Monday, 10 June 2019

कैदार से कैलाश तक

#केदार_से_कैलाश_तक
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" आसिफ़ .... माँ नही रही  वापस आ जा  ....आसिफ  बहाव .....आसिफ़ ........"

एक करन्ट सा दौड़ा मेरे अंदर ...और यकायक मेरी आँख  खुली ,,, पसीने से तर था मैं .....

" मैं आसिफ अब्बास ...उम्र 22 साल ...उत्तराखण्ड  का रहने वाला हूँ .....  " केदारनाथ " घोड़ो से श्रद्धालुओं को पहुँचाता था ...लेकिन केदारनाथ आपदा में मेरा पूरा परिवार जमीन और पानी निगल गए ...सिर्फ अम्मी बची ..लेकिन उनकी भी आँख की रौशनी जाती रही ...और एक चट्टान के नीचे दबने से उनकी रीढ़ की हड्डी पर गहरी चोट लगी ...जिसकी वजह से उनपर फालिस गिर गया ...कमर से नीचे का हिस्सा सुन हो गया ....इस आपदा के वक्त में ..उस बहाव में इसलिए नही आ पाया क्यूँकि मैं नीचे हार्ट मेडिकल कैम्प पर एक श्रद्धालु को छोड़ने गया हुआ था ....जिसको दिल का दौरा पड़ा था ....पठान हूँ मैं ...यानि घोड़े की नस्लों .को पहचानने उन्हें पालने की शौकीन कौम का नुमाइंदा .. लेकिन जितनी मुहब्बत घोड़ों से है मुझे उतनी ही केदारनाथ से ...और उस जमीन से भी ...जिसे लोग देवभूमि कहते हैं ...आंग्ल -अफगान युद्ध की वजह से मेरे पूर्वज जिनपर जुल्म की इंतेहा बर्तानीयों ने गिराई ..तो इसी मुक़द्दस जमीन ने हमें पनाह दी ...जो आज हमारा वतन ..हमरी इज्जत है ...मेरी  पीढ़ियों ने मुद्दत से यहाँ तीर्थयात्रियों की खिदमत की  ....और इसी वास्ते आज ये तीर्थयात्री मुझे मेरे परिवार का हिस्सा लगते है...."

" ओह्ह्ह्ह ..वेरी इंट्रस्टिंग ...लेकिन फिर .. .केदारनाथ ..मीन्स उत्तराखण्ड क्यूँ छोड़ा ? "

" मेमसाहब ..शायद केदारनाथ ने हमको छोड़ दिया ... बार-बार वहाँ अपनों की याद सताती थी ..और अम्मी का इलाज भी फिर ...."

" ओह्ह्ह्ह ...लेकिन फिर  ये नेपाल में बसेरा ..अच्छा ये बताओ कि ये चीनीयों से दोस्ती कैसे गाँठी ... ?"

" युवान .और शिलाजीत .हर बार नीचे लौटकर   मेरी कमाई का एक चौथाई युवान इनका और  शिलाजीत भी "

" आई नो युवान इट्स करेंसी बट ये शिलाजीत क्या है  .....?."

" मेमसाहब सम्हल के बैठिये ..आगे अब आपको भी थोड़ा पैदल चलना होगा ....क्यूँकि पैर बर्फ में धँस रहे हैं मेरे ....."

" अरे आसिफ़ मियाँ और कितना भाई ....?"

" साहब हम पहुँचने वाले है ...डिरापुक में ही कैम्प करेंगे ...."

तापमान माइनस तर माइनस डिग्री सेंटीग्रेट पर उतर गया था ...हर चीज जमने लगी थी ...मुझे अनुमान नही था कि आज मौसम इतना खतरनाक हो जायेगा ....
मैं तुरन्त शर्मा जी टेंट में गया ....

" साहब मौसम खराब हो रहा है ...लेकिन आप लोग घबराइयेगा नही ...बस ऑक्सीजन सिलेण्डर , अपने पास ही रखियेगा ...और सुनिए किसी भी चीज की जरूरत पड़ी तो सीटी बजा दीजियेगा...जब तक मैं नीचे जाकर देखूँ कि बाकि के यात्री अभी तलक क्यूँ नही पहुँचे "

" थैंक्स बेटा ! ... लेकिन वो ..."

" बोलिये साहब क्या ...?"

" वो मेरी बेटी दीप्ती को ठण्ड से एलर्जी है ...शायद हम उसको गलत ले आये यहाँ ...लेकिन जिद भी उसी ने की थी "

मैं उसी केम्प के बगल में लगे कैम्प में गया ...जहाँ दीप्ती जी की माताजी दीप्ती जी के पैर के तलवे रगड़ रही थी

" माँ जी मुझे लगता है ...इनकी तबियत बिगड़ने लगी है ...मैं देखता हूँ कुछ आग जला सकूँ "

" बेटा हर ओर बर्फ है ...यहाँ लकड़ी कहाँ मिलेगी ...?."

सही बोल रही थी वो ...मौसम के इतने बिगड़ते रूप को मैं भी नही समझ पाया था ...इसलिए न साथ पेट्रोल ला पाया न स्टोव्....

" बेटा इसकी हालत लगातार बिगड़ रही है ...कुछ करो .... "

तभी अन्य श्रद्धालु भी पहुँच गए ...

" माँ जी ...  राक्षस झील तलक ले जाना होगा ...वहीँ मेडिकल कैम्प है ..."

" तो ले जाओ बेटा ...प्लीज इसे बचा लो "

" पागल हो गई हो सुधा ...अकेला कैसे जाने देंगे ..."

तभी दीप्ती जी के पिताजी के मित्र बोले -

" ठीक कहते हो शर्मा जी ...आसिफ़ अच्छा लड़का है ...लेकिन है तो मुसलमान ही ... कोई ऊँच-नीच हो गई तो ..."

" भाड़ में जाए तुम्हारी ये हिन्दू -मुसलमान वाली सोच ...साक्षात बाबाजी के दरबार में आये हो  और इतनी छोटी सोच ...छी "

माँ जी का जवाब सुनकर सब खामोश हो गए ...लेकिन मैंने जिस्मानी  प्रतिक्रिया  दिखाई और उठकर अपनी पीठ पर सवारी बनाई ...

और दीप्ती जी को उठा कर मेडिकल कैम्प का सफर शुरू कर दिया ...सफर कुछ 10 किमी. का था ...लेकिन मुझे यकीन था कि ये सफर अब हम दोनों की जिंदगी का  आखरी सफर है... लेकिन ये खतरा इसलिए उठा लिया क्यूँकि मैं दीप्ती जी से मुहब्बत करने लगा था ....

जी हाँ प्यार ..जो मुझे आज तलक कभी किसी से नही हुआ ...वो प्यार जो  मजहब की दीवारों को भी भेद देता है ...जी हाँ इश्क ! ...ये जितने दिन भी  मैंने दीप्ती जी के साथ बिताये ... मुझे पता चला कि महज वो एक हाड़-माँस का पुतला भर नही ...बल्कि एक मुकम्मल सोच की मालकिन है ... इंसान के लिए ही नही बल्कि मालिक की बनाई हर कृति के लिए उनके दिल में मुहब्बत और उनके दर्द के लिए आँखों में आँसू हैं ...

" आ..आ...आसिफ़ ... मुझे पता है हम दोनों ही नही बचेंगे ...लेकिन एक बात कहना चाहती हूँ तुमसे ...."

" बोलिये न...दीप्ती जी "

" मुझे तुमसे प्रेम हो गया है ...एक लड़की एक लड़के से क्या चाहती है...यही न कि वो उससे पागलों की तरह प्यार करे .... उसे हमेशा खुश रखे ...उसकी हर जरूरत को पूरा करे....लेकिन तुम उससे भी आगे बढ़ गए ... तुमने तो मेरे लिए अपनी जान भी दाँव पर लगा दी "

ये सुनकर जैसे जिंदगी मिल गई मुझे ...और मेरे थके पैरों को एक रफ़्तार ...मुझे हर कीमत पर दीप्ती को बचाना था ...क्यूँकि अब मुझे अपनी पूरी जिंदगी उनके साथ जो बितानी थी ....

" आसिफ़ नही हो पायेगा ...तुम लौट जाओ ..."

" कैसी बात करती हो ...अभी खुद बोला कि प्यार वही जो प्यार के लिए जान दे.. दे और अब "

मेडिकल कैम्प दिखने लगा था ...और उन लोगों ने भी हमको देख लिया था ...वो दौड़ के आये और स्ट्रेचर में दीप्ती जी को उठा कर ले गये ...और मैं घुटने धँसा के हाँफता हुआ वहीँ बर्फ की मखमल चादर मैं बैठ गया ....तभी बर्फ का एक पहाड़ टूटा ...और सैलाब का एक हिस्सा मुझे भी कुछ ढांक गया ...मुझे साँस नही आ रही थी ...देर होने वाली थी ...लेकिन मुझे तत्काल खोद लिया गया और मैं बाहर निकाला गया ...तभी ...मैं बेहोश हो चुका था

" आसिफ़ ..माँ नही रही वापस आ जा  ...आसिफ़ बहाव .....आसिफ़ "

और मेरी आँख खुली ..

सामने दीप्ती जी खड़ी थी ...

" क्या हुआ आसिफ़ ...कोई बुरा सपना देखा "

हाईपोथर्मिया की वजह से मुझे गर्मी लगने लगी ...और सीवियर हाईपोथर्मिया की वजह से मुझे वो सब याद आने लगा जो गुजर चुका था ...लेकिन कुछ होश बाकि था

" दीप्ती जी ...आसिफ नही मेरा नाम नकुल है ...जो कहानी आसिफ़ की मैंने आपको सुनाई थी वो आसिफ ने ही मुझे नीचे उतरते वक्त सुनाई थी ...इकलौती माँ को लेकर केदारनाथ दर्शन में आया था ...आपदा से पूर्व ही माँ को को दिल का दौरा पड़ा और मौसम को देखते हुए हर किसी ने माँ को नीचे हार्ट मेडिकल कैम्प पर ले जाने से मना कर दिया ...एक आसिफ ही था जिसने माँ को अपनी पीठ पर उठाकर उस भयानक मौसम में ...माँ को नीचे मेडिकल कैम्प ले जाने की जिम्मेदारी ली ....मैं पीछे -पीछे उसके साथ था ...लेकिन अफसोस माँ बीच रास्ते में ही  गुजर चुकी थी .. मैंने अपने आप को सम्हालकर आसिफ़ को बताना चाहा  तभी पीछे से एक चट्टान टूटकर हमारे पीछे आ गिरी  जिसकी वजह से आसिफ़ अपने आप को सम्हाल नही पाया और माँ उफान खाती नदी में जा गिरी ....और आसिफ़ ने आव देखा न ताव उस नदी पर छलाँग लगा दी ...माँ नजर से ओझल थी लेकिन आसिफ़ अब भी पानी को काट रहा था ...और फिर बहाव का तेज तूफ़ान आया और सब बहा ले गया ...मेरी माँ  शिव से मिल चुकी थी ...लेकिन अभी एक माँ थी जो अपने बेटे का इन्तेजार कर रही थी ....आसिफ ने बताया था मुझे अपनी अम्मी के बारे में ...आँसू पोंछ कर मैं ऊपर की ओर चढ़ा ही था तभी मैंने पानी का हाहाकार देखा ...ऊपर से बहती लाशें नीचे आ रही थी ...मैंने वहीँ एक सुरक्षित स्थान पर ओट ले ली ...और जब पानी का ये प्रलय थमा तो मैं ऊपर पहुँगा ....मात्र शिव के अतिरिक्त वहाँ कुछ शेष न था ....सब तबाह हो चुका था ...तभी मुझे एक हल्की सी चीख सुनाई दी ....आसिफ़ की अम्मी उसे पुकार रही थी ...वो एक शिला के नीचे दबी हुई थी ...मैंने उन्हें निकाला लेकिन उनकी हालत बहुत बुरी थी ...फिर रेस्क्यू टीम होलीकैप्टर से आती दिखी और हम दोनों बच गए ...

दिल्ली में नौकरी करता था मैं लेकिन इस हादसे ने मेरी जिंदगी बदल दी ....और मैंने वहीँ कसम खाई कि जैसे आसिफ ने अपनी जिंदगी  तीर्थ श्रद्धालुओं की सेवा में समाप्त कर दी मैं भी अपने जीवन को इसी सेवा में समर्पित कर दूँगा ....आसिफ की अम्मी यानि अब मेरी अम्मी जो अब देख नही सकती ...मैंने सोचा उन्हें लेकर दूर चला जाऊँगा और जब तक वो जीवित हैं  उनका बेटा बनकर उनकी सेवा करूँगा ....मुझे नही पता कि वो जान चुकी हैं कि मैं उनका बेटा हूँ या नही ...लेकिन उनको आँख खुलते ही ये पता चला था कि उनके बेटे की आवाज भी इस हादसे में जाती रही ......केदारनाथ इसलिए छोड़ा कि कहीं कोई मुझे पहचान न ले ...नेपाल चुना क्यूँकि यहाँ हमें कोई नही पहचानता ...ये सब आपको नाटकीय लगे दीप्ती जी .. लेकिन  आसिफ़ की तरह मैं भी जा रहा हूँ ...लेकिन अम्मी अभी भी ज़िंदा हैं उनका ख्याल........"

सब खामोश हो चुका था ...आसिफ दो बार मरकर भी नही मरा था ... ये शिव की ही लीला थी कि उसने अपने श्रद्धालुओं को आसिफ़ और नकुल से सेवक प्रदान किये.. और एक हम हैं जो इन दोनों नामों में ही नही बल्कि इनके बनाने वाले में भी फर्क करते हैं ।।।

अम्मी की सेवा और आसिफ ..नकुल का सपना ही अब मेरा जीवन है ....क्यूँकि ये न होते तो मैं कभी शिव और शिव की महिमा को नही समझ पाती   ।।।।।

तभी कान पर जयकारा गिरा ..

" हर हर महादेव ! "

नवाज़िश

By ~
Junaid Royal Pathan

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