#इश्क_ऑन_बस_स्टॉप
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हाँलाकि दुनिया मुझे एक सड़कछाप लेखक समझती है लेकिन अगला बुकर मेरा है ....ये नासमझ दुनिया वाले नही जानते ...नरेश चौधरी उर्फ़ ' आग ' नाम है मेरा ...उम्र 40 के पार ..और रंग गुड़ पापड़ी की सोंधी सिकाई वाला ....मैं अपना तआरुफ़ इसलिए जल्दी बाजी में दे रहा हूँ क्यूँकि अब जो कहानी मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ ...वो कहानी ..कहानी न होकर एक मकड़जाल है ...जिसमें मेरी मनहूस किस्मत ने मुझे भी उसका एक अप्रत्यक्ष पात्र बना दिया ....
दिल्ली की एक सुबह सर्द मद्धम हवाओं के मध्य उड़ते कोहरे के छँटते ही मुझे नजर आये दो इंसान एक नर और एक मादा ...
नर की उम्र तकरीबन कोई 40 से 42 के मध्य और मादा यही कोई 35 साल पहने हुए ...
मैं हाथ में अख़बार लिए हुए जब उनके और करीब पहुँचा तो दोनों बल्लीमारान की बस का वेट कर रहे थे ...
बल्लीमारान यानि मेरे मुँह बोले चचा " ग़ालिब " की कलम ए आशनाई की जमीन ....
" आज लगता है बस कुछ लेट है ..?"
" जी मुझे भी लगता है ! "
" आप कॉलेज कर रहीं हैं ..? "
" जी बी .ए फर्स्ट इयर "
" जी मैं भी बी. कॉम सेकंड इयर ..."
घण्टा इतना कर्रा और घिनौना झूठ ...साले उम्र की जिस पिच पर खड़े हैं वहाँ से दो दशक पूर्व की फेक बॉल फेंक रहें हैं ।।
" जी आपका गुड नेम ..?"
" डौली ! "
" मैं राकेश श्रीवास्तव ..नाइस नेम एन्ड नाइस टू मीट यू "
" सेम हियर !"
तभी बस आती है और एक महिला बस से चिल्लाती है !
" अरे नीरजा चल जल्दी आ सीट घेर रखी है !"
मैंने इधर -उधर टाप के देखा हम तीन जनों के इतर उधर कोई नही था ...एक मिनट दो जन के इतर क्यूँकि वो पुरुष अर्थात राकेश कुमार अब वहाँ नही था !
वो महिला फिर चिल्लाती है और मेरे साथ खड़ी महिला अर्थात डौली उसे हाथ हिलाकर बोलती है
" आ रही हूँ बाबा ! "
ये मेरे लिए आज सुबह का एक और बड़ा शॉक था ...साला अभी डॉली बता रही थी अपना नाम जब लौंडिया बनी हुई फेंक रही थी ...जाना तो था मुझे चाँदनी चौक लेकिन मेरे अंदर का एक गिलमिलाया लेखक मुझे डौली ..यानि नीरजा यानि लौंडिया ...इसकी माँ का पता नही क्यूँ उस फेंकूँ औरत के पीछे बस चढ़ने को मजबूर कर बैठा ...
" क्यूँ जी ! किस्से गप्पे लड़ा रही थी ...मेरी तरफ पीठ थी उस जेंटलमैन की इसलिए पहचान नही पाई ..बता न कौन था ..?"
" कोई नही यार ..बस की आवाजाही की इंफॉर्मेशन ले रहा था बस ..."
" ओके और बता भाईसाहब कैसे हैं ? ...सरिता कह रही थी तुम नेक्स्ट मन्थ इजिप्ट जाने वाले हो ...?"
" हाँ यार ...बस प्लान बन गया है ..."
" मतलब फिर हनीमून ..वो भी शादी के 15 साल बाद ..."
दोनों ठहाके से हँसे लेकिन मेरी अक्ल दीपावली के उस घनचक्कर की भाँति हो गई जो आग पकड़ते ही उल्टा हो जाता है ...
खैर बात आई -गई हो गई और फिर अगले दिन की सुबह ने आँख खोली ...और फिर अख़बार लिए मैं बस पकड़ने आगे बढ़ा तभी -
" ओ हाय ..डौली जी ..."
" हैलो राकेश जी ...कल अचानक से आप कहाँ चले गये थे ..?"
" जी बस एक काम याद आ गया था ..कॉलेज जा रहीं हैं ...?"
" जी ! और आप ..?"
" आज हमारे कॉलेज में इलेक्शन वोटिंग है .. आई हेट पॉलटिक्स सो ऐसे ही सोचा आज दिल्ली घूम लूँ "
" वोटिंग तो हमारे कॉलेज में भी है ...और बिलीव मी आई एम आल्सो हेट पॉलटिक्स "
" वाओ ..सेम थिंकिंग ...तो चलिए फिर आज दिल्ली घूमते हैं ...इफ यू डोंट माइंड ..."
" हूं..हूं . ओके ! "
ये अपने प्रेम की मोमबत्ती जला रहे थे या मेरे दिमाग की सुलगा रहे थे ...साले इतने बड़े झूठे आज तलक नही मिले और मिले तो दोनों एक साथ ...मेरी दादी गप्पियों की कहानी सुनाती थी लेकिन ये महागप्पी उन सबसे आगे हैं ...जो मेरी ही तरह अच्छी तरह जानते हैं कि दोनों एक दूसरे के सामने फेंक रहें है ...खैर मेरी जगह कोई मुर्दा भी ये सब देख -सुन लेता तो श्मशान या कब्रिस्तान में राख या खाक होने से पहले इनका पीछा करता ...
पहले ये क़ुतुब मीनार गए ..वहाँ इनकी मुहब्बत का पहला अध्याय जवां हुआ ..फिर हुमायूं के मकबरे ..जहाँ इन्होंने एक दूसरे का हाथ पकड़ा ..फिर जहाँ -जहाँ ये घूमते -फिरते मुहब्बत और गाढ़ी होती ...शाम के सूरज का बदन जब छिपने लगा तो ये एक दूसरे की बाँहों में थे ....
ये कैसे मुमकिन है और कैसे मयस्सर ...मतलब ये सब नामुमकिन है ...ऐसा कहीं किसी लव स्टोरी में नही होता ...जबकि ये लव है ही नही ...ये सब तो झूठ की जमीन पर फैला एक रायता भर है ...
उस रात मैं सिर्फ सिगरेट पीता रहा ...रम की दो बोटल खलाश कर दी ..सारा गुस्सा कागजों पर निकाला और डस्ट बिन के पेट को कागजों के निवाले से बदहजमी कराने के बाद भी मुझे मुठ्ठी भर नींद मयस्सर नह हुई ....अगली सुबह का बेसब्री से इन्तजार था कि आखिर अब आगे क्या होगा ...
रात की आखरी साँस टूटने से पहले मैं बस स्टॉप पर जा पहुँचा ...
कुछ 20 मिनट के इन्तेजार के बाद गप्पी नम्बर वन और टू भी आ गए ...लेकिन मुझे ये ज्ञात नही कि इनमें नम्बर वन कौन और नम्बर टू कौन है ...? खैर -
" सॉरी राकेश अब हम नही मिल सकते ...मेरी शादी पक्की हो गई '
बहुत जोर की खाँसी आई मुझे और पूरा गला भर गया ...कल कुतुबमीनार के पीछू ये ही बोल रही थी कि शादी तो तब करूँगी जब अपने पैरों पर खड़ी हो जाऊँ ...तो क्या अब अपने पैरों पर खड़ी हो गई है तो फिर कल क्या फिर ये आर्टिफिशयल पैरों से दिल्ली में भसड़ रौंद रही थी ....
" डौली मैं अब तुम्हारे बिना नही जी सकता हमारे प्यार को आज पूरे पाँच साल हो गए और अब तुम मेरे लिए मेरी मुहब्बत से ज्यादा मेरी एक आदत ..मेरा एक जूनून बन गई हो ...."
" तो मुझे हमेशा के लिए अपना बना लो राकेश ...मैं भी तुम्हारे बिना नही जी सकती ...मुझे ले चलो राकेश "
इनकी माँ का ..ता था .थैय्या ..इनके बाप का हो गया भैया ...साले दो दिन पहले मिले और आज पाँच साल पूरे हो गए ...कल बड़ी मुश्किल से पौने दो पर हाथ पकड़ा और सवा चार पर गले लगे और आज मुझे ले चलो ..तुम जूनून ..तुम लोटा ..तुम लस्सन ....
खैर ...
" तो चलो डौली ...आओ बस आ गई है ...चलो कहीं दूर चलते हैं..."
वो दोनों बस पर चढ़े और उनको देखकर कुछ देर के लिए तो मैं भी इमोशनल हो गया ...लेकिन जब चूतियापा टूटा तो मैं भी बस पर चढ़ गया....
सीट खाली होने के बावजूद भी उनके पीछे खड़ा हो गया ...उन दोनों के चेहरे में एक युवा प्रेम जोश था ..और प्रेम की एक जीत का हकीकी सच ...वो दोनों किसी और दुनिया में थे ...
उन दोनों को देखकर लगता ही नही था कि ये दोनों ढोंग कर रहें हैं...इतना दमकता विश्वास असम्भव था दो दिन के प्यार और मुलाकात में ...मैनें सोचा जाने दो ..शायद बहुत दूर चले जायेंगे ....लेकिन मुझे तो उतरना ही था ....अगले स्टॉप के बाद मेरा पड़ाव था तभी बस रुकी और वो जोड़ा उतर गया ...खट से मैंने सोचा शायद किश्तों में सफर तोड़ -तोड़ कर पूरा करेंगे ...मैं भी उनके पीछे उतर गया ..मैंने सोचा शायद अब कोई टैक्सी पकड़ेंगे लेकिन वो तो चलने लगे ...और मैं भी उनके पीछे हो लिया ...तभी
" देखो डौली आज हम दिल्ली को छोड़ आये ...आज हम इतने दूर निकल आयें हैं जहाँ पर कोई भी हमें न पहचानता हैं और न कोई हमपर बन्दिश लगाने वाला न कोई आवाज उठाने वाला ..."
दोनों ने एक दूसरे को हग किया और फिर डौली बोली -
" अच्छा राकेश अब चलती हूँ ..सुमित आज बैंगलोर से आने वाले हैं ... मुझे जाना होगा..."
" थैंक्स डौली ! "
"थैंक्स मत बोलो यार ...मुहब्बत जीत गई बस ये ही काफी और मुकम्मल है "
जैसे ही दोनों एक दूसरे से विदा लेने लगे ...मुझ सूखी डाल पर बैठे उल्लू की गिल्लियाँ गिरने लगी ...मैंने सीधे उनके पास जाकर घुटनों के बल बैठकर बड़ी अकीदत से उन दोनों से अर्ज किया -
" तुम दोनों जो भी हो ...उसकी जले लंका ..बस मुझे इतना बता दो कि आखिर ये सब चक्कर क्या है ...तीन दिन और दो रातों को मेरी राख कर चुके हो तुम ...घण्टा तुमसे बड़ा फेंकूँ न ही कभी देखा न कभी सुना ...ये सब क्या ड्रामा है ...तीन दिन से पीछा कर रहा हूँ तुम्हारा ...वो भूतनी का कौनसा हाथी का हिलोरा कॉलेज है जहाँ तुम इस उम्र में लौंडे -लौंडिया बनकर पढ़ते हो...और वो कौन सी शक्ति है जिससे तुम इतनी बकलोली करके दूसरे के दिमाग का बलत्कार कर सकते हो बोलो वरना मैं यहीं अपनी जान दे दूँगा या फिर मैं पागल हो जाऊँगा ...बताओ क्या है ये सब कुछ ...?"
वो दोनों सकपका गए ...और फिर एक दूसरे को देखकर आपस में आँखों में बात करकर ..एक सहमति लेकर राकेश बोला -
" दरअसल ये मिसेज सुमित श्रीवास्तव हैं ...इनका पति एक बिजनेस मैन है ...इनके दो बच्चे हैं ...और मेरे भी एक लड़का और एक लड़की ....मैं एक कम्पनी में काम करता हूँ ...लेकिन आज से तकरीबन कई साल पहले ऐसा कुछ नही था ..."
फिर डौली बोली -
" हमारी मुलाकत इसी बस स्टॉप पर हुई थी ..जब हम दोनों कॉलेज में पढ़ते थे..एक छोटी सी मुलाकत जो धीरे-धीरे प्यार में बदल गई ...पूरे पाँच साल हम प्यार में रहे ..लेकिन मेरे घर वालों को जब पता चला तो उन्होंने मेरी शादी पक्की करा दी ...और मैं जब आखरी बार राकेश से मिली और उस को कहा कि मुझे कहीं दूर ले जाओ तो ...अचानक मेरे भाई आ गए और राकेश को बहुत पीटा ...और हमारा प्यार जिस बस स्टॉप पर जवां हुआ उसी में दफ्न होकर रह गया ....हम दोनों एक दूसरे के साथ भागने को तैयार थे ...और अपने इश्क को एक मंजिल देने वाले थे ....."
इतना कहते ही डौली फूट-फूट कर रोने लगी ...तो मंच सम्हाला राकेश ने
" तीन नही चार दिन पहले हम अचानक से एक रेस्त्रां में मिले और मिलकर एहसास हुआ कि हम आज भी एक दूसरे से इश्क करतें है ...एक दूसरे को अब तक नही भूल पाये हैं ...लेकिन अब कुछ नही हो सकता ...क्यूँकि अब हम तन्हा नही बल्कि कई जिंदगियाँ हमारे साथ जुड़ी हैं लेकिन इतना तो हमारे हाथ में था कि जो इश्क जिस बस स्टॉप पर बेमुकम्मल और लहू से लाल हुआ ...उसे पूरा करें ...और एहसास कमाये कि हमनें इश्क करके उसे मुकम्मल कर दिया ...हमारे पास सिर्फ तीन दिन थे क्यूँकि आज डौली के हसबैंड आने वाले हैं....इसलिए सब कुछ जल्दी में होता रहा ..जो आपने देखा और जो सुना ....."
सब समझ गया मैं ....आज हाँलाकि जब भीड़ तालियाँ बजा रही है और मेरे हाथ में बुकर अवार्ड है ...तो फिर भी दिल में एक बैचैनी एक मायूसी है कि काश जिन दो इश्क करने वालों की कहानी लिखकर मैंने ये तमगा हासिल किया काश कोई ये सब कुछ मुझसे छीन कर वो दौर वापस लौटा देता कि जब इन दोनों की आखरी मुलाकत हुई थी ...काश कोई इन्हें सकुशल उस बस पर चढ़ा देता ...काश ये दुनिया से दूर निकल जाते ...काश इनका इश्क एक मुकम्मल रिश्ते की शक्ल ओढ़ लेता ...काश मुझे ये कहानी फिर कोई न सुनाता ...काश आज राकेश और डौली यूँ जल्दीबाजी में इश्क मुकम्मल करके अपने -अपने हिस्से का इश्क बिछड़ कर अदा नही करते .....खैर तालियाँ फिर बजी और मैंने आँखों की नमी साफ़ करके आवाम से कहा -
" नवाजिश "
Junaid Royal Pathan
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