मास्टर विद्यासागर शास्त्री मेरे और सरफराज के पिछवाड़े से कठोर ईर्ष्या करते है ..संटी बरसाने से पूर्व वो हमको हमेशा समकोण बनने का आदेश देते है !
गणित पढ़ाते है ..और बड़े नेम व्रत और पूजा -पाठ वाले व्यक्ति है ..पायजामे का नाड़ा खोलने से पूर्व कान में जनेऊ चढ़ा लेते है ..छुआ-छूत भी मानते है ये मैं इतने विश्वास से इसलिए बोल सकता हूँ क्यूँकि कक्षा के सारे बच्चों की पीठ में मुक्का घुसेड़ते है और हमें संटी से स्पर्श कर नित्य क्रियाओं में पीढ़ा का अनुभव कराते है ..
जब वार्षिक परीक्षा का रिजल्ट आया तो पता चला दूसरे बार भी सरफराज व्यायाम छोड़ सारे विषयों में निपट गया ..और मैं रेंगता हुआ ..अनुदान के नम्बरों से बमुश्किल कक्षा पलट पाया ..
विद्यासागर से पिछवाड़ा सुजवाते हुए मैंने बमुश्किल 12वीं जमात उत्तीर्ण की ..परन्तु संटी के निशानों संग मेरा ये पूर्वाग्रह भी स्थाई हो गया कि मैं मुसलमान का बच्चा था तभी विद्यासागर मुझे कूटने में अपनी विशेष रुचि एवं ऊर्जा प्रदर्शित करते थे...इस पूर्वाग्रह ने मेरे मन में एक विशेष धर्म के प्रति मेरी नफरत को पल्लवित करने का कार्य किया ..और मुझे अपने जैसे प्रतिरूपों का निर्माण करने का अतुलित बल प्रदान किया ..
12वीं बाद विद्यासागर को कुछ कर दिखाने के जूनून में मैंने इतिहास विषय से पी.एच.डी कर ..अंजुमन इस्लामिया यूनीवर्सिटी में बतौर प्रवक्ता का पद ग्रहण किया ...दिन रात अपने विद्यार्थियों को इतिहास तोड़ -मरोड़ के प्रस्तुत करना अब मेरा काम और पेशा बन गया..स्वयं से प्रभावित हुए मैंने अपने जैसे अनेक जीव निर्मित करने में करारी सफलता का अर्जन किया ...
एक दिन भरी कक्षा में जब इतिहास का मनमौजी चीरहरण कर रहा था ..तभी लेक्चर के मध्य में एक लड़की खड़ी होकर बोली -
" सर आप गलत बयानी कर रहे हैं ..ऐसा कुछ नही घटा जो आप हमको बता रहें है "
क्लास में सन्नाटा छा गया और सभी छात्र एवं छात्रा पहले उसका फिर मेरा मुँह देखने लगे ...तभी मैं नींद से जागा और बोला -
" तुम आलिया परवीन हो न "
सिर्फ डॉक्युमेंट्स में सर मगर मैं चाहुँगी कि मुझे .." आलिया विद्यासागर शास्त्री कहकर बुलाया जाये "
ये वाला डायलॉग तो विद्याधर की संटी से भी ताकतवर था ...खैर कुछ बोल पाता तभी छुट्टी की बेल लगी ..मैं आलिया को रोकता इससे पहले वो क्लास से बाहिर निकल गई.. मैंने बैग सम्हाला और पूरे परिसर में आलिया को सर्च किया ..वो न मिली ..तभी मैंने उसको एक ऑटो में जाता हुआ पाया ...तुरंत एक ऑटो पकड़कर उसका पीछा किया ...
उसका ऑटो टेढ़ी -मेढ़ी गलियों से होकर एक पीले रंग के मकान के आगे रुका ..वो उसके अंदर दाखिल हुई ...मेरी समझ में कुछ नही नही आ रहा था कि अब क्या करूँ ..
हिम्मत बटोरकर मैंने उसका दरवाजा जैसे ही खटखटाने की सोची ...अंदर से एक औरत की आवाज ने मेरा बढ़ा हाथ रोक दिया ..
" आलिया बेटा तुम्हारी नमाज का वक्त हो गया है "
अब न रहा गया दरवज्जा ठोका ..लेकिन दरवाजा खुलते ही सामने वाला मंजर देख मेरा कलेजा जोर -जोर से ठक-ठक करने लगा ...
साड़ी में लिपटी ..माँग भरी ,मंगलसूत्र धारण किये हुए एक औरत दरवाजे में खड़ी थी .!
आप ..?
जी..जी..जी... मैं आ..आलिया का टीचर हूँ कहाँ है वो ..?
आइये अंदर आकर बैठिये वो नमाज अदा कर रही है
मैं पानी लाती हूँ ...
पहली बार जिंदगी में वो दीवार देखी जिसपर काबा और कैलाश बिना किसी हिचक के आपस में गूँथे थे ..पानी की एक घूँट मारते ही फ़िर दूजी दीवार पर नजर पड़ते ही मेरे मुँह से घुसा पानी नाक से निकल गया ...सामने खड़ूस मास्टर विद्यासागर दीवार पर लटकती तस्वीर से मुझे ही घूर रहे थे..
मैं सरपट अपनी जगह खड़ा हो गया ...
तभी आलिया की आवाज कान में गिरी-
" जी सर यही मेरे वालिद है जनाब विद्यासागर शास्त्री .. जब सिर्फ 5 साल की थी तो एक सड़क हादसे में मेरे वालिद अनवर हुसैन और वालिदा सईदा बीबी की मौत हो गई लेकिन मैं बच गई ..जिस हॉस्पिटल में मुझे रखा गया उसी में मेरे मास्टर विद्यासागर अपनी पत्नी शांती देवी का इलाज करवा रहे थे ...इन्होंने मुझे गोद ही नही लिया बल्कि एक बेसहारा को कोठे और सड़कों की जीनत बनने से बचा लिया ..चाहते तो मुझे भी अपने मजहब में दाखिल कर सकते थे ..लेकिन मेरे वालिद जनाब विद्यासागर एक हकपरस्त और उसूल से सिले इंसान है .."
इससे पहले आलिया कुछ और बोलती मैंने उसकी बात काटते हुए बदहवाशी में बोला
" आलिया कहाँ मिलेंगे मास्टर जी "
सर शाम हो गई है तो नूरपुर बस्ती में मुस्लिम बच्चों को गणित पढ़ा रहे होंगे ...सुबह में मिलना चाहेंगे तो बजरंगपुर मुहल्ले में हिन्दू बच्चों को गणित पढ़ाते मिल जायँगे ...रिटायरमेंट के बाद अब बस यही करर...
आलिया जुमला पूरा करती इससे पहले मैंने सीधा नूरपुर के लिए ऑटो पकड़ा और नूरपुर की जमीन पर पैर रखते ही कुछ बच्चों को समकोण बना पाया ...मैं समझ गया मास्टर जी आसपास ही होंगे ...तभी छड़ी थामे एक आकृति नजर आई ..जो बच्चों को उन्नीस का पहाड़ा रटा रही थी ...
आव देखा न ताव सीधे उनके कदमों में जा गिरा ..लुगाई क्या रोयेगी अपने जवान मरद की मौत पर जो मैं गिड़गिड़ा कर रोता और माफ़ी माँगता रहा ..सारा पूर्वाग्रह और नफरत उनके चरणों पर गिरती रही और धुलती रही..
कौन हो भाई ..? उठो तो सही ..अरे खड़े हो मैं झुक नही सकता कमर में दर्द रहता है ।
कदमों में ही पड़े -पड़े बोला मास्टर जी मैं जुनैद ! अलीपुर के अनीस सब्जी वालों का बेटा... आपका शिष्य जुनैद !
अरे उठो जुनैद ..बेटा उठो ..
उठा और उन्होंने गले लगा लिया ...सब कुछ पूछा लेकिन वो तब गर्व से फूल गए जब उन्होंने मेरी जुबान से सुना कि मैं अब प्रवक्ता हूँ ..एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि और सुकून उसका विद्यार्थी का यश और प्रसिद्धी है ..ये आज मैंने उनकी आँखों में देखा ।
तभी तपाक से बोले जुनैद तुम जरा इन्हें उन्नीस का पहाड़ा रटाओ मैं अभी आया ..पसीना छूट गया क्यूँकि.उन्नीस का पहाड़ा मुझे न तब याद था जब समकोण बनता था न अब जब सर्किल बन गया हूँ ..खैर .मुझे लगा मेरे सामने आँखे तर करने में शरमा रहे है मास्टर जी इसलिए कोना देखने गए है ..लेकिन तभी उन्होंने काँधे में हाथ डाल जनेऊ खींची और कान में चढ़ाई और मैंने मुँह फेर मुस्कुराहकर बच्चों से कहा तो बोलो उन्नीस इ कम उन्नीस ..उन्नीस दूनी चौतीस ....नवाजिश
#जुनैद........