Tuesday, 11 June 2019

बैगन

#बैगुन
~~~~

" कई दिनों से देख रहा हूँ ..पूरी गली में तुम ..गाजर , टिंडे, आलू ,कटहल वगैरह की आवाज लगाते हो ...और जैसे ही मेरे दरवाजे के सामने आते हो तो सिर्फ ~

" बैगुन ले लो ..बैगुन ले लो .. "

" नही पण्डित जी  कसम खुदा कि सिर्फ बैगुन ले लो  नही कहते ...साथ में ताजे ..मोटे ..लम्बे, चमकीले और काले भी बोलते हैं "

" बदतमीज आइंदा यदि मेरे द्वार के सामने दिखे भी तो समझ लेना ...."

" लुगाई ..मतलब बीवी से बोलियो अपनी ...उन्हें रोको ...मतलब अब हम धंधा भी न करें ...उन्हें ही पसन्द है बैगुन ....वो ही कहती हैं ताजे हो तो आवाज लगा देना ....."

" नीच .. मेरी बीवी इस दुनिया में नही है उसे मरे पूरे 2 साल हो चुके हैं ...मैं यहाँ अकेला रहता हूँ समझा "

" ओह्ह्ह माफ़ करना पण्डित जी ...कोई काम वाली धरे हो क्या ...?"

" नही ..हम सब स्वयं कर लेते हैं ...."

" तो फिर आपके पीछू वाले दरवाजे से जो औरत अक्सर मुझसे बैगुन खरीदती है वो कौन है ...?"

जवाब नही तमाचा मिला ..और वो भी भीड़ में से एक अधेड़ व्यक्ति का ...

" साले दो कौड़ी के कुंजड़े ....किस पर लांछन लगा रहा है ...ये पण्डित रमाशास्त्री हैं ...माँ काली मन्दिर के पुजारी ...अभी माँ तेरा संहार करने स्वयं प्रकट हो गई तो समझ फिर न कोई दवा असर करेगी न कोई दुआ ...दफा हो जा इधर से और आइंदा इधर न दिखना वरना .. तेरा संहार सत् प्रतिशत निश्चित है "

मैंने रेहड़ी उस गली से मेन चौराहे की ओर दाब दी ..और रेहड़ी रोकी सीधी करीम भाई की चाय की दुकान पर ~

" करीम भाई चाय पिलाओ यार ...!

" क्यूँ शब्बीर मियाँ आज बड़ी जल्दी आ पहुँचे ...क्या कर्फ्यू लगा है ..बजरंग गली में ...? "

मैंने एक साँस में ..सारी आपबीती करीम भाई से कह दी ..

" न ...न ..मान ही सकता ...इत्ता भला आदमी गेरा है अल्लाह ने जमीन पर पण्डित शास्त्री की शक्ल में ...तुझे या तो कोई धोखा हुआ ..या बेटा तू चरस -चिल्लम ज्यादा फूँकने लगा है ...

" करीम भाई ..ले लियो तुम भी ...चरस पीता हूँ लेकिन इतना भी नही कि लुगाई और मरद में फर्क न कर सकूँ ..."

" अबे तो क्या पता मकान या दरवज्जे में नजर फिसल गई हो ...ये ले चाय अब हफ्ता भर न जइयो उधर वरना समझ लेना फिर जो हाल कुत्ते का पेट्रोल छिड़क के होवे है वही तेरा भी होगा ......"

उसी दिन अल्लाह से तौबा करी और चरस से तलाक लिया ...लेकिन मुझे यकीन था कि जो कुछ हुआ वो झूठ नही था ...

" मौलवी साहब ये बताओ ...लुगाई का भूत कैसा होता है मतलब ..दिखने में ...?"

" बस तू जनाना कपड़े पहन कर आईने में शक्ल देख ले ...सब पता चल जाएगा ..."

मौलवी साहब उस दिन से रूठे हैं जब इनसे तीन पत्ते सौ के हड़प के हापुस कहकर टोकर आम पकड़ा दिये थे.....

हफ्ता भर बाद फिर बजरंग गली में रेहड़ी लेकर दाखिल हुआ तो ..लौंडों ने कुत्ते खोल दिए पीछे ...साँस न ली और फिर करीम भाई ....

" अबे कितने बार मना किया उधर मत जइयो अब ...भतेरी गली बिछी हैं लखनऊ में ...किसी और में दाखिल हो जा ...ले चाय पी ....

बैगुन बेचने ही बन्द कर दिए अब ...या यूँ कहूँ बैगुन की शक्ल देख कर ही मुझे रपटी पिनक दौड़ पड़ती है .....

धंधा पटिया गया ...और गलियों ने पहले से ही रेहड़ी ज्यादा थी और खरीदार कम ....जब कर्जा सर पर पकने लगा ..और सब्जी सूख और सड़ कर कूड़े की डिग्गी खाने लगी तो सोचा अब सब्जी का धंधा छोड़ दूँगा ....

तभी किसी बूढ़े की आवाज  पीछे से कान पर टकराई ...

" बैगुन भी धरे हो क्या ..?"

मैं कुछ नही बोला लेकिन बुड्ढा मेरी आँखों के अंगार और भिंची मुट्ठियों को देख समझ गया कि कहानी क्या बनने वाली है और वो लौट गया ...लेकिन मैं शाम तलक वहीँ बैठा रहा ...और सोचा जामनगर  चला जाता हूँ ..फिर से वहाँ  आइसक्रीम ही बेचूँगा ..

तभी सब्जी उलट रहा था कि सामने सड़क पर पड़ा एक बैगुन दिखाई दिया ....

पहले मेरा खून का दबाव बढ़ा फिर मैंने उसे हाथ में लेकर कसम ली ...

" मुझे बर्बाद करने वाले मक्कार पण्डित ...मैं भी तेरी इज्जत उतार कर ही जामनगर की बस पकडूँगा "

तभी ऊपर छज्जे से आवाज नीचे गिरी ~

" ओ भैय्ये अबे कहाँ उठा रिया है ...लौंडे से नीचे गिर गया ...जरा ऊपर फैंकियों तो "

" चल तेरी माँ का .. नौकर हूँ तेरे बाप का ...खुद उठा ले आकर ..."

उसे नीचे आने में देर थी और वहीँ बैगुन जमीन पर फेंक गाढ़ी आगे सरपट दबा दी ।

कसम खुदा की नींद नही आ रही थी ...करवट बदलते -बदलते इरादा भी बदला ..और सीधे पहुँचा बजरंग गली ....

कुत्ते भूतनी के बहुत हैं यहाँ ...आदमी से नही पहले उनसे बचना था ...सो फूँक -फूँक कर आगे बढ़ रिया था ..तभी नजर पड़ ही गई एक की ...और फिर उनकी पूरी टीम ....

बड़ी मुश्किल से जान बची ... बचपन से ही तीन गेरे छत्तीस का रहा है अपना इस कुत्ता कौम से लेकिन इस बार उनका एहसान माना ...उन्होंने ठीक मुझे मेरी मंजिल पर टांका था ....

पण्डित के पीछू का दरवाजा बन्द था ...तभी मुझे अंदर से पायल की छम-छम की आवाज आई ...मैं डर के थर -थर काँपने लगा ...घड़ी देखी रात के ढाई बज रहे थे ...

पहले लगा कोई चुड़ैल होगी... फिर तुरन्त खुद से कहा कि पण्डित ने मजे का सामान रखा है ...सबके सामने शरीफ और भक्त बनता है और पीठ पीछे आधी रात खूब छम -छम करवाये है ....

लेकिन मुझे अभी अपनी आँखों से  वो सच देखना था जिसको पंडित ने दो साल से दुनिया से छिपा के रखा है ....

किस्मत भली थी ..एक पाइप नजर आया ...जो सीधे खिड़की के पास खत्म होता था ....

मैंने सीधे उसपर चढ़ना चाहा तभी ...हाथ फिसल गया ...और मैं जमीन पर आ गिरा ... फिर कोशिश की और इस बार खिड़की तलक पहुँचने में कामयाब रहा ....और जैसे ही अंदर झाँका ~~

" अबे एक नही ये तो दो हैं "
मन में बड़ी जोर से कहा मैंने ...तभी~

" भाईजान ! मैंने अल्लाह के नेक बन्दों के बारे में सुना जरूर था लेकिन अब देख भी लिया ...काश मैं आपकी सगी बहन होती "

वो औरत पण्डित के पैरों में घिर पड़ी ...

" उठो ! उठो ! शायरा बहन उठो ..  हमें शीघ्र ही यहाँ से निकलना होगा ...अपितु प्रातः हो जायेगी ..आप दोनों ने सब सामान रख लिया ...कुछ भूले तो नही "

" भाईजान आओगे न हमसे मिलने ...?"

पण्डित कुछ बोलता इससे पहले ही मैंने अंदर छलांग लगा दी और ~

" वाह पण्डित वाह ..खुल्ला खेल
हो रहा है यहाँ ..चल माना ये तेरी बहन ...लेकिन ये दूसरी वाली तो बेगम ही होगी न ...ज़माने के सामने तू साधू और पीठ पीछे ये हाल "

तभी मेरे गाल पर एक तमाचा पड़ा ..

" नीच किसको बोल रहा है ये सब ...किसको ?...सुन मैं शायरा बेगम  हूँ और ये मेरी बेटी आबिदा पैदाइशी गूँगी और नाबीना(नेत्रहीन ) है ये ...इनकी बेगम मरी नही ...बल्कि दो साल पहले शहर में जो धमाका हुआ उसमें शहीद हुई .... वो धमाका जिसका इल्जाम मेरे बेकसूर शौहर पर लगा ...और जिसके बाद हमारा जीना हराम हो गया ...पराये तो पराये अपनों ने भी हमको धिक्कार दिया ..एक  जवान अपाहिज बेटी को लेकर कहाँ जाती मैं ?..भला हो इस फ़रिश्ते का जिसने धमाका करने वाले की शक्ल देखी थी और जिस वक्त मेरे शौहर पर इल्जाम लगे ये हमारे घर आये ...और ज़माने की धिक्कार .नफरत ..और रोटी -रोटी को तरसते हम माँ -बेटी को इन्होंने सहारा दिया ...और न सिर्फ सहारा दिया ..बल्कि मेरे शौहर को निर्दोष साबित करने में अपनी उम्र की जमा कमाई लगा दी .. ...अपनी इज्जत को ताक पर रखकर ..इन्होंने एक दिन नही बल्कि पूरे 23 महीने हमें यहाँ दुनिया की नजर से छिपाये रखा ..मकान को बिल्कुल पिंजरा बना दिया हमारे लिए ...इन्हें अपनी इज्जत का डर नही बल्कि हमारी इज्जत और मुस्तकबिल का ख़ौफ़ था ...बहुत पसन्द करती है बैगन की भाजी मेरी बेटी और पण्डित जी को कुछ तीन  दिन मन्दिर में ही रहना था .. इसलिए तुझसे ..पीछे वाले दरवाजे से बैगुन खरीद लिए एक आद बार और तूने मेरे भाई की इज्जत ही नीलाम कर दी ..तू क्या समझता है सब खामोश रहे उसके बाद.. बल्कि बाते उछलने लगी मेरे बेदाग भाई के सर पर फिर .....लोग किस्से गढ़ने लगे ..मजाक बनाने लगे "

" छोड़ो बहन इसका कोई दोष नही ...भाई मैं हाथ जोड़ता हूँ सुबह होने वाली है ..इन्हें स्टेशन छोड़ना है ताकि किसी को कानों -कान खबर न हो कि यहाँ कोई रहता था ...वरना जैसे तुम नही समझे वैसे कोई इस रिश्ते को नही समझेगा .. मेरे पूर्वज जो माँ काली के अनन्य उपासक रहे हैं उनकी इज्जत  मिट्टी में मिल जायेगी "

" नही मिलेगी पण्डित जी ..माफ़ी नही माँगूगा आपसे क्यूँकि मैं तो उस लायक  भी नही ....लेकिन यकीन दिलाता हूँ इन्हें इनकी मंजिल तक छोड़ने में मैं आपकी मदद करूँगा "

छुपते -छिपाते हम रेलवे स्टेशन पहुँचे ..एक मन किया कि शायरा बेगम की लड़की को अपना के महानता में पण्डित के बराबरी में खड़ा हो जाऊँ लेकिन दूसरे ही पल रुक गया ...क्यूँकि महानता जिम्मेदारी उठाने का भी नाम है और मुझसे अपना पेट ही पल जाये गनीमत है .....

शायरा बेगम रेल के डब्बे के खुले फाटक  से हाथ तब तलक हिलाती रही जब तक उसे पण्डित का वुजूद दिखता रहा ...मैंने उसकी आँख में उतने ही आँसू गिने जितने इस वक्त में पण्डित की आँख में बरामद कर पा रहा हूँ ....

बेकसूर अपनों की लाश देखकर इन आँखों  ने इंसान को यहाँ हैवान बनते बहुत देखा है ...लेकिन बेकसूर अपने को खोकर किसी इंसान को फ़रिश्ता बनता आज ही देख रहा हूँ ...अल्लाह ऐसे मासूम लोगों को खूब लम्बी जिंदगी दे ताकि इंसानियत दुनिया में बची रहे ....

पंडित जी मेरे काँधे पर सर देकर  वहीं रेलवे की बैंच में बैठे रहे और एक सवाल जो मुझे परेशान कर रहा था जिसे  मैं सोचता रहा कि आखिर कैसे पण्डित जी से पूछूँ कि ~

" एक बात बताइये पण्डित जी ...क्या आपको बैगुन की भाजी पसन्द है ?"

नवाज़िश

BY~

Junaid Royal Pathan

No comments:

Post a Comment