#हेल्प_मी
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" अबे ये तो बेहोश हो गई !"
" अच्छा ही है ..उठा पत्थर और चेहरा चपटा कर दे हरामजादी का "
फूल नही हमें कलियाँ पसन्द है ,,, भेली नही हमें डलियां पसन्द है ....
रज्जाक खान ..उम्र 26 , कद दरमियाना , चेहरा गोल और गेहुँवा ,,, जिगरी यार राकेश देशपांडे ...
इस्कूल में दाखिला संग लिया ..फेल संग हुए और इस्कूल से निकाले भी साथ में ही गए ....
मुल्क हिन्दू -मुसलमान के नाम पर जहाँ आमने-सामने हैं वहीँ हम आजू-बाजू सट कर चलते हैं ...
हम दोनों को दुनिया हरामखोर कहती है ..लेकिन हम से बड़ा मेहनती पूरे कस्बे में कोई दूजा लौंडा नही ...चरस की छटांक तस्करी और उसका नशा हम दोनों की जिंदगी का दूसरा एक आधार है ....
तो कोई पूछे कि फिर पहला क्या है तो हम दोनों एक सुर में कहेंगे ....लौंडिया ~~और वो भी कच्ची लौंडिया ।।।
हर उम्र की औरत को कभी झाँसे.. कभी पैसे और कभी मजबूरी से बिस्तर पर खोलने के बाद हमको ज्ञान प्राप्त हुआ कि ..जो मजा कन्दूक में वो मजा सन्दूक में नही ....
फिर भी बस्ती में कोशो गरीबी और जहालत के चलते हमनें दो -एक कच्ची कलियों के पेट भी फुलाये हैं और बात बड़ी तो पैसे से तो हल्की दबंगगिरी से मामला शांत भी कराया है ....
लेकिन इसमें रिस्क है ..ये हमने जान लिया लेकिन इज्जत भी कुछ इस कदर तवायफ के घुँघरू की तरह बिखरी की अब हम दोनों की शक्ल देख जहां लोग थूकते हैं वहीँ कोई भी मादा हमारे करीब से नही गुजरती .....
लोगों ने एक दूसरे के कान में डोर टू डोर फूँक दिया कि हम शिकारियों से शिकार को बचाये रखें ...
हमें फर्क नही पड़ता लेकिन लगने लगा है कि अब अगर कोई कच्ची कली छुई भी तो बस्ती वाले खोल के रख देंगे..
नर्म गोश्त जबड़ो को छू जाये तो हट्टा-कट्टा शेर भी आदमखोर हो जाता है ...इसलिए हमनें शहर बदल दिया ....
हमारा अगला पड़ाव था ...दिल्ली !
एक पॉश ऑफिसर कॉलोनी में हमें क्रमशः गेटकीपर और लिफ्टमैन की नौकरी मिल गई ....
हफ्ता शांत गुजरा ..क्यूँकि जेब में झाड़ा अभी खत्म नही हुआ था ... जी. बी रोड में हर नई रात ..हर नया बदन .....
लेकिन इन मेनीहैंड्स पीस को यूज करने के लिए भी रकम चाहिये...रकम भी जाये और मजा भी न आये इसलिए हमें जल्द कोई फैसला करना जरूरी था ...
जिस कॉलोनी में हम सर्विस दे रहे थे ..वहाँ हर तरफ नर्म कच्ची कलियाँ बिखरी पड़ी थी ...लेकिन इन कच्ची कलियों के माली बड़े सख्त थे ...कोई मौका ही नही देते थे ....
मेरे यानि रज्जाक के लिए वो पल सुखद होता जब ये कच्ची कलियाँ स्कूल बस में चढ़ती और उतरती ...इनके छोटे -छोटे स्कर्ट और बिना रोंओ के बदन उफ्फ्फ...
और राकेश के लिए वो पल जन्नत होता जब ये कलियाँ लिफ्ट में अप -डाउन करती ...हाँलाकि उनकी मम्मियां उनके साथ होती लेकिन मौका देख हल्की रगड़ -घिस तो हो ही जाती .....
जिन्दगी में अब न चरस था और न कच्चा नशा ..और पहली बार लगा कि जिंदगी बदरंग सी हो चली है .....
लेकिन जब अँधेरा छाता है तभी कोई न रौशनी का छींट जरूर नजर आता है ...
नोरमा ..नार्थ- ईस्ट इंडियन ...जिसकी फैमली कल ही यहाँ शिफ्ट हुई है ... साँस रुक गई जब उसने मुझसे पहली बार कहा " हैलो " ....
उफ्फ्फ सिर्फ आँख थोड़ी छोटी ...बाकि हर चीज उतनी ही बड़ी जितना हमारा शौक ....उम्र यही कोई 12 या 13 साल ...लेकिन वो कली जो फूल बनकर खिलने को मचल रही थी ...उसके माता-पिता इन खड़ूस कॉलोनी वालों की तरह नही थे ...बहुत हँसमुख थे ..और फ्री माइंड ...
पता चल गया ...उनकी जिंदादिली और मुस्कुराहट का राज ...नार्थ ईस्ट अब भी परम्पराओं और संस्कारों को पकड़ा हुआ है .. इनका विश्वास है कि पूरी दुनिया इनकी तरह ही साफ़ दिल की होती है ...लेकिन हमारा दिल अब नोरमा के कपड़ो के अंदर ट्रांसप्लांट हो चुका था ....
उसे साईकिल चलाने का शौक था और हमें उसके स्कर्ट के उठने का ,,,,
" हे गॉय ..हेल्प माय हनी ...प्लीज "
मिस्टर जोंग ..नोरमा के फादर मुझसे यानी रज्जाक से कह रहे थे ..कि नोरमा को साईकिल चलाने में हेल्प करो ...
आव देखा न ताव और सीधे नोरमा की साईकिल को पीछे से पकड़ लिया ..पहले दिन कोई हिम्मत नही हुई ...लेकिन हर खिसकते दिन ...मेरा हाथ भी सरकने लगा ...कभी नोरमा की पीठ ..कभी पेट ..कभी उसके बाजू ...कभी उसके .......
भोली थी वो ..वो समझ नही पा रही थी कि हवा का रुख किस दिशा में बह रहा है ...
कभी राकेश कभी मैं ...जिंदगी में जिंदगी लौट आई ....नोरमा हमें अपना सगा मानने लगी थी ...वो हम दोनों को अंकल कहती थी लेकिन भूल रही थी कि हम अंकल ही उसके जिस्म के पहले उपभोक्ता बनने वाले है ....
" यार अब नही रहा जाता ...मन करता है कि साली को ..."
" हाँ यार राकेश ...सच बोल रहा है ...कुछ करना पड़ेगा यार वरना ये कली अगर हाथ से निकल गई तो मैं खुद को कभी माफ़ नही करूँगा "
" क्या करें फिर बोल ...?"
फैसला हो चुका था ...
" नोरमा क्या आपने डिज्नी लेंड देखा है ...?"
" नो अंकल ..?"
" देखोगी ..?"
" बट हाउ ..? पापा कोहिमा गयें हैं ...नेक्सट वीक आयेंगे एन्ड ममा को ऑफिस में बहुत काम है "
लौंडिया हिंदी सीख चुकी थी लेकिन उसे कुछ और भी सीखना था और वो था झूठ बोलना ....
" नोरमा.. मैं और राकेश अंकल तुम्हे छुपकर से डिज्नी लैंड दिखा सकते हैं और तुम्हारी ममा को पता भी नही चलेगा "
" ओ मई गॉड ..बट हाउ केन इट्स पॉसिबल ?"
" देखो नोरमा जब तुम्हारी ममा कल सुबह ऑफिस जाए तो तुम नाटक करना और पेट में दर्द की बात बोलना ... वो तुम्हे स्कूल नही भेजेगी और फिर हम दिन-भर डिज्नी लैंड "
" बट...... ओके ! आई विल डू "
बात बनी और मैंने और राकेश ने अपनी पैकिंग शुरू कर दी ...क्यूँकि कल के बाद हमें शहर बदलना था .... रात भर हम दोनों ने शराब पी और शराब में ख्यालों संग घोला नोरमा का कच्चा बदन ... एक कतरा नींद न आई जिस्म में तूफान और गर्मी दोनों साथ भड़क रहे थे ....
अगला दिन हमनें नोरमा को सब समझा दिया था ...टैक्सी बुक की ...राकेश को नोरमा को सदर दिल्ली से बाहर लेकर आना था और मुझे तब तक ट्रेन के टिकट बुक कराने थे ....और उन्हें उसी जगह मिलना था जहाँ बस उन्हें ड्राप करेगी ....
वो दोनों बस से उतरे तो नोरमा को खटका हुआ ...शायद वो कुछ समझ बुन रही थी ....और उसने एकदम से कहा -
" मुझे घर जाना है ...पली "
उसका इतना कहना था कि क्लोरोफॉर्म ने अपना कमाल दिखाया ...
हम दोनों उसको उठाकर उस सुनसान खण्डर में ले गये जहाँ परिंदा भी पर नही मारता ......
" अबे ये तो बेहोश हो गई !"
" अच्छा ही है ..उठा पत्थर और चेहरा चपटा कर दे हरामजादी का "
" पागल है क्या ...चेहरा चपटा कर दूँगा तो नर्म -रसीले इसके होंठ ..इसके गाल कैसे चूमूँगा ? "
वो दोनों जानवर मासूम नोरमा पर टूट पड़े ...न कोई अवतार उस मासूम की मदद को आया न कोई आसमानी फ़रिश्ता ....
लेकिन तभी एक लकड़ी का पलटा रज्जाक के सर से टकराया ....और मौके पर ही उसने जान दे दी .....
नोरमा को हल्का होश आ चुका था उसके बदन पर कपड़े नही थे ..लेकिन गनीमत थी कि अब भी उसका कौमार्य सुरक्षित था ....
राकेश घबरा कर पीछे हटा और नोरमा ने धुंधली आँखों से देखा उस फ़रिश्ते को जो हाथ पर लकड़ी का पलटा लिए राकेश की ओर बढ़ रहा था......
वो गन्दा.. मटमैला ..बदबूदार ..जिसे समाज ने पागल की उपाधि देकर समाज से किनारे कर इस सुनसान खण्डहर में जिंदगी बसर करने पर मजबूर कर दिया था ....
राकेश दीवार फ़ांद भाग चुका था ....और उस मानसिक बीमार व्यक्ति ने नोरमा को कपड़े पहनने हेतु कहा और उसकी तरफ पीठ कर ली ....
नोरमा पहले तो सकपकाई फिर कपड़े पहनकर .. दौड़कर उस व्यक्ति को पीछे से लिपट गई ... दोनों की आँख में आँसू थे ...
नोरमा तो घर लौट गई लेकिन वो व्यक्ति जिसे कानून ने न किसी सजा के लायक समझा न किसी ईनआम के वो अब भी वहीँ उन्ही खण्डहरों में घूमता रहता है ....वो जो कल का एक इंजीनियर था वो जिसकी फूल सी मासूम बेटी का गैंग रेप हुआ था ...वो जिसकी बीवी इस सदमे से न जी सकी ....वो जिसकी खुशहाल जिंदगी ऐसे ही जानवर रौंद गए ...वो जिसने आज एक परिवार की जिंदगी को जहन्नम न बनने दिया ....
नोरमा अक्सर अपने पेरेंट के साथ उस महान आत्मा से मिलने जाती है ....और वो व्यक्ति नोरमा में अपनी बेटी को ही देख कर मचल उठता हुआ उसके साथ ढेर सी बाते करता है ...खेलता है ..हँसता -मुस्कुराहता है ....
नोरमा भी सब भूलने लगी है ...और जिंदगी फिर लौटने लगी है लेकिन वो जानवर अब भी फरार है और भय इसलिए बना रहता है कि हर नोरमा को बचाने के लिए जमीन..जमीनी फरिश्तों से लगभग हल्की या मुक्त हो चुकी है .....
नवाज़िश
By
Junaid Royal Pathan
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