Friday, 21 June 2019

उस्मानलीला

#उस्मानलीला
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" हे राम ...चलाओ तीर  उस्मान आपके सामने है  "

उस्मान तेलगी से मैं पूरे 10 साल बाद मिला हूँ ...जब भी मिलता हूँ अलग साइज में मिलता हूँ ...मतलब उस्मान काका हमेशा वयस्त रहते हैं ....और हमेशा किसी न किसी अदाकारी का मुखौटा लगाये रहते हैं ...

उनका मजहब हाँलाकि उन्हें बहुत सी इजाजत नही देता ...लेकिन वो अक्सर कहते हैं कि ~

" अमां छोड़ो दीपू मियाँ ..मेरा रोजगार है ये सब ..और मेरा अल्लाह जानता है कि मैंने कभी हराम की कमाई की एक रोटी अपने बच्चों के हलक के पार न होने दी ...और कुछ गलत होता तो क्या मेरा अल्लाह जो जमीन -आसमान पनपा सकता है वो मेरे हाथ पैर सुन्न करने में क्या वक्त लगायेगा "

मुझे नही पता उस्मान काका , का अल्लाह क्या चाहता है लेकिन मुझे पता है कि इस बस्ती के इंसान क्या चाहते है ~ तभी शास्त्री जी दिखाई दिए ~

" प्रणाम शास्त्री जी ! वो सुना इस बार उस्मान काका कस्बे की रामलीला में प्रतिभाग नही करेंगे "

धूप अधिक थी तो शास्त्री जी बोले ~

" आओ दीपांकर ..उस पेड़ के नीचे चलकर बैठते हैं ...."

पेड़ की छाँव में बैठकर शास्त्री जी ने जेब से ..तम्बाकू निकाला और चूना धून ..अँगूठे से उसे हथेली में घिसकर बोले ...

" देखो दीपांकर ! ये तो मानोगे न कि समय बदला है ..अब ये ही देख लो कि तुम पहले कितना समय शाखा में देते थे और अब तुम्हारी अनुपस्थिति से कितने प्रश्न खड़े हो रहे हैं... लोग तो दबे मुँह ये भी कह रहे हैं कि तुमने ईश्वर पर पारम्परिक आस्था भी छोड़ दी है "

" क्षमा करें शास्त्री जी ..ये मेरा व्यक्तिगत आचरण हैं ..और इसका मुझे पूरा अधिकार है ..... "

शास्त्री जी चूना फटकते हुये बोले ~

" तो शाखा के अधिकार पर काहे प्रश्न खड़ा कर रहे हो फिर ...उन्हें उस्मान से उत्तम कोई कलाकार मिल गया तो उस्मान को नही लिया ...स्पष्ट है "

शास्त्री जी ने तम्बाकू को होंठ की घिरी में फँसाया और तभी मैं बोल पड़ा ...

" पूरे 35 साल बाद शाखा को ऐसा लगा ...याद कीजिये मेरे पिताजी स्वर्गीय श्री शुभंकर नाथ तिवारी और उस्मान तेलगी ने ही इस कस्बे में रामलीला की प्रथा का शुभारम्भ किया .. और न सिर्फ शुभारम्भ किया अपितु अनेकों पात्रों का अभिनय  करके कस्बे में रामलीला के मंचन हेतु कस्बे वालों को प्रोत्साहित किया .....कम से कम हमें उस्मान काका के त्याग और श्रद्धा का तो सम्मान करना ही चाहिये "

शास्त्री जी उठ खड़े हुए और बोले ~

" हम सम्मान न करें तो अपमान भी नही करते ..और किस उस्मान की बात कर रहे हो तुम ...वो जिसका दो पैसे का सम्मान नही इस कस्बे में वो उस्मान ....जाओ पूछो ...उसी के मजहब वालों से ..."

मैं आवाज में कुछ आवेश भरकर बोल पड़ा ...

" लेकिन किसी के सम्मान से उस्मान काका ..."

शास्त्री जी फिर रुके नही ~लेकिन मैं कुछ देर तलक रुक गया ..बहुत छोटा सा था मैं ... जब मेरे पिताजी और उस्मान काका युवा हुआ करते थे ..याद है कितनी ऊर्जा थी दोनों में ..तब ये कस्बा आज की तरह नही था ...बहुत गंगा-जमुनी रंग था इसमें ..मैं हमेशा मेहरू अम्मा की गोद में बैठकर रामलीला देखता ..मेहरू अम्मा उस्मान काका की अम्मी थी ...पता ही नही चलता कब आँख लग जाती ...हिलती नही थी मेहरू अम्मा सीने से चिपकाये सुलाये रखती थी मुझे ...

पिताजी राम का अभिनय करते थे ..और उस्मान काका कभी अंगद , हनुमान, रावण , केवट आदि का ...ईद भी बड़ी मीठी होती थी उस वक्त सुबह से ही मेरी माता जी नहला धुलाकर मुझे उस्मान काका के घर छोड़ आती थी ...उस्मान काका के बच्चे नईम और जुबैर ही मेरे सबसे सगे और घने मित्र थे ....उस वक्त हमारे लिए मन्दिर और मस्जिद में कोई फर्क नही था ...जमीन ही जैसे जन्नत थी तभी ~

" भाईजान इस जमीन को जन्नत न समझो ...ये तो फ़ानी है फनाह हो जायेगी ..बस अल्लाह से मुहब्बत करो ..अपने दीन से मुहब्बत करो ... इस्लाम से मुहब्बत करो "

मैंने पीछे मुड़कर देखा ये जुमला ...जुबैर का था ..वो जुबैर जो आज भरी दाढ़ी और कुर्ते -पायजामे में एक मजदूर को अल्लाह की बातें समझा रहा था ...उसके ठीक  बगल में नईम खड़ा था ...जिसने मजदूर के कांधे पर हाथ रखा था ....

कई सालों बाद अपने यारों को देखा तो बेहद ख़ुशी हुई ...सोचा जाकर मिलूँ और उनके पीछे हो लिया ~तभी एक बच्चा दौड़ कर आया ~

" जुबैर भाईजान आपके अब्बू की तबियत ख़राब हो रही है ....जल्दी चलिए "

हम तीनों ने एक साथ कदम उठाये लेकिन सिर्फ मेरे कदम ही आगे बढे ..कि नईम बोला ~

" ये अल्लाह का अज़ाब है उनपर ...जिंदगी भर एक नमाज नही पढ़ी उन्होंने ..और रामलीला में कसरत से कोई भी मौका नही छोड़ा ...जो अल्लाह के दीन का नही वो फिर लानत के लायक है ..मदद के नही ..तुम जाओ सादिक  "

गुस्से में मुट्ठियाँ भींच ली मैंने मन किया ऐसी नालायक औलादों का मुँह तोड़ दूँ ....लेकिन मुझे उस्मान काका तक पहुँचना था ...तभी रास्ते में पुनः शास्त्री जी टकराये ~

" शास्त्री जी उस्मान काका की हालत बहुत खराब है ... चलिए उन्हें किसी अस्पताल में दिखा दें ..."

शास्त्री ने उदासीनता प्रकट कर पीताम्बरी गमछा अपने काँधे में लौटाया और बोले ~

" दीपांकर  उसकी औलादें उसकी नही तो हम क्यूँ पहल करें ...मुझे अभी एक विवाह में सम्मिलित होने जाना है और तुम्हें भी एक बात कहे जाता हूँ आगे काम आएगी ...कि बेटा उस्मान भी उसी इस्लाम का मानने वाला है जिसके खिलाफ हमारी शाखा और हमारा धर्म है ...और अब माहौल दोनों तरफ बदल गया है ... मेरी मानों तुम भी लौट जाओ ...चलते हैं ..श्री हरि तुम्हारा मार्गदर्शन करे "

पैरों -पैर गढ़ गया वहीँ ...पता किया तो पाया उस्मान काका अब अकेले रहते हैं ..सईदा काकी के मरने के बाद उनके दोनों बेटों ने उन्हें अकेला छोड़ दिया है.... उन्हें सिर्फ उनके बेटों ने अकेले नही छोड़ा बल्कि इस कस्बे के हर इंसान ने उन्हें अकेला कर दिया है ....

ये कस्बा जहां अब इंसान नही हिन्दू-मुसलमान रहते हैं ...  वो कस्बा  जहाँ एक  इंसान  और उसकी जान की अब किसी को कोई  इज्जत कोई चिंता नही .. धिक्कार है ऐसी जमीन पर ऐसे स्थान पर जहाँ मेरा जन्म हुआ ....लेकिन पुनः ध्यान आया उस्मान काका का ..और दौड़ लगा दी उनके घर की तरफ ....

" काका क्या हुआ ..सब ठीक तो है ...?"

" मामूली खाँसी थी बेटा दीपू ..तुम्हे किसने बताया ...?"

मामूली खाँसी फर्श लाल नही करती ...जमीन पर पसरा खून बता रहा था कि वक्त अब रिसने लगा है ....

मैं उन्हें पानी पिलाकर.. सुलाकर ...अपने पैतृक घर पहुँचा जहां चाचा जी रहते थे ...उन्हें सब बात बताई तो उन्होंने मुझे आदेश दिया कि मैं पहले स्नान करूँ ...स्नान पश्चात मेरे ऊपर गोमूत्र छिड़का गया ......

शाम ढल आई ..रामलीला मंच से भजन की आवाजें गूँजने लगी ...तभी शास्त्री जी मेरे पास दौड़े आये ...

" दीपांकर ..वो ..वो ..आज रावण दलन है और रावण यानि अयोध्या सिंह जी का एक सड़क दुर्घटना में निधन हो गया ..."

" बहुत  बुरा हुआ ...लेकिन मैं क्या कर सकता हूँ शास्त्री जी .."

शास्त्री जी एकदम से मुझे किनारे ले गए ...और बोले ~

" हमनें समिति और शाखा से बात कर ली है ...यदि उस्मान आज रावण का अभिनय कर ले तो ..."

मैंने ताली ठोकी और बोला ~

" वाह शस्त्री जी वाह ! ..परिस्थितियां बिगड़ी तो उस्मान याद आ गया ..."

पूरा बोलता तभी एक झटका और लगा ....जुबैर और नईम आ गए ... बारी -बारी गले  लगे और किनारे ले गए ...

" यार दीपू ...अब्बू हमारी शक्ल नही देखना चाहते लेकिन फिर भी हर दुःख -सुख में हम अब्बू के साथ हैं ...यार अब्बू को कैंसर हो गया है ..पता नही कब फौत हो जायें ...सुना है कि वो मकान और जमीन स्कूल और हॉस्पिटल बनवाने के लिए सरकार के नाम कर गयें हैं ...यार वैसे ही बुरे दिन चल रहे हैं तू उनको समझा न हम वसीयत भी साथ लायें हैं ....बस उनके साइन करवा दे ..."

ये लोग जो धर्म और मजहब का काम कर रहे हैं ...उसके निर्माण उसका प्रसार ..कोई इसे राम का काम बोलता है कोई अल्लाह का ...लेकिन आज अपना स्वार्थ पड़ते ही इन्हें राम और अल्लाह नही बल्कि वो इंसान याद आया है जिसने अपनी पूरी उम्र इन दोनों नामों के एकीकरण में फनाह कऱ दी ....

दोनों पक्षों को दुत्कार के अपने से अलग किया ...और किसी कोने को तलाशने लगा ...रात्रि का पहर उतरा तो जय श्री राम के नारे गूँजने लगे ...मैंने भी रामलीला मंच की ओर प्रस्थान किया ~दृश्य आते रहे जाते रहे लेकिन मुझे मात्र तरस आ रहा था उन मासूम लोगों पर जिनको इन साम्प्रदायिक स्वार्थी व्यक्तियों ने आज राम और अल्लाह के नाम पर इतना बंटवारा कर दिया है कि वो आपसी इसी नफरत को आज धर्म और मजहब का काम बोलते हैं ....

मन नही लग रहा था सोचा कल ही पहली ट्रेन से शहर लौट जाऊँगा कि तभी राम और रावण के युद्ध की घोषणा हुई और मैंने अपनी सीट छोड़ दी और दूर निकलने लगा~तभी कानों में आवाज गिरी

" हे राम....चलाओ तीर उस्मान आपके सामने है "

आव देखा न ताव मैं मंच की ओर दौड़ गया ....पर्दे के पीछे छिपा निर्देशक राम को तीर चलाने को बोल रहा रहा था लेकिन अभी कुछ संवाद बाकि थे लेकिन उस्मान काका जिनकी दशा दूर से भी खड़े होने लायक नही दिखती थी ...निर्देशक ने कड़क कर कहा तीर चलाओ और तीर सीधे लगा ..उस्मान काका के सीने में ...और वो धाप से मंच पर गिरे मैं वहीँ रुक गया ...तालियों और राम के जयकारे के मध्य...और जब वो कुछ मिनटों बाद भी खड़े नही हुए तो मैं सीधे मंच पर पहुँच गया उनका सर अपनी गोद में लिया लेकिन वो गुजर चुके थे ...

क्या शानदार मौत थी एक कलाकार की ...जिसने इस मंच को खड़ा किया ..इस पर अपनी जवानी वार दी और आज जिंदगी की आखरी साँसे भी इसी मंच को सौंप दी~

उनकी सुपर्द ए खाक में कुछ ज्यादा भीड़ नही थी लेकिन कुछ मुठ्ठीभर हिन्दू -मुसलमान अवश्य खड़े दिखाई दिए ...शायद ये ही कोई उम्मीद हो अब इतना बड़बड़ाकर मैंने कस्बे की ओर पीठ की और रेलवे स्टेशन की ओर अपने कदम बढ़ा दिए ........

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

( कथा हेतु चित्र उपलब्ध कराने हेतु " प्रोफेसर राधिका वशिष्ठ जी " आपका हृदय से आभार )

Thursday, 20 June 2019

Pink

#पिंक
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" आज भी अंदर पिंक पहना है  क्या ....?"

आत्मा तक सिहर उठी ..मनचलों की उस भीड़ में उस एक आवाज से ...मैंने कनखियों से देखा वो मेरी ही उम्र का लड़का था ..जिसने ये बेहुदा फिकरा मुझ पर फेंका था ....

लेकिन मैं चलती रही ..और वो भी तेज-तेज कदमों से ...लेकिन अब वो फिकरा उन लफंगों की टीम की जैसे आदत बन गई ....जैसे ही लाल-चौक से गुजरती ..रूँह अंदर तक काँप जाती ...क्यूँकि वहीँ इन लफंगों का जमावड़ा जो लगता था ....

मैंने लाल चौक से निकलना ही छोड़ दिया ..दूसरा रास्ता हाँलाकि थोड़ा लम्बा जरूर था लेकिन वहाँ ऐसे लफंगे नही थे ....

ऑटो वाले को हाथ दिया ..उसने मुझे मेरे दफ्तर छोड़ा ~

" कितना हुआ भैय्या ...?"

" भैय्या मत कहो पिंक मैडम ..आपके लिए सब फ्री है ...बस एक बार हमें भी ...?"

उसके मुँह में पचास का नोट मारकर भागी और दफ्तर के अपने केबिन की सीट पर धाप से जा बैठी ....

आँखों में आँसू उतरने ही वाले थे कि तभी बॉस आ गए उन्होंने मुझे अपने केबिन में बुलाया ~

" देखो श्वेता आज रात हमारे एक क्लाइंट जर्मनी से आ रहें हैं तो तुम्हे आज रात मेरे साथ होटल शालीमार में चलना होगा .."

" पर सर घर में पापा अकेले हैं ..."

" देखो श्वेता तुम चाहो तो अभी छुट्टी ले लो ...लेकिन रात को ठीक 9 बजे तुम्हे शालीमार आना ही होगा ...रूम नम्बर  305 "

मैं घर चली गई ...बाबूजी ने पूछा तो उन्हें सब सच बता दिया ...उन्होंने जाने के लिए मना किया लेकिन फिर उनको समझाया कि पापा पूरा घर इसी जॉब से चल रहा है ....उन्होंने मायूसी में मुँह दूसरी तरफ  फेर लिया और मैंने घर से साढ़े आठ बजे शालीमार होटल को प्रस्थान किया ...

" ओह्ह्ह श्वेता आओ ...बैठो ..बहुत हसीन लग रही हो "

बॉस शराब पी रहे थे और अकेले थे ..मैंने पूछा ~

" सर क्लाइंट नही आये अभी ...?"

बाथ गाऊन की स्ट्रिप बाँधकर बॉस खड़े हुए और मेरी तरफ बढे ...और उन्होंने मेरे होंठों पर अपने होंठ रखने की कोशिश की ..मैंने उनको धक्का दिया और वो जमीन पर गिर गये ...

" साली ..रंडी ..छिनाल ..साली सती सावित्री बनती है मेरे सामने ...जानता हूँ तेरी औकात ..तू क्या है ..साली पिंक कुतिया "

मैंने सीधे दरवाजा खोला और दौड़ गई ...अंधाधुंध दौड़ती रही ..ये तक ख्याल नही रहा कि मुझे कहाँ जाना है ...दौड़ते -दौड़ते लाल -चौक पहुँची तो वही लफंगा मिला जो अक्सर मुझे देख कर बेहूदा फिकरे कसता है ....मैं सकपका और घबरा गई ~

" ओये.. होये मैडम पिंक... कभी हमें भी रात्रि सेवा का अवसर दे दो ...कभी हमें भी पिंक पीस लाइव फ्लेवर दिखा दो "

" तुझे देखना है न तो ले देख हरामजादे देख ...मेरे पास सब कुछ वही है जो तेरी माँ -बहन के पास है ..देख कुत्ते ..देख ..."

मैंने जैसे ही अपनी कुर्ती उतारी वो लफंगा डर के मारे भाग निकला ...

घर पहुँची ....दरवाजा बन्द किया ..और बाथरूम में जाकर फूट-फूट कर रोने लगी ....और फिर इरादा कर लिया कि अब जिन्दा नही रहना ...किचन में गई और चाकू हाथ में लिया और जैसे ही उसे हाथ की नश में रखा तभी पापा की खाँसी की आवाज सुनाई दी ...और न जाने क्यूँ चाक़ू खुद ब खुद हाथ से फर्श पर गिर गया ....

फैसला कर लिया था कि अब उस नीच के ऑफिस में काम नही करूंगी ...3 दिन घर में रहने के बाद चौथे दिन इंटरव्यू देने एक कम्पनी जा रही थी कि रास्ते में लाल -चौक पड़ा ..और बैठे दिखे वो लफंगे ...मैंने डर के मारे मुठ्ठियाँ भींच ली ....लेकिन चमत्कार हुआ और एक भी फिकरा आज मुझपर नही उछला ...

जैसे ही लाल चौक से निकल कर ऑटो का वेट करने लगी तभी ~

" सॉरी मैडम ..वो उस रात कुछ ज्यादा मिसबिहेव कर दिया अपन ने ..सॉरी ...अपन भी तो गन्दे काम  पंटरगिरी ..और रंगबाजी करके अपनी फैमली पालता है ...तो अपन आप को बुरा क्यूँ कहे ...अपन और अपन के फ्रेंड्स आज
के बाद आप को प्रॉब्लम नही देंगे ...."

वो मवाली लौटने लगा तो मैंने चिल्लाकर बोला ~

" ए..ए ...हाँ यू ..तुमसे किसने कहा कि मैं गन्दे काम करके अपनी फैमली को पालती हूँ ..तुम्हारी तरह नही हूँ समझे ...गो टू हेल "

तभी वो लफंगा पास आया और बोला ~

" ओये मैडम अपन तेरे को इज्जत दे रेला है ..सॉरी बोल रेला है और तू भाव खा रेली है ...अपन क्या पूरा शहर जनता है तू कैसा आइटम है समझी "

मैं आगे बढ़ी और एक जोरदार तमाचा उस मवाली के मुँह पर मारा ~

" कुत्ते ..मेरी जगह तेरी बहन भी होती न ..तो आज ये पूरा शहर उसे भी यही बोलता...दो पैसे के टपोरी जानता भी है क्या हुआ था मेरे साथ ?"

ऑटो आ चुका था ..और मैं इंटरव्यू देने निकल गई ...लेकिन अब वो टपोरी न मुझे छेड़ता था न सामने आता था ...कभी नजर मिल जाए तो नजरे झुका लेता था ...तभी एक दिन लाल चौक से गुजरते वक्त उस टपोरी के एक दोस्त ने  मुझे छेड़ा~

" कभी हमें भी पिंक टू पीस के दर्शन करा दो "

मैं कुछ प्रतिक्रिया करती इससे पहले ही मुझसे सॉरी बोलने वाले उस टपोरी ने उस दूसरे टपोरी जिसने मुझे छेड़ा था उसको मार-मार कर अधमरा कर दिया ...और उसने मुझे देखा ..लेकिन उसकी इस हीरोगर्दी से मेरे दिल में उसके लिए जरा सी भी इज्जत न बढ़ी ...

एक दिन रात को पापा को अस्थमा का अटैक पड़ा ... मैंने एम्बुलेंस को फोन किया और एम्बुलेंस आ गई ...पापा की जान खतरे में थी ..तभी जेम लग गया ...मैंने सड़क पर उतरकर स्थिति को देखा तो पाया कि बीच में एक ट्रक और कार का एक्सिडेंट हो गया है ...अब ये जेम लम्बा था और पापा की हालत बिगड़ती जा रही थी ...तभी मैं वापस एम्बुलेंस के करीब पहुँची तो पाया पापा वहाँ नही थे ...

" पापा .कहाँ हैं मेरे ...?"

" मैडम एक गुंडा आया और बोला ..सीन हॉस्पिटल ले जा रहा हूँ उसके हाथ में चाकू था "

मैं सड़क की दूसरी लेन में गई और ऑटो पकड़कर सीन हॉस्पिटल पहुँची वो लफंगा वहीँ खड़ा था ...

" तुम ..तुम ..यहाँ भी .. ..कहीं तुम ही तो नही  ..तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अभी पुलिस कम्प्लेन ....."

तभी  डॉक्टर साहब बोल पड़े ~

" रहने दीजिये मिस ...यदि ये आपके पापा को यहाँ नही लाता तो आप के पापा शायद नही बचते "

पूरा दृश्य फ़िल्म जैसा था ...लेकिन था वास्तविक. मेरी आँखों में आँसू उतर गए .... लेकिन अभी भी मेरे मुँह से उस लफंगे के लिए सॉरी या थैंक्स नही निकला ~

" अपन को मालूम है आप अपन को थैंक्स बोलना चाहती हैं मैडम ..बट कोई बात नही अपन साला इस लायक नही ..ये अपन का नम्बर है ..कोई बात हुई तो अपन को फोन करना अपन मर भी रहा होगा तो आपके वास्ते मौत से लड़कर यहाँ पहुँच जायेगा "

वो जाने लगा तभी मैं बोल पड़ी ~

" सु ..सुनो ..तुम्हारा नाम क्या है ..."

" अपन की माई अपन से दिनेश बोलती है और खांटी भाई लोग डेंजर "

" सुनो दिनेश थैंक्स ..तुमने आज पापा की जान बचाई "

तभी दिनेश बोला ~

" लेकिन अपन तुम को तभी थैंक्स बोलेगा मैडम जब तुम अपन को वो सच बताओगी जिसके वास्ते अपन ने अपने गाल पर तुम्हारा चांटा भी चिपकाया है "

कुछ देर की ख़ामोशी के बाद ..मैं बोली ~

" यहाँ बैठो ..."

" हम दोनों आई .सी .यू के बाहर लगी सीट पर बैठे ...

" एक लड़के से बहुत प्यार करती थी मैं ...ये बात तब की है जब मैंने एक नई -नई कम्पनी में जॉब के लिए अप्लाई किया ..वो भी मेरे साथ एक केंडिनेट था ... उसने अपना नाम राजेश बताया था मुझे ...मैंने उसके डाक्यूमेंट्स पर भी उसका यही नाम पढ़ा था ...बातों ही बातों में हमारी दोस्ती हो गई ...और फोन नम्बर एक्सचेंज हो गए ...हैलो ..हाई ..गुड मोर्निग ..गुड नाईट के मेसेज  बाद में लम्बी -लम्बी बातों में बदलने लगे ..बातों से सिलसिला साथ घूमने -फिरने और फ़िल्म देखने तक पहुँच गया ....और जब उसने मेरा विश्वास पूरी तरह से जीत लिया तो फिर... मैं वो कदम उठा बैठी जिसका पछतावा आज तक मेरी जिंदगी में एक गाली बनकर चिपका हुआ  है ....वो एक दिन अपने बर्थ डे की पार्टी बोलकर मुझे एक होटल में ले गया ...उसने शराब पी और मुझे जबरदस्ती वोडका पिला दिया और जब मुझे नशा ज्यादा हो गया तो  उसके बाद वो मुझे बिस्तर पर ले गया और मेरे कपड़े उतार कर ... मेरे साथ .....हाँ उस दिन मैंने पिंक अंडर गारमेंट्स पहने थे ....उस कमीने ने न सिर्फ मेरी इज्जत तार-तार की बल्कि मेरी वीडियो क्लिप बनाकर उसे वायरल कर दिया ....बाद में मुझे पता चला कि वो उसका धंधा था .... उसने मुझे अपने नाम के आलावा कभी कुछ नही बताया और जो कुछ बताया वो सब झूठ था जो मुझे बाद में पता चला ... और दिनेश जब वो क्लिप हर जगह वायरल हुई तो सबसे पहले मेरे भैय्या -भाभी ने मेरा त्याग किया ..और वो बैंगलूर चले गए ...माँ इस सदमे से चल बसी ..बाबूजी की हालत और बिगड़ गई ...और मैं एक लड़की ..एक इंसान से महज पिंक बन गई  "

मैं वहीँ फूट -फूट कर रोने लगी ...लेकिन तभी मुझे सहारा दिया दिनेश ने ~

" मैडम अपन  पढ़ा -लिखा और आप के लायक  नही वरना अबीच बोलता कि अपन को आप से प्यार हो गेला है ...और अपन आप के साथ शादी बनाना चाहता है ...अपन उस हरामी की तरह फ्रॉड नही ..अपन गरीब और गुंडा जरूर है ...लेकिन अपन तुम्हारे वास्ते दिन-रात  मेहनत करके अपनी गरीबी दूर करेगा और गुंडागर्दी अपन आज से ही छोड़ता है ....अपन प्रोमिश करता है ...कि अपन को सिर्फ एक साल का बकत दो अपन इन एक सालों में आपके लायक बनकर दिखायेगा ...अपन बहुत बड़ी बाते नही करेगा लेकिन अपन इतना जरूर कहेगा कि ...अपन साला आपको बहुत खुश रखेगा .. बहुत खुश "

दिनेश की आँखों में जहाँ मेरे लिए बेहिसाब प्यार नजर आ रहा था वहीं  बेशुमार आँसू भी थे .. एक गहरा दर्द और एक प्राश्चित भी ...लेकिन मुझे लगा कि वो मेरी स्टोरी सुनकर सेंटीमेंटल हो गया है तब ऐसा बोल रहा है ....मैं चुप रही और वक्त गुजरता रहा
और फिर ~

एक दिन किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी ..दरवाजा खोला तो सामने उजली सफेद कमीज में दिनेश खड़ा था ...उसका हुलिया बिलकुल बदल गया था.. छोटे बाल ..फ़टी जीन्स की जगह इस्त्री करी हुई काली पेंट ...

" मैडम ..माफ़ करना आपके पूरे लायक बनने में तो जिंदगी निकल जायेगी ...एक साल हो गया ..और अपनी दी हुई जबान के मुताबिक मैं अभी सिर्फ एक इज्जतदार रोजगार ही हासिल कर पाया ..बाकि पढ़ -लिख भी रहा हूँ ..इतना कहने आया था कुछ और साल की मोहलत मिल जाती तो पूरा आपके लायक बनकर लौटता  .."

कुछ ही पल का सन्नाटा रहा  ...लेकिन इन कुछ पलों में ... मैं खुद से बाहर जा खड़ी हुई औरबोली ...

" लेकिन मैं अब तुम्हारे बिन एक दिन..एक पल नही जी सकती दिनेश मुझे अपना लो ...मुझे अपना लो..   "

और ये कहते -कहते छलछलाती आँख में आँसू भरकर मैं  दिनेश के गले लग गई और जिंदगी जैसे पिंक से बदलकर इंद्रधनुष के समस्त रंगों में रंग गई  ......

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan

( Story image credit goes to ~ Sunita Srivastava)   Thanks !

Wednesday, 19 June 2019

#धरा ***** " तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला " मुझे एक तेज झटका लगा ..जैसे किसी ने 440 वोल्ट का करेंट मेरे जिस्म में दौड़ दिया हो ! मैं डॉक्टर रचित कुमार हूँ ... भूख है मुझे इतिहास ..और उससे जुड़ी सामग्री की ..ऐसी कट्टर और विषैली भूख कि जिसके चलते मैंने बहुत कुछ खोया है .... मेरी बीवी मुझे छोड़ कर चल दी ..उसका तर्क सही था कि जब तुम्हे खण्डहरों से इतना प्रेम है तो फिर मुझसे विवाह क्यूँ किया .?..मेरे पास जवाब अब भी नही कि मैं क्यूँ इन ऐतिहासिक इमारतों के मध्य ही आंशिक सुख पाता हूँ ..आखिर वो कौनसा पूर्ण सुख है जिसकी तलाश है जिसके लिए मैंने अपना हुलिया पागलों सा बना लिया ...आखिर वो कौन सा जवाब है जो मुझे अब तक नही मिला ~~~ उत्तर भारत के लगभग समस्त किले , प्रासाद , महल , बावड़ी मैंने इस 52 वर्ष की आयु तक घूम लिए या इनमें अपने जीवन का एक भाग बिता लिया ...अब दक्षिण भारत ही बचा था जिसके दो तिहाई ऐतिहासिक स्थानों को मैंने छान मारा .... लेकिन फिर भी अंदर ही अंदर एक आरा अभी भी मेरे हृदय को धीरे-धीरे काट रहा है ... मैंने मात्र इन स्थानों पर जिंदगी जी ही नही बल्कि चीख-चीख कर इनसे न्याय भी माँगा है ...या माँगी है वो दिशा जिसपर पूरा राष्ट्र झोंक दिया जाये .... . ~~~~ माँ के दाल पर छोंका मारते ही ...मुझे छींक आई तो धरा खिलखिला कर हँस उठी ... " माँ देथो भैया तो थींक आ दई .....ही ही ही " धरा मेरी जिंदगी का वो आधार जिसमें मेरी जान बसती थी ..मेरी इकलौती फूल सी बहन .... जिसकी उम्र यही कोई 5 साल थी उस वक्त ... पिताजी या माँ जब भी उसे गोद में लेते और दुलार करते ..मैं अंदर ही अंदर जल -भुन कर राख होने लगता ..क्यूँकि धरा पर सिर्फ मेरा अधिकार था ... क्यूँकि भगवान ने उसे सिर्फ मेरे लिए ही धरती पर उतारा था ... उसके पैर में एक काँटा तक नही चुभने देता था मैं ,, पहले वो खाती फिर मैं उसका झूठा खाता ... उसके साथ खेलता ..लेकिन जब धूल से उसके बाल भर जाते तो उनको झाड़ता भी ...वो जिस पेड़ पर चढ़े और पके फल की फरमाइश करती वो उसकी झोली में होता ...वो जो माँगती बस में नही होता तो चुराकर उसको देता ... सब हैरत करते कि एक भाई अपनी बहन पर इतनी जान कैसे छिड़कता है ...तो सब कि बात क्यूँ सुनूँ ..सब होते कौन हैं ? ये वो ही सब हैं जिन्होंने मुझे बताया था कि मैं कौन हूँ ... मैं यानि एक लँगड़ा ..पोलियो है मुझे बचपन से ...सुंदर न होने के साथ -साथ पैर खराब होना .. किसी का प्यार नही टूटता था मुझपर ..मेरी माँ ही थी जो मुझे दुलार करती थी ..घरेलू कामों में लिप्त रहने के चलते वो हर वक्त मेरे साथ नही रहती थी ...पिता जी रेलवे में ड्यूटी करते थे ..तो अक्सर घर से बाहर रहते .... लेकिन जो मेरे साथ हँसती -खेलती ..मेरे गालों को चूमती ..मुझे दुलार करती ...और मेरे लिए रोती-तड़पती वो धरा थी मेरी करोड़ो में एक प्यारी बहन ..... उसकी बलाएँ मेरे सर ...इतना अमिट प्रेम इतना वात्सल्य की एक बार प्राइमरी के मास्साहब ने उसका कान पकड़ लिया तो मैंने पत्थर से वो हाथ ही घायल कर दिया उनका ..जिसने मेरी बहन की आँख में आँसू दिए .. पढ़ने में मेधावी रहा हूँ कुरूपता और पोलियो ने मुझे अंतर्मुखी व्यवहार प्रदान किया ...किस्से -कहानियाँ ..जादू-नगरी ही मेरे साथी थे लेकिन तब जब धरा मेरी गोद में सो जाती थी ... जन्मदिवस था धरा का उस दिन ...उसने नीली आँखों वाली गुड़िया माँगी थी मुझसे ...पिताजी को आज नही लौटना था और माँ के पास इतने पैसे नही थे ....उस समय रूपये की धमक थी,, तो गुड़िया यही कोई 80 रूपये की कीमत पर दुकान में टंगी हुई थी .... मैंने गुल्लक फोड़ा तो पाँच रूपये 20 पैसे हाथ लगे ...वो गुड़िया मेरी गुड़िया की फरमाइश थी ... तो व्याकुल सा हो उठा ...सोचा क्या करूँ ..क्या करूँ ...? तभी मैंने मन्दिर पर एक इंसान को जाते देखा और देखा दान-पात्र पर उसके द्वारा रूपये गिराते ....समझ शून्य हो गई .. शीघ्र फैसला करना था भगवान या धरा ...? सीधे दान -पात्र उठाया और उसे लेकर दौड़ गया ...किसी ने आँख गिरा दी ...और उसके बाद 12 की उम्र के मुझ बच्चे को लोगों ने गिरा-गिरा कर मारा ...बात घर तलक पहुँचनी स्वाभाविक थी ...माँ खूब रोई ..और उस दिन के बाद मेरा नाम लँगड़ा चोर पड़ गया .... जी लेता लेकिन जब अपनी हालत पर धरा की आँख में आँसुओं का रेला देखा तो चिपट पड़ा उससे ... " मेरी गुड़िया ..मेरी रानी ...कुछ नही हुआ मुझे ...चल खेलते हैं ...लेकिन धरा रोते-रोते वहीँ सो गई ...और मैं उसके मासूम चेहरे पर आँसुओं की एक बूँद जो उसके गालों को सेंक रही थी अँगुली से उठा कर फिर मैं खुद भी फूट-फूट कर रोने लगा .... मुझे धरा को मुस्कान देनी थी ....माँ स्नान करने गयीं तो उन्होंने अपने मंगलसूत्र को वहीँ संदूक में डाल दिया ...बहुत अंतर्द्वंद था लेकिन धरा की जीवन में भूमिका मेरे लिए माँ से भी बढ़ चुकी थी ... बिना कुछ्मैं सोचे मैंने शहर को लंगड़ाते हुए दौड़ लगा दी .... और जब वापस लौटा तो एक तरफ जेब में ढ़ेर से पैसे और हाथों में नीली आँखों वाली गुड़िया थी ...वो गुड़िया जिससे मैंने रास्ते भर बात की ..बहुत जल्दी थी मुझे धरा तलक पहुँचने की ... लेकिन देर हो चुकी थी ...घर में रोने चिल्लाने का माहौल बरपा था ... " रच्चू कहाँ है धरा ..? कहाँ ले गया था उसे ...?" " मैं ..मैं ..मैं कहीं नही ले गया ..वो तो सो रही थी ...जब मैं ....." और फिर मेरे गले से एक चीख निकली ... " धराआआआआआआ " तीन दिन तलक धरा को ढूँढा वो कहीं न मिली ...और जब मिली तो वो धरा नही एक बेजान टूटी -फूटी ..फटी -पुरानी गुड़िया थी ....जंगली जानवर जिसका एक हाथ खा चुके थे .... डॉक्टरी रिपोर्ट ने बताया धरा के साथ बलत्कार हुआ था .. उस मासूम परी के साथ जिसको अभी " ब " वर्ण का स्पष्ट उच्चारण करना भी नही आता था ..... केस दर्ज हुआ ..अभियुक्त पकड़े गए ...उन्हें जेल हुई ...लेकिन जमानत में भी देरी नही हुई ...उनकी जमानत के लिए जिस वकील ने एड़ी चोटी का जोर लगाया वो खुद एक मासूम बच्ची का बाप था ...जिन जज साहब ने उन्हें जमानत दी वो भी दो बेटियों के पिता थे .... धन -रसूख के चलते सबूत मिटा दिए गए .. हमनें वो स्थान ही बदल दिया जहाँ कभी धरा चहकती थी ...धरा के बाद जीवन में कुछ नही रहा ...कमरे और किताबों के बीच जीवन खो गया ..कभी जब धरा याद आती तो मैं खुद को रोते-रोते चोटिल कर लेता ... और चीख -चीख कर पूछता भगवान से कि मेरी मासूम बहन का कसूर क्या था ...? लेकिन जवाब नही मिलता ... इसी सवाल ने मुझे दुनिया से काट दिया ...पिताज़ी चल बसे ...आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ऑफ़ इण्डिया में मेरी नौकरी लग गई ..और जीवन अब खाली ..खण्डहर इमारतों के बीच गुजरने लगा ..जहाँ मैं धरा को याद करता उसके साथ खेलता ..बाते करता ..और जब वापस होश आता तो उन्हीं इमारतों ..मूरतों ..खम्बों ..मेहराबों से जवाब मांगता कि धरा का कसूर क्या था ...उसे इंसाफ कौन देगा ...और तभी रोते -रोते सम्राट सुदर्शन के सिंहासन को पकड़ लिया ... ये मेरा पागलपन था या फिर समय का पीछे लौट जाना ..कि मैंने स्वयं को काँची नगरी के उस प्रासाद में खड़ा पाया जहाँ न्याय का दरबार लगा था ... वो सैनिक अपनी बेटी के लिए न्याय माँग रहा था ...जिसकी मासूम फूल सी बेटी के साथ राजा के पुत्र ने बलत्कार किया था ... " अमात्य हिदायतुल्ला प्रमाण नही ...जिह्ववा नही ...पुत्री क्या कहती है ...किसकी ओर संकेत करती है ...बताओ मुझे ..?" " महाराज वो अबोल पुत्री अब जीवित नही ...परन्तु " " परन्तु क्या अमात्य ....? " " राजकुमार ने मदिरा के मद की मुद्रा में ....ये अपराध किया है ...उनके मद को इसका दोषी माना जाये राजकुमार को नही अपितु आपके एकमात्र पुत्र अर्थात राजकुमार के दण्डित होने से वेल्लुई साम्राज्य का पतन हो जायेगा ..वो आपके एकमात्र पुत्र हैं " " तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला " मेरी आँख में आँसू आ गए ...और मुँह से अनायास ही निकल पड़ा ... " महाराज की जय हो ..महाराज का न्याय अमर रहे ..महाराज अमर रहे ..महाराज मेरी बहन धरा भी आपके न्याय की प्रतीक्षा में है ...महाराज न्याय .... " और चेतना मुझे फिर धरातल पर ले आई .. ये सब काल्पनिक था या वास्तव में इतिहास में ऐसा कभी हुआ होगा ज्ञात नही ...लेकिन जिस देश का राजा दोषी को तुरन्त दंड प्रदान करने में कदापि नही हिचकता ..जिस देश का नृप न्याय करते क्षण अपने कुल की गति को भी रोक दे ....वो देश क्या आज का ही भारत है ....? काश सम्राट सुदर्शन आज जीवित होते ..तो मेरी बहन को भी न्याय और मुक्ति प्रदान करते ....अपितु यदि उनकी आत्मा ही आज मुझे देख और सुन रही है तो " हे महाराज ! पुनः जन्म लो और न्याय करो ..ताकि ये फूल सी मासूम बच्चियाँ अपना बचपन अपनी आयु अपने सपने जीने में किसी भेड़िये किसी जानवर की बुरी नजर की जद में न आये ...महाराज अपराध मुक्त करो ये भारतभूमि ...महाराज दोषियों का दलन करो " जवाब मिल चुका था ...न्याय जहाँ त्वरित हो जहाँ दोषी की दशा वीभत्स और भयानक हो वहाँ बेटीयाँ फिर राज और उसकी नीतियों का निर्वहन करती हैं जैसे महाराज सुदर्शन वेंकेटेश्वर वेल्लुई की पुत्री ~ " राजकुमारी धरा " नवाज़िश By~ Junaid Royal Pathan

#धरा
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" तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला "

मुझे एक तेज झटका लगा ..जैसे किसी ने 440 वोल्ट का करेंट मेरे जिस्म में दौड़ दिया हो !

मैं  डॉक्टर रचित कुमार हूँ ... भूख है मुझे इतिहास ..और उससे जुड़ी सामग्री की ..ऐसी कट्टर और विषैली भूख कि जिसके चलते मैंने बहुत कुछ खोया है .... मेरी बीवी मुझे छोड़ कर चल दी ..उसका तर्क सही था कि जब तुम्हे खण्डहरों से इतना प्रेम है तो फिर मुझसे विवाह क्यूँ किया .?..मेरे पास जवाब अब भी नही कि मैं क्यूँ इन ऐतिहासिक इमारतों के मध्य ही आंशिक सुख पाता हूँ ..आखिर वो कौनसा पूर्ण सुख  है जिसकी तलाश है जिसके लिए मैंने अपना हुलिया पागलों सा बना लिया ...आखिर वो कौन सा जवाब है जो मुझे अब तक नही मिला ~~~

उत्तर भारत के लगभग समस्त किले , प्रासाद , महल , बावड़ी मैंने इस 52 वर्ष की आयु तक घूम लिए या इनमें अपने जीवन का एक भाग बिता लिया ...अब दक्षिण भारत ही बचा था जिसके दो तिहाई ऐतिहासिक स्थानों को मैंने छान मारा ....

लेकिन फिर भी अंदर ही अंदर एक आरा अभी भी मेरे हृदय को धीरे-धीरे काट रहा है ... मैंने मात्र इन स्थानों पर जिंदगी जी ही नही बल्कि चीख-चीख कर इनसे न्याय भी माँगा है ...या माँगी है वो दिशा जिसपर पूरा राष्ट्र झोंक दिया जाये ....
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माँ के दाल पर छोंका मारते ही ...मुझे छींक आई तो धरा खिलखिला कर हँस उठी ...

" माँ देथो भैया तो थींक आ दई .....ही ही ही "

धरा मेरी जिंदगी का वो आधार जिसमें मेरी जान बसती थी ..मेरी इकलौती फूल सी बहन .... जिसकी उम्र यही कोई 5 साल थी उस वक्त ... पिताजी या माँ जब भी उसे गोद में लेते और दुलार करते ..मैं अंदर ही अंदर जल -भुन कर राख होने लगता ..क्यूँकि धरा पर सिर्फ मेरा अधिकार था ... क्यूँकि भगवान ने उसे सिर्फ मेरे लिए ही धरती पर उतारा था ...

उसके पैर में एक काँटा तक नही चुभने देता था मैं ,, पहले वो खाती फिर मैं उसका झूठा खाता ... उसके साथ खेलता ..लेकिन जब धूल से उसके बाल भर जाते तो उनको झाड़ता भी ...वो जिस पेड़ पर चढ़े और पके फल की फरमाइश करती वो उसकी झोली में होता ...वो जो माँगती बस में नही होता तो चुराकर उसको देता ...

सब हैरत करते कि एक भाई अपनी बहन पर इतनी जान कैसे छिड़कता है ...तो सब कि बात क्यूँ सुनूँ ..सब होते कौन हैं ? ये वो ही सब हैं जिन्होंने मुझे बताया था कि मैं कौन हूँ ...

मैं यानि एक लँगड़ा ..पोलियो है मुझे बचपन से ...सुंदर न होने के साथ -साथ पैर खराब होना .. किसी का प्यार नही टूटता था मुझपर ..मेरी माँ ही थी जो मुझे दुलार करती थी ..घरेलू कामों में लिप्त रहने के चलते वो हर वक्त मेरे साथ नही रहती थी ...पिता जी रेलवे में ड्यूटी करते थे ..तो अक्सर घर से बाहर रहते .... लेकिन जो मेरे साथ हँसती -खेलती ..मेरे गालों को चूमती ..मुझे दुलार करती ...और मेरे लिए रोती-तड़पती वो धरा थी मेरी करोड़ो में एक प्यारी बहन .....

उसकी बलाएँ मेरे सर ...इतना अमिट प्रेम इतना वात्सल्य की एक बार प्राइमरी के मास्साहब ने उसका कान पकड़ लिया तो मैंने पत्थर से वो हाथ ही घायल कर दिया उनका ..जिसने मेरी बहन की आँख में आँसू दिए ..

पढ़ने में मेधावी रहा हूँ कुरूपता और पोलियो ने मुझे अंतर्मुखी व्यवहार प्रदान किया ...किस्से -कहानियाँ ..जादू-नगरी ही मेरे साथी थे लेकिन तब जब धरा मेरी गोद में सो जाती थी ...

जन्मदिवस था धरा का उस दिन ...उसने नीली आँखों वाली गुड़िया माँगी थी मुझसे ...पिताजी को आज नही लौटना था और माँ के पास इतने पैसे नही थे ....उस समय रूपये की धमक थी,, तो गुड़िया यही कोई 80 रूपये की कीमत पर दुकान में टंगी हुई थी ....

मैंने गुल्लक फोड़ा तो पाँच रूपये 20 पैसे हाथ लगे ...वो गुड़िया मेरी गुड़िया की फरमाइश थी ... तो व्याकुल सा हो उठा ...सोचा क्या करूँ ..क्या करूँ ...?

तभी मैंने मन्दिर पर एक इंसान को जाते देखा और देखा दान-पात्र पर उसके द्वारा रूपये गिराते ....समझ शून्य हो गई .. शीघ्र फैसला करना था भगवान या धरा ...?

सीधे दान -पात्र उठाया और उसे लेकर दौड़ गया ...किसी ने आँख गिरा दी ...और उसके बाद 12 की उम्र के मुझ बच्चे को लोगों ने गिरा-गिरा कर मारा ...बात घर तलक पहुँचनी स्वाभाविक थी ...माँ खूब रोई ..और उस दिन के बाद मेरा नाम लँगड़ा चोर पड़ गया ....

जी लेता लेकिन जब अपनी हालत पर  धरा की आँख में आँसुओं का रेला देखा तो चिपट पड़ा उससे ...

" मेरी गुड़िया ..मेरी रानी ...कुछ नही हुआ मुझे ...चल खेलते हैं ...लेकिन धरा रोते-रोते वहीँ सो गई ...और मैं उसके मासूम चेहरे पर आँसुओं की एक बूँद जो उसके गालों को सेंक रही थी अँगुली से उठा कर फिर मैं  खुद भी फूट-फूट कर रोने लगा ....

मुझे धरा को मुस्कान देनी थी ....माँ स्नान करने गयीं तो उन्होंने अपने मंगलसूत्र को वहीँ संदूक में डाल दिया ...बहुत अंतर्द्वंद था लेकिन धरा की जीवन में भूमिका मेरे लिए माँ से भी बढ़ चुकी थी ...

बिना कुछ्मैं सोचे मैंने शहर को लंगड़ाते हुए दौड़ लगा दी .... और जब वापस लौटा तो एक तरफ जेब में ढ़ेर से पैसे और हाथों में नीली आँखों वाली गुड़िया थी ...वो गुड़िया जिससे मैंने रास्ते भर बात की ..बहुत जल्दी थी मुझे धरा तलक पहुँचने की ...

लेकिन देर हो चुकी थी ...घर में रोने चिल्लाने का माहौल बरपा था ...

" रच्चू कहाँ है धरा ..? कहाँ ले गया था उसे ...?"

" मैं ..मैं ..मैं कहीं नही ले गया ..वो तो सो रही थी ...जब मैं ....."

और फिर मेरे गले से एक चीख निकली ...

" धराआआआआआआ "

तीन दिन तलक धरा को ढूँढा वो कहीं न मिली ...और जब मिली तो वो धरा नही एक बेजान टूटी -फूटी ..फटी -पुरानी गुड़िया थी ....जंगली जानवर जिसका एक हाथ खा चुके थे ....

डॉक्टरी रिपोर्ट ने बताया धरा के साथ बलत्कार हुआ था .. उस मासूम परी के साथ जिसको अभी " ब " वर्ण का स्पष्ट उच्चारण करना भी नही आता था .....

केस दर्ज हुआ ..अभियुक्त पकड़े गए ...उन्हें जेल हुई ...लेकिन जमानत में भी देरी नही हुई ...उनकी जमानत  के लिए जिस वकील ने एड़ी चोटी का जोर लगाया वो खुद एक मासूम बच्ची का बाप था ...जिन जज साहब ने उन्हें जमानत दी वो भी दो बेटियों के पिता थे ....

धन -रसूख के चलते सबूत मिटा दिए गए .. हमनें वो स्थान ही बदल दिया जहाँ कभी धरा चहकती थी ...धरा के बाद जीवन में कुछ नही रहा ...कमरे और किताबों के बीच जीवन खो गया ..कभी जब धरा याद आती तो मैं खुद को रोते-रोते चोटिल कर लेता ...

और चीख -चीख कर पूछता भगवान से कि मेरी मासूम बहन का कसूर क्या था  ...? लेकिन जवाब नही मिलता ...

इसी सवाल ने मुझे दुनिया से काट दिया ...पिताज़ी चल बसे ...आर्कियोलॉजी डिपार्टमेंट ऑफ़ इण्डिया में मेरी नौकरी लग गई ..और जीवन अब खाली ..खण्डहर इमारतों के बीच गुजरने लगा ..जहाँ मैं धरा को याद करता उसके साथ खेलता ..बाते करता ..और जब वापस होश आता तो उन्हीं इमारतों ..मूरतों ..खम्बों ..मेहराबों से जवाब मांगता कि धरा का कसूर क्या था ...उसे इंसाफ कौन देगा ...और तभी रोते -रोते सम्राट सुदर्शन के  सिंहासन को पकड़ लिया ...

ये मेरा पागलपन था या फिर समय का पीछे लौट जाना ..कि मैंने स्वयं को काँची नगरी के उस प्रासाद में खड़ा पाया जहाँ न्याय का दरबार लगा था ... वो सैनिक अपनी बेटी के लिए न्याय माँग रहा था ...जिसकी मासूम फूल सी बेटी के साथ राजा के पुत्र ने बलत्कार किया था ...

" अमात्य हिदायतुल्ला प्रमाण नही ...जिह्ववा नही ...पुत्री क्या कहती है ...किसकी ओर संकेत करती है ...बताओ मुझे ..?"

" महाराज वो अबोल पुत्री अब जीवित नही ...परन्तु "

" परन्तु क्या अमात्य ....? "

" राजकुमार ने मदिरा के मद की मुद्रा में ....ये अपराध किया है ...उनके मद को इसका दोषी माना जाये राजकुमार को नही अपितु आपके एकमात्र पुत्र अर्थात राजकुमार के दण्डित होने से वेल्लुई साम्राज्य का पतन हो जायेगा ..वो आपके एकमात्र पुत्र हैं "

" तो ठीक है ..न्याय हो चुका ...मैं चक्रवर्ती , धर्मपालक , थल्लानियामक , समग्र समुद्र पीत वाहन नरेश राजा सुदर्शन वेंकेटश्वर वेल्लुई आज्ञा देता हूँ कि इस नीच , पापी पशु को पुरुषत्व से मुक्ति दी जाये ... आज्ञा का पालन हो अमात्य हिदायतुल्ला "

मेरी आँख में आँसू आ गए ...और मुँह से अनायास ही निकल पड़ा ...

" महाराज की जय हो ..महाराज का न्याय अमर रहे ..महाराज अमर रहे ..महाराज मेरी बहन  धरा  भी आपके न्याय की प्रतीक्षा में है ...महाराज न्याय .... "

और चेतना मुझे फिर धरातल पर ले आई ..

ये सब काल्पनिक था या वास्तव में इतिहास में ऐसा कभी हुआ होगा ज्ञात नही ...लेकिन जिस देश का राजा दोषी को तुरन्त दंड प्रदान करने में कदापि नही हिचकता ..जिस देश का नृप न्याय करते क्षण अपने कुल की गति को भी रोक दे ....वो देश क्या आज का ही भारत है ....?

काश सम्राट सुदर्शन आज जीवित होते ..तो मेरी बहन को भी न्याय और मुक्ति प्रदान करते ....अपितु यदि उनकी आत्मा ही आज मुझे देख और सुन रही है तो

" हे महाराज ! पुनः जन्म लो और न्याय करो  ..ताकि ये फूल सी मासूम बच्चियाँ अपना बचपन अपनी आयु अपने सपने जीने में किसी भेड़िये किसी जानवर की बुरी नजर की जद में न आये ...महाराज अपराध मुक्त करो ये भारतभूमि ...महाराज दोषियों का दलन करो "

जवाब मिल चुका था ...न्याय जहाँ त्वरित हो जहाँ दोषी की दशा  वीभत्स और भयानक हो वहाँ बेटीयाँ फिर राज और उसकी नीतियों का निर्वहन करती हैं  जैसे महाराज  सुदर्शन वेंकेटेश्वर  वेल्लुई की पुत्री ~

" राजकुमारी धरा "

नवाज़िश

By~
Junaid Royal Pathan