Friday, 21 June 2019

उस्मानलीला

#उस्मानलीला
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" हे राम ...चलाओ तीर  उस्मान आपके सामने है  "

उस्मान तेलगी से मैं पूरे 10 साल बाद मिला हूँ ...जब भी मिलता हूँ अलग साइज में मिलता हूँ ...मतलब उस्मान काका हमेशा वयस्त रहते हैं ....और हमेशा किसी न किसी अदाकारी का मुखौटा लगाये रहते हैं ...

उनका मजहब हाँलाकि उन्हें बहुत सी इजाजत नही देता ...लेकिन वो अक्सर कहते हैं कि ~

" अमां छोड़ो दीपू मियाँ ..मेरा रोजगार है ये सब ..और मेरा अल्लाह जानता है कि मैंने कभी हराम की कमाई की एक रोटी अपने बच्चों के हलक के पार न होने दी ...और कुछ गलत होता तो क्या मेरा अल्लाह जो जमीन -आसमान पनपा सकता है वो मेरे हाथ पैर सुन्न करने में क्या वक्त लगायेगा "

मुझे नही पता उस्मान काका , का अल्लाह क्या चाहता है लेकिन मुझे पता है कि इस बस्ती के इंसान क्या चाहते है ~ तभी शास्त्री जी दिखाई दिए ~

" प्रणाम शास्त्री जी ! वो सुना इस बार उस्मान काका कस्बे की रामलीला में प्रतिभाग नही करेंगे "

धूप अधिक थी तो शास्त्री जी बोले ~

" आओ दीपांकर ..उस पेड़ के नीचे चलकर बैठते हैं ...."

पेड़ की छाँव में बैठकर शास्त्री जी ने जेब से ..तम्बाकू निकाला और चूना धून ..अँगूठे से उसे हथेली में घिसकर बोले ...

" देखो दीपांकर ! ये तो मानोगे न कि समय बदला है ..अब ये ही देख लो कि तुम पहले कितना समय शाखा में देते थे और अब तुम्हारी अनुपस्थिति से कितने प्रश्न खड़े हो रहे हैं... लोग तो दबे मुँह ये भी कह रहे हैं कि तुमने ईश्वर पर पारम्परिक आस्था भी छोड़ दी है "

" क्षमा करें शास्त्री जी ..ये मेरा व्यक्तिगत आचरण हैं ..और इसका मुझे पूरा अधिकार है ..... "

शास्त्री जी चूना फटकते हुये बोले ~

" तो शाखा के अधिकार पर काहे प्रश्न खड़ा कर रहे हो फिर ...उन्हें उस्मान से उत्तम कोई कलाकार मिल गया तो उस्मान को नही लिया ...स्पष्ट है "

शास्त्री जी ने तम्बाकू को होंठ की घिरी में फँसाया और तभी मैं बोल पड़ा ...

" पूरे 35 साल बाद शाखा को ऐसा लगा ...याद कीजिये मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री शुभंकर नाथ तिवारी और उस्मान तेलगी ने ही इस कस्बे में रामलीला की प्रथा का शुभारम्भ किया .. और न सिर्फ शुभारम्भ किया अपितु अनेकों पात्रों का अभिनय  करके कस्बे में रामलीला के मंचन हेतु कस्बे वालों को प्रोत्साहित किया .....कम से कम हमें उस्मान काका के त्याग और श्रद्धा का तो सम्मान करना ही चाहिये "

शास्त्री जी उठ खड़े हुए और बोले ~

" हम सम्मान न करें तो अपमान भी नही करते ..और किस उस्मान की बात कर रहे हो तुम ...वो जिसका दो पैसे का सम्मान नही इस कस्बे में वो उस्मान ....जाओ पूछो ...उसी के मजहब वालों से ..."

मैं आवाज में कुछ आवेश भरकर बोल पड़ा ...

" लेकिन किसी के सम्मान से उस्मान काका ..."

शास्त्री जी फिर रुके नही ~लेकिन मैं कुछ देर तलक रुक गया ..बहुत छोटा सा था मैं ... जब मेरे पिताजी और उस्मान काका युवा हुआ करते थे ..याद है कितनी ऊर्जा थी दोनों में ..तब ये कस्बा आज की तरह नही था ...बहुत गंगा-जमुनी रंग था इसमें ..मैं हमेशा मेहरू अम्मा की गोद में बैठकर रामलीला देखता ..मेहरू अम्मा उस्मान काका की अम्मी थी ...पता ही नही चलता कब आँख लग जाती ...हिलती नही थी मेहरू अम्मा सीने से चिपकाये सुलाये रखती थी मुझे ...

पिताजी राम का अभिनय करते थे ..और उस्मान काका कभी अंगद , हनुमान, रावण , केवट आदि का ...ईद भी बड़ी मीठी होती थी उस वक्त सुबह से ही मेरी माता जी नहला धुलाकर मुझे उस्मान काका के घर छोड़ आती थी ...उस्मान काका के बच्चे नईम और जुबैर ही मेरे सबसे सगे और घने मित्र थे ....उस वक्त हमारे लिए मन्दिर और मस्जिद में कोई फर्क नही था ...जमीन ही जैसे जन्नत थी तभी ~

" भाईजान इस जमीन को जन्नत न समझो ...ये तो फ़ानी है फनाह हो जायेगी ..बस अल्लाह से मुहब्बत करो ..अपने दीन से मुहब्बत करो ... इस्लाम से मुहब्बत करो "

मैंने पीछे मुड़कर देखा ये जुमला ...जुबैर का था ..वो जुबैर जो आज भरी दाढ़ी और कुर्ते -पायजामे में एक मजदूर को अल्लाह की बातें समझा रहा था ...उसके ठीक  बगल में नईम खड़ा था ...जिसने मजदूर के कांधे पर हाथ रखा था ....

कई सालों बाद अपने यारों को देखा तो बेहद ख़ुशी हुई ...सोचा जाकर मिलूँ और उनके पीछे हो लिया ~तभी एक बच्चा दौड़ कर आया ~

" जुबैर भाईजान आपके अब्बू की तबियत ख़राब हो रही है ....जल्दी चलिए "

हम तीनों ने एक साथ कदम उठाये लेकिन सिर्फ मेरे कदम ही आगे बढे ..कि नईम बोला ~

" ये अल्लाह का अज़ाब है उनपर ...जिंदगी भर एक नमाज नही पढ़ी उन्होंने ..और रामलीला में कसरत से कोई भी मौका नही छोड़ा ...जो अल्लाह के दीन का नही वो फिर लानत के लायक है ..मदद के नही ..तुम जाओ सादिक  "

गुस्से में मुट्ठियाँ भींच ली मैंने मन किया ऐसी नालायक औलादों का मुँह तोड़ दूँ ....लेकिन मुझे उस्मान काका तक पहुँचना था ...तभी रास्ते में पुनः शास्त्री जी टकराये ~

" शास्त्री जी उस्मान काका की हालत बहुत खराब है ... चलिए उन्हें किसी अस्पताल में दिखा दें ..."

शास्त्री ने उदासीनता प्रकट कर पीताम्बरी गमछा अपने काँधे में लौटाया और बोले ~

" दीपांकर  उसकी औलादें उसकी नही तो हम क्यूँ पहल करें ...मुझे अभी एक विवाह में सम्मिलित होने जाना है और तुम्हें भी एक बात कहे जाता हूँ आगे काम आएगी ...कि बेटा उस्मान भी उसी इस्लाम का मानने वाला है जिसके खिलाफ हमारी शाखा और हमारा धर्म है ...और अब माहौल दोनों तरफ बदल गया है ... मेरी मानों तुम भी लौट जाओ ...चलते हैं ..श्री हरि तुम्हारा मार्गदर्शन करे "

पैरों -पैर गढ़ गया वहीँ ...पता किया तो पाया उस्मान काका अब अकेले रहते हैं ..सईदा काकी के मरने के बाद उनके दोनों बेटों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है.... उन्हें सिर्फ उनके बेटों ने अकेले नही छोड़ा बल्कि इस कस्बे के हर इंसान ने उन्हें अकेला कर दिया है ....

ये कस्बा जहां अब इंसान नही हिन्दू-मुसलमान रहते हैं ...  वो कस्बा  जहाँ एक  इंसान  और उसकी जान की अब किसी को कोई  इज्जत कोई चिंता नही .. धिक्कार है ऐसी जमीन पर ऐसे स्थान पर जहाँ मेरा जन्म हुआ ....लेकिन पुनः ध्यान आया उस्मान काका का ..और दौड़ लगा दी उनके घर की तरफ ....

" काका क्या हुआ ..सब ठीक तो है ...?"

" मामूली खाँसी थी बेटा दीपू ..तुम्हे किसने बताया ...?"

मामूली खाँसी फर्श लाल नही करती ...जमीन पर पसरा खून बता रहा था कि वक्त अब रिसने लगा है ....

मैं उन्हें पानी पिलाकर.. सुलाकर ...अपने पैतृक घर पहुँचा जहां चाचा जी रहते थे ...उन्हें सब बात बताई तो उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं पहले स्नान करूँ ...स्नान पश्चात मेरे ऊपर गोमूत्र छिड़का गया ......

शाम ढल आई ..रामलीला मंच से भजन की आवाजें गूँजने लगी ...तभी शास्त्री जी मेरे पास दौड़े आये ...

" दीपांकर ..वो ..वो ..आज रावण दलन है और रावण यानि अयोध्या सिंह जी का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ..."

" बहुत  बुरा हुआ ...लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ शास्त्री जी .."

शास्त्री जी एकदम से मुझे किनारे ले गए ...और बोले ~

" हमनें समिति और शाखा से बात कर ली है ...यदि उस्मान आज रावण का अभिनय कर ले तो ..."

मैंने ताली ठोकी और बोला ~

" वाह शस्त्री जी वाह ! ..परिस्थितियां बिगड़ी तो उस्मान याद आ गया ..."

पूरा बोलता तभी एक झटका और लगा ....जुबैर और नईम आ गए ... बारी -बारी गले  लगे और किनारे ले गए ...

" यार दीपू ...अब्बू हमारी शक्ल नही देखना चाहते लेकिन फिर भी हर दुःख -सुख में हम अब्बू के साथ हैं ...यार अब्बू को कैंसर हो गया है ..पता नही कब फौत हो जायें ...सुना है कि वो मकान और जमीन स्कूल और हॉस्पिटल बनवाने के लिए सरकार के नाम कर गयें हैं ...यार वैसे ही बुरे दिन चल रहे हैं तू उनको समझा न हम वसीयत भी साथ लायें हैं ....बस उनके साइन करवा दे ..."

ये लोग जो धर्म और मजहब का काम कर रहे हैं ...उसके निर्माण उसका प्रसार ..कोई इसे राम का काम बोलता है कोई अल्लाह का ...लेकिन आज अपना स्वार्थ पड़ते ही इन्हें राम और अल्लाह नही बल्कि वो इंसान याद आया है जिसने अपनी पूरी उम्र इन दोनों नामों के एकीकरण में फनाह कऱ दी ....

दोनों पक्षों को दुत्कार के अपने से अलग किया ...और किसी कोने को तलाशने लगा ...रात्रि का पहर उतरा तो जय श्री राम के नारे गूँजने लगे ...मैंने भी रामलीला मंच की ओर प्रस्थान किया ~दृश्य आते रहे जाते रहे लेकिन मुझे मात्र तरस आ रहा था उन मासूम लोगों पर जिनको इन साम्प्रदायिक स्वार्थी व्यक्तियों ने आज राम और अल्लाह के नाम पर इतना बंटवारा कर दिया है कि वो आपसी इसी नफरत को आज धर्म और मजहब का काम बोलते हैं ....

मन नही लग रहा था सोचा कल ही पहली ट्रेन से शहर लौट जाऊँगा कि तभी राम और रावण के युद्ध की घोषणा हुई और मैंने अपनी सीट छोड़ दी और दूर निकलने लगा~तभी कानों में आवाज गिरी

" हे राम....चलाओ तीर उस्मान आपके सामने है "

आव देखा न ताव मैं मंच की ओर दौड़ गया ....पर्दे के पीछे छिपा निर्देशक राम को तीर चलाने को बोल रहा रहा था लेकिन अभी कुछ संवाद बाकि थे लेकिन उस्मान काका जिनकी दशा दूर से भी खड़े होने लायक नही दिखती थी ...निर्देशक ने कड़क कर कहा तीर चलाओ और तीर सीधे लगा ..उस्मान काका के सीने में ...और वो धाप से मंच पर गिरे मैं वहीँ रुक गया ...तालियों और राम के जयकारे के मध्य...और जब वो कुछ मिनटों बाद भी खड़े नही हुए तो मैं सीधे मंच पर पहुँच गया उनका सर अपनी गोद में लिया लेकिन वो गुजर चुके थे ...

क्या शानदार मौत थी एक कलाकार की ...जिसने इस मंच को खड़ा किया ..इस पर अपनी जवानी वार दी और आज जिंदगी की आखरी साँसे भी इसी मंच को सौंप दी~

उनकी सुपर्द ए खाक में कुछ ज्यादा भीड़ नही थी लेकिन कुछ मुठ्ठीभर हिन्दू -मुसलमान अवश्य खड़े दिखाई दिए ...शायद ये ही कोई उम्मीद हो अब इतना बड़बड़ाकर मैंने कस्बे की ओर पीठ की और रेलवे स्टेशन की ओर अपने कदम बढ़ा दिए ........

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

( कथा हेतु चित्र उपलब्ध कराने हेतु " प्रोफेसर राधिका वशिष्ठ जी " आपका हृदय से आभार )

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