#अ_रण्डी_वॉयस
****************
" साहब अगर हराम का ही खाना होता तो भीख नही माँग लेती ..... आइये साहब मेरी नंगी जवानी और रसीले अंग आपका गर्म बिस्तर पर इन्तेजार कर रहें हैं "
बिस्तर पर जैसे हजारों काँटे खड़े हो जाते हैं जब ये मेरे दादाजी के ज़माने की घड़ी का अलार्म बजता है ...वो भी प्रतिदिन करेक्ट साढ़े चार बजे ....
उसके बाद नित्य क्रिया ...थोड़ी जॉगिंग ..थोड़ा योगा ...ईश्वर से स्वर्गीय पिता के लिए स्वर्ग में विशेष स्थान ...
" माँ " भी मेरी भगवान को प्यारी हो गई ...लेकिन वो स्वर्गीय हो ही नही सकती क्यूँकि वो एक औरत तो थी लेकिन एक माँ और एक अच्छी इंसान तो हरगिज नही .. मेरे लिए वो जैसे कभी थी ही नही ... मतलब यदि आज मैं 50 वर्ष का होकर मात्र अविवाहित हूँ और इस पूरी दुनिया में बिलकुल अकेला हूँ तो उसकी वजह मेरी माँ है ....
मैं तब ही उस औरत को माँ कहता हूँ जब मुझे कोई लीगल डॉक्यूमेंट या कागज -पत्तर में अपनी माँ का नाम लिखना होता है ...अदरवाइज वो मेरी जुबान और सोच में हमेशा रण्डी थी ...रण्डी है ...और रण्डी रहेगी !
मेरे पिता को तिल -तिल मारती वो औरत ..जिसके लिए मेरे पिता ने अपनों से जंग लड़ी ..अपने सपनों को तबाह किया ... वो औरत जिसने मेरे सदाचारी पिता को शराबी बनाया ... और आखिर में एक अप्रत्यक्ष दल्ला !
दल्ला बनना सबके बस की बात नही ...इंसान जब अपना ईमान बेच देता है तो दल्ला बन जाता है ...लेकिन मेरे पिता ने कभी अपना स्वाभिमान नही बेचा ...जानता हूँ कि वो जानते थे कि उनकी पीठ पीछे उनका घर कोठा बन चुका है ...लेकिन कभी वो उस कोठे के इंचार्ज नही बने ...अपनी कई रस्मों के छोंके से ब्याहता को जब उन्होंने अपने ही बिस्तर पर पहली बार किसी गैर मर्द की नग्न बाँहों में देखा तो उस दिन के बाद फिर वो कभी उस रण्डी की बाँहों में न गये ....
वो चुप रहे क्यूँकि मैं शोर करने लगा था ... मैं पैदा ही नही हुआ बल्कि घुटनों भी चलने लगा था ....वो जानते थे कि मैं उस रण्डी के किसी भी आशिक का परिणाम हो सकता हूँ लेकिन वो तो सदा मेरा आरम्भ देखते थे ....
मुझसे अगाध स्नेह रखते थे ....इतना कि जब मैं 14 का हुआ तो मैंने देखा कि वो मेरी तस्वीर सामने रख के अपने बन्द अँधेरे कमरे में शराब पीते थे ....और फिर फूट-फूट कर रोते थे ....
हाँलाकि वो औरत तब तलक ही मेरी " माँ " रही जब तलक वो मेरी हर फरमाइश अपनी हराम की कमाई से पूरी करती थी ...और तब वो मेरी माँ से पुनः मेरे लिए एक रण्डी बन गई जब मुझे स्कूल आते-जाते लोग रण्डी की औलाद कहने लगे ...
उस दौर मेरी नाड़ियाँ बेलगाम हो जाती थी ...रक्त उनमें उबलने लगता था ...लेकिन अब जब मैं मान चुका हूँ कि मैं एक विशुद्ध रण्डी की औलाद हूँ तो अब खुद पर ज्यादा गुस्सा नही आता .....
लेकिन तब भर उठता हूँ ..घायल कर लेता हूँ खुद को जब ये सोचता हूँ कि मेरे मासूम पिता भी तो उन्ही सड़कों में चलते थे तो लोग उनको क्या कहते होंगे....
यही कि ..बीवी की कमाई खाता है ...भड़वा है तू ... हमारी भी सेटिंग करा दे ...नामर्द है तू !
बस !
तभी फोन की रिंग बजी ..
" अजय सर ! गुड मॉर्निंग ...इमिडेटली चीफ ने आपको ऑफिस बुलाया है ...उनके पास ये नम्बर नही था ...."
" बट टूडेज माय रेस्ट डे ..ओके ! आई एम कमिंग "
दिन के 11 बजे ऑफिस में !
" आई एम सो सॉरी अजय ! बट यू नो यू आर आवर बेस्ट जर्नलिस्ट ...माय मीन सो सिम्पल एण्ड पॉइंट इज डेट ..एक बहुत बड़ा कैम्पेन चला है इण्डिया में ...तुम जानते ही हो कि सेक्स वर्कर की घर वापसी का !"
" तो ..."
" तो मतलब क्या ...मतलब हम चाहते हैं कि तुम इस कैम्पेन में कुछ स्पेशल करो ...फॉर आवर चैनल एंड इट्स टी .आर. पी ..."
" सॉरी सर आई हेट रण्डी ..मतलब सेक्स वर्कर ...मैं नही कर सकता कुछ भी ...अविनाश इसमें बेहतर कोई रिपोर्ट... कोई बेहतर कवरेज दे सकता है ..."
" लेकिन इमोशन उसका क्या .."कौन दे सकता है तुम्हारे बिना ...? समझो अनिल वैसे ही हमारा चैनल बन्द होने की कगार पर है और ....मैं रात तलक तुम्हारे फोन का वेट करूँगा "
रात क्या दिन के हर ढलते पहर से मैंने खुद को शराब में डुबो लिया हर पहर बीतते हुए शराब मेरी नस-नस में घुलने लगी ...जिस रण्डी को मैं हर दिन भूलना -भूलाना चाहता हूँ वो रण्डी रह-रह कर किसी न किसी शक्ल में मुझे दीमक की तरह खोखला करती जा रही है ...
फोन की रिंग बजी ...और सर ने पूछा कि
" सो वाहट्स योर आंसर ..आर यू रेडी ...?"
मेरे जेहन में और जिस्म की हर एक हरारत में सिर्फ " न " ही उबल रहा था ...मगर पता नही पिताजी की तस्वीर सामने आते ही जुबान ने " हाँ " क्यूँ बोल दिया ....
इसका जवाब मुझे नही पता लेकिन मेरा अगला पड़ाव था .....दिल्ली मेट्रो सिटी " जीबी रोड " !
मैंने कोई क्रू साथ नही लिया ...एक कैमरा और मैं खुद ...दरअसल मैं चाहता क्या था ..मैं खुद नही जानता था लेकिन इतना तो तय था कि भारत का सबसे बड़ा सेक्स वर्कर हेवेन मुझे कुछ न कुछ देगा तो जरूर ....
मैं एक सर्द शाम के 5 बजे..जीबी रोड पहुँचा ...तभी -
" ए ..ए साहब ...ए लाल कोट..आता है क्या ..?"
" अमां इन्हें छोड़ो साहब कसम मालिक कि अभी ताजा सीलिंग माल पेश करवा सकता हूँ ...बस नस्ल बोलो ...?"
" मतलब ! "
" मतलब यहाँ हिंदुस्तान की नही बल्कि पड़ोसी मुल्कों की भी जनानियां है ..उफ्फ्फ तौबा मेरी ...जनानी नही लौंडियाएं और वो भी कच्ची उम्र की ही ही ही "
मैं आगे बढ़ा -
" ओये जेंटलमैन ..इधर ..ओये इधर ... "
" हूँ ...बोलो ...! "
" अगर 20 हजार देगा तो बिना कॉन्डोम के ....समझा "
बहुत तेजी से आगे बढ़ा ...ये शब्द हांलाकि आज भारत का वो हर बच्चा -बच्चा जानता जो टी .वी को देखता और समझता है लेकिन मेरे लिए ये सब सुनना और सहना नामुकिन हो रहा था ... मेरी रण्डियों के प्रति नफरत और गाढ़ी होने लगी ...कि तभी -
" कैमरा लेकर घूम रहा है ...क्या पोनोग्राफर है ...या फिर कोई इंटरनेशनल दल्ला ? "
" चुप कर साली रण्डी ! ...दो कौड़ी की तेरी औकात नही और मुझे दल्ला बोल रही है ...आई एम अ जेर्नेलिस्ट ...समझी "
" ओह्ह्ह ... मतलब पत्रकार ..तो क्यूँ मरवा रहा है ...यहाँ तो लोग मारने आते है ..."
" क्या मारने आते है ...वो और नामर्द होंगे जो यहाँ अपना ईमान तुम जैसी रण्डियों की अदाओं और जिस्म पर तिल -तिल मारते होंगे .... निलेश देशराज का खून बहता है मेरी रगों में समझी ....न लंगोट कच्चा हूँ न ईमान का "
आगे बढ़ता गया ...लेकिन कुछ समझ में न आया ...लेकिन इतना जान चुका था ये रण्डियाँ अभ्यस्त और पेशेवर हैं जो पैसे के लिए ही जीती और मरती हैं .....तभी
" साहब गलत सोचते हो तुम ...या सोच रहे हो ...."
" तुम यहाँ ...मेरा पीछा क्यूँ कर रही हो ...?"
" इसलिए कि आपको बता सकूँ कि महज 11 साल की थी ....नेपाल से अपने बाप के साथ आई थी यहाँ .....14 पूरे करते-करते 14 आदमी उतर गए मुझमें ...अब बताओ साहब क्या मैं पैदाइशी रण्डी थी ...? मेरा बाप दिन भर रस्सी -बोरा लेकर काम पर निकलता और समाज मेरे घर पर दाखिल होता ...दुपट्टा पहना ही नही कभी ...क्यूँकि जब छोटी थी तो वो खेलते वक्त पाँव में फँसता था और जब बड़ी हुई तो वो लोगों की नजरों में चुभता था ...बाप मेरा कितनों से लड़ता ...कहती थी उससे कि माँ के पास भेज दो यहाँ अच्छे लोग नही है ...लेकिन जब माँ के पास गई तो जिस्म खमीर की रोटी की तरह फूल चुका था ...और फिर हर तन्दूर पर वहाँ भी चढ़ती रही ....साहब एक आप जैसा साहब मिला था मुझे जब 16 की हुई ...बोलता था कि प्यार करता है मुझसे ...भाग चली उसके साथ ...10 दिन 9 रातें उसने मुझे बिस्तर पर रखा ..लेकिन वो सिन्दूर की डब्बी जो टेबल में रखी थी उसका ढक्कन तक न खोला ....माहवारी पर चल रही थी ...और दसवीं रात फिर जब किसी के खटखटाने पर दरवाजा खोला तो फिर मेरे लिए सब खुलता ही चला या ...हर दिन कभी दो तो कभी चार ....और जब पेट से हो गई ...तो फिर कोई नहीं आया ...अकेली थी तो हर मर्द सहारा देने चला आता ...पेट से हुई तो किसी ने तसल्ली भी नही दी ...यहाँ लगभग 4 हजार रण्डियाँ काम करती हैं ...और यकीन करें ...किसी को प्यार यहाँ लाया ...तो किसी को गरीबी ...किसी को कोई सगा ..तो किसी को कोई मजबूरी .... "
बड़ी देर तक खामोश रहा ...फिर यकायक ही सवाल पूछ बैठा -
" वो तुम्हारा बच्चा ...?"
" रण्डी की औलाद था साहब ...पैदा इसलिए नही किया कि कल बढ़ा होकर लोगों के फिकरे ताने न सुने ...कोई उसे रण्डी की औलाद न कहे ...उसके बाप का नाम न पूछे ...."
बस यही जवाब था जिसे सुनने के लिए जिन्दा था ..वो सवाल जिसे एक रण्डी मुझे पैदा करके छोड़ गई थी ..और जिसका जवाब भी एक एक रण्डी ने देकर मेरे जिंदगी भर की उलझन ..घुटन ..सबको फनाह कर दिया ....कुछ कहना चाहता था उससे लेकिन न जाने जेब में हाथ क्यूँ चला गया -
" साहब अगर हराम का ही खाना होता तो भीख नही माँग लेती ..... आइये साहब मेरी नंगी जवानी और रसीले अंग आपका गर्म बिस्तर पर इन्तेजार कर रहें हैं "
" ....साथ चलोगी मेरे ...हाँलाकि ये सबने कहा होगा लेकिन यकीन करो मेरा ... एक रण्डी की औलाद का "
आँख में कुछ चुभा उसके ...और कुछ छलकी भी वो ...
" साहब ! मुझे पता नही कि आप कौन है ...पढ़े -लिखे दिखते हैं ..समझदार भी हैं ...और एक अच्छे इंसान भी ...लेकिन रण्डी औलादें पैदा नही करती ...औलादें तो वो औरतें पैदा करती है जो रण्डी नही .. ..आपकी माँ अगर मजबूरी के नाम पर लुटी तो वो रण्डी है ..और अगर किसी को मजबूर करके खुद को लुटवाया तो वो रण्डी नही बल्कि रण्डी जैसे पाक लफ्ज और जज्बात के क्या वो तो एक औरत कहलवाने के भी लायक नही ।
इंटरव्यू लेने आया था एक रण्डी का ...लेकिन खुद को इतना पवित्र ...इतना हल्का और इतना उज्ज्वल मैंने कभी महसूस नही किया ....अब किसी भी रण्डी के लिए दिल में कोई नफरत नही थी ..बल्कि सम्मान था .. वो फूल सी बच्चियां जो भड़काऊ मेकअप करके ..मुझे बुला रही थी ...वो मजबूर युवतियाँ जो खुलेआम मुझे जिस्म दिखा रही थी ...वो अधेड़ जो आवाज लगा रही रही थी ...वो बूढ़ियां जो एक दीवार पर सटे घुटनों पर बैठी हुई थी ...ये सब चीख -चीख कर कह रही थी ...भगवान ने अवतार लिया असुरों के लिए ...पैगम्बर आये दौर ए जालिमों के लिए ..नेताओं ने सत्ता के लिए ...हमारे लिए कौन आयेगा ...ये बताकर जरूर जाना .....ताकि आने वाला भविष्य सिर्फ रण्डियों का नाम किताबों या किस्सों में ही जान पाये ...स्पर्श करने और भोगने के लिए उन्हें कोई रण्डी न मिले ...
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
No comments:
Post a Comment