Tuesday, 26 March 2019

मां

#माँ_बनाम_जिंदगी
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" चल बे अंदर ...तुझ हरामी से कोई मिलने नही आने वाला ...!"

दौलत राम  नाम है मेरा ...अब उम्र 32  साल ..कद 5 '4 इंच ..रंग साँवला चेहरा गोल मय चेचक दाग .... ग्राम रहीमपुर   ...जिला दबईया !

मुल्क मेरा वही जो मुझे रोटी और इज्जत देता है ..और जीने का हुकूक भी..लेकिन आखरी बार मेरी इज्जत में सुराग वहाँ से हुआ जब मैंने अपनी जिंदगी के 19 साल पूरे किये ....

जिला दबईया का दसवी जमात का टॉपर रहा हूँ मैं ...बारहवीं में कोई झण्डा इसलिए नही चेप पाया क्यूँकि बारहवीं के बीच बाप की तेरहवीं लग गई  ....बाप मेरा था तो साबुत शराबी लेकिन इतने घर दे ही देता था जितने से चूल्हा आग खाये और जिन्दा जमात रोटी ....

दो बहनों के बीच का हूँ मैं...वैसे ही जैसे माँ हमेशा चक्की के दो फाड़ो में फँस कर जिंदगी भर एड़िया रगड़ती रही .....

जिंदगी की जद्दोजेहद में फ़ंसी मेरी " माँ " अपने उन दिनों में पूरी नास्तिक हो गई जब किसी भी आस्तिक कोने से उसे ढेला भर नमक भी न मिला ....

शराब सग़ी महबूबा निकली मेरे बाप की जैसे ही मैंने अठरह पूरे किये वो बाप को अपने आगोश में भरकर चितकबरी दुनिया से दूर ले गई ...

माँ पर पहाड़ टूटना तय था लेकिन बड़ी बहन पर इस घटना ने जैसे हजारो दुर्रे (कोड़े) जड़ दिए ....उसकी शादी तय हो चुकी थी और उसी दिन बाप की अर्थी ने एक विश्वास को जन्म दे दिया कि मेरी बहन अशुभ है ...जो मांगलिक कार्य के दिन अपना बाप खा गई ....

छोटी को पोलियो खा चुका था ...और बचा मैं घर की बढ़ती भूख और लाचारी से मजबूर होकर विद्या की देवी का सौदा कबाड़ के काँटे से करके कुछ किलो आटा ले आया ...

माँ सरस्वती का श्राप मुझपर निश्चित रूप से टूटना तय था ...लेकिन उसकी शक्ल और समय से मैं अनभिज्ञ था ....

समय कुछ पौन इंच आगे सरका तो मैंने दुपहिया का पहिया खोलना शुरू किया ...काम में बरकत इसलिए नही थी क्यूँकि अभी उस्तादी की शरण में था लेकिन अब ईश्वर मेहरबान हुआ और माँ आस्तिक ...

घर के राशन के कनस्तर भरने लगे ...और छलनी किस्मत के सुराग भी ....

मैंने कई बार " माँ " से पूछा कि " माँ " इसके पीछे आखिर राज क्या है ..?

माँ हमेशा कहती कि साहब बहादुर बड़े दयावान है ....माँ एक रंडवे रेलवे के ऑफिसर के वहाँ खाना पकाने , कपड़े , बर्तन का काम करती थी ...लेकिन मुहल्ले वालों ने फिकरों में जल्द बता दिया कि माँ का साहब कितना दयावान है ...

माँ लगभग उसकी रखैल बन गई ...और मैंने माँ से अबोल करके इसे ही तात्कालिक न्याय समझा लेकिन मेरी गैरत फिर भी मर चुकी थी क्यूँकि रोटी मैं उसी आटे की खाता था जिसे माँ इस पाप की कमाई से खरीद कर सान के बनाती थी ....

मन चाहा विरोध दर्ज करूँ ...जिस दिन करने की ठानी उस दिन पता चला बड़ी बहन की शादी पक्की हो गई और खर्चा साहब बहादुर उठाने वाले हैं ...

बहन की बढ़ती उम्र और बोझ के तकादे ने कंधे और जुबान को समतल कर दिया ...और जमीर को सुला कर मैंने इस को गरीबी की नियति और न्याय मानकर सन्तोष कर लिया ....

बहन घर से विदा हुई लेकिन सिर्फ महीने भर के लिए ....जब बहन को महीने भर बाद उसका पति घर छोड़ कर गया तो मुझे उस वक्त कुछ पता न चल सका ...चन्द दिनों में मुझे क्या पूरे मुहल्ले को पता चल गया कि आखिर मामला क्या है ...

बहन का बढ़ता पेट चीख-चीख कर गवाही देने लगा कि उसके पेट में किसी का पाप शक्ल ले रहा है ....

फिकरे खाता ..और मजाक पीता उस रात जब मैं पीकर घर लौटा तो मैंने  कुल्हाड़ी खड़ी कर ली .. और पूछा बहन से कि ये पाप आखिर किसकी मिल्कियत है ....?

सहम कर बहन ने साहब बहादुर का नाम ले लिया ....और मैंने अगली घिन की नजर माँ पर डाली ...उसके चेहरे में एक भी तर्रार शिकन नही थी ...

माँ ने उस रात जुबान खोली तो पता लगा कि मेरी माँ ....माँ की शक्ल में एक डायन है ...जिसने चन्द सिक्कों और दौलत के वास्ते अपनी बेटी का सौदा भी उस आदमी के हाथों सौंप दिया जिसकी वो खुद रखैल है .....

लेकिन माँ ने इस मजबूरी को गरीबी और लाचारी से जोड़ा ....और मुझ नामर्द ने फिर एक जहर का घूँट फूँक कर पीया ....

दिन बीते और बहन ने एक बेटी को जन्म दिया ...मैंने उस दिन और कस के कच्ची हलक से उतारी ...

एक रात धुत शराब के नशे में जब मैं घर लौट रहा था तो दूर से आती दो जनानी आकृतियों को अपनी ओर आता देखने लगा ....

पैर की लचक ने दुरुस्त कर दिया कि वो मेरी छोटी बहन है और पास आये तो माँ की शक्ल ने जता दिया कि अपने सुनसान सड़क पर रात की चादर पर  खड़े हैं...

माँ ने जोर देकर बोला कि -

" मुन्नी की तबियत खराब है जरा डॉक्टर साहब को दिखाने ले जा रही हूँ ...घर का ख्याल रखना ...

जैसे ही मुन्नी पर नजर डाली उसकी नजरों ने   जाने क्यूँ एक पल में जता दिया कि उसका जिस्म उसकी आँखों से काँटा नही मिलाता .....

कुछ दूर चला फिर तेजी से लौटा ....माँ और बहन फिर नही दिखी ...पता नही क्यूँ पैरों ने समझ लिया कि मंजिल क्या है ....

मैंने साहब बहादुर के घर की जानिब दौड़ लगा दी .. ....लेकिन .तब तलक देर हो चुकी थी ...उजड़ी बहन दरवाजे की देहलीज पर लुटी हुई इज्जत .. और पीठ दिवार पर जोड़ के बैठी थी...मैंने उसका चेहरा देखा तो पाया उसकी आँख में दो आँसू सूखे टुण्ड की भाँति जमे हुए थे ....

मैंनेआव -देखा न ताव और अंदर दाखिला लिया .. ...

और एक कमरे से मुझे आवाज के कतरे रिसते हुए सुनाई दिए ...

" देखो कमला ... अब इसे रोज ले आना ....समझ रही हो न ? "

" आपको कभी गोश्त न दिया दो कहियो ... आप की खिदमत में तो पति ।भी कुर्बान कर दिया ... उस रात उसने देखा न होता तो और जिन्दा रहता ...लेकिन लौंडा शक खाने लगा है मेरा ..."

" तो क्या हुआ...  बाप की तरह शराब पीने लगा है सुना ...निपटा दो उसे भी बाप की तरह शराब में जहर मिलाकर .."

अब गैरत जवाब दे चुकी थी ...एक औरत जिसे माँ कहते हैं ...वो माँ जो अपने बच्चों के लिए भगवान का रूप होती है ....वो जिसके कदमों के नीचे जन्नत होती है ...वो जो खुद गम खा ले लेकिन बच्चे को रोटी खिलाये बिना सोने नही देती ...वो जो। अपने ख़ौलते खून का दूध बनाकर बच्चों को सेहत और जिस्म देती है ....वो माँ जो आज एक जानवर से भी बदतर हो चुकी है ...जो अपने बच्चों का शिकार करने वाली एक शिकारी बन चुकी है ...वो जिसने अपने सुहाग को निगल लिया ..वो जिसने अपनी इज्जत को अपने सस्ते लालच के वास्ते नीलाम कर दिया .....

मैंने वहीँ आस-पास सरसरी नज़र डाली और टेबल में पड़ी एक रिवाल्वर देखी .....दो फायर किये और जमीन को दो हैवानों से मुक्त करा दिया .....

आज जेल की सलाखों के पीछे से अगर याद आता है तो अपना बाप ...जो माना कट्टर शराबी था लेकिन ईमान का पक्का था ....अपनी बड़ी दीदी जिसने माँ और परिवार की इज्जत के चलते कभी जुबान नही खोली ...छोटी बहन जिसका क्या हुआ होगा मैं नही जानता ...?
और वो मासूम जान जिससे मैं नफरत तो करता था लेकिन फिर न जाने क्यूँ उसे गोद में भरकर चूमने का मन करता था .....

माँ कुमाता नही होती ...ऐसा मेरे गुरूजी कहा करते थे ...लेकिन माँ भी एक औरत होती है ...गुरूजी बताना भूल गए ...इस दुनिया में अगर आदमी एक औरत को रण्डी बनाता है तो कभी -कभी एक औरत भी खुद को बाजारू बनाने का दम रखती है .....

जेल की सलाखें काटने को कभी जी नही करता क्यूँकि डर लगता है उस दुनिया में फिर शामिल होने में जिसके लिए मैंने अक्ल वालों को कहते सुना है कि इसे भगवान ने बहुत सुंदर और नायाब बनाया है ........हर दिन मिलने वाले कमरें में इन्ही सलाखों से बाहर झाँकने चला आता हूँ...शायद एक बार बहनें अपने जिन्दा होने का सुबूत देने चली आयें लेकिन हर दिन बस यही आवाज कान में गिरती हैं कि -

" चल बे अंदर.... तुझ हरामी से कोई  मिलने नही आने वाला !"

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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