पाठशाला में जब द्वारिका नाथ बाबू हमें पुष्प , जहाज, पतंग , लोटा-लस्सन बनाते को देते तो ... हम उनकी सुनते जरूर लेकिन बनाते हमेशा अपने मनपसन्द की चीज ।
जैसी नंगी औरत बनाना , गुप्तांगों का रहस्यमयी और अकाल्पनिक चित्र ....सम्भोग की कल्पनाशील स्वयं खोजी 156 विधियों का प्राकृतिक एवं अप्राकृतिक तैल एवं मोम चित्रावली आदि।
हमारी यही कामुक रंगमयी दक्षता हमें कॉलेज के लौंडो के बीच शिखर पर ले गई ...
उस समय हम डिमांड में बुक भी किये जाते थे ... कॉलेज की किसी भी हॉट लौंडिया के पीछे उसका ठुल्लु आशिक जब उसे पूर्ण या आंशिक रूप से पाने में असफल हो जाता था... तो हमारे पास आकर अक्सर उसका अश्लील चित्र बनवाने हेतु निवेदन करता ...
हम भी कर्रे नवाब थे उस दौर ..तभी बिकते थे जब वो चार गिलौरी कड़े कत्थे की किमाम , चटनी और रवि 64 का तम्बाकू गेर के पेश करें...साथ ही 2 घण्टा मशक्कत से पैर दबवाते और कुनकुने तेल से पूरे जिस्म की मालिश करवाते....
फिर लौंडे की कामुक उत्सुकता को अपने अश्लील नेत्रों से माप कर उससे चित्र के एवज में मोटा माल वसूलते ।
आज जब कॉलेज से सिफारशी लम्बर लेकर आउट हुए तो दुनिया में शामिल होने पर पता चला कि कॉलेज के लौंडों के मध्य इतने साल हमनें अपनी इस पवित्र कला को मात्र जाया किया ...
अतः हमने रेलवे स्टेशन और बस अड्डो के किनारे अख़बार , पुस्तक बेचने वालों से सम्पर्क साधा और आश्वासन दिया कि यदि वो हमारी कामुक चित्रावली को बेंचे... तो हम अपने कौशल से वो वो काम कलाएँ कागज के सीने में उतार सकते है कि ग्राहक एक बार आएगा और अगली बार दुगने दामों में भी जेब झाड़ के जाएगा ....
धंधा चल निकला ..हमनें घर में ही अपने बनाये चित्रों हेतु गुपचुप ..एक छापाखाना भी खोल लिया और खूब रकम बनाई ....
मुहल्ले के हाजी नूरल हसन ने हमारे पेशे से अंजान मगर पैसे से प्रभावित होकर अपनी सबसे खबसूरत लौंडिया छलनी कौसर का निकाह हमसे करवा दिया ....
ईमान से छलनी में इतने छेद नही जितने मुल्क उनको हमने अपने फन से कमाई दौलत से घुमा दिये ...छलनी में इतनी हवा दाखिल नही हो सकती जितना सोना और लिबासों से हमने उनको ढंकवा दिया ....
दिन बीतते रहे और हमनें कोठी खरीदी ..मस्तलाल नाम से आज हम पूरे भारत के लौंडो में प्रसिद्ध है .... लेकिन मुहल्ले वाले हमें नवाब जुनैद रॉयल पठान के नाम से जानते है .....
लेकिन हर दिन एक सा नही रहता ...भारत में हरामहट कम्प्यूटर ने दस्तक दी तो पहले हमारी नौकर-चाकरी हाथ से निकली... फिर उसमें मुआ इंटरनेट दाखिल हुआ तो कोठी भी नीलाम हो गई ... मोबाइल के आते ही बीवी से तलाक हुआ ... और स्मार्ट फोन विथ 3G आते ही हम आज .... रेहड़ी में हनुमान ..शिरडी बाबा , , दरगाहों , के चित्र बनाकर बेचते है लेकिन शाम तलक कभी ससुरी बौनी भी नही होती....
अब आने भर के भी नवाब न रहे हम..जालिम दुनिया ने सब कुछ तो छीना मगर नाम से नवाब और रॉयल भी खींच के निकाल लिया ...रेलवे और बस अड्डों के दुकानदारों से जब पुराना वाला हिसाब मांगने जाते है तो ससुरे कुत्ते पीछे लगवा देते है ....
मस्जिद में दाखिल होने में भी अब शर्म आती है ..और कोई तौबा भी समझ में नही आती है ....
आज कड़कती दुपहरी में जब रेहड़ी नीचे आराम फरमा रहे थे तभी एक पिद्दा सा लौंडा हमारी रेहड़ी में धरी रंगों की एक दवात और एक कूची (ब्रश) चोरी कर के भागा।
हम लुंगी शर्मखाने के किनारे टेट करके उसके पीछे भागे ...जंगल ,बस्ती घूमाते वो हमें एक लापरवाह और खस्ता सूबेदारी हवेली ले गया ....हमनें छुपके ताड़ा हराम जना करता क्या है ......
तभी एक बच्चे के रोने की शदीद आवाज आई ...हमनें अंदर बढ़ के देखा रूह काँप गई एक मरी हुई औरत की गोद में एक बच्चा लेटा हुआ था ....
उस चोर बच्चे पर नजर फेरी तो वो पत्ते- झाड़ साफ कर एक फर्श पर मेरी कूची और रंगों से कुछ बना रहा था जब आकृति बन कर मुकम्मल हुई ....
मेरे रोंगटें खड़े हो गए .... वो एक औरत की टेढ़ी -मेढ़ी छाती थी ...जिसपर उसने उस रोते हुए बच्चे का मुँह लगाया ....बच्चा धूल और रंग चाट चुप तो गया लेकिन कुछ घण्टों में मर जाएगा ....
मुझे अब मांगी मौत भी नही मिल रही थी ....अल्लाह ने मुझे जो हुनर दिया मैंने उससे सिर्फ कई नस्लें बर्बाद की लेकिन इस बच्चे के बेहुनर हाथों ने इसी सामन से एक बच्चे की ख़ामोशी तैयार कर दी ।
मेरा कलेजा फट नही रहा था ...मेरे कानों में अब भी जमाने की कई माँओ की गालियॉ.. सिसकिया और बद्दुवाएं शोर मचा रही थी ... लानत हो मेरी आँखों में अब... जो मेरी अम्मी का चेहरा भी नही बना रही थी ...मेरे होंठ अल्लाह का नाम तक नही ले पा रहे थे....
मेरे दिल में तौबा हर पल मरती जा रही थी .....मेरी अंगुलियों ने भी मेरी मर्जी मुताबिक चलना बन्द कर दिया था......
आँखे घुमा कर देखा तो पाया अब न वहां कोई औरत थी न उसका नवजात बच्चा और न वो पिद्दा लौंडा जिसने मेरी कूची और दवात चुराई थी ...बल्कि मेरी कूची और दवात तो मेरी गोद में एक अंगारा बनकर मुझे मुकम्मल नार सा सुलगा रही थी .........नवाजिश
#जुनैद...........
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