Sunday, 31 March 2019

सीटी अंकल

#सीटी_अंकल
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" पीछे..पीछे...चल आगे . काट ... रुक ...."

और फिर सीटी की कर्कश आवाज लेकिन सिर्फ उसके लिए जिसने इसे पहली बार सुना ...

मगर बचपन से सुनता आया हूँ इस आवाज को मैं इसलिए इससे सुरमई ..शाहनवाज ..दिलखुश चश्मई...सुंदर ..निरुपम और मनोहर आवाज मुझे फिर  कोई और नही लगती ...

हाँलाकि संगीत मेरी कमजोरी है ...मेरी माँ आरती सिंह सितार बजातीं हैं ...लेकिन मैं क्या करूँ इस सीटी को सुनते ही मेरी तबियत हरी हो जाती है ...   मेरे पिताजी  आई जी रिटायर्ड  हैं ...मैं अनिल  सिंह उम्र 23 साल ...

बचपन से एक नाता है रानीपुर से ...हाँलाकि मूल रूप से रहने वाला मैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश का हूँ लेकिन ये पहाड़ी जिला मुझे जन्नत से भी हसीन लगता है ...पापा को यहीं पर पहली नियुक्ति  जिला एस.पी के रूप में मिली थी ...पापा जिनका नेताओं के साथ अच्छा खासा उठना -बैठना था लेकिन मुझे ये कभी रास नही आया ....

मेरे पिताजी ..और मेरे मध्य बचपन से ही एक पर्दा था ..मेरा बचपन जहाँ लाड़ और शरारत माँगता था वहीँ पर मेरे पिताजी ने मुझे अनुशासन का कठोर चाबुक दिया ... माँ कभी पिताजी के खिलाफ इसलिए भी नही गई क्यूँकि वो खुद मुझे पैदा करके मेड के सहारे छोड़ संगीत कार्यक्रम ..मुशायरों में जाने से खुद को कभी न रोक सकी...

मेरा बचपन ..जब गीली मिट्टी में नंगे पैर चलना चाहता था तो मुझे कंक्रीट का फर्श मिला ..जब धूल उड़ाकर फिजा में नाचने का दिल किया तो मुझे मात्र पंखे के नीचे की हवा नसीब हुई ...जब अपनी उम्र संग खेलने को ललचाया तो मुझे समझाया गया कि मैं अपना स्टेट्स और पेरेंट की रेपो देखूँ ....

और भी ऐसा बहुत कुछ जिसको मेरी अबोल उम्र ने झेला ...इसलिए किताबों की दुनिया के पात्र ही मेरे दोस्त ...साथी और सगे बनते गए ....

मैं वास्तविक दुनिया को भी किताबों से समझने लगा ...लेकिन अक्सर बहुत गुस्सा आता था क्यूँकि मेरे रूम के जस्ट नीचे ट्रैफिक पॉइंट था जिसकी वजह से मुझे रोज अपने कानों में रुई डालकर अपनी स्टडी एन्ड रीडिंग करनी पड़ती थी ....

लेकिन जब एक दिन मैं जॉन मिल्टन की एक पोइट्री में खोया हुआ था और कल्पनाओं के जंगल में बहुत आगे निकल गया था तब मुझे जो ध्वनि मेरी मूल वास्तविकता में खींच कर लाई वो थी ......

एक विस्सल की आवाज ... यानी सीटी !

मैंने झट से कमरे की खिड़की से नीचे झाँका और पहली बार मेरी मुलाकात हुई ... नजीर अहमद से  ।

ट्रैफिक हवलदार नजीर अहमद ....मुझे बहुत गुस्सा आया कि अब इस पॉइंट पर एक सीटी वाला हवलदार भी खड़ा कर दिया गया है ...पहले ही गाड़ी-मोटरों की आवाज कम थी क्या ....?

उम्र के चौदहवें पड़ाव पर मैंने अपना बचपना प्रदर्शित किया और खिड़की खोल उस हवलदार को पुकारा -

" ऐ सीटी अंकल ...विस्सल मत बजाओ डिस्टर्ब होता है ....कल एग्जाम है मेरा ..."

हवलदार ने ऊपर देखा ..और झट से मुझे सेल्यूट किया ....और फिर दुबारा विस्सल बजाकर अपने काम में लग गया ....ये सब मेरे फादर भी देख और सुन रहे थे और तुरन्त उन्होंने अपने रूम से हवलदार को ऊपर आने को कहा....

हवलदार अपनी जगह से नही हिला और अपने काम में व्यस्त हो गया ...

पापा आग -बबूला होकर मॉर्निंग गाऊन में ही नीचे सड़क पर आ गए -

" क्यूँ बे ! साले बहरा है या चर्बी चढ़ गई है आँखों में ...जानता नही कौन हूँ मैं ..?"

" जय हिन्द साहब  ! आप जिला कप्तान साहब हैं ..वो कोई रिलीवर नही था साहब मेरी जगह ..और मेरे साहब ने ऑर्डर दिया था कि बिना रिलीवर पोस्ट मत छोड़ना "

" कौन है तेरा साहब ...?"

" इंस्पेक्टर निर्मल चौधरी साहब !"

" मादरजात ..इंस्पेक्टर और एस.पी के रुबाब और ओहदे में कोई अंतर नही समझता ...रुक अभी ! "

मुझे नजीर अहमद फिर तीन महीने तक उस पोस्ट में  दिखाई नही दिया ....वो सस्पेंड हो चुका था ...अब उसकी जगह बिना सीटी वाला एक ट्रैफिक हवलदार मेरी खिड़की के नीचे खड़ा होता था जो पोस्ट में कम और हमारे घर के कामों और पापा की जी हुजूरी में जियादह ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ था .....

पापा का ट्रांसफर हो गया ...और हम सब एक जन्नत से पहाड़ी  जिले से निकलकर तराई में शिफ्ट हुए ...यहाँ हर तरफ सीटी ..कोलाहल ..आवाजें और धुंवा था ....और जब धुंवा हटा तो फिर मुझे नजर आया वो धूप से बिलकुल झुलसा और स्याह चेहरा जो अकेला ट्रैफिक से लोहा ले रहा रहा था ...जिसके गले की नसें पानी माँग रही थीं और हिलते कदम कुछ देर का आराम ...

" पापा वो देखो सीटी अंकल !"

" अनिल जस्ट शटअप ...मिरर ऊपर करो सन लाईट स्किन डिजीज़ करेगी "

पता नही क्यूँ आँख से आसूँ गिर गया ...वो भी तो धूप में खड़ा है ..बिलकुल न्यूड धूप में ..क्या उसका कोई पापा नही ..क्या उस बेचारे को कोई आराम नही ..तभी पापा की गाड़ी उस हवलदार के सामने रुकी -

" जय हिन्द साहब ! "

" क्यूँ बे तू यहाँ ...? पोस्ट पर मुश्तैद बने रहना वरना इस बार लम्बा घर भेजूँगा समझा "

उसने मुस्कुराह कर जी साहब बोला ...और अपने काम पर लग गया लेकिन पता चला आज अपने पिता की निर्दयता का शिखर .. माना सॉरी नही भी बोल सकते थे तो कम से कम मीठा तो बोल जाते .....

अगले दिन सन्डे था ...पापा एक आपात मीटिंग में दिल्ली गए हुए थे और मेरी ममा उनके साथ ...मैंने मेड को चुपचाप अपनी पॉकेट मनी से कुछ पैसे दिये और कहा कि वो मुझे बाजार घुमा कर लाये ...वो नही मानी लेकिन जब मैंने उनसे बहुत रिक्वेस्ट की तो वो मान गई ....पुलिस महकमे का एक ड्राईवर आया और वो भी एक थाने की पुलिस वैन लेकर ....

मुझे अटपटा लगा कि यदि अपराधी का पीछा करने की बात हुई तो किस गाड़ी से पीछा किया जाएगा खैर हम बाजार में जब उसी ट्रैफिक पॉइंट के पास से गुजरे तो ....मैंने जीप रुकते ही आव देखा न ताव ..और उस हवलदार के पास पहुँच गया -

" सॉरी सीटी अंकल ...उस दिन के लिए भी ...और कल पापा के मिसबिहेव के लिए भी "

धूल चढ़ी पलकों और कालिख खाये होंठों पर उन्होंने थिरकन दी और मुझे झट पहचान गये ...और बोले -

" बाबा ...कोई बात नही .मैं भी सॉरी बोलता हूँ उस दिन सीटी से आपको डिस्टर्ब हुआ ...लेकिन आपका इम्तिहान कैसा रहा ...?"

" इम्तिहान मतलब ...?"

" ओह्ह्ह एग्जाम ..!"

" फर्स्ट क्लास सीटी अंकल ..नाऊ फ्रेंड .."

सीटी अंकल के हाथ कँपकपाने लगे ..लेकिन उन्होंने मेरे सर पर हाथ रखा और बोले -

" अल्लाह तुम्हे मेरी भी उम्र दे बेटा ...तुम बहुत नेक मासूम हो ...अब जाओ ट्रैफिक खुलने वाला है "

उस दिन के बाद मेरा और सीटी अंकल का एक रूहानी रिश्ता बन गया ...वो जब भी मुझे देखते मैं स्माइल करता ..वो हाथ हिलाते तो मैं सीटी बजाने को बोलता ...वो खिलखिला कर हँसते और सीटी बजाते ...वक्त निकलता गया और मैं दिल्ली चल दिया .. सिविल सर्विस की कोचिंग के लिए ...आई .पी . एस कैडर गेन किया और फिर असोम पोस्टेड हो गया ...शादी हुई बच्चे हुए और पापा का रिटायरमैंट भी ....

अगली पोस्टिंग रानीपुर हुई वही पहाड़ी जिला जहाँ मेरा जन्म हुआ था ....पूरे परिवार संग शिफ्ट हुआ ...

अगले दिन प्रदेश के मुख्यमन्त्री की चुनावी रैली थी ...और मैं चाक चौबन्द .. मुख्यमन्त्री के सभा स्थल में मेरी ड्यूटी थी तभी वायरलैस सेट पर मुझे खबर मिली की मुख्यमन्त्री की गाड़ी ट्रैफिक में फँस गई हैं ....मैंने आनन -फानन में अपनी गाड़ी को ट्रैफिक पॉइंट को रवाना किया ....मेरे पिता मुख्यमन्त्री के साथ थे ...क्यूँकि वो अब राजनीति में आने को नेताओं की जी हुजूरी में मुब्तिला  थे ....

" हरामजादे तू अब तक जिन्दा है ...तुझ जैसा कामचोर ..निठल्ला ..घामड़ मैंने अपने पूरे सेवाकाल में नही देखा ...आज तेरी लम्बी छुट्टी करवाता हूँ ..."

मुख्यमन्त्री भी अंदर गाड़ी में दाँत पीस रहे थे .....मेरी तरफ उस ट्रैफिक वाले की पीठ थी और मैं गाड़ी से उतरकर  भाग कर उसकी जानिब बढ़ा .....

जैसे ही मैंने उसका चेहरा देखा फिर मानो ऐसा लगा जैसे पूरा ट्रैफिक में भूल गया ...हर जज्बात ...हर बात...हर जिम्मेदारी ..हर ओहदा और हर कर्म ....उसने मुझे देख के काँपते हुए सैल्यूट बनाया ..उसकी आँख का चश्मा उसकी नाक से नीचे गिरने लगा ...मैंने हाथ आगे बढ़ाया वो पीछे बढ़ा ..फिर लड़खड़ाया उसके जूते का  फीता खुला था ...मैंने अपने घुटनों पर बैठकर पहले उसका फ़ीता बाँधा फिर न जाने क्यूँ उसको सैल्यूट बना दिया ...ये प्रोटोकॉल के खिलाफ था ...लेकिन मैं खुद में नही था ...

पापा शर्म से गड़े जा रहे थे ...लेकिन मेरी दशा शर्म की नही फक्र की थी ...वो सीटी अंकल जो दुनिया में बिलकुल अकेला था ..एक दिन उसी ने मुझे बताया था ...जिसका रिटायरमेंट बिलकुल पास खड़ा था ...जिसने कर्म से बढ़कर कभी किसी की जी हुजूरी नही की ...वो बुझी आँखों को फैलाकर मुझे पहचान गया ....और अब प्रोटोकाल उसने तोड़ा और मेरे गले से लगकर फूट-फूट कर रोने लगा ....ट्रैफिक तो कोतवाल और सी .ओ सिटी ने खुलवा दिया ..लेकिन मेरे पिता आवाक् थे ...और मुख्यमन्त्री खफा ...लेकिन जो आम जनता इन्हें अपना नेता बनाती है ...वो आम जनता जिनके बीच से निकलर एक अफसर उन्ही पर रौब चलाता है उसने तालियों की बौछार से हमें नहला दिया ....आम पुलिस का साधारण छोटा कर्मचारी आँखों में आँसू ले आया ....और मैंने हौले से सीटी अंकल के कानों में कहा -

" एक बार सीटी तो बजा दो सीटी अंकल ! "

बदले में कोई प्रतिक्रिया नही आई ....सीटी अंकल की लटकी हुई सीटी जरूर हिल रही थी लेकिन दिल, में कोई हलचल नही थी ....मैं समझ चुका था वो जा चुके हैं ...मैंने वहीं उनको अपनी गोद में लेटाया ...और जी भर कर रोया ....जब एम्बुलेंस आई तो मैंने सीटी अंकल के जेब में कुछ कागजात देखे ...उन्हें पोल्युसन से कैन्सर हो गया था ...दिन -रात बिना ठहरे , बिना मास्क के अपनी ड्यूटी अदा करता वो भी बिना जी हुजूरी के ऐसा इंसान अब नही बनता ...लेकिन मैंने आँख पोंछी और जब सीटी अंकल को आखरी बार एम्बुलैंस में देखा ....तो उनके कन्धे का इक इकलौता  सितारा ऐसा चमक रहा था जैसे ईमानदारी का कोई आखरी सूरज अपनी चमक बिखेर कर अस्त होने चला हो .....

मैं एस.पी  अनिल सिंह इस घटना के बाद देश के हर घर-घर जाना जाने लगा ...सबका चहेता और लाडला बनकर.. लेकिन मेरा आदर्श वो सीटी अंकल आज भी मेरे ड्राइंग रूम में अपनी तस्वीर के माध्यम से मुझसे बात करता है....और शायद ही कोई यकीन करें मैंने अक्सर उनकी सीटी की आवाज अपने कानों में गिरती  सुनी है ...

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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