#किडनैप
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" बहन मुमताज आपके भी किडनैप हो गए क्या ..? "
" हाँ बहन सुजाता ! अल्लाह का शुक्र है ...मुझे भी निजात मिली ..."
" ओह्ह्ह्हो तो खोलो बहन मुँह ..और करो मुँह मीठा ...मेरे भी किडनैप हो गये...ही ही ही "
लेकिन मेरे अभी गायब नही हुए ... और सौगंध है मुझे अपनी " माँ " की ...मर जाऊँगा लेकिन ....उनपर आँच नही आने दूँगा .....तभी ठक -ठक की आवाज दरवाजे पर गिरती है ....दरवाजा खोला सामने बाबू जी खड़े थे ~~~
" बाबूजी कितने बार कहा है आप से ...अकेले बाहर न जाया करें ...माहौल कैसा है पता है आपको ...पूरा मुहल्ला ढूंढ लिया लेकिन आप कहीं न मिले ..जानते हैं मेरी हालत क्या हो गई थी .....? "
" बेटा जतिन क्षमा करना ...वो क्या है बचपन का मित्र था ' अलीम ' ....सोचा उसके घर वालों से मिलता आऊँ राहत मिलेगी उनको ..किडनैप कर लिया है उसे भी ...."
तभी राधा किचन से बाहर निकलती है और ~
" आते ही शुरू हो गए आप ...बाबूजी आप बैठिये ..मैंने आपके लिए आपकी फेवरेट खीर बनाई है ......इनकी बात का बुरा न माने ...अटूट प्रेम करते हैं आपसे ...इसलिए व्याकुल हो उठे ....इतना प्रेम एक संतान का अपने पिता के लिए देखकर ..जहाँ आँख भर आती है वहीँ एहसास होता है कि काश मेरे भी माता -पिता भी आज ज़िंदा होते "
" बेटा क्या मैं आपका पिता नही ....बोलो ..बताओ ..?."
ये रुअंटा मिलाप अब चल निकलेगा ...लेकिन राधा सही कह रही थी ...मैं अपने पिता के बगैर कुछ भी नही ....माँ को 4 साल की आयु में खो दिया था ...लेकिन बाबूजी ने कभी माँ की कमी नही खलने दी ....
4 साल का बच्चा होता कितना बड़ा है ...अंदाज कीजियेगा तो पायेंगे ... इतना आश्रित इतना असहाय ..इतना कमजोर ..जैसे आँख खोल कोई चढ़ती बेल !!!
बाबू जी ! मेरे शौच से भरे कपड़े मात्र धोते ही नहीं ..अपितु कभी -कभी उसके मध्य सोते भी ...मैं उनके कलेजे से चिपका रहता ..और वो अक्सर रातों को जागकर मेरे चेहरे से मक्खियाँ उड़ाते ...
बहुत आकर्षक थे बाबूजी ...और एक सरकारी सेवक भी ...भला दूसरा विवाह भी कर सकते थे ...लेकिन नही किया ...दफ्तरी थे समाज कल्याण में ...वो पल सोचता हूँ तो आँख से आँसू नही थमते कि मेरे बचपन का एक वक्त समाज कल्याण के दफ्तर में बीता .. .. पिताजी से आता -जाता हर कोई कहता कि विवाह कर लो ..लेकिन पिताजी ने मेरे लिए ..सिर्फ मेरे लिए ..विवाह क्या कभी किसी परकीय स्त्री से सम्बन्ध तक न रखा ....
स्कूल जाने लगा तो पिताजी को कुछ राहत हुई ..और फिर पिताजी दफ्तर की फाइलों के मध्य और मैं स्कूल की किताबों के मध्य खो गया ....
पिताजी सुबह तड़के उठते ..मेरा नाश्ता बनाते ..कपड़े धोते ..पूजा नेम के बाद मुझे जगाते ...फिर मुझे स्कूल छोड़ कर दफ्तर चले जाते....
आज मैं एक इंजीनियर हूँ और शहर का सबसे माना -जाना इंजीनियर ...आज भौतिक सुविधाओं के नाम पर मैंने सर्वस्व अर्जित कर लिया है जिसकी एक आम इंजीनियर कल्पना भी नही कर सकता .... धन है ,वैभव है और है शहर के आखरी कोने में एक बहुत बड़ा फ़ार्म हाऊस लेकिन इसके साथ -साथ मेरे पास मेरे बाबूजी भी हैं...जो मेरे लिए इन समस्त बहुमूल्य संसाधनों से भी बहुमूल्य है ...वो संसाधन जिसकी असीमित भूख के चलते आज इंसान अपने समस्त नैतिक ..मौलिक एवं आत्मिक कर्तव्यों से मुँह मोड़ चुका है ।।।
राधा मेरे लिए मेरे प्राणों से प्रिय है ..ये जानते- बूझते की वो कभी माँ नही बन सकती ...मेरी और श्रद्धा उसपर टूटती है ....
" अच्छा राधा ...जरा ऑफिस के काम से बाहर जा रहा हूँ शाम तलक लौटूँगा ....."
" जल्दी आन जाना जी... "
घर से निकलते ही ~
" जतिन भैया नमस्कार ! ...भैया पुलिस को कोई खोज नही मिली ..भैया बड़ा परेशान है मम्मी -पापा के लिए ..."
" मैं आपकी परेशानी समझता हूँ ...जानता हूँ इस शहर में महँगाई बहुत है ...और आपको फ्री में अब कोई काम वाला और काम वाली नही मिलेंगे ..जानता हूँ अब कोई ऐसा हाड़-माँस का व्यक्ति आपको निःशुल्क प्राप्त नही होगा ..जिसको आप बात -बात में नीचा दिखाएँ ..जिसे आपकी धर्मपत्नी ताने दे ..जिसे आपकी मॉर्डन बेटी सिट बुड्ढे .. या मैनरलैस बुढ़िया कहें .. आपको वो बूढ़ा गाल भी मुफ़्त में प्राप्त नही होगा और न प्राप्त होगा वो शरीर जिसने अपनी एड़िया घिस दी आपको रेलवे का एक अफसर बनाने में ..वो जो मात्र आपका पिता नही ..आपका पालनहार था वो जिसके गाल पर आप तमाचा मार कर अपनी मर्दानगी को और धार दे पायें ..लेकिन याद रखियेगा अविनाश जी ... जिस असहाय बूढ़े माता -पिता पर आपने अत्याचार की अति कर दी ...उन्ही का श्राप आपके नाश का कारण अवश्य बनेगा ..."
" ये सब कुछ आपको कैसे पता ..जतिन भाई ...?"
" चलता हूँ ...यदि हो सके तो आगे से मुझसे किसी भी प्रकार का सम्पर्क और सम्बन्ध रखने की कोशिश न कीजियेगा ..."
और मैंने गाड़ी सीधे पुलिस स्टेशन रोकी ~
" आइये जतिन साहब ...मैं आपको ही फोन लगाने वाला था ..."
" क्या कुछ ..कुछ पता चला ..इंपेक्टर साहब. ..ये सब कौन कर रहा है और क्यूँ कर रहा हैं ...?"
" अभी तलक तो कोई सबूत नही मिल पाया जतिन साहब लेकिन एक बात समझ में नही आती ...आखिर इन बूढ़े लोगों के किडनैप से किसी को क्या मिलेगा ....कहीं कोई किडनी या शारीरिक अंगो की तस्करी करने वाला कोई गिरोह तो नही....?"
तभी एक हवलदार दौड़कर आता है उसके हाथ में एक लिफाफा था ...
" सर ..सर ...ये देखिये "
" ओह्ह माय गॉड ... जतिन साहब ये तो उन्हीं गुमशुदा वृद्धों की तस्वीरें हैं ...और इस खत में लिखा है कि हमें ढूंढ़ने की कोशिश मत कीजियेगा ...हम यहाँ पर सुखी है ...हम उस नर्क में दुबारा नही लौटना चाहते जहाँ हमारा जीवन और चरित्र और हमारी मौजूदगी का कोई मोल और कोई सम्मान नही "
"... ओह्ह्ह ...इंस्पेक्टर साहब इसका मतलब जैसा हम समझ रहे थे वैसा कुछ नही .. धन्यवाद देता हूँ भगवान को, कि वो सब सुरक्षित और खुश हैं ..."
इंस्पेक्टर साह कुछ बोले नही ...और मैं वहाँ से उठकर चला आया ...शाम को अपने घर पहुँचा तो बाबूजी भगवान के मन्दिर में दीया जला रहे थे ...और राधा किचन में थी... तभी मेरा फोन बजा ...
" जतिनन साहब ...मुझे अभी आपसे मिलना है..मेरे घर चलें आयें ..."
" अभी ..इंस्पेक्टर साहब ...क्यूँ क्या बात है ..अच्छा मैं आया "
मैं इंपेक्टर साहब के घर पहुँचा ...वो अपने घर के लॉन में ही बैठे शराब के सिप ले रहे थे ...
"आइये जतिन साहब ...आपके लिए बनाऊँ ..?"
" माफ़ कीजियेगा मैं शराब नही पीता ..."
" ओह्ह्ह्ह ...चलिए बात करने से पहले मैं आपको एक पेंटिंग दिखाता हूँ ....अंदर आइये ..."
मैं उनके साथ उनके घर के अंदर दाखिल हुआ ...
" ये देखिये ...कैसी लगी ...?"
एक औरत साँझ के डूबते सूरज के मध्य अपना बच्चा अपने सीने से चिपकाए खड़ी थी ...
" व्हाट अ नाइस पेंटिंग ..."
" जतिन साहब ...यदि आज ये पेंटिंग नही होती तो मैं उस किडनैपर को कभी नही पकड़ पाता ..."
"म...म..मत ..लब ?"
" मतलब ये कि जब ये पेंटिंग ...को तनवीर नाम का मिस्त्री मेरी वॉल में एडजस्ट कर रहा था ...तो ठीक उसी वक्त में उसी दीवार के नीचे उन वृद्धों की हँसती -मुस्कुराहती तस्वीरों को देख रहा था जो आज आपने भी मेरे ऑफिस में देखी "
" जी ...तो ..?"
" तभी मिस्त्री की नजर मुझपर पड़ी और वो ऊपर से बोला ...साहब मुझे याद आ रहा है ये तस्वीर भी मैंने ही दिवार पर टांकी हैं ..."
"कौन सी तस्वीर ..तनवीर ?"
" साहब यही जो इस फोटो में हैं इन बुड्ढे लोगों के पीछू ...उगते सूरज वाली ..लेकिन अपन को याद नही आ रहा है कि कहाँ टांकी थी ?"
मैंने उसे याददाश्त पर जोर देने को कहा तो उसको याद आया ....
मैं सीधे उसके बताये पते पर पहुँचा ...और मुझे वो सारे वृद्ध वहाँ पर मिले .... यू आर अंडर अरेस्ट मिस्टर जतिन......
शायद मुझे यही कहना था आपसे ...लेकिन उन वृद्धों की आप-बीती सुनकर उनके ऊपर हुए अत्याचारों को सुनकर ... मेरी भी आँख भर आई ... जितेन साहब बस सवाल ये कि ..आपने ऐसा क्यूँ किया ...मतलब शहर में वृद्धाश्रम भी तो बहुत हैं आप वहीँ उनका दाखिला करवा देते ...?"
" जानते हैं वृद्धाश्रमों की स्थिति...सर मैंने इस कदम को उठाने से पहले शहर का प्रत्येक वृद्धाश्रम छान मारा ...कहीं ढंग का खाना नही ..तो कहीं बिस्तर और दवाइयाँ नही ...कहीं वो जेल से बदतर हैं तो कहीं वृद्धों के साथ कैदियों जैसा बर्ताव किया जाता है ...जितने भी वृद्ध और वृद्धा आप को मेरे फ़ार्म हॉउस में मिले ...वो उनकी संतानों को कभी इंसान नही लगे ..वो उनके टूटे चश्मे ..फ़टे कुर्ते ..तार-तार साड़ियों को नही बदल सकते ...वृद्धाश्रम का खर्चा और वहाँ उनकी आवश्यकताओं को कैसे पूरा करते .... मैंने देखा है इनका हाल ..एक -एक मामूली बुखार और ब्लड प्रेशर की गोलियों को इनको तरसते हुए ...मैंने सुना ..देखा और महसूस किया है इन्हें अपने बच्चों , बहुओं और पोते -पोतियों के हाथ रोज -रोज झिड़कियां खाते ...टूट गया सब्र उसदिन जिस दिन मैंने एक बेटे को अपने बाप पर हाथ उठाते देखा ...अरेस्ट कर लीजिये मुझे लेकिन भगवान के लिए उन्हें वहाँ से फिर दुबारा उसी नर्क में मत छोड़ दीजियेगा जहाँ बेटों , बहुओं की शक्ल में जानवर रहते हैं ....मैं आपके हाथ जोड़ता हूँ इंस्पेक्टर साहब "
इंस्पेक्टर साहब ने मुझे अपने कदमों से उठाया और बोले ~
" जतिन साहब अरेस्ट ही करना होता तो आपको यहाँ नही बुलाता ...जतिन साहब यकीन करो ..किडनैप हुए बूढ़ों के परिवार वाले सिर्फ एक या दो बार मेरे पास आये ...और मुझसे उनकी खबर ली ...लेकिन उसके बाद तब से आज तलक फिर कोई नही आया .... जिससे पता चला कि जैसे उन सब को इसी मौके की तलाश थी ताकि उन्हें अपने बीमार ..बूढ़े ..माता -पिता या सास -ससुर के खर्चे और सेवा से मुक्ति मिले ... केस बन्द कर रहा हूँ क्यूँकि इस केस के लिए मुझपर न ऊपर से कोई दबाव है ..न शहर में कोई सामाजिक संगठनों द्वारा हलचल ..न ही किसी नेता की कुर्सी खतरें में ...और न प्रशासन की मूँछ नीचे होती है ....एक बात कहूँगा जतिन साहब यदि आप मानेगें तो मुझपर एहसान होगा ...'
" बोलिये न साहब ..!"
" ये शराब आज से बन्द कर रहा हूँ ...इसपर कुछ 12 से 15 हजार खर्च करता हूँ महीने के ... ये धन प्रतिमाह में आपको हस्तगत करना चाहता हूँ ताकि आप की इस महान सेवा में ...मैं भी अपना गिलहरी योगदान दे सकूँ ..."
आज पिताजी नही रहे और मैं भी रिटायर हो चुका हूँ ...राधा और मैं अब उसी वृद्धाश्रम में रहते हैं ...फर्क सिर्फ इतना है कि अब मुझे वृद्धों को किडनैप नही करना पड़ता ...बल्कि अब उन्हें प्रेरित करना पड़ता है कि तोड़ डालो उस बंधन को ...छोड़ दो उस मोह को ...त्याग दो उस स्थान को जहाँ तुम्हारे अपने ...रोज तुम्हारे वुजूद में धीरे -धीरे छुरी फेरते हैं .......तभी
" जितेन साहब ...नये मेहमान आये हैं ...!"
" आया इसन्स्पेक्टर साहब ...तब तक उन्हें उनका कमरा दिखाइए .."
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
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