Friday, 7 June 2019

Dosti

#दोस्ती
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~ और यदि तुम भी मुझसे प्रेम करती हो तो इस पत्र के पीछे मेरा नम्बर लिखा है ...मैं तुम्हारे फोन की प्रतीक्षा करूँगा दिव्या ~

तुम्हारा
सुमित !

सुमित से ज्यादा मेरा यानि अमजद अत्तारी का कलेजा धड़क रहा था ..क्यूँकि इस खत के बोल मेरे हैं राइटिंग सुमित की ..हम दोनों कॉलेज कैंटीन की दिवार के पीछे से छिप कर देख रहे थे ...जब दिव्या की सहेली नीतू उसे और अन्य सहेलियों को ये खत पढ़ कर सुना रही थी ....और तभी ख़ामोशी को भेदा दिव्या के ठहाके ने ...और उसके बाद फिर हँसी की ये फुहार रुकी नही ....तभी दिव्या बोली ~

" साला ...चम्पू ..चशमिश कहीं का ...

"  दीवी ...देख ..हा हा हा ..देख..देखा कभी उसको अभी भी भौंपू पेंट पहनता है वो भी कपड़े वाली.हा हा हा .."

" हा हा हा ...और उसके ऊपर शर्ट ...और वो भी पेंट से बाहर ...सिटोले की तरह बाल हा हा हा ...."

मैंने दाँत पीस लिए..जी करा अभी जाऊँ और इन हरामजादियों का चौखटा बदल लूँ ....जितना उनकी हँसी गूँज रही थी उतनी ही मेरी मुठ्ठी भींच रही थी ...तभी मैंने गर्दन घुमाई और मुझे तेज झटका लगा ...सुमित अपनी नस ब्लेड से काटने ही वाला था ...

" पागल हो गया है सुमित ... सिर्फ एक लड़की के लिए ...सिर्फ एक मामूली लड़की के लिए जान दे रहा है "

" मामूली नही है  अमजद भाई ...जिंदगी है मेरी ....नही जी सकता  इसके बिना "

सुमित सच कह रहा था ... " दिव्या " सच में उसकी जिंदगी थी ...20 की उम्र है सुमित की लेकिन कसम खुदा पाक की  उसका  प्यार  उन्नीस नही है दिव्या के लिए .....

जब मालूम नही था कि अपना जेंटलमैन यार उससे कसा हुआ प्यार करता है तब दिव्या पर सबसे ज्यादा नजर मेरी खराब थी .....फिर कॉलेज के दूसरे लौंडों की ..

दिव्या यानि आसमान का एक नूर से नहाया सितारा ,, जितनी खूबसूरत वो उतनी उसकी अदायें .. उसके आधुनिक भड़कीले कपड़े ...और जुबान से निकलती हमेशा अंग्रेजी की सुगंध ...मतलब गुलाम बना लिया था उसने कॉलेज के गुलफाम  लौंडों को अपना .... किसी को ये मेरा टुच्चापन लगे ...लेकिन मैंने अर्थशास्त्र के प्रोफेअर मिस्टर देशराज को भी उसको गन्दी नजरों से ताड़ते देखा है ....

साले को पसन्द भी क्या आई ... मतलब कोई सिम्पल -विंपल लौंडिया होती तो ...उठा लाता ...या खुदा कसम टोटकों से फंसवा ही देता लेकिन ये चाँद साला अपने से नही फँसेगा तो सुमित तो फिर .....

कोई सोचेगा इतने ढपलू लौंडे से मेरी दोस्ती कैसे ...मैं ठहरा कॉलेज का सबसे ठरकी और ये सबसे ज्यादा चढ़ा हुआ पढ़ाकू ...तो मेरी जान ..इसने पिछला सेमेस्टर निकवाल दिया मेरा वरना हंड्रेड पर्सेंट फेल था मैं ...अगर ये नकल नही कराता तो....फिर तब जुबान दी थी कि कभी तेरे किसी काम आ सकूँ तो बिंदास बोल देना ....कल जब कैंटीन में ..मैं दोस्तों के संग बैठा ..लौंडियाओं को फिगर मार्क्स दे रहा था ...आकर बोला अमजद भाई एक बात है ...और फिर ये सब कुछ घटा ...

खैर समझा बुझा कर भाई को घर छोड़ा....लेकिन डर था कहीं कुछ कर न ले ..साला बहुत इमोशनल है ...इसलिए रात का जागरण रहा ..हर 15-20 मिनट में कॉल करता रहा ....अगले दिन मैंने बाइक सुमित के घर टाँकी और उसको लोड किया और कॉलेज छोड़ के अपने दोस्तों यारों संग फिर वही लफंडरी ..तभी पंकज दौड़ता हुआ आया ...

" अबे अमजद वो चूतिया सुमित ...अबे उसे लौंडे कूट रहें हैं बे ...."

" तेरी माँ का ...चूतिया होगा तेरा बाप ..."

और मैंने दौड़ लगा दी ...

सुमित जमीन पर खून से लथपथ पड़ा था ..तभी एक बन्दे ने उस पर लात उठाई ....मैंने उसको पकड़ लिया और एक घूँसा उसके मुँह पर जड़ दिया ...कितनी एकता थी उन पीटने वालों में एक पर पड़ा तो सब एक को गए और सुमित को छोड़ अब मुझे कूटने लगे ...लेकिन एक मेरे यार थे जो रोज मेरे पैसे में पलते थे ...साले एक मुझे बचाने नही आये ....

" सुनो बे हरामियों !  ये ट्रैलर है ...अब अगर दिव्या की तरफ आँख भी उठाई तो बेटा अँधा कर देंगे और लूला भी ....और तू सुन बे कटुए ..अब अगर तू ज्यादा कूदा तो समझ ले जिन्दा फूँक देंगे "

घण्टा बनता पुलिस केस ...वो लेटर अब भी दिव्या के पास था ... और ये लड़के कोई मामूली नही बल्कि धर्म निर्माण सभा के सदस्य थे ...दिव्या इनमें से ही किसी एक की बहन थी ....

कुछ दिनों में रिपेयर हुए तो कॉलेज पहुँचे ...लेकिन अब मैंने सोच लिया था सुमित के साथ ज्यादा नही रहना ...खाली इज्जत भी गई ..पुर्जे भी ढीले हुए और इन धर्म निर्माण वालों से दुश्मनी भी लग गई ...

मैं डरता नही इनसे लेकिन डरता हूँ सिर्फ अपने अब्बू की इज्जत और उनके कारोबार से ...लेकिन वो भी सही थे ..बहन किसी की भी हो कोई छेड़े तो यही भाव उस पल हिलोरे मारता है ....

" अमजद भाई मुझे माफ़ कर दो ...मेरी वजह से आपको "

" देख यार सुमित ..जो होना था हो गया ...अब सुन तू यार अपनी पढाई पर ध्यान दे ..और आगे बढ़ ..ऐसी न जाने कितनी लौंडिया तुझपर बिछेंगी ..अच्छा चलता हूँ "

मैंने मुश्किल से उससे पलड़ा छुड़ाया ...और शायद वो भी समझने लगा ...लेकिन न जाने क्यूँ अब सुमित यार लगने लगा था ...उसके विचार सुनकर मेरी लोफरी भी बदलने लगी ...दिल का बहुत साफ था ..गरीब जरूर था लेकिन हम -तुम ..हम सब से अमीर ...मैं शर्त लगाके कह सकता हूँ कि दिव्या ने सुमित का प्यार कुबूल न करके अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती कर दी ...बदकिस्मत है साली ...लेकिन अब ध्यान रखता हूँ कि गलती से भी साली का नाम सुमित के आगे न लूँ ...क्यूँकि मुझे डर है कि जिन्न फिर बोतल से बाहर न आ जाये ....

दोस्ती चलती रही ...और एक दिन |

" अमजद भाई ..कुछ पैसा उधार चाहिये था ...वो मततलब कुछ 2000 रूपये ...बाद में लौटा  दूँगा ..."

" यार  है तू अपना ...अब तो जान भी दे सकता हूँ तेरे लिए...ये ले और लौटाये तो मेरा मरा मुँह देखेगा "

उसके बाद ग्रेजवेशन का रिजल्ट आते -आते सुमित हमेशा के लिए कहीं चला गया ...उसकी फैमली भी नही जानती थी कि वो कहाँ हैं ....

वक्त बीतता रहा ...कोई काम मिला नही तो सोचा पी.एच.डी ही कर लूँ ...दिव्या भी पी.एच .डी कर रही थी फर्क सिर्फ इतना था कि हम हिंदी की झण्डी पकड़े थे और वो अंग्रेजी का झण्डा ....

आज कॉलेज का एनवल डे था ...एक तो सुमित की दोस्ती थी और एक बढ़ती उम्र का तकाजा कि अब जीवन में लोफरी नही थी ...और न थे वो दोस्त जो महज पलते थे साथ चलते नही थे ...और ये भी सुमित का एहसान था मुझपर ...अगर उस दिन नही ठुकता तो पता ही नही चलता कि दोस्ती की आड़ में मैंने साँप आस्तीन में पाल रखे है.....रहनुमा अंसारी से मुहब्बत भी हो गई है साथ ही पी.एच.डी करती है ....अक्सर सुमित की बाते करता हूँ उससे ...भूल नही पाया उसे कभी ..लेकिन खुदा से दुआ करता हूँ वो जहाँ भी हो जिन्दा हो ...क्यूँकि मुझे नही लगता वो जिन्दा होगा ..बहुत इमोशनल फूल था और उसे इमोशनल फूल बनाने वाली दिव्या जस्ट मेरे आगे की सीट पर बैठी थी ....और मेरी बगल में रहनुमा ...खैर तभी तालियों की गड़गड़ाहट से हॉल नहा गया ...

" तो स्टूडेंट्स अब से महज थोड़ी ही देर में हमारे सामने मुख्य अतिथि महोदय पधारने वाले हैं ...मैं चाहूँगा कि आप सब उनका खड़े होकर तालियाँ बजाकर स्वागत करें "

हम सब की नजर एंटर डोर पर थी तभी उसमें से पहले एक पुलिस वाला हाथ में कारबाइन लेकर दाखिल हुआ ..फिर खाकी वर्दी में एक आकृति वो आकृति जिसके काँधों पर अशोक चिन्ह चमक रहा था ....

" वाव यार सो हैंडसम ..सो डेशिंग ..."

" ओह्ह्ह माय गॉड ..प्यार हो गया मुझे इससे पहली नजर में ..."

लड़कियों में ये आवाजें गरमाने लगी ..और इनमें एक आवाज दिव्या की भी थी ....थोड़ी जलन हो रही थी मुझे ...तभी

" अब आपके सामने हैं हमारे जिले रानीपुर के एस .पी सुमित कुमार  वो सुमित कुमार जो कभी इसी कॉलेज के एक मेधावी छात्र रहें हैं ...."

मैं सीट से जम्प कर गया ...मेरा मुँह फटा हुआ था ..और तालियों के मध्य
मेरी आँखों से आँसू थमने का नाम नही ले रहे थे ...रहनुमा मुझे बैठने को मेरा हाथ खींच रही थी लेकिन मैं खुद मैं नही था ....तभी स्वयं सुमित ने माइक सम्हाला

" देखते क्या हो अमजद भाई ...आओ यार गले नही लगोगे ....आओ न यार "

मैंने सीटों को फलांग दिया ...एक बार गिरा भी मुझे गिरता देखा सुमित भी मेरी तरफ दौड़ा ...और आकर मेरे गले लग गया ...हम दोनों की आँख में आँसू थे और आँसू उतर आये उन सब कोमल हृदयी विद्यार्थियों की आँखों में जो ये मिलन की रूहानियत को सम्हाल नही पाये ....

उसके बाद फंक्शन की समाप्ति तक मैं सुमित के साथ मंच पर उसकी बगल में बैठा रहा ...पूरे दौर वो मेरा हाथ थामे रहा ....कार्यक्रम की समाप्ति के बाद जब कुछ छात्र एवं छात्राएं सुमित को घेरने लगी तो एक आवाज हम दोनों के कान में साथ टकराई

" हाय सुमित ...पहचाना ...मैं दिव्या "

" माफ़ कीजियेगा ..कई दिव्याओं से मिला हूँ जिंदगी में ...आप कौन सी वाली हैं ? "

बस सुमित का मुँह चूमने का मन किया लेकिन खुद पर कण्ट्रोल किया ...कि कहीं कोई दूसरा याराना न समझ ले ...वो सब कुछ एक शॉट में बहाल कर दिया सुमित ने जिसने मुझे कभी सोने नही दिया ...मुझे मंच पर बैठे -बैठे  कहीं ये लग रहा था कि सुमित यहाँ कहीं दिव्या के लिए तो नही आया ....पर अब यकीन हो गया वो मेरे लिए आया है यानि अपने यार अमजद के लिए ......और प्यार और दोस्ती में इस बार जीत दोस्ती की हुई .....वो दोस्ती जिसका फिर कोई मजहब , कोई रंग , कोई सीमाये और कोई मिसाल नही होती .....

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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