Tuesday, 4 June 2019

ईद मुबारक

#ईद_मुबारक_तिवारी_जी
***********************

" बिटिया लगता है जल्दी ही अब तुम्हारी शादी करवानी होगी !"

" आर यू क्रेज.....मतलब पापा आर यू सीरियस ..?"

" हाँ बिटिया .. गम्भीर होकर बोल रहें हैं "

" नो पापा अभी हमें पढ़ना है ...डॉक्टर बनना है.."

" तो ठीक है बिटिया .. अब तुम्हे चुनना है डॉक्टरी या  मुसलमान दोस्त आबिद और अकरम "

आज मैं भी सन्न रह गई ..मैं यानि रुक्मणी तिवारी ...मेरे पति ने कभी मेरी बेटी नीलिमा से एसे बात नही की ...इकलौती बेटी पर वो जान छिड़कते हैं ...आज भी याद है वो दिन जिस दिन नीलिमा पैदा हुई थी .... उसकी सांस वापस नही आ रही थी ...मेरे पति जो हद से ज्यादा आस्तिक है उसे दोनों हाथों में उठाकर ...चिल्लाने लगे !

" माँ काली या तो इसे जीवन दे या फिर मेरा भी जीवन मुझसे हर ले "

हाँलाकि ये प्रॉब्लम पैदा हुए बच्चे के साथ लगी रहती है ...लेकिन  अपनी बेटी के प्रति उनका प्यार और समर्पण देखकर अस्पातल में उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति यहाँ तक डॉक्टर भी सन्न रह गए ....

अपनी बेटी पर जान छिड़कते हैं वो ..उसकी हर फरमाइश पूरी करते हैं ..यहाँ ... तक उसकी शिक्षा के लिए गाँव की अपनी जमीन तक बेच दी उन्होंने और अब उसे डॉक्टर बनाने के लिए बैंक लोन भी ले चुके हैं ....

राष्ट्रवादी जागरण मंच के अध्यक्ष हैं ... मैं कभी इनके ..इनकी सोच और इनके काम के मध्य नही आती लेकिन कभी लगता है कि मैंने तिवारी जी को समझने में  भूल कर दी ....

क्यूँकि मेरा लालन-पालन सदभाव ..सम्भाव और इस देश की साझी संस्कृति के मध्य हुआ ...मेरी दाई मुमातज बेगम उर्फ़ मुम्मी फ़ूफ़ी थी ...और मेरे स्वर्गीय पिताजी की वो मुँह बोली बहन थी ....

मैंने कभी ईद और दीपावली में अंतर स्थापित नही किया ... लेकिन आज मुझे रुकना पड़ता है ....जुबान और भावनायें सिलनी और सम्हालनी पड़ती है ...

हाँलाकि तिवारी जी कठोर नही ...क्रोध और ईर्ष्या उनमें विद्यमान नही ...परन्तु मुसलमानों से पता नही क्यूँ वो खींचें रहते हैं ....शादी के बाद मैं कभी किसी इस्लामिक त्यौहार में प्रतिभाग नही कर पाई ...इसका कारण कोई डर अथवा भय नही ..मात्र तिवारी जी का आत्मसम्मान है ....

परन्तु मैंने भरकस कोशिश की है अपनी बच्ची को ये संस्कार प्रदान करने की , कि वो कभी किसी पूर्वाग्रह और ईर्ष्या के चलते अपने जीवन को संकुचित न बनाये ....

मेडिकल कॉलेज में उसके दोस्तों में  से दो नाम आबिद सिद्दीकी और अकरम बेग के भी हैं ....जो नेचुरल है ... मुझे अपनी बेटी पर पूरा विश्वास है कि वो कभी हमारा सर झुकने नही देगी लेकिन दोस्ती का कोई मजहब नही होता ...

उस रात जहाँ नीलिमा को अपने पिता के इस नये रूप के चलते नींद न आई ...उसी रात में भी ये सोचते -सोचते आखिर हिचक को सन्तुलन प्रदान कर तिवारी जी से पूछ ही बैठी -

" आपको नही लगता ..कि आपने आज नीलिमा से कुछ ज्यादा की कठोरता बरती ..?"

" हाँ रुक्मणी ! इसी लिए तो नींद नही आ रही है ...लेकिन मैंने जो कुछ कहा उसकी और अपनी भलाई के लिए कहा है ..."

" लेकिन क्या दोस्ती का कोई मजहब होता है ..?"

" नही "

" तो फिर ........"

" लेकिन तुम जानती हो एक लड़का और लड़की दोस्त नही हो सकते ...उनमें से एक के मन में अवश्य कोई दूसरा भाव होता है ...बात ये है रुक्मणी कि मैं जिस संगठनात्मक इकाई से जुड़ा हूँ ...वो इस्लाम के खिलाफ है ..और यदि मेरी बेटी ही .."

" तो छोड़ क्यूँ नही देते इस संगठन को !"

" हरगिज नही ..इस संगठन से मैं कोई लालच या पदलोलुपता के चलते नही जुड़ा हूँ ... अपितु मेरा मानना है ...ये विधर्मी जो हमारे धर्म के विरुद्ध साजिश कर रहें है ....और जब ये अपने धर्म के प्रचार हेतु कट्टर हैं तो मैं क्या अपने धर्म की रक्षा का व्रत नही ले सकता "

मैं समझ चुकी थी कि अब उनसे कुछ कहना उन्हें  निराश करना होगा ... तो मैंने नीलिमा को ही समझाना बेहतर समझा ...और उसे समझा -बुझा कर जता दिया कि यदि उन मुसलमान लड़कों से दूरियाँ न बढ़ी तो तुम अपने पिता से हमेशा के लिए दूर चली जाओगी ...

नीलिमा के लिए ये आज का दूसरा झटका था ...जहाँ उसने अपने पिता को आज बदलते देखा वहीँ महसूस किया अपनी माँ के विचारों को भी बदलते ...

खैर नीलिमा ने आबिद और अकरम से लगभग अबोल कर ली ...लेकिन वो अब हमसे भी कुछ अधिक बात नही करती थी .... दिन गुजरते रहे और नीलिमा ने डॉक्टरी पूर्ण की और उसकी शादी एक डॉक्टर से ही कर दी गई....

अब इस पूरे घर में , मैं अकेली रह गई ...कहने को तिवारी जी हमेशा मेरे करीब बने रहते लेकिन विचारों के सन्दर्भ में हम नदी के दो किनारे थे ....

नीलिमा की शादी के बाद तिवारी जी को जैसे घर से कोई अनुराग नही रहा ...और वो दिन रात संगठन के विचार उसके प्रचार के कामों में लिप्त रहते ...

नीलिमा एक तो वैसे ही खुले विचारों की लड़की थी ...और दूसरा उसका पेशा भी ऐसा था कि उसे सबके दर्द को एक सा और ..एक रंग में समझना पड़ता था ....पिता की लाडली आज पिता से दूर हो चली थी ....

लेकिन तिवारी जी के पीछे उसकी ही उम्र के युवाओं का एक सैलाब था ... जो तिवारी जी के अनुगामी थे और उनके विचारों के प्रचारक ..... 

रमजान के दिन चल रहे थे ... मुझे आज भी मीठी सेंवई ..वो इफ्तार की कचौरी ..वो जाफरान हलवा ...वो सौंधी कलौंजी की पकौड़िया भूले से नही भूलती जिसे मेरे पिताजी अपनी बहन मुम्मी फ़ूफ़ी के पूरे दिन के रोजे के इफ्तार हेतु अपने हाथों से बनाते थे .....

रमजान में एक रोज एक विवाद भी गरमा गया ...जिसका एक पक्ष से नेतृत्व किया तिवारी जी ने ...वो सबसे आगे थे ...लेकिन मैं भयमुक्त थी क्यूँकि तिवारी जी हिंसा के सख्त खिलाफ थे और उनका ही प्रयास रहा कि दो समुदायों के मध्य एक बहुत बड़ा विप्लव होते -होते रह गया .....

लेकिन तिवारी जी के संगठन को इससे और मजबूती मिली...

नीलिमा घर आई हुई है ..वो पेट से है ...गर्मी के दिन थे ...खाना खाकर मैं और नीलिमा अपने -अपने कमरों में विश्राम कर रहे थे ....और तिवारी जी अपने संगठन की कार्यकारी समिति की एक मीटिंग में वयस्त थे जो घर पर ही आयोजित थी ....तभी दरवाजे पर से एक औरत की मर्मस्पर्शी आवाज कानों से टकराती है -

" भाई ...ओ ..भाई ... अल्लाह के नाम पर अपनी बहन को कुछ सदका -खैरात दे दे .... भाई अल्लाह तेरी रोजी में बरकत करेगा ...ओ भाई मेरी बेटी ने सुबह से एक दाना अन्न का मुँह पर नही डाला "

मैं जैसे ही उसे कुछ देने उठी मुझसे पहले तिवारी जी दरवाजे पर पहुँच गए ...

" बोल राम भला करेंगे ..बोल हनुमान भला करेंगे ..बोल शिव भला करेंगे ..ये बोल तब ही तेरी झोली भरूँगा वरना दफा हो ले यहाँ से "

उनके इस जुमले से जहाँ समिति के सभी सदस्य गदगद और अभिभूत हुए वहीँ मैंने पीछे मुड़कर देखा तो नीलिमा की आँख में आँसू थे .....और कुछ नमी मेरी आँख में भी मुझे महसूस हुई ...

मैं फिर कहती हूँ कि मैंने तिवारी जी को समझने में भूल की लेकिन आज उनका वो अमानवीय रूप भी देखने को मिल गया ...जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नही की थी ....

खैर ! तिवारी जी ने अपनी जेब से एक 50 रूपये का नोट निकाला और उस भिखारन को दे दिया ...जिसे भिखारन लेकर आगे बढ़ गई ....मैं खिड़की से उसके साथ उसकी मासूम बच्ची को टकटकी बाँध कर देखते रह गई ...

तिवारी जी ने मीटिंग बर्खास्त की ....और अपने कमरे में चले गये ....

कल ईद है ... माँ को नही देखा मैंने , मुझे पैदा करते ही वो भगवान को प्यारी हो गई लेकिन मुम्मी फूफी ने कभी माँ की कमी नही खलने दी .... मुझे अँगुली पकड़कर ईदबाजार ले जाती ...खूब सारी नॉन , जलेबी और फेनी खिलाती ...और मेरे लिए कपड़े खरीदती ...रात को  मेरे छुटके हाथों में मेहँदी लगाती .... ईद के दिन पहले वो मुझसे पूजा करवाती और अपना नमाज अदा करती ....सब कुछ एक झटके में याद आते -आते शाम ढल गई .....तभी

" अरे रुक्मणी और नीलू तैयार हो गए चलो भई.. फिर मुझे जागरण में भी जाना है "

हम तीनों साथ थे ..हर तरफ ईद का बाजार लगा था ...लोग खुश थे . कपड़ो की दुकानें ..पकवानों की खुशबू ..इत्र की सुगंध.... हम दोनों माँ बेटी जब एक चूड़ी की दुकान से खरीदारी करने लगी तो हमें ध्यान नही आया कि तिवारी जी कहाँ हैं ....

मैंने जब पीछे मुड़कर देखा तो पाया तिवारी जी एक दुकान पर खड़े हैं ...जहाँ छोटे बच्चों के कपड़े बिक रहे थे .... मैंने कोहनी से नीलिमा को ठेला और हम दोनों उन्हें देखकर मुस्कुराहने लगे ....

हमें पता था कि वो अपनी होने वाली नातिन या नाती के लिए कपड़े खरीद रहें हैं ...हम चूड़ी पहनने में लग गए और जब मैंने पीछे मुड़कर देखा तो पाया कि तिवारी जी दुकानदार को पैसे देकर हाथ में बैग लेकर आगे बढ़े ...फिर उन्होंने बहुत सी सेंवई और मिठाइयाँ खरीदी ...और फिर एक लेडीज सूट भी..... हम दोनों हक्के -बक्के रह गए ....छोटी जूती और एक बड़ी चप्पल भी .खरीदी उन्होंने...मामला समझ से परे था ... ...

अब जब तिवारी जी खरीदारी करते-करते दूर निकल गए तो ...हमने पाया कि तिवारी जी ने अपने कुर्ते की जेब से रुमाल निकाला और अपने मुँह पर बाँध लिया ......और तेजी से आगे बढ़े....भीड़ खचाखच थी ...

तभी एक झटका और लगा जब नीलिमा ने चूड़ी वाले से अपनी कलाई को छुड़वाया और वो अपने पिता की दिशा में भागी ...उसकी कलाई से खून की एक धार फूट रही थी ....

मेरे लिए ये सब कुछ नाटकीय था ...लेकिन गर्भ धारण किये दौड़ती नीलिमा  के पीछे मैं भी दौड़ने लगी ....

और तब मैंने नीलिमा को देखा जो एक घने पेड़ के तने के पीछे छिपी हुई थी ..तो मैंने उसके काँधे पर हाथ रखा ....वो पीछे पलटी और उसने मुझे अँगुली से चुप रहने को कहा .....

" मुझे पता था तुम यहीं मिलोगी.. चन्द्र रात्रि की बधाइयाँ बहन ..और कल की ईद की भी शुभकामनाएं ...ये लो बिटिया के लिए कुछ कपड़े और मिठाइयाँ ...और ये बहन तुम्हारे लिए ...मना मत करना बहन इसे एक भाई का अपनी बहन को ईदी का उपहार समझ कर स्वीकार कर लो "

तिवारी जी तेजी से लौटने लगे तभी -

" भाई तुम्हारा राम भला करेंगे ..हनुमान भला करेंगे ..शिव भला करेंगे ..मेरा अल्लाह भला करेगा "

तिवारी जी ने पीछे मुड़कर देखा ..चेहरा ढ़का होने के बावजूद भी वो मुसलमान भिखारिन उन्हें पहचान चुकी थी ......तिवारी जी  ने रुमाल मुँह से खोला और हवा में हाथ ऊपर कर उसे और उसकी बच्ची को आशीष दिया ....

हम दोनों माँ -बेटी की हिम्मत नही थी कि उनके सामने आ जायें ... लेकिन जहाँ नीलिमा का चेहरा अपने पापा पर गर्व से तमतमाया हुआ था ...जहाँ उसकी आँख से निर्झर आँसू बह रहे थे वहीँ ...मैं सिर्फ इतना सोच रही थी कि क्या मैं कभी तिवारी को समझ पाऊँगी ....

खैर तभी नन्हे कदमों से वो मासूम बच्ची तिवारी जी की तरफ दौड़ी और तिवारी जी के पैरों पर घेरा डाल कर खिलखिलाने लगी .....तिवारी जी ने पलट कर देखा और उसे गोद में उठाकर उस आसमान की तरफ उछाल दिया जहाँ ईद का चाँद अपने चाँद होने पर इतरा रहा था .....और जब वो फिर तिवारी जी के हाथों  में आकर गिरी तो तिवारी जी ने उससे कहा -

" ईद मुबारक बिटिया "

और न जाने क्यूँ  मेरे  मुँह से भी  अनायास निकल पड़ा-

" ईद मुबारक तिवारी जी "

नवाज़िश

By ~

Junaid Royal Pathan

No comments:

Post a Comment