Tuesday, 30 October 2018

उन्नीस का पहाड़ा

मास्टर विद्यासागर शास्त्री मेरे और सरफराज के पिछवाड़े से कठोर ईर्ष्या करते है ..संटी बरसाने से पूर्व वो हमको हमेशा समकोण बनने का आदेश देते है !
गणित पढ़ाते है ..और बड़े नेम व्रत और पूजा -पाठ वाले व्यक्ति है ..पायजामे का नाड़ा खोलने से पूर्व कान में जनेऊ चढ़ा लेते है ..छुआ-छूत भी मानते है ये मैं इतने विश्वास से इसलिए बोल सकता हूँ क्यूँकि कक्षा के सारे बच्चों की पीठ में मुक्का घुसेड़ते है और हमें संटी से स्पर्श कर नित्य क्रियाओं में पीढ़ा का अनुभव कराते है ..

जब वार्षिक परीक्षा का रिजल्ट आया तो पता चला दूसरे बार भी सरफराज व्यायाम छोड़ सारे विषयों में निपट गया ..और मैं रेंगता हुआ ..अनुदान के नम्बरों से बमुश्किल कक्षा पलट पाया ..

विद्यासागर से पिछवाड़ा सुजवाते हुए मैंने बमुश्किल 12वीं जमात उत्तीर्ण की ..परन्तु संटी के निशानों संग मेरा ये पूर्वाग्रह भी स्थाई हो गया कि मैं मुसलमान का बच्चा था तभी विद्यासागर मुझे कूटने में अपनी विशेष रुचि एवं ऊर्जा प्रदर्शित करते थे...इस पूर्वाग्रह ने मेरे मन में एक विशेष धर्म के प्रति मेरी नफरत को पल्लवित करने का कार्य किया ..और मुझे अपने जैसे प्रतिरूपों का निर्माण करने का अतुलित बल प्रदान किया ..

12वीं बाद विद्यासागर को कुछ कर दिखाने के जूनून में मैंने इतिहास विषय से पी.एच.डी कर ..अंजुमन इस्लामिया यूनीवर्सिटी में बतौर प्रवक्ता का पद ग्रहण किया ...दिन रात अपने विद्यार्थियों को इतिहास तोड़ -मरोड़ के प्रस्तुत करना अब मेरा काम और पेशा बन गया..स्वयं से प्रभावित हुए मैंने अपने जैसे अनेक जीव निर्मित करने में करारी सफलता का अर्जन किया ...

एक दिन भरी कक्षा में जब इतिहास का मनमौजी चीरहरण कर रहा था ..तभी लेक्चर के मध्य में एक लड़की खड़ी होकर बोली -

" सर आप गलत बयानी कर रहे हैं ..ऐसा कुछ नही घटा जो आप हमको बता रहें है "

क्लास में सन्नाटा छा गया और सभी छात्र एवं छात्रा पहले उसका फिर मेरा मुँह देखने लगे ...तभी मैं नींद से जागा और बोला -

" तुम आलिया परवीन हो न "

सिर्फ डॉक्युमेंट्स में सर मगर मैं चाहुँगी कि मुझे .." आलिया विद्यासागर शास्त्री कहकर बुलाया जाये "

ये वाला डायलॉग तो विद्याधर की संटी से भी ताकतवर था ...खैर कुछ बोल पाता तभी छुट्टी की बेल लगी ..मैं आलिया को रोकता इससे पहले वो क्लास से बाहिर निकल गई.. मैंने बैग सम्हाला और पूरे परिसर में आलिया को सर्च किया ..वो न मिली ..तभी मैंने उसको एक ऑटो में जाता हुआ पाया ...तुरंत एक ऑटो पकड़कर उसका पीछा किया ...
उसका ऑटो टेढ़ी -मेढ़ी गलियों से होकर एक पीले रंग के  मकान के आगे रुका ..वो उसके अंदर दाखिल हुई ...मेरी समझ में कुछ नही नही आ रहा था कि अब क्या करूँ ..
हिम्मत बटोरकर मैंने उसका दरवाजा जैसे ही खटखटाने की सोची ...अंदर से एक औरत की आवाज ने मेरा बढ़ा हाथ रोक दिया ..

" आलिया बेटा तुम्हारी नमाज का वक्त हो गया है "

अब न रहा गया दरवज्जा ठोका ..लेकिन दरवाजा खुलते ही सामने वाला मंजर देख मेरा कलेजा जोर -जोर से ठक-ठक करने लगा ...
साड़ी में लिपटी ..माँग भरी ,मंगलसूत्र धारण किये हुए एक औरत दरवाजे में खड़ी थी .!

आप  ..?
जी..जी..जी... मैं आ..आलिया का टीचर हूँ कहाँ है वो ..?
आइये अंदर आकर बैठिये वो नमाज अदा कर रही है
मैं पानी लाती हूँ ...

पहली बार जिंदगी में वो दीवार देखी जिसपर काबा और कैलाश बिना किसी हिचक के आपस में गूँथे थे ..पानी की एक घूँट मारते ही फ़िर दूजी दीवार पर नजर पड़ते ही मेरे मुँह से घुसा पानी नाक से निकल गया ...सामने खड़ूस मास्टर विद्यासागर  दीवार पर लटकती तस्वीर से मुझे ही घूर रहे थे..
मैं सरपट अपनी जगह खड़ा हो गया ...

तभी आलिया की आवाज कान में गिरी-
" जी सर यही मेरे वालिद है जनाब विद्यासागर शास्त्री .. जब सिर्फ 5 साल की थी  तो एक सड़क हादसे में  मेरे वालिद अनवर हुसैन और वालिदा सईदा बीबी की मौत हो गई लेकिन मैं बच गई ..जिस हॉस्पिटल में मुझे रखा गया उसी में मेरे मास्टर विद्यासागर अपनी पत्नी शांती देवी का इलाज करवा रहे थे ...इन्होंने मुझे गोद ही नही लिया बल्कि एक बेसहारा को कोठे और सड़कों की जीनत बनने से बचा लिया ..चाहते तो मुझे भी अपने मजहब में दाखिल कर सकते थे ..लेकिन मेरे वालिद जनाब विद्यासागर एक हकपरस्त और उसूल से सिले इंसान है .."
इससे पहले आलिया कुछ और बोलती मैंने उसकी बात काटते हुए बदहवाशी में बोला

" आलिया कहाँ मिलेंगे मास्टर  जी "

सर शाम हो गई है तो नूरपुर बस्ती में मुस्लिम बच्चों को गणित पढ़ा रहे होंगे ...सुबह में मिलना चाहेंगे तो बजरंगपुर मुहल्ले में हिन्दू बच्चों को गणित पढ़ाते मिल जायँगे ...रिटायरमेंट के बाद अब बस यही करर...

आलिया जुमला पूरा करती इससे पहले  मैंने सीधा नूरपुर के लिए ऑटो पकड़ा और नूरपुर की जमीन पर पैर रखते ही कुछ बच्चों को समकोण बना पाया ...मैं समझ गया मास्टर जी आसपास ही होंगे ...तभी छड़ी थामे एक आकृति नजर आई ..जो बच्चों को उन्नीस का पहाड़ा रटा रही थी ...
आव देखा न ताव सीधे उनके कदमों में जा गिरा ..लुगाई क्या रोयेगी अपने जवान मरद की मौत पर जो मैं गिड़गिड़ा कर रोता और माफ़ी माँगता रहा ..सारा पूर्वाग्रह और नफरत उनके चरणों पर गिरती रही और धुलती रही..

कौन हो भाई ..? उठो तो सही ..अरे खड़े हो मैं झुक नही सकता कमर में दर्द रहता है ।
कदमों में ही पड़े -पड़े बोला मास्टर जी मैं जुनैद ! अलीपुर के अनीस सब्जी वालों का बेटा... आपका शिष्य जुनैद !

अरे उठो जुनैद ..बेटा उठो ..

उठा और उन्होंने गले लगा लिया ...सब कुछ पूछा  लेकिन वो तब गर्व से फूल गए जब उन्होंने मेरी जुबान से सुना कि मैं अब प्रवक्ता हूँ  ..एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि और सुकून उसका विद्यार्थी का यश और प्रसिद्धी है ..ये आज मैंने उनकी आँखों में देखा ।

तभी तपाक से बोले जुनैद तुम जरा इन्हें उन्नीस का पहाड़ा रटाओ मैं अभी आया ..पसीना छूट गया क्यूँकि.उन्नीस का पहाड़ा मुझे न तब याद था जब समकोण बनता था न अब जब सर्किल बन गया हूँ ..खैर .मुझे लगा मेरे सामने आँखे तर करने में शरमा रहे है मास्टर जी इसलिए कोना देखने गए है ..लेकिन तभी उन्होंने काँधे में हाथ डाल जनेऊ खींची और कान में चढ़ाई और मैंने मुँह फेर मुस्कुराहकर बच्चों से कहा तो बोलो उन्नीस इ कम उन्नीस ..उन्नीस दूनी चौतीस ....नवाजिश
#जुनैद........

Monday, 29 October 2018

कमला

#कमला
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वो न बाय दी वे ...आई एम वेरी चूजी .....

घण्टे की चूजी हैं ये , इनके बाप का नाम इज्जत लाल है ....शहर के मुन्सिपाल्टी दफ्तर में संविदा क्लर्क है ,... देशी दारू के कट्टर शौकीन ...कोई हराम में पिला दे तो ,वो वन नाइट स्टैंड  इनका ईश्वर , लुगाई इनकी एक सरकारी विद्यालय में भोजन पकाती है ...कुल 4 जमा, जमीन पर और एक पेट में लिए घूम रहीं है ....ये उन चार में से दूसरे नम्बर की है ..इनका आधार कार्ड पर नाम कु. कमला है ....लेकिन ये किसी भी अजनबी लौंडे को अपना नाम सोनम बताती हैं
....इनको खुर्राट वहम हैं कि हफ्ते में एक दिन नहाई इनकी देह और  हफ्ते में 14 दिन धुली इनकी शक्ल अनिल कपूर की लौंडिया से मिलती हैं ....जबकि इनकी नाक का पकौड़ा खमीर चढ़े पूए से मैच करता है ,,,,,

विद्यालय जाती हैं ,,,और कक्षा 11 में पढ़ती है ...दसवीं की बोर्ड परीक्षा में इन्होंने एक साल फेल होकर अगले साल रोला -रप्पा कर क्लास तो बदल ली , लेकिन 11 के फेर में इनका घिरना तय है ...

स्कूल में इन्होंने गंध फैला रखी है ...इनका लौंडेबाजी का अपना एक दबदबा है ...और इनका संक्रमण लौंडो और लौंडियाओं पर बराबर पड़ता है ...उदाहरण पटकता हूँ आप कैच कीजिये .. इन्होंने दसवीं में 85% नम्बर पाई लौंडिया को अपने फ़िल्मी प्रभाव में लेते ही विथ इन फाइव मन्थ 11वीं की हाफ इयरली परीक्षा में 34% में ला खड़ा किया ....

स्कूल के शिक्षक से लेकर कैंटीन मालिक और उसके सर्वेंट से भी ये फँसी पड़ी हैं ... 12वी के आधे लड़के इन्हीं ने स्कूल से फेल करवाकर निपटाये ...ये मेलों के बड़े कर्रे और गहरे शौक रखती हैं ...और उससे जियादह शौक इन्हें आधुनिक छोटी और चुस्त पोशाकों का है ....

इनका बौद्धिक ज्ञान ये है कि इन्हें सिर्फ नम्बर सेव करना , मेसेज करना , इमोजी फिलिंग से आग लगाना और सेल्फ़ी लेना आता है ...बाकि इनके घोड़े खुल जाते है जहाँ जरा सा दिमाग लगाना पड़े ...विद्यालय मासिक टेस्ट हेतु लौंडे और मास्टर इनका क्रमशः ख्याल रखते है वगरना ये फूँकनी की अपने नाम में कमला को कलाम लिख देने का इल्म भी जानती है ....

बैंक में मिली थी मुझसे ...बोली फॉर्म भर दीजिये ...हमनें भरा तो सट से अपने नंगे बाजू हमारी नंगी कोहनी से रगड़ दिए ...हम लंगोट के पक्के तो हैं लेकिन सिर्फ जुबान से ...हमनें और घसीटा दिया तो बोली ...सब देख रहें है ...हमनें कहा नम्बर दोगी..? बोली कार्ड भूल गई वैसे ही सेव कर लो ...इनकी तरह इनका नम्बर भी बड़ा छिछोरा निकला ...हर महीने हमारी जेब से मजे लेने लगा ...

जब भी फोन पर चुम्मा मांगते तो हिलोरा मार  देती लेकिन जैसे ही जीवंत सशरीर मुलाकात में मांगते तो कहती आज हमारा फास्ट है .....

वाकई में ये हराम की डली बहुत फास्ट है ...देह का घर्षण कर सकती है लेकिन देह नही सौंपी किसी को इन्होंने ..इनकी इस ईमानदारी की तो कसम चलती है मुहल्ले में ....

अनीस मल्होत्रा इनका नया बॉय फ्रेंड है ...सुनने में आता है तीन कोठियाँ , चार राईस मिल ,, 2 बी .एम डब्ल्यू ..मिला कर 19 गाड़ियाँ हैं उसके कन्ने ,, आज तलक उसे किसी ने नही देखा .. लेकिन इन्होंने उसे अपने मन मन्दिर का देवता और अभी से अपना पति मान लिया है ... इनका चालू पन आखिर मैजिक कर ही गया और इन्होंने अपने कथनानुसार राज योग से सज्जित लौंडा फाँस ही लिया ...

इन्होंने कसम ले ली थी अनीस की ,,कि अब ये सस्ते और फक्कड़ आशिकों के मुँह पर थूकेंगी भी नही ....जब इन्होंने सब को खदेड़ना शुरू किया तो हमनें खुद को 36 वे स्थान पर पाया ...ये नम्बर हमारी कमर के नम्बर से मैच करता है ...

ये पूरे घर की सम्मिलित 11000 रूपये की कमाई में ..14000 रूपये तो अकेले अपने ऊपर फूँकना सीख
गई थी ..

.इनकी माँ ने कभी इनसे नही पूछा कि 30 हजार का मोबाईल , ये हजारों  की जीन्स , ये स्कर्ट ये जूते ...ये स्कूटी इन्होंने कौन सा टीवी किवज शो जीत के कमाई ..और इनके बाप को दिनभर की थकान एक देशी ठर्रे का क्वार्टर गटक  कर बीवी पर फिसल कर सो जाने में ही रस था .....

लेकिन शिखा इसे अक्सर समझाती थी ...शिखा कमला की बड़ी बहन ...उसने कई बार कहा कि अगर तू इसी चाल -चलन में बहती रहेगी तो समझ लेना ...तू कहीं की नही रहेगी .....

खैर आज कमला उर्फ़ सोनम मिसेज मल्होत्रा हैं ..बड़े घर की बहू और एक बिजनेस टायकून की वाईफ बनते ही इन्होंने सबसे पहले अपने परिवार से नाता तोड़ा फिर मुहल्ले से....शादी के बाद कमला कभी वापस नही आई ...परिवार भी कमला को भूल सा गया ...और हम लौंडो के लिए तो हर दूसरी लौंडिया कमला है ...लेकिन इन सब में ,,मैं आज तलक कमला को नही भूल पाया ...

कमला सब की नजर में बुरी थी ..लोग अपनी बच्चियों को उसकी सोहबत से बचाते थे ..औरतें हाथ कूट-कूट कर और होंठ चबा-चबा कर उसे बुरा कहती थी ...लड़के और अधेड़ उसे छीनाल ,,रण्डी तलक कहते थे ...लेकिन कमला ऐसी नही थी..बड़ी शर्मीली बड़ी संकोची थी कमला ....11 साल की उम्र तलक वो भी आम बच्चियों की तरह जुगनू, तितली खोजती और पकड़ती थी ..टेढ़े उलझे सवाल करती थी ..किताबों में चित्र देख कल्पना के सागर में विलीन हो जाती थी ...गिट्टी के बर्तन पर घास पकाती थी और अपनी गुड़िया का विवाह आँख फूटे काने गुड्डे से कराती थी ..उसकी कमीज हमेशा उसक कन्धे से सरक जाती थी ...जो उसके सगे चाचा को बहुत आकर्षित और उत्तेजित करती थी ...अक्सर वो कमला को पास बुला कर उसके जिस्म को अपने जिस्म से रगड़ता  उसकी छातियों को उम्र से पहले असमान्य भी उसी पशु ने ही किया ...

उसकी हवश के 70 दिन बाद जब कमला की माँ ने ये सब देख लिया तो उसने पुलिस की धमकी दी और चाचा मुहल्ला छोड़ ,शहर लड़ी हो लिया ....

कमला आदतन और लड़कियों से पहले इस स्पर्श और उसके प्रभाव को समझ चुकी थी ...फिर बात जब मुहल्ले में दौड़ी तो  मासूम कमला अब मर्दजात के लिए बच्ची नही रही .....कमला को लालच और धमकी देकर कोई न कोई अपनी हवश का पहला फेज यानि  देह स्पर्श कर ही लेता ....कमला को सोनम ...कमला ने नही बल्कि समाज ने और उसके माता पिता की अनदेखी और लापरवाही ने बनाया ....

8 मार्च यानि अंतराष्ट्रीय महिला दिवस था उस दिन जिस दिन मैंने कमला को फिर 7 साल बाद दुबारा देखा वो भी एक खिड़की की झिरी से ...एक उसकी उम्र से तीन गुना बड़ा आदमी उस की देह का भोग कर रहा था ....उसने भोग के पश्चात पैसे कमला की नंगी देह पर फेंके ..और चला गया ...फिर मेरी बारी थी कमला नग्न बिस्तर पर ज़िंदा लाश सी पड़ी थी ..और मैं जिन्दा लाश सा खड़ा होकर एक दौर की सबसे चालाक और मनचली लड़की को आँख से आँसू पोंछता देख रहा था ....उसने अपने जिस्म पर एक दुलाई ओढ़ी और आवाज लगाई

" आ जा रे हीरो ....

उस कोठे की सीढ़ियों के बारे में कहते सुना है कि नया बन्दा उसे  4 मिनट में उतरता है ..मैंने आधे मिनट में ही उन को नाप कर जमीन छू ली
.....
कमला के सपनों का वो रईसजादा मिस्टर अनीस मल्होत्रा कमला से भी कोशों चालाक निकला वो दलाल था जो ऐसी ही फ़िल्मी लड़कियों को प्यार और झूठी हसीन दुनिया के ख्वाब दिखा कर उनकी कीमत कोठों से वसूल करता था   ......

खैर कल की वेरी चूजी कमला ....आज अनेक खाये -पीये चूहों की रसद बन चुकी है .... अफसोस महज इतना कि कमला को पहले सोनम  फिर एक वेश्या बनाने वाला उसका चाचा ...और ये समाज अभी तलक ज़िंदा और सक्रिय  है  ...और हमको फक्र करना चाहिये की हम इसी समाज का एक हिस्सा है ...नवाजिश
#जुनैद.......

Sunday, 28 October 2018

फ़ौजी

फौजी हूँ चचा ..मुल्क की हिफाजत करता हूँ !
शकीना की अम्मी अबे खींच लियो बे ..लकड़ी चूल्हे से ..कुछ न  पकाइयों ...लौंडा फौजी है फौजी !

चचा मजाक अच्छा करे हो आप ...
अबे मजाक नही कर रिया मियां .,सोलह आने सच्ची बोल रिया हूँ ..समझे ?

क्यों फौजी में क्या खराबी है चचा ?
मियां लौंडिया को बेवा (विधवा ) नही कराना । देखा न काश्मीर में क्या हो रिया है ....?

तभी शकीना की अम्मीजान ने बावर्चीखाने ( रसोईघर) के पर्दे के पीछे से हल्की आवाज में कहा .." मियां सुना है बारात चढ़ाई के दिन भी सरहद से बुलवाई का पैगाम आ जाता है "

व्हील चेयर पर मुंह में पान की सुपारी से लोहा लेती शकीना की 3/4 पोपली दादी ..पहिये खिसकाकर पास आई और कान में हौले से बोली " मियां हमने तो जे तक टापा है कि सुहागरात में चिपकते ही फौजी दरवाजा कूटने लगता है ..की जंग छिड़ी है ..बॉर्डर देखी है मैंने ही ही ही ....
बड़ी बेइज्जती खा- चबा कर जब मैंने शकीना की देहलीज लाँघी तभी फोन पर मेसेज आया ...
" मियां पहले ही कहा था अब्बू को मत बताइयो कि फौजी हो आप ...अब भूल जाइयो मुझे ।"
उसके बाद शकीना का नम्बर कभी स्विच ऑन नही हुआ ...
अजानों के बीच से होता हुआ ..मैं बढ़ता ही गया ..तभी जोर की पेशाब लगी ..मैंने एक सस्ते इत्र और आँखों में सुरमा लगाये लौंडे से पेशाबघर का पता पूछा ..उसने कहा " मियां वो खड़ा जीना (सीढ़ी) देख रिये हो ऊपर हो लियो उससे ही ही ही "
सीढ़ी चढ़के मैं ऊपर एक बरामदे में पहुँचा ..एक औरत हिलते झूले में बैठी पीकदान में पान की पीक थूक रही थी ...
वो औरत बोली " मियां तशरीफ़ रखिये और बताइये कैसा पान लेना पसन्द करेंगे - कच्चा , नरम , पका या फिर विदेशी ?
पान नही खाता मैं !
तो यहाँ क्या अपने अब्बा की बारात में आये हो ?
बदतमीज जलील औरत जानती है कौन हूँ मैं ..,फौजी हूँ फौजी !
और गुस्से से उठकर वहाँ से जाने लगा ...
तभी वो औरत बिजली सी चमक लिये मेरे बढ़ते पैरों पर गिर पड़ी और गिड़गिड़ाकर बोली " मियां एक इल्तिजा कुबूल कर लो कि जो आपने मुझसे कहा वो किसी से अब इस मुहल्ले में मत कहना वगरना किसी को पता चला की फौजी भी कोठे की सीढ़ी चढ़ने लगे है तो लोगों का फौज की अकीदत और अजमत से यकीन उठ जाएगा !"
मैंने एक जिस्मफ़रोश पेशे से गलीच औरत की आँखों में फौज के लिए वो श्रद्धा देखी जो अब मुश्किल से ही देखने को मिलती है ....मैंने उसे अपने कदमों से उठाया और सारी आप बीती एक सांस में सुना दी ।
लेकिन वो अब जल्दीबाजी में नही थी ..बड़े सब्र से बड़े हौले से उसने एक पान की गिलौरी मुँह में डाली और बोली -
"मियां गलती न शकीना ही है न उसके अब्बा की ..सात बरस की थी जब सगा चच्चा बेच गया था इहाँ ..तब से देख रही हूँ इस मुहल्ले के हर चढ़ते -उतरते रंग को ..सब कुछ है यहाँ ..पर दुनयावी इल्म और तालीम नही ...नजाकत और शोखी  है लेकिन दुनिया से जुड़ने का शऊर नही ..मदरसे बेशुमार है पर स्कूल नही ..सिनेमा बेपनाह है मगर कम्प्यूटर एनसीटूट ( institute) नही ...इस्लाम के नाम पर ढेर सारे फिरके है यहां ,कारोबार ,दस्तकारी है यहाँ लेकिन उसको मुकाम देने का कोई उरूज नही ..,रंजिशें बेसबब है यहाँ ..और पुलिस की गस्ती भी .,लूट ,कत्ल, दंगे में बरकत है यहाँ लेकिन अम्न पैदा हो सके वो मयार नही ...असल फौज यहाँ के बाशिंदों ने सिर्फ टी वी ,सिनेमा में देखी है या फिर दंगो के दरमियान ..,लेकिन खुदा की कसम हर दिन पाँचो वक्त इस मुहल्ले की मसाजिदों में आवाज उगलता लाऊड स्पीकर मुल्क की बेहतरी और मुल्क के दुश्मनों की बर्बादी की दुआ मांगता है लेकिन इसपर मुल्क वालों को ऐतबार नही.... खबरचियों के कैमरे भी यहाँ नही पहुँचते लेकिन नेता चक्कर लगाते रहते है जो अपने-अपने हिसाब से पूरी कोशिश करते है कि ये मुहल्ला कभी इल्म और बेहतरी से आबाद न हो सके और सवाल पूछने का रुतबा हासिल न करे ..,गैर कौम से डराने या उसपर भड़काने का कारोबार उनके दलाल यहाँ तेजी से चलाते है .. भीड़ बहुत है यहाँ लेकिन रोजगार नही ..फौज तो दूर की बात है मियां ये तो फौज को भी किसी और दुनिया के इंसान समझते है ....
एक बाजारू औरत ने आसान लफ्जों में मुझे शकीना की मजबूरी ,उसके बाप की नासमझी
और फौज की शान बता दी .....
वर्दी में नही था वगरना बूट पटक कर उसे सैलूट करता ..,फ़िलहाल अदब से आदाब कर आया लेकिन उससे पूछना ही भूल गया कि पेशाबघर कहाँ मिलेगा....नवाजिश
#जुनैद

Friday, 26 October 2018

ये जीवन है

#मोक्ष
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हाथ हटाइये ! .....मैंने कहा मेरी थाई से हाथ हटाइये ...बुढ्ढे ..खूंसट !

उसने घृणा से मेरे चेहरे को  देखकर ...मेरा हाथ अपनी जाँघों से झटक दिया ...बस मैं ऐसा कोई नही था ...जिसकी थूथकार मेरे चरित्र पर न गिरी हो ....

मेरे कुछ बोलने अथवा प्रतिक्रिया देने से पहले ही बस.. ..बस -अड्डे पहुँच गई ...सभी यात्रीगण उतर कर अपनी -अपनी मंजिल को लौट गए .....!

मैं अशोक वर्धन अब भी उसी बस मैं बैठा हूँ ...क्यूँकि चाहकर भी मैं उससे उतर नही सकता ...वो लड़की यही कोई 16-17 साल के बीच की रही होगी ....मेरी पोती श्रद्धा भी इतनी ही बड़ी है ,, बस खाली हो चुकी है ...बस कंडेक्टर और ड्राईवर भी मेरी चुप्पी और खमोशी से ये समझे की बस में अब कोई नही ....रात का तीसरा पहर है ,,पीछे से एक आगे वाली सीट पर बैठा हूँ ...जहाँ सिर्फ अँधेरा है  घना अँधेरा  ..।।।

मेरे दो जिन्दा पुत्र है , अमित वर्धन और सुमित वर्धन ...इनको जनने वाली अब से दो बरस पहले कुत्ते की मौत मर गई ,,, जब  तक उसका दम  सरकारी हस्पताल में न निकला  ...तब तलक मैंने चैन की साँस न ली ...उसके मरते ही ,,, मैंने अपने बेटे के ड्रायर से रात को एक व्हिस्की की बॉटल चुराई और अपने जीवन साथी के लौट जाने का जश्न मनाया ।।।

दो पैग में ही आदमी औकात से आगे निकल गया ...और  जहाँ खड़ा था वहीँ उल्टी करने लगा ,,, और उसी में गिरकर -घिसकर आँख लग गई .. सुबह अमित ने बड़ी बेइज्जती करके जगाया ..और कहा -

" शर्म करो बाबूजी ..शर्म करो ...आप तो कहते थे कि आपने कभी शराब को हाथ नही लगाया ...आपसे बड़ा ढोंगी और बेशर्म कोई नही देखा... नीचे अम्मा की मृत देह लगी है और आप यहाँ .... ...आप तो अध्यापक रहें है ...क्या यही शिक्षा दी  बच्चों को आपने ....? "

शिक्षा... जैसा घण्टा भी कोई शब्द नही होता ,,,अध्यापक हूँ ..और अपने सम्पूर्ण शिक्षक जीवन  में मैंने सबसे अधिक बलात्कार  इसी शब्द का होते देखा है ..... एक अध्यापक के रूप में , मैं इसलिए भी असफल रहा क्यूँकि ..मैं अपनी सन्तानों को ही शिक्षा नही दे पाया ....

देता भी कैसे ...उस दौर शिक्षक बनने से पहले ही शांति जैसी देवी से विवाह हो गया ,, ..पिता जी के देहांत के बाद , अम्मा , चार बहनों और दो भाइयों की जिम्मेदारी मेरे सर आ लगी ,,, खेती -खलिहानी की ,, बताशे कोरे ,,कांधे में इमली , टॉफी , चूड़ी ,पतंग बेची ,,, और तो और लोगों के घरों में ईंटें भी चढ़ाई ...पिता जी भी शिक्षक थे ...उनके आदर्शों की गहरी छाप थी मुझमें ,,,वो चाहते थे कि मैं भी शिक्षक बनूँ इसलिए इस मजूरी और भागमभाग में भी मैंने पिता जी के सपने को मरने नही दिया ...और आभाव , विपन्नता , संघर्ष की बलि वेदी चढ कर मैंने शिक्षक जैसा पद प्राप्त किया ...लेकिन मेहनताना अब भी फ़क़ीरी था ...परन्तु क्षणिक  सुकून सा हो गया  था....

अम्मा को यमराज ने प्राण हड़प कर निपटाया ...चार बहनों को मैंने ब्याह कर ..भाइयों को पढ़ा-लिखाने शहर भेजा ...कुछ बन गए तो वापिस न लौटे ....

शांति .. तीन फ़टी साड़ीयों ..में शादी के 3 साल काट गई ...और दो औलादें भी जन गई ....समझती थी मुझे ,,, मैं विद्यालय तो वो खेतों में ,, मैं घर में तो वो रसोईघर में ,, मैं बिस्तर में तो वो बर्तनों के बीच ...मैं बेखटक सोया तो वो उठ-उठ कर बच्चों को कम्बल ओढ़ाती ...

उफ़्फ़ और शिकायत और फरमाइश क्या होती है शांति तब समझती जब उसे फुरसत मिलती ...अपने खून से उसने औलादों को सींचा ,,, वो अच्छा  और ताकतवर खा सके तो कंगन गिरवी रखवाकर गाय खरीद लाई मुई ....घी ..दूध ने अपना चमत्कार दिखाया ...उसे बनाने वाली सूखती रही और उसे गटकने और चाटने वाले जिस्म बनाते रहे ....

बच्चों की परीक्षाओं में शांति की भूमिका और प्रभावी हो जाती ...सुबह बच्च्चों को उठाना ...रात उनके साथ जागना ..उन्हें पंखा झलना ...कभी खिड़की के सींकचे से सर टिकाकर 10-7 मिनट की पॉज श्वान नींद ले लेना ...

आज अमित और सुमित क्रमशः बैंक और कृषि विभाग में अफसर के पद पर कार्यरत है ...तो बीवी भी अफसर लाये ...मैं तो उनमें कुछ रत्ती भर एडजेस्ट भी कर लेता हूँ ... मगर उम्र से पहले कोशों बूढ़ी और कमजोर , गंवार शांति डिसमैच कर गई ...

हाँलाकि  शादी के वक्त क्या अनुपम सुंदरी थी मेरी शांति ...और आज उसका रूप किसी श्मशान की आधी भस्म लकड़ी सा हो गया है ....अपनी वही काम की आदत उसने बड़े घर में भी नही छोड़ी इसलिए अमित ,सुमित और उनकी पत्नियों को कभी नौकरानी की कमी  महसूस नही हुई ....मैं अक्सर समझाता था उसे कि चल गाँव लौट चलते है ...पेंशन बहुत है दोनों हँसते -खेलते पल जायेंगे ...लेकिन उसे श्रद्धा यानि अपनी पोती का लालच कभी दुबारा गाँव से नही जोड़ पाया ...श्रद्धा जब तक बच्ची थी दादी की छाती से चिपकी रहती थी ...आज जब वो आधुनिक दुनिया में समाई तो दादी के फ़टे-कटे हाथों से उसे घिन आती है ....

शांति बीमार रहने लगी ...हद से जियादह उसकी तबियत बिगड़ती गई .... अफसर औलादों ने उसके ईलाज का खर्चा बाँट लिया और ये इतना निकला कि उसे सरकारी हस्पताल में एक बैड मिल गया .....

जिंदगी भर घुटते -पिघलते वो मुझे आदमखोर औलादों के बीच अकेला छोड़ गई .....लेकिन मैं खुश था बहुत खुश कि उसे मुक्ति मिल गई  .....

उसकी मृत्यु के मात्र दो महीने बाद मुझे पैरालेसिस अटैक पड़ा ..शरीर का दांया हिस्सा सुन्न पड़ गया ...जब औलादों को मेरी पेंशन लूटने में मेरे दस्तखत की आवश्यकता पड़ी तो उन्होंने मेरा ईलाज ..मेरे ही पेंशन के जमा पैसे से करवाया ....

महज रत्ती भर फर्क पड़ा ..हिल -झूल कर थोड़ा चल लेता हूँ ...लेकिन हाथ को अपनी इच्छा से  अभी भी कोई हरकत नही दे सकता  ...

उस दिन जब शांति की बारसी पर मैंने अपने पुत्र और उनकी वधुओं को वीकेंड पिकनिक प्लान बनाते पाया ...तो रोया उस दिन भी नही मैं ...सिर्फ  दो कुर्ते ,, शांति की तस्वीर , अपने चश्मे का बक्स , अपना तौलिया , और कुछ किताबें बैग में भरी और अपना दाहिना हाथ , बांये हाथ से पकड़ कर अपने उस कुर्ते की जेब में डाला जो कभी भी फट सकती थी ...उसके बाद  चुपके से मैं उस नर्क से बाहर निकल आया ...

बस में बैठा था ...तभी एक प्यारी बच्ची मेरी बगल में आ बैठी ...श्रद्धा की छवि उसमें नजर आई ...लेकिन रास्ते भर अंदर ही अंदर रोता रहा और खिड़की से बाहर देखता रहा ..तभी मेरी जेब फट गई और मेरा दांया हाथ उस बच्ची की जाँघ पर चला गया ...उसने उसे उठाकर झटक दिया लेकिन मुझे तब पता चलता जब उसमें जान होती ...फिर वो हाथ फिसल कर उसकी जांघ में चला गया .....

हाथ हटाइये ! हाथ हटाइये ...बुढ्ढे ..खूंसट ...!!!!!!!

खैर अब कुछ नही बचा खोने को तो अब बस से नही बस जिंदगी की नैय्या से उतरना चाहता हूँ ....शांति हाथ दे रही है ...वो नवेली दुल्हन सी नजर  आ रही है ....मेरे बाबूजी ...मेरी अम्मा भी उसके साथ है ...मेरे दिल ने मेरी तड़प और उनसे मिलने की प्यास को इस बार अनदेखा नही किया और  एक आखरी  धड़कन मेरे दिल से होकर गुजरी  और मैं स्वयं से मुक्त हो गया ... ......नवाज़िश
#जुनैद.........