Tuesday, 18 June 2019

वन टच

#वन_टच
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" ए  .. हाउ डेअर यू ..तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझे टच करने की ... क्या अपनी माँ -बहन को भी  ऐसे ही टच करता है ...?"

दौड़ती बस में कर्रा ब्रेक दिया ड्राईवर ने ~

" क्या हुआ मिस एनी प्रॉब्लम ..?"

" बोलिये न ! किसने की है बदतमीजी .."

" बताओ तो एक मासूम ..अबला को बस में सफर तक नही करने देते ..."

ये तमाम उस भद्र पुरुष समाज की आवाजें थी ..जो अब तलक चलती-हिलती बस में लोहे का डंडा पकड़े उस युवती के चुस्त जींस में  नितम्ब लार टपकाई मुद्रा में देख रहा था .....तभी युवती बोली ~

" ये ..बदतमीज है ..ये जो अभी शरीफ बनने का नाटक कर रहा है ...कमीना कहीं का ..."

तभी दूर की पॉवर का चश्मा पहने वो लड़का घबराते और ममियाते हुए बोला ~

" नही ..नही ...मैंने कुछ नही किया ....  अल्लाह की कसम ...मैं रोजे से हूँ ...मैंने कुछ नही किया "

तभी एक युवा खड़ा हुआ ..और चीखकर बोला ~

" साले ..हमारे धर्म की लड़की को हाथ लगाने की तेरी हिम्मत कैसे हुई ...पुलिस तो तेरी ठुकाई बाद में करेगी पहले हम तेरा गेम बजाते  हैं ..देखते क्या हो भाइयों मारो हरामजादे को ....."

उसका इतना कहना था कि तीन और युवक उसका समर्थन कर उस कमजोर से कॉलेज बॉय को मारने उतरे ...और पहला मुक्का उसी ने हवा में चलाया जिसने युवाओं में जान फूँकी थी ...लेकिन उसका मुक्का अपने लक्ष्य अर्थात उस कॉलेज बॉय के जबड़े से टकराने से पहले ही रुक गया ....या रोक दिया गया .....

" इसने कुछ नही किया ... .. छोड़ दो इसे और जाकर अपनी सीट पर बैठो ..."

मुक्केबाज बोला ~

" तू जरूर इसका दोस्त या रिश्तेदार लगता है ...?"

" हाँ... हूँ ..और अभय सिंह नाम है मेरा ...मैं इस जैसे उस हर  इंसान का रिश्तेदार हूँ ..जो बेकसूर है"

युवाओं का जोश ठंडा पड़ गया ...लेकिन तभी वो युवती तपाक से बोली ~

" जब आपने सब देखा तो बताइये इसने नही तो फिर किसने की वो बदतमीजी ..?"

" सॉरी .. वो मैं नही बता सकता.. .क्यूँकि मैं सिर्फ उसके साथ हूँ जो बेकसूर है ...बाकि किसने किया ..कहाँ किया इससे मुझे कोई मतलब नही "

तभी बस रुकी ..और भीड़ की खेप नीचे उतरी ...

" शुक्रिया अभय भैय्या आपने आज मुझे बचा लिया ...अल्लाह आप को सलामत रखे "

" खुश रहो ...जाओ तुम्हे कॉलेज के लिए लेट हो रहा है "

वो युवती जो अभय के पीछे -पीछे चल रही थी तुरन्त अभय के पास तेज कदम के साथ पहुँची और बोली ~

" मिस्टर अभय अगर मेरी जगह तुम्हारी माँ या बहन होती तो क्या तुम तब भी कसूरवार को ऐसे ही जाने देते ....?"

" होती तो कसम इन्ही रिश्तों की मैं उसका हाथ उसके काँधे से उखाड़ देता ...लेकिन मेरा कोई सगा इस दुनिया में अब जिन्दा नही बचा ...और मैडम ये लेक्चर उस समाज को सुनाओ जो समाज एक निर्दोष ,एक मासूम को मारने पर रगें फुला लेता है ...लेकिन मेरा गला पकड़कर पूछने की हिम्मत नही करता कि उसका नाम बता जिसने ये बदतमीजी की है ...."

बड़ा अजीब सा लगा अभय ..उसकी आँखों मैं जैसे लावा तैर रहा था ...जितना कड़वा उसका व्यक्तित्व था उतनी ही साफ़ और सच्ची थी उसकी बातें .....

मैं दीपशिखा नेगी ...उत्तराखण्ड के देहरादून में रहती हूँ ....यहाँ दिल्ली में एक फार्मासूटिकल कम्पनी में जॉब करती हूँ ..रोज 8:40 की ये बस पकड़ती हूँ ...और आज फिर अभय मुझे उसी बस में बैठा दिखा ...हम दोनों की आँखे मिली और मैंने रुठने के अंदाज में मुँह फेर लिया ...

आज मुझे सीट मिल गई थी ...तभी एक आंटी चिल्लाई ....

" बदतमीज ....ढंग से खड़ा नही रहा जाता ..."

कोई कुछ बोलता इससे पहले ही अभय बोल पड़ा ~

" आपके ही बैग का हत्था है आंटी ...जो बार आपसे टकरा रहा है आगे कर लीजिये बैग को "

बस रुकी ....और कुछ मिनटों के लिए मैं भी .. पता नही क्या जादू रहा अभय के व्यक्तित्व में कि मैं उसकी ओर आकर्षित होने लगी थी ... अभय मुझे एक बन्द किताब की शक्ल सा लगा ..और मैंने इरादा कर लिया कि इस बन्द किताब के पन्ने पलट कर ही रहूँगी ...और फिर ~

" तुम क्या अपने को कोई हीरो समझते हो ...हमेशा हर जगह टाँग अड़ाते हो अभी वो आंटी ..."

" क्यूँ तुम क्या हिटलर की औलाद हो जो हर बेकसूर को पिटवाने के मौके तलाशती रहती हो ...?"

बड़ा गुस्सा आया अभय पर लेकिन फिर वो गुस्सा उड़न छू भी हो गया ...और मैंने जींस की जेब से फोन निकाल कम्पनी में फोन किया कि आज मेरी तबियत खराब है ..आज मैं कम्पनी नही आ पाऊँगी ..दरअसल अचानक मेरी तबियत खराब नही हुई बल्कि मेरे होश जो बन्दा उड़ा चुका था आज मुझे उसके बारे में सब कुछ जानना था ...चोरी -छिप्पे अभय का पीछा किया तो देखा वो एक बंगलों में दाखिल हुआ ... अपने बैग से उसने टूल निकाले और फिर कपड़े चेंज करके एक कार रिपेयर करने लगा ...मैं गेट की झिर्री से सब कुछ देख रही थी ...अब समझी अभय मोटर मैकेनिक है..न जाने अभय को कितनी देर लगनी थी तो सोचा वापस कम्पनी चल दूँ ..कुछ कदम भी बड़ाये लेकिन न जाने क्या बात थी अभय में कि वहीँ गेट के बाजू में एक पेड़ के नीचे बैठ कर मोबाईल में गेम खेलने लगी ...कुछ 3 घण्टे लगे अभय को ...और मैंने फिर उसका पीछा शुरू कर दिया ...

उसने एक बस पकड़ी और मैंने उसका पीछा करने को एक ऑटो ...

वो सीधे नीचे उतरा और एक सिविल सर्विस  कोचिंग इंस्टिट्यूट में दाखिल हुआ ... और कुछ देर में वापस लौट आया ..

फिर अभय ने पुनः एक बस पकड़ी और वो पहुँचा दिल्ली के बीजी कॉर्नर में और वहाँ उसने एक दुकान का शर्टर उठाया और अपना कार मेकेनिक का काम करना शुरू कर दिया ...

कुछ भी बात नही थी अभय में ...माना उसका कोई अपना नही था ..लेकि सिर्फ वो एक मेकेनिक ही तो था ...और खराब ,बेजान और मजबूत गाड़ियों के बीच रहकर उसका स्वभाव भी वैसा ही रुखा और निष्क्रिय हो गया था ..मैं शायद अभय को पढ़ चुकी थी ..या फिर ...खैर

उसी रात मम्मी का फोन आया कि दीपा हमनें तुम्हारे लिए एक लड़का पसन्द किया है  ...उसकी फोटो भी मम्मी ने व्हाट्सअप की  ...लड़का बहुत एट्रेक्टिव , गुड लुकिंग और वेल जॉब था ...मैं क्या कोई भी लड़की उसके लिए हाँ कर देती लेकिन ...पता नही क्यूँ मैं हाँ नही कर पाई ...अगले दिन फिर उसी बस में मैंने अभय को तलाशा लेकिन वो नही मिला ...पूरा दिन उदास रही ..और  काम में मन न लगा ...मम्मी का फोन भी बहुत काम है कहकर काट दिया ...इन दो दिनों में अभय ने मेरी जिंदगी में न जाने क्या तूफान खड़ा कर दिया था ...मैं चाहकर भी उसको आँखों और यादों से मिटाने में अक्षम हो रही थी .....लेकिन मेरे सामने कोई राह भी तो नही थी ...

क्या मुझे अभय से प्यार हो गया है ..? क्या अभय ही वही लड़का है जिसका मुझे इन्तेजार था ..?

अपनी फ्रेंड ज्योति से बात शेअर की तो उसने छूटते ही कहा कि पागल मत बन ..तेरा करियर एक मैकेनिक के साथ सिर्फ डार्क है ...ब्राइट नही ...लेकिन वो मैकेनिक अब मुझसे खेलने लगा था ..वो शायद मुझे पूरा खोल चुका था ...और अब मुझे जोड़ना भी उसके ही बूते था ....हर लड़का मुझे देख कर आँहे भरता है और एक अभय जिसने मेरी तरफ इन दो मुलाकातों में कभी आँख उठाकर मुझसे बात नही की ...न मुझे देखा ..न मेरी सुंदरता पर रीझा ..न उसने मुझे इम्प्रेश करने की कोई कोशिश की  ......

नेक्स्ट मॉर्निंग ज्योति का फोन आया कि उसकी कार खराब हो गई है ...आस -पास कोई मैकेनिक हो तो उसे एड्रेस दे दे मेरा ....

मैं उछल पड़ी ...और शॉवर लेकर ..खूब सज-धज कर ऑटो पकड़कर वो राह पकड़ी  जहाँ अभय का गैराज था ...

लेकिन उसका गैराज बन्द था सुना वो कोई कार रिपयेर करने गया है... दो घंटे बैठे रही ...और फिर ज्योति का फोन आया कि उसने कार रिपेयर करवा ली है ...अब मैकेनिक की जरूरत नही ...

बड़ा पैर पटका जमीन पर और घूर कर अभय के गैराज को देखा .... तभी अभय आता हुआ दिखाई दिया ...

" न कोई फोन नम्बर लिखा है न किसी को कुछ बताया है ...कि कहाँ गए हो ...जरूरत थी तुम्हारी जानते हो ..?"

" मैडम .. कभी सुना है कि मैकेनिक हड़ताल पर जाते हैं ...पूरी दिल्ली का चप्पा -चप्पा पटा हुआ है मोटर मैकेनिक से तो यहाँ क्यूँ झक मार रही हो आप "

इतना कहना था कि मेरी आँख में आँसू उतर आये ....

" बड़ा समझते हो अपने आप को ...समझते भी नही एक लड़की क्यूँ किसी लड़के की इतनी कड़वी बाते सुनती है ...क्यूँ किसी का इतना इन्तेजार करती है ...पहले उस बंगले के बाहर 3 घण्टे इन्तेजार करवाया और अब यहाँ दो घण्टे ...नही करुँगी अब ...जाओ ...नही याद करुँगी अब तुम्हे कभी नही ...कभी नही "

मैं आंसू पोंछते हुए दौड़ पड़ी लेकिन अभय वहीँ खड़ा रहा ....मैंने इरादा कर लिया कि अब मम्मी के बताये लड़के से शादी कर लूंगी लेकिन फिर इरादा बदल के ये तय किया कि अब कभी अभय के बारे में नही सोचूँगी ....अगली सुबह मैंने ऑफिस के लिए बस पकड़ी ...तभी मुझे सामने अभय बैठा दिखाई दिया ...मैं जैसे जी उठी ..फिर खुद पर कण्ट्रोल किया ...अभय ने मुझे देखकर स्माइल दी ...लेकिन मैं पत्थर बनी रही ...बस रुकी फिर ~

" सुनो ...मुझे नही पता तुम मेरे बारे में क्या सोचती हो ...लेकिन इतना कहने आया हूँ कि मैं तुम्हारे लायक नही हूँ..."

मैं पलटी और बोली ~

" लायक नही होते तो तुम्हारे लिए तड़पती नही ..हर पल सिर्फ तुम्हे याद नही करती ...तुमसे प्यार नही करती "

अभय और मेरे बीच अब सिर्फ हवा का शोर था या ट्रैफिक का ...अभय आगे आकर बोला ~

" मैडम ...."

" दीपशिखा ...नाम है मेरा "
" हाँ दीपशिखा ..जेल गया हूँ मैं कुछ तीन महीने ...बोलो क्या अब भी मैं तुम्हारे लायक हूँ ..?"

कुछ ख़ामोशी हम दोनों के दरमियान रही और मेरी ख़ामोशी को मेरी न समझ कर अभय वापस लौटा ..

" मैं जानना चाहती हूँ कि आखिर तुम जेल क्यूँ गए ..?"

" तो सुनो ! बहुत खुश था उस दिन मैं ..बचपन में ही एक हादसे में अपने माता -पिता और बहन को खो चुका हूँ ...लेकिन ताऊजी ने अपनी औलाद की तरह पाला और अच्छी शिक्षा दिलवाई .. उच्च शिक्षा के लिए दिल्ली भेजा ... यहाँ शिक्षा के साथ मैं मोटर मैकेनिक का काम भी करने लगा ताकि ताऊजी अब मेरा खर्च न उठाये ...लेकिन इसके अलावा मेरी जिंदगी में सिर्फ किताबों का बसेरा था ...दिन- रात पढ़ता था मैं ताकि एक दिन ..आई .ए. एस ऑफिसर बनकर देश की सेवा कर सकूँ ..प्रिलिम और मेंस भी निकाल लिए थे मैंने ...लेकिन इंटरव्यू वाले दिन जिस बस को मैंने इंटरव्यू सेंटर जाने के लिए पकड़ा ...उसी बस में मेरे आगे एक लड़की खड़ी हुई  थी बस में बेहद भीड़ थी ...तभी मेरे पीछे खड़े या साइड में बैठे किसी व्यक्ति ने उस लड़की के साथ बदतमीजी करी और सारा इल्जाम मुझपर लगा ..और फिर उस बस के कुछ यात्रियों ने बिना सच जाने और समझे  मुझे लात -घूँसों से खून से तरबतर कर दिया ... और जब जी नही भरा तो फिर पुलिस के हवाले ...मैं रोता रहा गिड़गिड़ाता रहा ..उस लड़की के पैरों पर गिर गया कि मेरा आज इंटरव्यू है मुझे जाने दो  लेकिन किसी ने मेरी एक न सुनी ..एफ .आई .आर हुई और उसके अगले दिन कोर्ट में पेश हुआ और तीन महीने की जेल ...... तबाह हो गया मैं दीपशिखा ...उसके बाद न मैं किसी संस्था में जॉब करने लायक रहा न कोई सपना देखने और बुनने लायक ...बस अब अपनी कमाई का एक अंश उन छात्रों को दान कर देता हूँ जो गरीब तबगे के होकर दिल्ली में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं "

आँख से आँसू रुकने का नाम नही ले रहे थे फिर भी बोली ~

" अब समझी कि क्यूँ तुमने उस लड़के को पिटने से बचाया ..क्यूँ तुम निर्दोषों की ढाल बनकर खड़े हो जाते हो ...क्यूँकि तुम भी निर्दोष थे ... अभय मैं उस सोच को नही बदल सकती जिसमें बिना सबूतों के किसी निर्दोष को दोषी समझ कर समाज सजा देने हेतु फड़फड़ाने लगता है ..जबकि ये कानून का काम है ...मगर मैं तुम्हे पूरी तरह समझ चुकी हूँ ...अभय मुझे गर्व है कि मैंने तुमसे यानि एक इंसान से प्रेम किया है ...अगर हो सके तो मुझे अपनी जिंदगी में शामिल कर लो ...अपना लो मुझे अभय ..अपना लो मेरे प्यार को ......."

अभय अभी भी पत्थर बना खड़ा था ....न उसके चेहरे में कोई भाव था न आखों में ...लेकिन तभी अचानक उसने अपनी बाँहें खोली और मैं आगे बढ़कर उसमें पूरा समा गई ........"

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

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