#माया
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" बड़े मजे में नही आया हूँ चचा..बस इतना जानना चाहता हूँ कि...जिस कस्बे में प्रतिभाओं की खान थी ..जिस कस्बे के बच्चे प्रदेश की विद्यालयी हो या प्रतियोगी समस्त परीक्षाओं में टॉप करते थे ....महज पाँच सालों में ऐसा क्या हुआ कि यहाँ का नक्शा ही बदल गया ? "
" वो देख रहे हो रितेश ...वो मकान ... वो इस कस्बे की सारी प्रतिभाओं को निगल गया "
चचा कतई सठिया गयें हैं... भला एक बेजान ईंट -गारे का मकान कैसे कस्बे की समस्त प्रतिभाओं को निगल सकता है ...?
ऐसे ही अनामपुर एक शादी में आया था ...पेशे से एक सस्ते साप्ताहिक पत्र का सम्पादक हूँ ...शादी अनामपुर के पास ही टिकी थी ..पहले इसी कस्बे में मेरा भी एक किराये का कमरा था ...जब हिंदी भाषा के एक सम्मानित समाचार पत्र हेतु क्षेत्रीय समाचार एकत्र करता था ...परन्तु फिर विवाह हो गया तो जिम्मेदारियां भी बढ़ गईं ..और छोटे से इस वेतन से जूझते हुए मैंने अनामपुर को अलविदा कह दिया और शहर चला गया .. 5 साल कस्बे से दूर रहने के बाद मुझे लगा था कि कस्बा आज कम से छोटा-मोटा आधुनिक शहर तो बन गया होगा परन्तु ..कस्बे में पैर रखते ही मुझे बड़ा गहरा झटका लगा ...
जिस कस्बे के बच्चे कभी चलते-फिरते गणित के सवाल हल करते थे ..समसमायिक राष्ट्रीय -अंतराष्ट्रीय प्रसंगों पर चर्चा करते थे ...जिस कस्बे की बच्चियाँ फ़िल्मी गाने नही बल्कि पाठ्य -पुस्तकों की कविताओं पर गुनगुनाती थीं आज इस वातावरण का वहाँ सोता पड़ा था ...
बड़ा मायूस हुआ ...कि तभी आशा की एक किरण मेरे आँखों में गिरी ..एक किशोर मुझे एक पेड़ के नीचे बैठा पुस्तक पढ़ता नजर आया ...
मैं सरपट उसकी ओर बढ़ा ..और वृक्ष के पीछे छिपकर जैसे ही मैंने झाँका ...मेरी आत्मा को गहरा प्रहार लगा ...वो किशोर पाठ्य-पुस्तक के मध्य अपने मोबाईल में एक अश्लील वीडियो क्लिप देख रहा था ....
जैसे ही चेतना वापस बटोर पाता ...तभी मैंने देखा एक लड़की को कुछ किशोरों की मण्डली ने एक फूहड़ फिकरा कसा ..आत्मा अभी पूर्व प्रहार की पीढ़ा से ही ग्रस्त थी लेकिन उस किशोरी का होंठ चबा के हँसना मुझे समझा गया कि अनामपुर से विद्या की देवी सरस्वती ही नही रूठी अपितु संस्कारों का एक वृहत बादल भी मुँह मोड़ चुका है ...
मेरे पास समय नही था इन सम्मिलित प्रभावों के एकमात्र कारण को जानने का जिसने एक बौद्धिक और प्रगतिवादी कस्बे की तस्वीर बदल दी ....खैर मैं बारात संग शहर लौट गया ...उसी ढलती शाम जब में घर पहुँचा तो मैंने देखा ...मेरी बीवी पार्वती किचन से दौड़कर आई और मुस्कुराह कर बोली ~
" आप बैठिये जी ..मैं चाय लाती हूँ "
कभी-कभी इस देवी का दास बनने को दिल करता है.... हाँ ये देवी ही तो है ..जिसने उन कठिन परिस्थितियों में भी मेरा साथ इसी तरह मुस्कुराह कर दिया जब इस शहर ने मेरी कड़ी परीक्षा ली ....आज इसी की बदौलत मेरा घर स्वर्ग होने का भ्रम प्रदर्शित करता है ,, खाली वक्त में ये पड़ोस के बच्चों को निशुल्क ट्यूशन पढ़ाती है ... उनका बौद्धिक, नैतिक और सांस्कारिक पक्ष सुदृढ़ करती है ...जब पड़ोस वाले कहते हैं कि ~
" धन्य हो रितेश जी आपने बीवी के रूप में साक्षात देवी का वरण किया है ...वो देवी जिसने इस मलिन , निरक्षर और संस्कारों से विहीन पड़ोस को देवी सरस्वती का निवास स्थल बना दिया ..वो देवी जिसने ...."
" कहाँ खोये हैं जी ..?.चाय पीने के बाद हाथ-मुँह धो लीजिये मैं खाना लगाती हूँ "
उस रात मेरे बिस्तर में, मेरी बगल में मेरी दुनिया थी ..और कलेजे से चिपकी मेरी सोती हुई मेरी मासूम बिटिया ' छवि '....
लेकिन पता नही क्यूँ मैं अपनी दुनिया में शामिल नही था ..मेरी आत्मा विचलित थी वो सम्भवतः अभी भी अनामपुर ही भटक रही थी ....मैंने निर्णय कर लिया ...और सुबह होते ही मैंने माँ और बाबूजी को फोन लगाया कि वो यहाँ आ जायें ..वो पास ही रहतें है....कुछ तीन घण्टों में वो घर पर थे ...और मैं अनामपुर की बस में ....और अनामपुर की जमीन पर जैसे ही मैंने पैर रखा इत्तेफाक कहो लेकिन बस सीधे उसी मकान के पास रुकी जिसकी तरफ चचा ने इशारा किया था ....
पता नही क्यों मन किया और मैंने उस मकान के दरवाजे की कुण्डी खड़खड़ाई .....
" जी आप कौन ...?"
जो रूप दरवाजे के उस तरफ था ..वो रूप जिसको देखकर प्यासा प्यास भूल जाये ..मुर्शीद,, पीर भूल जाये ..भक्त,, भगवान भूल जाये ..वो रूप जिसपर इस संसार की समस्त मदिराओं का नशा था ...वो रूप जिसके अंग-अंग में यौवन का कच्चा विष रेंग रहा था ..वो जिसके कूल्हों तक खुले बाल ..वो जिसकी छटांग भर की चोली में उन्माद का तूफान ..वो जिसकी कमर ..कमर नही एक गहरा ..कर्रा और तीखा मोड़ ...."
" क्या देख रहें हैं जी ..वो घर पर नही है ...आइये न ..मतलब आप बैठिये वो आते होंगे...वैसे माया नाम है हमारा ..."
उस माया के रूप की माया में ...मैं भी एक रसिक की भाँति अपना पुरुषत्व लगभग बेच ही चुका था कि तभी किसी ने मेरे काँधे पर हाथ रखा और मुझे झंझोरा ~
" रितेश ..रितेश ...रितेश मैं महेश चाचा ..."
मैं एक गहरी नींद से जागा ..और वर्तमान मैं लौटा ..यौवन का द्वार बन्द हो चुका था ...सामने महेश चाचा खड़े थे ..और मैं शर्मिंदगी से अपने ही जमीर में गलता जा रहा था
" अब समझे ..मैंने क्यूँ इस मकान की ओर इशारा किया था ..जब तुम जैसा एक समझदार ..चरित्रसम्पन्न ..पत्नीव्रता व्यक्ति इस छलावे से न बच सका तो ये तो मासूम बच्चे हैं जिनको इस रन्डडड...इस डायन ने अपने मोह ..अपनी जिह्वा अपनी कलाओं से अपना दास बना लिया है ...."
थोड़ा आगे बढ़े और एक वृक्ष पर बनी मुंडेर पर बैठे ~
" मैं कुछ समझा नही चचा ...? "
" आज से कुछ पाँच साल पहले ..मेरा पुत्र दिलीप शहर काम की तलाश में गया ...तुम तो जानते हो कितना मेधावी कितना सरल था वो ... वहाँ उसे इस चुड़ैल ' माया ' से प्रेम हो गया ..जबकि मैंने खोज की तो पाया इस डायन के अनेक प्रेम -प्रसंग रहें हैं ...दिलीप इसके रूप सौंदर्य का दास बन गया ...और जब रूप का मद व्यक्ति पर छा जाता है तो सर्वप्रथम उसकी बुद्धि की मृत्यु होती है ...जब बुद्धि ही मर जाये तो व्यक्ति के हाथ-पैर क्या चलेंगे ...अर्थात वो इस नागिन को लेकर अनामपुर आ गया ..और अनामपुर के बुरे दिन शुरू हो गए ..इसने यहाँ कदम रखते ही जहाँ यहाँ के युवाओं ..अधेड़ों पर अपने रूप का जादू चलाया वहाँ बुजुर्ग भी इसके रूप के पास से न बच सके ....इतना ही कर लेती तो तो कम से कम मैं जमीन देखकर तो चल सकता था ..फिर इसने किशोर और किशोरियों को अपने संक्रमण में ले लिया ...जहाँ अपनी देह का प्रयोग करके इसने किशोरों से उनका लड़कपन और मासूमियत छीनी वहीँ किशोरियों को श्रृंगार और फ़िल्मी दुनिया की चमक -धमक सुना -दिखा कर अपना अनुयायी बना लिया ... इसने मेरे उस पैतृक घर को कोठा बना दिया जहाँ कभी संस्कारों की अमर अग्नि प्रज्वलित होती थी ...मैंने दिलीप को समझाया परन्तु वो न समझा और मैंने इन दोनों को अपने घर से निकाल दिया जो ये नागिन चाहती थी ... रितेश इन पाँच सालों में इस डायन ने पूरे कस्बे की जैसे गति ही रोक दी ...सब इसके रूप के पास में कैद हैं और जो औरत इस औरत के खिलाफ आवाज भी बुलन्द करे तो इसका भक्त पुरुष परिसर उनका मुँह बंद कर देता है .... "
मैं सकते मैं पढ़ गया कि एक औरत क्या पूरे कस्बे की जीवन रेखा और दिशा तय कर सकती है ..फिर जवाब मिला क्यूँ नही ...जब एक स्त्री मेरे साधारण जीवन को स्वर्ग बना सकती है तो ये भी सम्भव है ...और पार्वती से इतने अटूट प्रेम के बाद मैं भी तो इस औरत पर एकदम से आशक्त हो गया ......
गाड़ी पकड़ी और शहर लौटा ...पार्वती ..माँ -पिताजी सब सवाल की मुद्रा में थे कि तीन दिन कहकर एक ही दिन में वापस क्यूँ आ गए ..?.चैन नही था एक पल का ...पार्वती ने जब मेरी दशा देखी तो मुझे अपने हृदय से लगाकर प्रकरण पूछा ...
मैंने उस महिला पर मोहित होने की घटना भी पार्वती को बताई और बच्चे की भाँती रोते हुए उससे क्षमा भी माँगी ...पार्वती ने पूरा घटनाक्रम सुना और बोली ~
" मुझे आपके साथ अनामपुर चलना है "
समझ से परे था कि आखिर वो करना क्या चाहती है ...लेकिन इतना पता था कि एक स्त्री चाहे तो यमराज से मृत प्राण ..जीवित खींच लाती है ...
अनामपुर पहुँचते ही ...पार्वती ने सर्वप्रथम विद्यालयों के शिक्षकों से बात की ...उसके पश्चात वो मन्दिरों के पुजारियों और मस्जिद के मौलवियों से मिली ....उसके बाद वो कस्बे के कोतवाल और उप जिलाधिकारी से मिली ....
सबने एकमत में पार्वती की बात को तरजीह दी ...और क्यूँ नही देते साक्षात् सरस्वती उसके बोलों में गति जो कर रही थी ...
अनामपुर में अब पुलिस गश्त बढ़ गई ...सदैव पुलिस के जवान वहाँ तैनात रहते ...एस .डी.एम साहब के कड़े निर्देशों पर कस्बे में साइबर सेल बनाई गई ..और कड़े निर्देश दिए गए कि यदि कोई भी भी व्यक्ति अश्लीलता देखता या उसे बेचता मिला तो उसपर कड़ी कार्यवाही होगी ...बाहर से आये लोगों की शिनाख्त होने लगी ...शिक्षक अब विद्यालय के बाद भी विद्यार्थियों को अतिरिक्त समय देने लगे ...मन्दिर -मस्जिद के पुजारी एवं मौलवी ..भी नैतिक और सांस्कारिक पक्ष पर जोर देने लगे ...समाजसेवी मोटिवेशनल स्पीकरों से भी पार्वती मिली और वो हफ्ता दर हफ्ता कस्बे में आते रहे और अपने व्याख्यानों से समाज के प्रत्येक पक्ष को प्रभावित करते रहे .....धीरे -धीरे अनामपुर फिर नक्शे में चढ़ने लगा ..प्रतिभाओं को बयार मिलने लगी ..लोग अब सामाजिक , सांस्कारिक और राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में बातें करने लगे..और पार्वती बिना रुके ..बिना थमे ..किशोरियों की रॉल मॉडल बन गई ....
तभी एक दिन समाचार मिला कि ' माया 'ने आत्महत्या कर ली ...पता चला तो जाना कि उसका जीवन ही एक विकृत समाज था ..उसकी भूख ही नग्नता , फूहड़ता , और निरक्षरता थी ...उसका शिकार समाज था और वो समाज जो रूप और देह की मदान्ता के चलते फिसल जाता है ....वो निष्प्राण हो चली थी ...क्यूँकि एक औरत की रणनीति उसके चक्रव्यूह को भेद चुकी थी .....पार्वती ने अनामपुर को उसका गौरव उसका दर्प वापस हस्तगत किया ....और आज भी पार्वती बिना रुके समाज की सेवा करती जा रही है .....
लेकिन इन सेवाओं के मध्य वो अक्सर मुझसे कहती है कि ' माया ' की उत्पत्ति स्वयम्भू नही थी ..अपितु उस समाज ने माया को जन्म दिया ...जिसमें अपने लिए सक्रियता और दूसरों के लिए निष्क्रियता होती है ...वो समाज जो अंधाधुंध आर्थिक प्रगति को ही जीवन का आधार मान चुका है और ढोंग , भोग से युक्त और कर्तव्यों और संस्कारों से मुक्त , उदासीनता के चलते एक बेटी उचित संरक्षण , उचित शिक्षा के अभाव के चलते माया बन जाती है ~~~
पार्वती की हर बात सत्य है लेकिन एक बात जो मैं पार्वती से अब कभी साझा नही कर सकता वो ये कि माया पूरी तरह नही मरी बल्कि वो,, मेरे सपनों में अक्सर आती है ... और मैं तथाकथित सामाजिक महात्मा अक्सर उसकी देह का भोग करता हूँ ~~~
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
(चित्र ~ गूगल )
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