

राम जी का खूब नाम सुना है मैंने .. मेरे अब्बू अक्सर राम जी को एक बेहतरीन शख्सियत कहकर समझाते है...मैंने टी.वी में भी देखा है वो असहाय , सताये और दीन-हीन के पालक बनकर उन्हें अपने कदमों से उठाकर अपने गले लगाते है  ....लेकिन मैं अब भी मजाक बनकर राम के चरणों पर ही गिरा हुआ था।

इसी भीड़ में सिर्फ एक ही चेहरा मुँह में दुपट्टा ठूँस जार-जार रो रहा था ...वो मेरी " अम्मी " थी जो अक्सर कहती है कि अगर कोई रोल करना ही है मुए ..तो राम का कर ..तेरी भी इज्जत में सुर्खाब लगेंगे और मेरी भी अजमत बढ़ेगी ...

लेकिन डायरेक्टर ने मुझे कभी राम न बनने दिया बोले ...असुर या जोकर ही बनवा सकते है ....मर्यादा पुरषोत्तम तो कोई नेम-व्रत सनातनी ही बनता है और बनता रहेगा ।

लेकिन मेरे  अध्यापक पण्डित दयाशंकर उपाध्याय जी समझाते हैं कि दुनिया में यदि यश और तेज का भागी बनना है तो राम बनो ... लेकिन ये लोग  राम बनने ही नही देते !

मौलवी उमर साहब से मैंने मदारिस में पूछा कि मौलवी साहब राम बनने के लिए एक्स्ट्रा क्या करना पड़ेगा तो उन्होंने कान पर गाँठ देकर बोला ...अबे तुझे जरूरत क्या है बे राम बनने की ...कुछ बनना है तो रसूल की सुन्नत का पैकर बन ...न पण्डित दयाशंकर जी की मोटी बात पल्ले पड़ी न मौलवी साहब की ठोकी ....

अतः मैंने अपनी अम्मी से जानना चाहा कि मुझे राम बनना है या कुछ और ...?
अम्मी ने मेरे अब्बा को  नमाज पड़ते देखा और उनकी तरफ इशारा करके बोली -
" जानते हो जुनैद राम या रहीम में बस मजहबों और सोच का फासला है ....कौन माँ नही चाहेगी कि उसका बेटा राम सा हो.. जो माँ-बाप का फरमाबरदार हो ..भाइयों का गमगुशार ..झूठ ..फरेब , चोरी से पाक ..सच बोलने का आदि ...वग़ैरह ,,,

जबकि तुम्हारे अब्बू जब तुम्हे अल्लाह के रसूल की हदीस समझाते और सुनाते है तो वहाँ भी वो बताते है कि चोरी ,झूठ , पाकी और बदइखलाक वगैरह से वो भी पाक थे ..तो फर्क क्या है राम बनो तो भी इंसान बने और सुन्नत के पैकर तो भी इंसान ....और बेटा  इंसान बनना हर किसी के बूते में नही ...
  यही ईसा ..यही मूसा ..यही बुद्ध यही महावीर ...जिसने इस दुनयावी जिंदगी को जीया.. सबकी माँ ने उन सब पर फक्र किया ......

राम ही बनना है बेटा कल... जब मुसीबत में हो तो अल्लाह का नाम लेकर इस पर्ची को खोल लेना  ...लेकिन मौके पर ही खोलना वरना इसका जादू खत्म हो जाएगा और तुम्हारा राम बनने का अरमान मिट्टी में मिल जायेगा ... आगे अम्मी बोली कल देखना एक मसखरा भी राम को समझा सकता है बस हिम्मत चाहिये और अपने ऊपर यकीन ...! यादों के झरोखे से एकदम वापस मंच पर लौटा !

अम्मी के बहते आँसू देख मैंने खुद को सम्हाला .. पायजामा ऊपर किया ..एक हाथ से नाड़े से पायजामा सम्हाला .. खड़े होकर ....दूसरे हाथ से जेब से एक पर्ची हथेली में फँसाकर दर्शकों की जानिब मुखातिब होकर बोला ---

" बोलो ..बोलो .. होते यहाँ पर राम तो क्या फिर होता मेरा अपमान ....?"
बताओ ..बताओ ..ये राम जो खड़ा है ..ये बड़ा या बड़ा राम का नाम ...?
मैं सनातनी ,नेम ..व्रत वाला न हुआ  पर तुमको तो है राम का ज्ञान !
एक मसखरे पर टूट पड़े खो कर स्वाभिमान ....
जो असहाय को देख रो पड़े ऐसे थे श्री राम !

पंक्तियाँ कमजोर और तुक पर आधारित थी लेकिन मेरी अम्मी फिर कोई कवयित्री थोड़ा ही थी ....

लेकिन जादू हुआ ..ऐसा लगा राम आस -पास ही हैं ...माहौल शांत हो गया ..एक हल्की सी चुप्पी को तोड़ा मेरे अध्यापक दयाशंकर जी की तालियों ने ...फिर तो तालियों की गड़गड़हट के एक सैलाब ने तब तक पीछा न छोड़ा जब तक मैंने ढंग से अपना नाड़ा न बाँध लिया .....
घर लौटते वक्त ...अम्मी ने सर पर हाथ फेरा और कहा देखो बन गए न राम .....(नवाजिश
#जुनैद..........

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