#खतना
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" देख ..देख ..देख मैना उड़ी ...कव्वा उड़ा ..."
" उईईईईईईई......"
और बाजू वाले कमरे में -
" देखा ..सुना पाण्डेय जी ...यही जगह मिली थी आपको "
" न सुमि देखा नही बस सुना ...अब छोड़ो न ये उनके धार्मिक कर्मकांड है ...लाओ दाल डालो तो जरा .."
" हे भगवान ! क्या हो गया है आपकी अक्ल को ..अरे अपनी नही कम से कम मेरी और अपने छोटे से बेटे की तो कुछ सोचो ..क्या सीखेगा ये बड़ा होकर "
" तुम खाली गर्म हो रही सुमि ...अरे एप्लीकेशन लगाये हैं भई सरकार को ...सरकारी कमरा जल्दी मिल जाएगा ....अच्छा जरा खीरा तो काटो "
" तो इसका मतलब पूरे शहर में आपको नियाज मुहल्ले के अलावा किसी ने कमरा न दिया ...."
" वो...."
तभी दरवाजे पर भड़ -भड़ होती है ~
" जी बहन सलाम ...ये लीजिये मिठाई ..."
" क्यूँ ...मतलब कोई ख़ास बात है आज ? "
" लो जी ...अभी उईईईईई की आवाज न सुनी ...मेरा ही लौंडा है ...खतना हुआ है आज उसका .. पाण्डेय जी बताये नही ... मुनीर के अब्बा तो बुलावा ठीक से दिए थे ...."
तभी पाण्डेय जी खाते से उठते हैं ...
" हाँ ..हाँ...भाभी जुबैर भाई बराबर बोल दिए थे...वो जरा दफ्तर से लेट हो गया ..बस पहुँचने ही वाला था ...आप आइये न बैठिये "
" नही भाई अभी जरा मुहल्ला निपटा दूँ मिठाई से ...फिर कभी आऊँगी "
दरवाजा बन्द होता है और ~
" ये क्या खा रहें हैं आप ..हे भगवान ..छोड़िये इसे ..शर्म नही आती आपको "
" यार सुमि तुम भी हद करती हो अब क्या मिठाई में कुछ चिपका है ..खाने दो वैसे भी मिर्ची ज्यादा कर दी तुमने दाल में "
" मैं क्या कहूँ अपने भाग्य को ...अरे कोई इस काम की भी मिठाई बाँटता है और क्या कोई इस काम की भी मिठाई खाता है ....अरे कुछ लाज -शर्म कुछ धर्म -कर्म भी बचा है आपके अंदर ? "
" बचा है सुमि ...बचा है..ये धर्म ही तो है जिसकी वजह से मैं इंसान होकर ..इंसानों में भेद नही करता ...ये धर्म नही तो और क्या है कि हर इंसान की खुशियों में खुश होता हूँ और हर एक के दर्द में मैं गमगीन ...."
ये जुमला मन में बोल ही रहा था कि तभी ......
" पापा ..पापा ..ये खतना क्या होता है...?"
सुमि ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा ...और मैं हाथ तौलिये में पोंछकर सीधे दरवाजे से बाहर हो गया....कुछ दिनों बाद ..एक रात खाना खाते वक्त ~
" सुनो जी ..अगले महीने माँ हमसे मिलने आ रही है ...मैंने तो जैसे तैसे दो महीने यहाँ निकाल लिए ..माँ को पता चला कि हम यहाँ रहते हैं तो ....?"
आज सुमि गुस्से में नही थी उसका सवाल बहुत मासूम था .....लेकिन फिर जैसे ही उसने गुस्से में साड़ी का पल्लू अपनी कमर में फँसाया मैं समझ गया अगर सन्तोषजनक उत्तर नही दिया तो अगले ही पल मेरी हालत हिरोशिमा ..नागासाकी से भी बदतर होने वाली है ....
" हा हा हा ..बस ..मेरी वीरांगना ...मेरी झाँसी की रानी इतनी सी बात ...अरे मैंने सब सोच लिया है ...माँ को कुछ पता नही चलेगा ....जरा भाजी तो गिराओ डार्लिंग "
" ठूंसते रहते हो हमेशा ...सुन लो जी अगर माँ को पता चला तो समझ लेना ...अच्छा नही होगा ...."
खाना खा के मैंने सोचा थोड़ा टहल लूँ.....
" आदाब अर्ज है पाण्डेय जी ...!"
" हाँ जुबैर भाई तुम भी लंका फूँकों मेरी ...ये क्या पाण्डेय जी लगा रखा है ...योगी कहने में जवान जलती है क्या ...?"
" माफ़ करना योगेश ..मतलब योगी ...लेकिन कुछ परेशान से दिख रहे हो ...?"
" वही यार घंटा रोज का चालीस चौथा ...यार ये सुमि भी न मेरा पुतला फूँक के ही दम लेगी ..."
" हा हा हा ...और करो लव ..पहले ही कहा था ...सोच लो लव मैरिज बहुत कम सस्पेस होती है "
" सक्सेस कहते हैं यार .."
" हाँ वही सक्सेस .., तुम उसे सब सच क्यों नही बता देते योगी ..?"
" वाह जुबैर भाई वाह ...क्या कहूँ उससे कि मैं दो कौड़ी का एक मामूली स्कूल बस का ड्राईवर हूँ .. ...सुनते ही मायके निकल लेगी मेरे बेटे को साथ लेकर ..."
" तो तुमने उससे झूठ बोला ही क्यूँ ...कि तुम एक सरकारी नौकर हो ...?"
" उसकी माँ के लिए ..दरअसल बुढ़िया को अपनी बेटी की शादी सरकारी नौकर से ही करनी थी ...ससुर नही है मेरा लेकिन ये श्राप बुढ़िया अभी जिन्दा है ...आने वाली है अगले महीने ..यार जुबैर भाई क्या करूँ बताओ ..शहर में कोई 5 से 6 हजार से नीचे कमरा किराये पर नही देगा ...जबकि महीने के 10 हजार भी मुश्किल से कमा पाता हूँ "
" यार ये तो बड़ी टेढ़ी खीर लग गई "
" थोड़ी ही टेढ़ी थी भाई ...आपकी बेगम ने तो पूरी टेढ़ी कर दी "
" क्या हुआ ...क्या किया सलमा ने ..?"
" यार खतना की मिठाई ले आई ..जबकि मैंने कहा था मैं घर पर ही आऊँगा ..."
तभी पीछे से किसी ने काँधे पर हाथ धरा ...
" भाभी आप ..?"
" सलमा तुम ..?"
" योगी भाई ..मैं सब समझ गई मैंने सब सुन लिया ..अब ऐसी गलती दुबारा न होगी ... आने दीजिये माँ जी को उन्हें कुछ पता नही चलेगा "
पूछना तो चाहता था कि कैसे पता नही चलेगा ...लेकिन फिर सिगरेट की तलब ने कहा छोड़ो यार ...इस मुहल्ले ने सभी फेंकूँ रहते हैं.....वक्त बीतता गया ...और एक दिन ~
" पाण्डेय जी उठो ...माँ का फोन आया है स्टेशन पहुँच गई हैं !"
" हें ..हें ..क्या घंटा पहुँच गई है ..भला ऐसे भी कोई पहुँचता है ...बुड्यययय..मतलब माँ तो कह रही थी वो तीन दिन बाद आयेंगी ...?"
" चलो उठो अब ..आप उन्हें लेकर आओ और मैं सामान बांधती हूँ ..."
" क्यूँ ...सामान क्यूँ ..?"
" वो इसलिए पाण्डेय जी ...क्यूँकि वो ये सब देखकर दरवाजे से ही कहेंगी .. चलो सुमित्रा अपने घर ... मैं तुम्हे इस नर्क में नही रहने दूँगी "
चल तो दिया ..लेकिन बहुत उदास ...निराश ..परेशान ...तभी भाभी और जुबैर भाई हैण्डपम्प के पास टकराये ...और मैंने उन्हें सब बता दिया ...
" आप फ़िक्र मत करो योगी भाई ...आप बेफिक्र होकर माँ जी को लेकर आओ ..."
मन में चौतीस भली-बुरी उठी लेकिन औरत समझ उसे मन में ही बुझा दिया ...
स्टेशन पर माँ जी का वेलकम किया ..उन्होंने सर पर हाथ रखा और हम रिक्शे में बैठे ...
" माँ जी वो जी ...अगले महीने की बात हो गई ..सरकार ने अर्जी मंजूर कर ली ..वो मकान मिल जायेगा अगले हफ्ते"
" बेटा क्या बोल रहे हो ...कम सुनाई देने लगा है कानों से अब "
" तेरी माँ की ...."
कम्प्लीट करने से पहले कण्ट्रोल किया ...रिक्शा जैसे ही नियाज मुहल्ले पहुँचा ....
" अबे भैय्ये ...ये कहाँ ले आया ...नियाज मुहल्ले कहा था ..."
" चुतियाचरन समझे हो..? क्या यही तो है नियाज मुहल्ला ...चलो अब उतरो ..."
चारों ओर मकान में भगवा ध्वज लहरा रहा था ...मैंने जेब से पैसे निकाले और रिक्शे वाले को दिए तभी ....माइक से सत्संग की आवाजें कान पर टकराई ....बुढ़िया तो हाथ जोड़कर लीन हो गई ...और फिर डिप्पर खोल मुस्कुराह के मेरे सर पर हाथ फेरा ...और बहुत से आशीर्वाद दिए ...फिर कुछ और आगे बढे तो अपना घर और उससे सटे जुबैर भाई का घर देखा ..हजारी के फूलों से घर लकदक था ...जिस आँगन में जुबैर भाई के अब्बा खटिया लगाकर हुक्का चूसते थे ...वहां तुलसी का गमला एक टेबल पर सजा था ...घर की देहलीज पर अल्पना बना थी ... सामने पेड़ की जड़ पर शिवलिंग ..उसपर महकता दूध ..और जलती धूप और अगरबत्ती की खुशबू से नहाया वातावरण ..."
बुढ़िया ख़ुशी के मारे फूले नही समा रही थी ..मैंने सोचा हार्ट अटैक न हो जाये ....
" माँ ....."
माँ बेटी का मिलाप देखकर मेरी सुलग रही थी ...लेकिन तभी नजर सलमा भाभी पर गिरी जिनसे साड़ी नही सम्हल रही थी .... फिर जुबैर भाई धोती में दिखे ...खूब हँसी आ रही थी लेकिन फिर न जाने क्यूँ आँख से आँसू गिरने लगे ...
" पगला गए हो योगी ...जाओ ..माँ जी को कुछ मत बताना ..मुहल्ले पर मेरे और मेरे अब्बा के करोड़ो एहसान है इसलिए वो भी इस नाटक में तुम्हारा साथ देंगे ...लेकिन असल बात ये कि वो भी तुमसे बहुत प्यार करतें हैं तुरन्त तैयार हो गए .."
मुझे ये सब एक कहानी सा लगने लगा ...इतना नाटकीय असल जिंदगी में कहाँ होता है ..पूरा मुल्क जहाँ धर्म-मजहब की नफरत में जल रहा है वहाँ ये सब कुछ .... कुछ पाँच दिन ये ड्रामा चलना था ...यानि पाँच दिन कुछ भी नही बदलना था ...लेकिन सुमि बदलने लगी थी ...मैंने सुमि और सलमा भाभी को बहुत करीब आते देखा ....और एक दिन हिम्मत करके ...
" सुमि आज माँ जाने वाली है तो मैं तुम्हे एक बात बताना चाहता हूँ ताकि तुम्हे कुछ गलत लगे तो तुम भी माँ के साथ चले जाओ ..."
" यही न कि आप एक स्कूल बस ड्राईवर हैं ...सलमा भाभी ने मुझे सब बता दिया ...गर्व करती हूँ पाण्डेय जी आपपर कि आप मेरे पति हैं और गर्व करती हूँ आपकी दोस्ती पर आपके व्यक्तित्व पर कि पूरे मुहल्ले के दिल में बसते हैं आप ...आप कुछ खास नही कमाते लेकिन आपने बेशुमार मुहब्बत कमाई है ..और वो भी गैर मजहब के मानने वालों के बीच रहकर ...मुझे क्षमा कीजियेगा पाण्डेय जी कि मैं आपको गलत समझी ...और गलत समझी धर्म की अवधारणा को जिसका मूल ही मानवता और सदभाव है ....."
तभी माँ जी की आवाज कानों पर गिरती है ~
" बेटा योगेश रिक्शा आया कि नही .....?"
" आ गया माँ ...आ गया ..."
उस दिन के बाद सुमि और मेरी जिंदगी स्वर्ग बन गई .. अब न कोई सवाल था न कोई जवाब ...एक दिन दुपहरिया में जैसे ही किचन में, मैंने सुमि को अपनी बाहों में लिया ...तभी बगल से फिर आवाज आती है लेकिन ये आवाज जुबैर भाई के छोटे बेटे की है ...जिसका आज खतना है
" देख बेटे चिड़िया उड़ी ....चील उड़ी ..देख."
"आईईईईइइइइ "
और सुमि खिलखिला कर मेरे कलेजे में और धसने लगी .......और जैसे ही हँसते -हँसते उसने मेरे कलेजे में सोणा मुक्का जड़ा मेरे मुँह से निकला ...
" उईईईईईई...."
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
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