Thursday, 6 June 2019

The window

#खिड़की
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" बहुत प्यारी लग रही है मेरी बिटिया रानी !"

" पापा इससे मिलो ये है ज्योति ..मेरी फ़ास्ट फ्रेंड "

तभी बत्ती चली गई ...

" ओके बेटा बारात किसी भी वक्त आने वाली है ...मैं देखता हूँ लाईट को क्या हुआ "

फ्यूज उड़ गया था ,, इसलिए मैंने जेनरेटर वाले से जेनरेटर स्टार्ट करवाया ... और फ्यूज की सुध लेने के वास्ते मेकैनिक को भेजा ....जब काफी देर हो गई और फ्यूज न सुधरा तो मैंने खुद जाकर निरीक्षण करने की सोची ...

" अरे जी ! आप यहाँ ..बारात कहाँ तलक पहुँची ..."

" सावित्री बस वीर चौक से निकल पड़ी है ..तुम बाहर जाकर  देखो तब तक मैं देखूँ तो सही ये कमबख्त फ्यूज वाला क्या कर रहा है "

जैसे ही मैं आगे बढ़ा मैंने एक गीत की मद्धम गुनगुनाहट सुनी ....और तभी देखा -

" ए ..ए क्या कर रहा है यहाँ ...क्या झांक रहा है अंदर ...तू फ्यूज अभी तकक्क्"

फ्यूज बनाने वाला मेकैनिक घबरा कर भाग गया ...लेकिन तभी फिर मेरे कान में उसी मद्धम गीत की झंकार गिरी ....मैंने उसी खिड़की के सुराग से अंदर झाँका जहाँ से वो मेकैनिक अंदर झांक रहा था ....

मैं सन्न रह गया .. 56 पार का मेरा शरीर अकड़ने लगा ..संरक्षित रक्त में जैसे लावा दौड़ने लगा ..सर से पैर तलक दावानल मेरे शरीर के प्रत्येक अंग को जलाने लगा .....

अंदर मेरी पुत्री शोभा की सहेली ज्योति ...स्नान कर रही थी ...उसकी देह किसी भी प्रकार के कृत्रिम आवरण से मुक्त थी ... उसकी 20 की देह का प्रत्येक अंग चीख -चीख कर मुझे आमंत्रित कर रहा था .. मेरी मर्यादा को उसका यौवन दीमक की भाँति चट करता जा रहा था ...मेरी शिष्टता एवं नैतिकता मोमबत्ती की भाँति पिघल कर मेरे चरणों पर गिर रही थी ....कि तभी बारात के बैंड का शोर और आतिशबाजी की आवाजें मेरे कानों से टकराई और मैं जैसे एक गहरी नींद से जागा ,,,

ये पल गुजर गया ...और अब जिस पल में ,,मैं खड़ा था वहाँ मेरी बिटिया ..मन्त्रो ..अग्नि और रस्मों के छोंको के मध्य उपस्थित थी ....परन्तु मैं किशोरी लाल अब स्वयं में समाहित नही था ...मेरी दृष्टि उसकी सहेली ज्योति पर ही केंद्रित थी ...

अनुपम सुंदरी लग रही थी वो ...मानों स्वर्ग की कोई अप्सरा हो !

बचपन अभाव चट कर गया मेरा और जवानी संघर्ष निगल गई ...बाकि इस इकलौती बिटिया शोभा और पत्नी सावित्री ने मुझे जिम्मेदारियों के बोझ से कभी उठने नही दिया ....

परन्तु मैं जीवन से संतुष्ट था ... आज मानता हूँ कि मैंने, सावित्री से कभी वो प्रेम नही किया जिसमें मनुष्य समस्त प्रकार की दशाओं को झुठला देता है ...वो प्रेम जिसमें बग़ावत होती है..हुँकार और निडरता जिसका आभूषण होता है ....

क्यूँ न जाने उम्र के इस अँधेरे पड़ाव में  .मेरे जीवन में एक ज्योति ने मेरे सूने अँधेरे जीवन में प्रकाश की वर्षा सी कर दी ....

हाँ मुझे उस युवती से प्रेम हो गया ...जिसने मेरे घर के अंदर प्रवेश करते समय मेरे पैरों को श्रद्धा से स्पर्श किया था और बोली थी -

" अंकल नमस्ते ! "

" सुनिए जी ...कहाँ खोये हुए हैं आप..पण्डित जी कब से पुकार करें हैं ...चलिये कन्यादान ..."

सावित्री इतना कहते ही फफक-फफक कर रोने लगी ...और यही दशा सत् प्रतिशत मेरी भी होती यदि मैंने उस खिड़की की झिर्री के अंदर न झाँका होता ....

सबने सोचा मेरी आँख में आँसू इसलिए नही हैं क्यूँकि मुझे सदमा लगा है ...बिटिया की विदाई का ...लेकिन सच ये था कि अब मन में सिर्फ एक ही टीस दस्तक दे रही थी कि यदि ज्योति ने मुझे छोड़ दिया तो मेरा क्या होगा ..?

आज शोभा को अपने घर जाए कुछ सात दिन हो गए हैं ... और अब आत्मग्लानि मुझे झुलसा रही है कि मात्र एक युवती की नग्न देह मुझे मेरी नैतिकता ...और मर्यादा से दूर ले गई ....और रही बात ये कि उस युवती ने मेरे पिता धर्म ..मेरे पिता प्रेम को भी क्षीण कर दिया ....मैंने सब कुछ भूलना चाहा और फोन कुर्ते की जेब से निकाल कर अपनी बिटिया को फोन करने के लिए जैसे ही उसका नम्बर ....तभी दरवाजे पर दस्तक होती है

" तु..तू...तुम "

" हाँ ..अंकल पहचाना नही ..मैं ज्योति ...प्रणाम अंकल ... वो क्या है मैं शोभा की शादी के दिन अपनी घड़ी यहीं भूल गई थी ..."

मैं कहाँ श्रुवण में था मैं तो उसके अधरों पर लगी लिपस्टिक में चिपका हुआ था ..जिसे वो बार -बार अधर मिला-मिला कर मुझे स्वयं के अधरों में और रचा रही थी ..

" अरे ! अंदर भी आने दोगे क्या ...आओ बिटिया ..जब से शोभा पराये घर की हुई है तब से इनका यही हाल है "

काश सावित्री का कहा सत्य होता ...खैर जितनी भी देर वो घर में रही मैं जन्नत में था ...जिस सोफे पर वो बैठी थी वही अब मेरा आशियाँ था ..जिस कप से उसने कॉफी पी वही मरने तक अब मेरे होंठों पर लगता रहेगा ...उसकी हाथ लगाई हर एक चीज अब मेरी सगी थी ....ये वास्तव में वो प्रेम था जिसका वर्णन मैंने प्रेम कथाओं और किवदंतियों में पढ़ा था ....मैं मानता हूँ ये गलत है लेकिन प्रेम गलत और सही में भेद करने लगा तो प्रेम फिर प्रेम कैसे कहलायेगा   ...

अब जीवन में उमंग ने घर कर लिया... सफेद बाल ..पर अब मेहँदी नही बल्कि कलर चढ़ने लगा ...गाल रोज ब्लेड से छिलते ताकि कोई भी सफेदी ज्योति की चमक को फीकी न करे ...

उसके घर का भी पता लगा लिया ...और सुबह जोगिंग और शाम की वाकिंग के लिए वही रास्ता चुना भी ...खामख्वाह हांफ़ता भी वही जहाँ उसकी खिड़की खुली होती ...

कपड़े की पेंट पहने बूढ़े अब जीन्स से नो कॉम्प्रोमाइज ... सावित्री जो मेरी अर्धांग्नी है ...वो कुछ समझ तो रही थी ..लेकिन अब तक मेरे बेदाग चरित्र के मद्देनजर उसकी सोच अधिक अतिक्रमण नही करती और न अधिक विस्तार लेती ...लेकिन मेरे लिये सब कुछ बदल चुका था...

" हैलो ज्योति ...?"

" ओ हैलो अंकल ..ओ सॉरी प्रणाम अंकल ...आप यहाँ ? "

" हाँ ऐसे ही गुजर रहा था ..तभी तुम्हे देखा ..."

जबकि ये झूठ था अब उसके कॉलेज के चक्कर भी लगाने शुरू कर दिये हैं मैंने ....हमेशा कोई न कोई  बहाना कोई न कोई वजह से कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष  उसके आस- पास बना रहना चाहता था .... उस दिन जौहरी बाजार में उसका पीछा किया ...

" अंकल आप यहाँ ..?"

" ओ हाँ ..वो क्या है  शोभा की मम्मी की अँगूठी रिपयेर कराने को दी थी ...तुम यहाँ ...?"

जवाब भी मिले सवाल भी हुए ...लेकिन अगला सवाल मेरे लिए दुनिया का सबसे मुश्किल सवाल था ...

" ज्योति क्या तुम अपना मोबाईल नम्बर दे सकती हो ? "

ज्योति कुछ ठिठकी जरूर लेकिन फिर नेचुरल होकर बोली -

" हाँ क्यूँ नही ...अंकल '

अब सुबह ज्योति को गुड मोर्निग ..रात को गड नाईट ..उसकी डी.पी को चूमना ...और हर रात उसको देखते -देखते उसकी यादों में तड़पना ....धीरे-धीरे हेल्दी चैट भी शुरू हुई ...और कभी फोन में बाते भी ....बड़ी मुश्किल से ज्योति को समझाया कि

" वी आर फ्रेंड " सो प्लीज ..डोंट कॉल मी अंकल "

मुझे लगने लगा था ज्योति के बन्धन भी टूटने लगे हैं ..वो भी मेरी ओर खींची चली आ रही है ...लेकिन एक ओर जहाँ मैं ज्योति के जीवन में आने से स्वर्ग की सैर कर रहा था ..वहीँ सावित्री की अपने जीवन में उपस्थिति अब मुझे अखरने लगी ..मुझे लगने लगा ये नीरस ओर बोझिल औरत ही मेरे और ज्योति के मार्ग का वो रोड़ा है जो हमें मिलने से रोक रहा है ...सावित्री पर अब हमेशा मेरा क्रोध टूटता ...एक दो बार उसपर हाथ भी उठा दिया ...

एक रात मैंने ज्योति को ' आई लव यू ' लिखकर सेंड कर दिया ...उसका रिप्लाई उस दिन क्या ...अगले तीन दिन तलक नही आया ....उसका फोन भी ऑफ़ जा रहा था ..और मेसेज भी डिलीवर नही हो रहे थे ....सोचा शायद वो ख़फ़ा है ...मुझे एक पल का चैन नही था ...सोचा आज उसके घर जाकर उससे बात करूँगा ...तभी सावित्री चाय लेकर आई और मैंने गर्म चाय को ठंडा बोलकर वही चाय उसके मुँह पर फेंक दी ...उसकी चीख निकल पड़ी ..

और मेरी भी क्यूँकि मेरे मोबाईल में ज्योति का मेसेज आया -

" मैं आज शाम 5 बजे ग्रीन पार्क में आपसे मिलना चाहती हूँ "

मोबाईल वहीँ सोफे पर पटका ...और ख़ुशी के मारे दर्पण के आगे जा खड़ा हुआ ...ज्योति ने मुझे शहर के सबसे सुनसान पार्क में बुलाया है इसका मतलब वो आज मुझसे अपने मन की बात कहने वाली थी ...जिसे सुनने के लिए मैंने तब से इन्तेजार किया जब से मैंने उस खिड़की के अंदर झाँका था ....मैंने इरादा कर लिया जैसे ही वी मेरे प्यार का जवाव प्यार से देगी उसी क्षण उसे अपनी बाँहों में भर लूँगा ...

लेकिन अभी मुझे शाम के लिए तैयार होना था ...ताकि हुश्न जब इश्क से मिले तो कोई शर्मिंदा न हो ...

मैं खूब तैयार होकर चार बजे ही पार्क में पहुँच गया ..और सपने बुनने लगा ...तभी पीछे से आवाज आई ...

" मेरा आपसे बोलना ..वो मेसेज वो बाते करना ..सिर्फ इसलिए था क्यूँकि मुझे शोभा ने कहा था ...पापा मेरे जाते ही टूट जायेंगे ..उनका ख्याल रखना ...उसने कहा था पापा जरूर तुम में भी अपनी बेटी की ही छवि देखेंगे उनका मन लगाये रखना ...लेकिन मुझे नही पता आपको ये कब और क्यूँ लगने लगा कि एक औरत का एक मर्द से बात करना उसे कुछ सम्मान और तवज्जो देना मात्र प्रेम का सूचक है ....खैर छोड़िये ये आपका नही सारी मर्द जाती का प्रॉब्लम है ... मैंने आपको यहाँ इसलिए बुलाया है क्यूँकि आज मैं आपसे किसी को मिलाना चाहती हूँ ...जिसे मैं अपनी जिंदगी से भी ज्यादा प्यार करती हूँ ....अरूण प्लीज आओ न "

शर्म और जिल्लत के बीच मैं तन्हा खड़ा था ...मेरे पैर थे तो जमीन पर लेकिन मैं चाह रहा था या तो मुझे जमीन समा ले या आसमान मुझ पर गिर पड़े ....ज्योति की मुद्रा गम्भीर थी लेकिन अरूण मुझे देख कर मुस्कुराह रहा था  .....मानो जैसे मेरा और मेरी उम्र का मजाक उड़ा रहा हो

ज्योति को उसका हमउम्र, हमसफ़र मिल चुका था ...वो दोनों चले जा रहे थे ...और मैं तन्हा खड़ा होकर उन्हें जाते हुए देख रहा था ....मैं  अकेला रह गया गम ये नही था मुझे मुकम्मल करने वाली सावित्री मेरे साथ बेमुकम्ल हो गई दर्द ये था ...वो देवी जिसपर मैंने इस पानी के बुलबुले के चलते इतने जुल्म ढहाये ...वो जिसने जीवन के प्रत्येक उतार-चढ़ाव में मेरा हर कदम पर साथ दिया ...वो जिसको मैंने कभी सुख की एक ठण्डी बूँद नही दी और आज बदले में दिया उसके चेहरे को गर्म ख़ौलता दर्द .....मैं घुटनों पर बैठ गया ..क्यूँकि मैं हार चुका था ...

" मैं पापी हूँ भगवान ...पाप किया है मैंने ....मैं हार गया प्रभु ...हार गया "

" किसने कहा आप हार गए ...मैं हूँ न आपके साथ ...घर चलिए !"

काँधे पर रखा हाथ ... शक्ल में तब्दील हुआ तो दिखा सावित्री अपना झुलसा चेहरा लिए मेरे सामने खड़ी थी ....मैं उस देवी के चरणों पर लोट गया ...और फूट-फूट कर रोने लगा ...मेरे आँसू उसके चरण धो रहे थे .. ..जब शांत हुआ तो सावित्री के हाथ पकड़ कर  घर की राह पकड़ी ...मैं बदल चुका था ...और मुझे आज लगा कि सावित्री ही वो नारी है जिससे मैं सच्चा प्रेम करता हूँ ...यही ....

" सुनिए जी ! जो हुआ सो हुआ ..लेकिन एक बात कहूँ ? "

" हूं...बोलो न !"

" वो क्या है जी ...अब अपना  हुलिया मत बदलना ..मतलब ऐसे ही बने रहना वो क्या है बड़े हॉट लग रहे हो जी "

पहले मैं  ठहाके के साथ हँसा और फिर मुझे देख सावित्री ....और फिर जैसे हमारी जिंदगी में खुशियाँ लौट आई ।।।।।जो एक खिड़की की वजह से खो सी गई थी ....

नवाज़िश

By~

Junaid Royal Pathan

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