#रेशमी_डोर
***********
" मतलब ..अपने से 25 साल छोटी ..वो भी नाबालिग ..और वो भी अपनी ही स्टूडेंट से प्यार ..मतलब आपके होश तो
दुरुस्त हैं न ?......शर्म्मम्म
शर्म तो मुझे आखरी बार तब आई थी जब नीलिमा ने मुझसे कहा था कि सर आप पर ये ब्लू जैकेट बहुत अच्छी लग रही है ...
मन ही मन मुस्काया था ,,विद्यालय में सबसे रौबीला नाम और व्यक्तित्व है मेरा ..." रंजन सुमेर सिंह " प्रवक्ता हिंदी ।
मेरा और हिंदी का मिजाज ही बेमेल है ,,हिंदी का मतलब रोमेन्स , फीलिंग , एक्शन, ड्रामा एक्स्ट्रा ...
बाबूजी के देहांत के बाद ..मैं आर्ट का विद्यार्थी हो गया ,, क्यूँकि बाबूजी अपने दौर के खग्गाड़ एम .एस . सी गोल्ड मेडलिस्ट थे ...और मुझे बाबूजी के इतर फिर कभी किसी का विज्ञान समझ न आया ... बाबूजी जीवन में सिर्फ शिक्षक बनना चाहते थे ..वजह मेरे दादा भी शिक्षक थे ...और कई अन्य सगे संबंधी भी ,,, लेकिन मैं कभी भी मास्टर नही बनना चाहता था ..लेकिन फिर कोई मुझसे पूछे कि आखिर आप क्या बनना चाहते थे तो मेरे
पास फिर कोई जवाब ही नही ....
लेकिन मास्टर तो हरगिज नही ..मेरी सोच है कि मास्टर बनते ही हमें जबरन की नैतिकता को ओढ़ना पड़ता है चाहे फिर हमनें पूरे कपड़े पहने हो या फिर गर्मी का ही मौसम क्यूँ न हो ....
समाज में और किसी भी पद पर कार्यरत् व्यक्ति कुछ भी करे लेकिन मास्टर उसी सीधी रेखा का अनुयायी है जिसको उसके पूर्वज उनके निमित्त उत्तराधिकार में खींच गये हैं....और यदि इस उत्तराधिकार का जुँआ कभी उतार कर फेंक भी दूँ तो गुरु ...ब्रह्मा के श्लोक मास्टर को ही भगवान से ऊँचा कर मास्टर की जुबान , किरदार और जज्बात को उससे खींच लेते हैं ... और यही भगवान से ऊँचा कभी कोई चूक कर जाए तो उसी तथाकथित ईश के चरित्र का सामूहिक गैंग -बैंग भी कर देते हैं ...
आजाद हूँ मैं ..अपने विचारों ..अपनी जीवन शैली और अपने उस प्रत्येक कर्म के लिए जिसके लिए सरकार मुझे मेहनताना नही देती ....
इसलिये कट चुका हूँ समाज के उस हर एक खोखले और बनावटी जीव से जो बिलकुल मेरी तरह है ...सोचता भी वही है ..लेकिन कहने और कहलवाने में संकोच करता है ....
विद्यालय में एक अलग छवि है मेरी ..मेरे संगी मास्टरों ने मेरे चरित्र को बच्चों के सामने इस प्रकार प्रस्तुत किया है जैसे मैं कोई गैर प्लेनेट का जीव हूँ ,,,
जो मेहनताना सरकार इनको विद्यार्थी जीवन के विकास हेतु सौंपती है ..ये स्वयंभू नैतिक ईश उसको मेरी निंदा और गॉसिप के कर्मकांड के बाद ही ग्रहण करना स्वीकारते हैं ...
जिस गीता ,,कुरआन के दर्प पर ये स्वयं को सनातनी और एकेश्वरवादी कहकर अपनी खाल खुजाते है मैंने इन सब किताबों और भावों का अध्धयन किया है और कहीं भी मुझे ये नही मिला कि " प्रेम " करने हेतु कोई नियम ..कोई पाबन्दी ..कोई उम्र ...या कोई पद का होना या न होना आवश्यक है ।।
खैर विद्यालय का एक -एक छात्र मुझसे किनारा करता है .. मेरे विषय में हाँलाकि प्रचुर रोचकता है लेकिन मुझे उसे परोसना नही आता इसलिए शायद मेरी कक्षा अक्सर बाँझ रहती है ....
अविवाहित हूँ और उम्र यही कोई 40 -42 के आस -पास गिरती है ....
समूल विद्यालय परिवार जब उस दिन 15 अगस्त के सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ़ ले रहा था ...उस दौर मैं एक कक्षा में अपनी हाजरी रजिस्टर का जायजा ले रहा था ...या जबरदस्ती खुद को खुद की नजर में व्यस्त दिखा रहा था ...ताकि मुझे ये एहसास न हो कि मैं अलग-थलग और एकाकी सा हो गया हूँ ....
सामने स्वामी विवेकानंद की तस्वीर मुझे संबल दे रही थी और ऊर्जा से रिसता विश्वास भी कि अकेला ही इतिहास बनाता और बिगाड़ता है ...
चारों तरफ बारिश की रिमझिम छींटें ..और नमी से नहाईं भीनी ठण्डी हवायें ...तभी
" मैं आई कम इन सर ...?"
" हाँ ...आओ !"
" हैप्पी इंडिपेंडेंस डे सर ..."
" तुम्हे भी आजादी मुबारक हो !"
और मैं अपने काम में फिर व्यस्त हो गया ...लेकिन वो साया अब भी वहीँ मौजूद था ...
" हाँ ...कुछ काम ..?"
" नो ..नो सर ! सर ये ब्लू जैकेट आप पर बहुत अच्छी लग रही है ...हैंडसम लग रहे हैं सर "
और इतना कहकर वो लड़की सीधे ..खिलखिलाते हुए फरार हो गई ...मैं सन्न सा रह गया ..और हाथों में कँपकपी चढ़ने लगी ,,, होश लौटा तो तुरन्त मैं भी कक्षा से बाहर निकला लेकिन वो जा चुकी थी ...अपने पूरे शिक्षक जीवन या यूँ कहूँ कि पूरे जीवन में मुझे किसी ने ऐसा कॉम्प्लीमेंट नही दिया ...वो लड़की न मेरे रौब से घबराई न मेरे मौजूदगी से बस अपने मन की कही और उड़ चली ....
लेकिन छोड़ गई एक सवाल जिसका जवाब ढूँढने मुझे न चाहकर भी उस हॉल में जाना पड़ा जहाँ मुझे वो मिल सकती थी ...सब शिक्षकों की नजर मुझ पर थी और मैं जिसे खोज रहा था वो अपनी हमउम्र लड़की के पीछे से महज आधा चेहरा लिए मुझे घूर रही थी ...इस बार उसके चेहरे में डर था उसको लगा शायद मैं उसकी कम्प्लेन प्रिंसिपल से कर सकता हूँ ...लेकिन फिर उसने मुझे देख आँख झपकाई और सॉरी कहा ...मैं उसे देखता ही रह गया ...दो झूलती चोटी में सुर्ख सफक सी दो आँखें मुझे खुद से बाहर खींच रही थी ...अचानक मंच की प्रस्तुति का समापन हुआ और तालियाँ बजने लगी ...और मेरा ध्यान बंटा ...फिर मैंने उस लड़की को देखा तो वो वहाँ मौजूद नही थी ....
रात -भर या यूँ कहूँ इस पल के बाद फिर उस रात मैं सो न सका ...अगले दिन रविवार गिरता था ..तो पूरा रविवार उस रवि की सुनहरी किरण के ख्वाब और ख्याल में बीत गया ....
न चाहते हुये भी क्यूँ आज तबियत से आईना देखा ...और नजर आये सर पर सफेदी के साये ...आँखों के नीचे चश्मे के गहरे काले दाग ..और चेहरे पर रेगिस्तानी खुश्की के निशान ...
खुद के अक्स से घृणा से हुई तो सीधे नदीम भाई की दुकान पर पहुँचा और उनसे हिचकिचाते हुए बोला -
" नदीम भाई ..लौंडा बना दो यार ! "
बहुत जज्बाती आदमी है नदीम भाई ..बहुत खुश हुए क्यूँकि मेरे जीवन में सिर्फ वो ही एक खास इंसान है जिन्हें मेरी कद्र और परवाह दोनों है ...
नदीम भाई ने मुझे दो घण्टे बाद ऐसा बना दिया कि मुझे खुद की शक्ल से मुहब्बत होने लगी ...लेकिन नदीम भाई जिस सवाल को अपनी जुबान पर ला -लाकर फिर पेट में गिरा देते उस सवाल का जवाब मेरे पास भी नही था ..
अगले दिन मेरा रूप और वेशभूषा पूरे विद्यालय का सबसे ज्वलन्त मुद्दा बन गया ...मध्यांतर में फिर कोई पीछे से बोला -
" सर बिलकुल फ़िल्मी हीरो लग रहें है "
" थैंक्यू ..सुनो ...सुनो... एएएएए ..."
वो फिर खिलखिलाकर दौड़ गई ...आखिर ये कौन लड़की थी जिसपर अब तक मेरी नजर न गिरी ...
" ए अमित इधर आओ ...ये लड़की जो अभी मुझसे बाते कर रही थी ...कौन है ये ..?"
" सर पगली है ये ...नीलिमा गुप्ता ...नई आई बाई स्कूल में "
वाकई में नीलम ही थी वो ..वो नीलम जिसकी कांति से एक ओखड़ एक मस्त मलंग बनने लगा था ....
क्लास हो या ...कोई भी पल मेरी नजर सिर्फ उसको पढ़ती सिर्फ उसको ढूंढ़ती और जब भी हम दोनों की आँखे मिलती वो मुस्कुराह कर मुझे जिन्दा कर देती ...
नदीम भाई खुश तो थे क्यूँकि मैं खुश था लेकिन उन्हें मेरी परवाह भी हो रही थी...
नीलिमा वो रेशमी डोर थी जो मेरे होंठों से खींचने और झलकने लगी थी ... मैं अब उसी में था या फिर उसी में गुमशुदा...
" रंजन भाई ..अल्लाह कसम एक पेट से नही उतरा आपके साथ लेकिन मानता अपना भाई ही हूँ आपको ....बताइये आखिर वो क्या वजह है जिसने आपको इतना हसीं और खुशगवार बना दिया ...कौन है वो खुशनसीब बानो जो मेरी भाभी बनकर मुझे भाई के लक़ब से नवाजेगी ..?"
" वो ...जीईईईई ..वो ..ऐसा तो कुछ भी नही है नदीम भाई ..!"
" मेरे सर पर हाथ रखकर कसम खाइये कि जो मैं सोच रहा हूँ वो गुनाह है "
" नीलिमा गुप्ता ..क्लास ट्वेल्व .."
"कय्य्य्य्या ..?"
" हाँ नदीम भाई ...मेरे ही स्कूल में पढ़ती है ..."
" मतलब ..अपने से 25 साल छोटी ..वो भी नाबालिग ..और वो भी अपनी ही स्टूडेंट से प्यार ..मतलब आपके होश तो दुरुस्त हैं न ...?"शर्म्मम्म........
नदीम भाई की दुकान पर ग्राहक आ गया और मैं बाहर निकल गया ...
मैं जानता था कोई इस प्यार को नही समझ पायेगा ..क्यूँकि मैं गुरु हूँ ..जिसे अपने मन से प्यार करने का भी हक नही ..जबकि भगवान को हक था कि वो इस धरती पर आकर प्रेम करें ...
लेकिन अब जो होगा होता रहे ...नीलिमा के अठरह की होते ही हम विवाह कर लेंगे ...ये एकतरफा फैसला था लेकिन मुझे यकीन था कि नीलिमा भी मुझपर मरती है ...और बेहद चाहती है मुझे ....
मैंने सोचा कल नीलिमा से मैं अपने मन की बात कहकर और उसकी सुनकर अपना इरादा दुनिया को जाहिर कर दूँगा ...
अगली सुबह मैं पहले से जियादह तैयार हुआ ...जीवन भर नास्तिक बना रहा मेरा वुजूद आज पहली बार रास्ते के एक मन्दिर पर ठहर गया ...हाँलाकि कुछ माँगा नही भगवान से मैंने लेकिन फिर भी हल्के से जुरूर कहा कि मेरी मदद करना !
जैसे ही मैं विद्यालय पहुँचा मुझे नीलिमा सामने खड़ी दिखी ....
वो मेरी तरफ दौड़ते हुए आई ...लेकिन ये मेरा भ्रम था क्यूँकि मेरे और उसके बीच में मिस्टर अवस्थी प्रवक्ता विज्ञान खड़े थे ...
" ओओओ ...सर आप पर ये रेड कोट जँच रहा है ...हैंडसम लग रहें है सर "
वो फिर खिलखिलाकर दौड़ गई ....लेकिन इस बार वो मेरे अरमान ..मेरे सपने ..मेरी खुशियाँ सब साथ ले गई ....खड़े -खड़े टूटा मैं ..और इतना बिखरा कि फिर वापस विद्यालय लौटने में पूरे तीन माह लग गए ...और तब तलक नीलिमा पास होकर विद्यालय छोड़ चुकी थी ...
मैं नही जानता कि इन तीन महीनों में .. मैं अंतर्मुखी कितना पिघला और टपका लेकिन नदीम भाई सब जानते हैं ... मेरी फिर वही पुरानी सूरत और वेशभूषा उन्हें बता चुकी थी कि वाकई मैं गुरु और भगवान में कोई साम्य नही ...भगवान जो चाहे वो मुश्किल नही लेकिन गुरु जो इंसान पहले है उसकी चाहत और प्रेम उसे छू कर भी निकल जाए तो ये भी रब्ब की मर्जी ....
लेकिन आज भी वो पगली रेशमी डोर जब भी याद आती है तो खूँटे में चढ़ी मेरी नीली जैकेट मुझे देख मुस्कुराह कर बोलती है ...."नवाजिश"
Junaid Royal Pathan
No comments:
Post a Comment