#धरा
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" तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला "
मुझे एक तेज झटका लगा ..जैसे किसी ने 440 वोल्ट का करेंट मेरे जिस्म में दौड़ दिया हो !
मैं डॉक्टर रचित कुमार हूँ ... भूख है मुझे इतिहास ..और उससे जुड़ी सामग्री की ..ऐसी कट्टर और विषैली भूख कि जिसके चलते मैंने बहुत कुछ खोया है .... मेरी बीवी मुझे छोड़ कर चल दी ..उसका तर्क सही था कि जब तुम्हे खण्डहरों से इतना प्रेम है तो फिर मुझसे विवाह क्यूँ किया .?..मेरे पास जवाब अब भी नही कि मैं क्यूँ इन ऐतिहासिक इमारतों के मध्य ही आंशिक सुख पाता हूँ ..आखिर वो कौनसा पूर्ण सुख है जिसकी तलाश है जिसके लिए मैंने अपना हुलिया पागलों सा बना लिया ...आखिर वो कौन सा जवाब है जो मुझे अब तक नही मिला ~~~
उत्तर भारत के लगभग समस्त किले , प्रासाद , महल , बावड़ी मैंने इस 52 वर्ष की आयु तक घूम लिए या इनमें अपने जीवन का एक भाग बिता लिया ...अब दक्षिण भारत ही बचा था जिसके दो तिहाई ऐतिहासिक स्थानों को मैंने छान मारा ....
लेकिन फिर भी अंदर ही अंदर एक आरा अभी भी मेरे हृदय को धीरे-धीरे काट रहा है ... मैंने मात्र इन स्थानों पर जिंदगी जी ही नही बल्कि चीख-चीख कर इनसे न्याय भी माँगा है ...या माँगी है वो दिशा जिसपर पूरा राष्ट्र झोंक दिया जाये ....
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माँ के दाल पर छोंका मारते ही ...मुझे छींक आई तो धरा खिलखिला कर हँस उठी ...
" माँ देथो भैया तो थींक आ दई .....ही ही ही "
धरा मेरी जिंदगी का वो आधार जिसमें मेरी जान बसती थी ..मेरी इकलौती फूल सी बहन .... जिसकी उम्र यही कोई 5 साल थी उस वक्त ... पिताजी या माँ जब भी उसे गोद में लेते और दुलार करते ..मैं अंदर ही अंदर जल -भुन कर राख होने लगता ..क्यूँकि धरा पर सिर्फ मेरा अधिकार था ... क्यूँकि भगवान ने उसे सिर्फ मेरे लिए ही धरती पर उतारा था ...
उसके पैर में एक काँटा तक नही चुभने देता था मैं ,, पहले वो खाती फिर मैं उसका झूठा खाता ... उसके साथ खेलता ..लेकिन जब धूल से उसके बाल भर जाते तो उनको झाड़ता भी ...वो जिस पेड़ पर चढ़े और पके फल की फरमाइश करती वो उसकी झोली में होता ...वो जो माँगती बस में नही होता तो चुराकर उसको देता ...
सब हैरत करते कि एक भाई अपनी बहन पर इतनी जान कैसे छिड़कता है ...तो सब कि बात क्यूँ सुनूँ ..सब होते कौन हैं ? ये वो ही सब हैं जिन्होंने मुझे बताया था कि मैं कौन हूँ ...
मैं यानि एक लँगड़ा ..पोलियो है मुझे बचपन से ...सुंदर न होने के साथ -साथ पैर खराब होना .. किसी का प्यार नही टूटता था मुझपर ..मेरी माँ ही थी जो मुझे दुलार करती थी ..घरेलू कामों में लिप्त रहने के चलते वो हर वक्त मेरे साथ नही रहती थी ...पिता जी रेलवे में ड्यूटी करते थे ..तो अक्सर घर से बाहर रहते .... लेकिन जो मेरे साथ हँसती -खेलती ..मेरे गालों को चूमती ..मुझे दुलार करती ...और मेरे लिए रोती-तड़पती वो धरा थी मेरी करोड़ो में एक प्यारी बहन .....
उसकी बलाएँ मेरे सर ...इतना अमिट प्रेम इतना वात्सल्य की एक बार प्राइमरी के मास्साहब ने उसका कान पकड़ लिया तो मैंने पत्थर से वो हाथ ही घायल कर दिया उनका ..जिसने मेरी बहन की आँख में आँसू दिए ..
पढ़ने में मेधावी रहा हूँ कुरूपता और पोलियो ने मुझे अंतर्मुखी व्यवहार प्रदान किया ...किस्से -कहानियाँ ..जादू-नगरी ही मेरे साथी थे लेकिन तब जब धरा मेरी गोद में सो जाती थी ...
जन्मदिवस था धरा का उस दिन ...उसने नीली आँखों वाली गुड़िया माँगी थी मुझसे ...पिताजी को आज नही लौटना था और माँ के पास इतने पैसे नही थे ....उस समय रूपये की धमक थी,, तो गुड़िया यही कोई 80 रूपये की कीमत पर दुकान में टंगी हुई थी ....
मैंने गुल्लक फोड़ा तो पाँच रूपये 20 पैसे हाथ लगे ...वो गुड़िया मेरी गुड़िया की फरमाइश थी ... तो व्याकुल सा हो उठा ...सोचा क्या करूँ ..क्या करूँ ...?
तभी मैंने मन्दिर पर एक इंसान को जाते देखा और देखा दान-पात्र पर उसके द्वारा रूपये गिराते ....समझ शून्य हो गई .. शीघ्र फैसला करना था भगवान या धरा ...?
सीधे दान -पात्र उठाया और उसे लेकर दौड़ गया ...किसी ने आँख गिरा दी ...और उसके बाद 12 की उम्र के मुझ बच्चे को लोगों ने गिरा-गिरा कर मारा ...बात घर तलक पहुँचनी स्वाभाविक थी ...माँ खूब रोई ..और उस दिन के बाद मेरा नाम लँगड़ा चोर पड़ गया ....
जी लेता लेकिन जब अपनी हालत पर धरा की आँख में आँसुओं का रेला देखा तो चिपट पड़ा उससे ...
" मेरी गुड़िया ..मेरी रानी ...कुछ नही हुआ मुझे ...चल खेलते हैं ...लेकिन धरा रोते-रोते वहीँ सो गई ...और मैं उसके मासूम चेहरे पर आँसुओं की एक बूँद जो उसके गालों को सेंक रही थी अँगुली से उठा कर फिर मैं खुद भी फूट-फूट कर रोने लगा ....
मुझे धरा को मुस्कान देनी थी ....माँ स्नान करने गयीं तो उन्होंने अपने मंगलसूत्र को वहीँ संदूक में डाल दिया ...बहुत अंतर्द्वंद था लेकिन धरा की जीवन में भूमिका मेरे लिए माँ से भी बढ़ चुकी थी ...
बिना कुछ्मैं सोचे मैंने शहर को लंगड़ाते हुए दौड़ लगा दी .... और जब वापस लौटा तो एक तरफ जेब में ढ़ेर से पैसे और हाथों में नीली आँखों वाली गुड़िया थी ...वो गुड़िया जिससे मैंने रास्ते भर बात की ..बहुत जल्दी थी मुझे धरा तलक पहुँचने की ...
लेकिन देर हो चुकी थी ...घर में रोने चिल्लाने का माहौल बरपा था ...
" रच्चू कहाँ है धरा ..? कहाँ ले गया था उसे ...?"
" मैं ..मैं ..मैं कहीं नही ले गया ..वो तो सो रही थी ...जब मैं ....."
और फिर मेरे गले से एक चीख निकली ...
" धराआआआआआआ "
तीन दिन तलक धरा को ढूँढा वो कहीं न मिली ...और जब मिली तो वो धरा नही एक बेजान टूटी -फूटी ..फटी -पुरानी गुड़िया थी ....जंगली जानवर जिसका एक हाथ खा चुके थे ....
डॉक्टरी रिपोर्ट ने बताया धरा के साथ बलत्कार हुआ था .. उस मासूम परी के साथ जिसको अभी " ब " वर्ण का स्पष्ट उच्चारण करना भी नही आता था .....
केस दर्ज हुआ ..अभियुक्त पकड़े गए ...उन्हें जेल हुई ...लेकिन जमानत में भी देरी नही हुई ...उनकी जमानत के लिए जिस वकील ने एड़ी चोटी का जोर लगाया वो खुद एक मासूम बच्ची का बाप था ...जिन जज साहब ने उन्हें जमानत दी वो भी दो बेटियों के पिता थे ....
धन -रसूख के चलते सबूत मिटा दिए गए .. हमनें वो स्थान ही बदल दिया जहाँ कभी धरा चहकती थी ...धरा के बाद जीवन में कुछ नही रहा ...कमरे और किताबों के बीच जीवन खो गया ..कभी जब धरा याद आती तो मैं खुद को रोते-रोते चोटिल कर लेता ...
और चीख -चीख कर पूछता भगवान से कि मेरी मासूम बहन का कसूर क्या था ...? लेकिन जवाब नही मिलता ...
इसी सवाल ने मुझे दुनिया से काट दिया ...पिताज़ी चल बसे ...आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ऑफ़ इण्डिया में मेरी नौकरी लग गई ..और जीवन अब खाली ..खण्डहर इमारतों के बीच गुजरने लगा ..जहाँ मैं धरा को याद करता उसके साथ खेलता ..बाते करता ..और जब वापस होश आता तो उन्हीं इमारतों ..मूरतों ..खम्बों ..मेहराबों से जवाब मांगता कि धरा का कसूर क्या था ...उसे इंसाफ कौन देगा ...और तभी रोते -रोते सम्राट सुदर्शन के सिंहासन को पकड़ लिया ...
ये मेरा पागलपन था या फिर समय का पीछे लौट जाना ..कि मैंने स्वयं को काँची नगरी के उस प्रासाद में खड़ा पाया जहाँ न्याय का दरबार लगा था ... वो सैनिक अपनी बेटी के लिए न्याय माँग रहा था ...जिसकी मासूम फूल सी बेटी के साथ राजा के पुत्र ने बलत्कार किया था ...
" अमात्य हिदायतुल्ला प्रमाण नही ...जिह्ववा नही ...पुत्री क्या कहती है ...किसकी ओर संकेत करती है ...बताओ मुझे ..?"
" महाराज वो अबोल पुत्री अब जीवित नही ...परन्तु "
" परन्तु क्या अमात्य ....? "
" राजकुमार ने मदिरा के मद की मुद्रा में ....ये अपराध किया है ...उनके मद को इसका दोषी माना जाये राजकुमार को नही अपितु आपके एकमात्र पुत्र अर्थात राजकुमार के दण्डित होने से वेल्लुई साम्राज्य का पतन हो जायेगा ..वो आपके एकमात्र पुत्र हैं "
" तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला "
मेरी आँख में आँसू आ गए ...और मुँह से अनायास ही निकल पड़ा ...
" महाराज की जय हो ..महाराज का न्याय अमर रहे ..महाराज अमर रहे ..महाराज मेरी बहन धरा भी आपके न्याय की प्रतीक्षा में है ...महाराज न्याय .... "
और चेतना मुझे फिर धरातल पर ले आई ..
ये सब काल्पनिक था या वास्तव में इतिहास में ऐसा कभी हुआ होगा ज्ञात नही ...लेकिन जिस देश का राजा दोषी को तुरन्त दंड प्रदान करने में कदापि नही हिचकता ..जिस देश का नृप न्याय करते क्षण अपने कुल की गति को भी रोक दे ....वो देश क्या आज का ही भारत है ....?
काश सम्राट सुदर्शन आज जीवित होते ..तो मेरी बहन को भी न्याय और मुक्ति प्रदान करते ....अपितु यदि उनकी आत्मा ही आज मुझे देख और सुन रही है तो
" हे महाराज ! पुनः जन्म लो और न्याय करो ..ताकि ये फूल सी मासूम बच्चियाँ अपना बचपन अपनी आयु अपने सपने जीने में किसी भेड़िये किसी जानवर की बुरी नजर की जद में न आये ...महाराज अपराध मुक्त करो ये भारतभूमि ...महाराज दोषियों का दलन करो "
जवाब मिल चुका था ...न्याय जहाँ त्वरित हो जहाँ दोषी की दशा वीभत्स और भयानक हो वहाँ बेटीयाँ फिर राज और उसकी नीतियों का निर्वहन करती हैं जैसे महाराज सुदर्शन वेंकेटेश्वर वेल्लुई की पुत्री ~
" राजकुमारी धरा "
नवाज़िश
By~
Junaid Royal Pathan
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