आज एक शादी में ... मियां -भाई वाली !
मैंने नूरूल की लुगाई को पहली बार बिना बुरखे के देखा ....पहली बार जहूर की लौंडिया बे नकाब दिखी ...शबनम चची तो साड़ी में थी और रेशमा खाला कमर दिखाते लहँगे में .......
सब के शौहर जिन्दा थे ...और अब भी उसी तड़ी से सलाम दे ले रहे थे जैसे पहले जब मोटरसाईकिल से लुगाईयों को पर्दे में ले जाते वक्त देते लेते है .....
बैंड नही था ..बाजा गुल था ...डी जे को तलाक मिला था ...गाने -बजाने भैय्ये की बाजार में भिंडी खरीदने गए थे ....हर तरह एक मायूस चहल-पहल थी .... कुछ बच्चे उट्ठी-गिट्टी खेल के सिट्टी गेर देते तो पता चलता कुछ रौला रप्पा हो रहा है ...
तभी मेरे अब तक जिन्दा चायनीज फोन में एक रिंग टोन बजी ...गाना था ....ले ..ले ...ले मजा ले ...रात का जम के मजा ले ...ले..ले..ले !
बगल में बैठे कुबड़े चचा बिगड़ गए......
" क्यूँ बे ..अल्लाह.. रसूल वाली घण्टी न मिली तुझे ...हरामखोर कब्र में ये ही सुना-सुना कर पिछवाड़ा न सेंकें फरिश्ते तब कहियो ...बताइयो ...!
" असलम खानशामा डेग ( बड़ी पतीली ) में कफगीर ( बड़ा दाढू या करची ) चलाते हुए बोला ....
" ये तो अनीस भाई का लौंडा जुनैद पहाड़ी दिख रिया है ....
" मौलवी साहब ने आधा लेग पीस ही चबाया था उसे बाहिर खींच बोले -
" बरखुरदार ! पहाड़ी हो जंगल जमीन में बसते हो न इसलिए इल्मो ईमान की दुरस्त जानकारी नही रखते ...लेकिन ये घंटी खराब करो ...वगरना तुम्हारी आख़िरत खराब होगी !!!!
" हे ...हे ..हे ...मौलबी सेब ...जरा पतलून भी देख लियो और सफाचट चेहरा भी ...कुछ हिदायत के दो -चार लफ्ज इसपे भी चस्पा कर दियो क्या पता लौंडा दुरस्त ईमान ले आये अब्बी के अब्बी ! ( रज्जाक नानबाई बोले )
" एक खान साहब बीड़ी एड़ी से मसलते हुए बोल पड़े -
" अबे तुम्हे शर्म न आती ..कुर्ता पायजामा न भी पहन सकते हो तो क्या कोई दूसरी ढीली ढाली पतलून न पेन सकते ...
चौधरी शौकत बोले -
" अबे दाढ़ी न भी रख सकते तो खत ही रख लो ..वो क्या नाम है बे कल्लन उस हिन्दू लौंडे का वो जो बल्ला मारने से पहले घुमाये ....
" बड़े मियाँ विराट कोहली !"
अबे शर्म करो गैर मुस्लिम खत रखके कामयाब हो सकता है तो तुम खत ही रख लो कम से कम शक्ल से तो मुसलमा दिखो ...तौबा...तौबा ....
रजिया ताई भी साड़ी का पल्लू कमर में ठूँस कर बोली ....
" ये सब इसकी अम्मा की ढील है वगरना हमारे देख लियो ...अल्लाह के करम से सात है लेकिन कोई कह दे कि ईमान दरूद से बाल बराबर भी मचले हो !
" और नी तो क्या हम भी आज ही ये लहंगा पेनी है नी तो कोई के दे कि कभी किसी पराये मर्द के सामने बेपर्दा आईं हो ....कसम से ईमान पेले है और दुनिया बाद में ......
तभी हाजी फ़िरदौस का लौंडा जिसकी बहन की शादी थी चिल्लाया -
" अबे ...जितेन तूने बड़ी देर कर दी बे आने में ....सब मिलिये जितेन यानि मेरे दोस्त से जो एक हिन्दू होने के बावजूद भी इस्लाम को कम से कम मुझसे तो बेहतर समझता है ....मौलवी साहब अरबी भी सीखी है इसने और उर्दू भी जानता है ...और कसम से ...हमारे नबी के अख़लाक़ पर फ़िदा है ...जितेन तू बोल न ...
" मैं क्या बोलूँ दोस्त ...जब तुझसे पहली बार अपनी बी .टेक की क्लास में मिला था मुझे लगा था ...कि लोग झूठ बोलते है कि इस्लाम बेहतरी को न पकड़ के अब भी आदिम इस्लाम को जी रहा है ....माना बेशक आदिम इस्लाम में सारी बातें ज़ुरूरी थी माना इस्लाम की जमीन अरब में उस वक्त हालात न औरतों के लिए बेहतर थे न बच्चियों के लिए ....लेकिन ये भारत है ...मैं खुद अपनी तहजीब को फॉलो करता हूँ और चाहता हूँ कि लोग मेरी तहजीब को फॉलो करें लेकिन जबरदस्ती करके ..डरा के धमका के किसी की मजाक उड़ा के मैं अपनी संस्कृति को यदि किसी को हस्तगत भी करूँ तो उसकी उम्र जियादह न होगी ....अब का इस्लाम उस इस्लाम से कितना जुदा है जिसके पैरोकार हजरत मुहम्मद साहब थे ..मैंने पढ़ा और समझा है उनको ...वो किसी को गलत बताकर अपने मजहब को सही नही कहते थे ...बल्कि दूसरे को दुरुस्त करके अपने मजहब को प्रचारित करते थे ....वो किसी की गलती पर उसे शर्मिंदा नही करते थे बल्कि उसकी गलती को उसी के सामने उसे बिन कुछ बोले खुद से सही साबित करखे दिखाते थे ..... खैर ऐसे लोग जो मुझे इस निकाह में मिले वो हर मजहब में एक बड़ी संख्या और सोच रखते है .....चलता हूँ भाई ....लेकिन किसी के कपड़ों और सूरत से ही अगर रब्ब खुश होता तो वो माँ के पेट से ही हमें उस हुलिये में पैदा करता जो वो कर सकता है ...फिर न पहाड़ बेलिबास होते ..न नदियां ..न दरियां.. न रेखजार ..और न ही समन्दर... वो बेशक अपने बन्दे का दिल देखता है औए जब दिल में रब्ब घर कर जाता है तो बेशक फिर बन्दा रब्ब को पाने की अपनी जिद में उसका हर हुक्म सर माथे पर लेता है ...और उसको पाने के वो सारे अरकान पूरे करता है जो हजरत साहब ने बताये है ...चलता हूँ दोस्त ...काश लोग धर्म ..मजहब का असल अर्थ समझ सकते तो दुनिया कितनी हसीन होती न .....नमस्ते ! आदाब !
तभी मेरी इंट्री हुई ....
" यार सॉरी मुनव्वर मुझे देर हो गई वो क्या है कुर्ता-पायजामा तो तूने भिजवा दिया था लेकिन नाड़ा नही भिजवाया था .....लेकिन यार यहाँ इत्ती ख़ामोशी क्यूँ है बे ....कोई निकल लिया क्या
" चुप कर बे जुनैद वरना ...वरना तुझे ये सब मिल बाँट कर पहाड़ पार करवा देंगे ...क्यूँकि तेरे ही चक्कर में आज रजिया गुंडों में फंस गई "
......नवाजिश
#जुनैद............
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