#हाय_हाय
**********
" लियो अब जे करो बात , पण्डित लुगाई बुरखे वाली ...ही ही ही "
फुँआक से मेरे मुँह से चाय निकल पड़ी..मैं वहीँ उसी दुकान में बैठा चाय पी रहा था जहाँ पर ये छिछोरे बैठे थे ....और जब एक ने गुटखे के सस्ते कत्थे से चढ़ी अपनी जुबान से इस जुमले को उछाला तो चाय मेरी नाक से बाहर आ गई ....
मेरा कलेजा तब सीने में और कुलेल करने लगा जब मैंने वो नजारा देखा जो भारत में इससे पहले न कभी किसी ने कभी देखा और न कभी सुना ....
" रुको बेगम ! हम जरा तेल ले आयें "
ये सच में हैरतअंगेज मंजर था ...एक धोती पहने , चोटी रखे ..चन्दन चढ़ाये पण्डित एक औरत संग सामने से गुजरा ...जिसे वो बेगम बोल रहा था और जिसे बेगम बोलता उसने बुरखा पहना हुआ था ....
' अल हैदर शमशीर पठान ' नाम है मेरा ... झिपक के अंडे बेचने आता हूँ हर हफ्ते यहाँ ...टोटल हिन्दुवाना इलाका है ... खून ख़ौल भी रहा था और ससुरा ठंडा भी हो जा रहा था ...
उस लुगाई को ये कहकर बद्दुआ दे रहा था कि ईमान बेच गई और इस बात पर फक्र भी हो रहा था कि अब भी अपना ईमान सम्हाले हुए है ....
लेकिन चक्कर ..चकोर था ..भला एक पंडत किस बिना पर ऐसा कर सकता है ..? और कर भी दे तो क्या भूखा न मर जायेगा ..?.समाज से रुसवाई अलग ..ठुकराई अलग ..बिरादरी से बरी तो और बात ...
हमनें उन्ही छिछोरी जमात में से एक को दुलार और पुचकार कर पूछा ...
" इधर आइयो तो बे ..? मतलब जनाब ए मोहतरम ए हैदर उर्फ़ चंगेजी ..जरा इधर खोपचे में तशरीफ़ लाइए तो ...?
वो झट आ गया !
" क्या हुआ मुल्ला जी ...?"
" अबे ...मतलब जनाब ए मोहतरम्...."
" अबे रहने दो ..फिर इत्ता लम्बा ....मार डालोगे का ...डब्बू नाम है मेरा "
" हाँ तो अजीज भाई डब्बू जरा ये बताओ तो ..ये माजरा क्या है मतलब ..ये पंडत और ये बुरखे वाली खातून ...मतलब ...?"
" देखो मुल्ला ..ये हमारे मुहल्ले की बात है ...हम आऊट नही कर सकते ...हाँ अगर पाँच सौ या हजार गिरा दोगे हथेली पर तो जयचन्द बन सकते हैं "
" पूरे दो बाप के हो मतलब ये लो पूरे पाँच सौ अब बताओ ये डिरामा आखिर है क्या ...?."
" बहुत दुःखभरी कहानी है मुल्ला...बेचारी ये औरत बहुत हसीन और निहायत ही जवान है ...सुनो मुल्ला किसी से कहियो मत .. कहते सुना है कि पंडत तंतर-मन्तर जाने है और वशीकरण भी ..."
" किय्य्या भसिकरण .."
" अब्बे ...वशीकरण बोले तो हिप्नोटाइज ..मतलब किसी को अपने कब्जे में कर लेना...पूरे दो कम पचास का है पंडत ...और ये नेक खबसूरत मासूम अबला सिरफ़ 19 की "
19 सुनते ही हमारी छाती के सफेद बाल खड़े हो गए ...रंडवे हुए पूरे चार साल हो गए हैं ...और हम भी 5 कम 50 के हैं ...तीन लौंडिया थी ..निकाह कर निपटा दिए ..अब वैसे ही अकेले हैं जैसे अन्ना अपने अनशन में हो जाते हैं.... हम बेजोड़ और अब तक मर्द जो सो रहें है तकिया टाँगों पर फँसाये और नंगे नंदन कमजोर पंडत 19 की खीर खा रहा है और वो भी हमारी पतीली की ....खून फिर ख़ौल गया ...और हमारे चेहरे पर से आग निकलने लगी ...
" अबे मुल्ला जी कूल हो जाओ ..वरना दाढ़ी झुलस जायेगी ...मैं समझ रहा हूँ ये जुल्म है ...लेकिन .."
" अबे वैसे हो किस बिरदरी मतलब मजहब के मानने वाले ..?"
" कट्टर सनातानी हूँ मुल्ला जी ...लेकिन इंसान पहले ... इसलिए बेचारी की हालत देखी नही जाती ...लेकिन आप जो सोच रहें हैं मैं जानता हूँ "
" तो जुगाड़ करवाओ फिर जिंदगी भर का ..मतलब समझ रहे हो न ..?"
" देखो मुल्ला जी हमको मालूम है रंडवे हो आप ...और हमारे मुहल्ले का भी माहौल इस बुरखे वाली की वजह से खराब हो रहा है ....पूरे 10 लाख लेंगे ..और बाइज्जत डिलिवरी देंगे...समझ रहे हो न !"
" हें..हें..हें ..अबे साफ -साफ़ बात करो "
" देखो मुल्ला जी ..हम 19 वाली ..कच्चे गोश्त ..कच्ची उमर की बुरखे वाली तुम्हें सौंप देंगे वो भी हमेशा के लिए ...पंडत तो वैसे भी वशीकरण जानता है ..अगली फिर फाँस लेगा ..लेकिन ये वाली तो दुबारा वो भी नही फाँस पायेगा ...अबे राजू इधर आइयो तो "
तभी डब्बू का गुर्गा आता है और -
" अबे जरा बुरखे वाली का नंगा हुश्न दिखाइयो तो मुल्ला को "
" तौबा ..तौबा ..अबे ये कब खींच ली ...?"
" मुल्ला जी पूरा मुहल्ला दीवाना है इसका तभी तो पंडत उसे बुरखा पहनवाता है ...अब समझे !"
सब समझ में आ गया ...लेकिन तस्वीर देख तो अब आग और भड़क गई ...जवानी की खुलती लुंगी और बन्द होती खिड़की ने तमतमा दिया और हम बोले -
" डिलिवरी कब तक दोगे बे ...?"
" डिलिवरी के साथ दिल भी देगी लौंडिया तुम्हे ये हमारी जुबान ...बस यहाँ तुमने कीमत दी और वहाँ हमनें तुम्हें हुश्न की चक्की "
" ठीक है लेकिन डिलिवरी तभी देंगे जब हम कट्टो को अपने पहलू में लेंगे ...तो आज रात पक्का ..जगह बताओ ?"
" ठीक है मुल्ला आज रात 11 बजे झूलता खंजर के वीराने में हम तुम्हें बुरखे वाली चिपका देंगे ...लेकिन अकेले आइयो ..मगर रोकड़ा संग लाइयो "
आज हमारे जिस्म में सुहागरात वाली जवानी फिर चढ़ने लगी ..और हमनें घर जाते ही ..भुल्लो गुलाम को हुक्म दिया कि बेटा कतली बनारसी पान अफीम डालकर ...हुक्का तूफानी तम्बाकू से भरकर ...खटिया गुलाबों से सजाकर ...दूध में केसर डालकर तैयार रखना ...
और हम रकम गिनकर झूलता खंजर की ओर अपनी झिपक मुर्गी की पिंजरें वाली गाड़ी लिए रवाना हुए ...कच्चे लंगोट के छिछोरे ..जुबान के पक्के निकले ...हमारे पहुँचने से पहले माल लेकर पहुँच गए...
उफ़्फ़ छिछोरे 4 थे लेकिन वो मुश्कतर गुलबहार ..जानेबहार ..जनेवफा ..गुदाज रसीला कलमी हुश्न इकलौता उनके बीच अलग ही नजर आ रहा था ...
हम कुछ पूछते इससे पहले ही जादू हुआ ..और वो कच्ची जवानी हमारी तरफ दौड़ी चली आई ...और हमारे गले लगकर हमारी सोई हसरत जिन्दा कर गई ....आव देखा न ताव हमने नोटों का बख्शा छिछोरों की जानिब उछाला और वो फिर लौट के पीछे न देखे ..,
हमने दिल से चिपकी नेकनाम को और कस के बाँहों में भींच लिया तभी -
" हाय ..हाय.. मुल्ला जान लोग क्या "
हमें बिजली का करन्ट सा लगा और हम उस खातून से अलग जा लगे ...और फिर उसकी जानिब झपट के हमनें उसका नकाब उठाया ....
" अबे तू क्या चीज है बे..?"
" हाय ..हाय क्या कभी बीच का नही देखा ...अभी चलता हूँ मुल्ला अपन को इतना ही पेमेंट मिला था वैसे ही अपन तेरी बाँहों में एक्स्ट्रा पाँच मिनट दे चुका है ... एक सौ का पत्ता हल्का करेगा तो 10 मिनट और चिपक सकता हूँ ..."
" भाग तेरी माँ का ....."
मैंने सीधे गाड़ी को पुलिस टेशन में दाबा और सामने बैठे कोतवाल से जैसे ही कुछ कहना चाहा तभी उनके सामने बैठा फरियादी बोला
"हजूर ..विशुद्ध पण्डित है ...होशियारपुर गए थे उस दिन किसी जजमान ने बुलाया था ..पूरा मुस्लिम मुहल्ला है ..हमनें देखा एक दाढ़ी वाले मुल्ला के संग एक साड़ी पहनी ..पल्लू करे कन्या ..माँग में सिंदूर लगाये ..गले में मंगलसूत्र पहने ..चली आ रही थी ...4 आदमी वहीँ बैठे बात कर रहे थे ...तभी हमें अजीब लगा हमारी धर्मपत्नी को मरे 7 साल हो चुके है और हमनें सोचा एक मुल्ला की जद से अपने धर्म की कन्या को यदि मुक्त करवा दें तो इहलौक भी स्वर्ग और परलौक भी ...उन चारों में से एक से सेटिंग हुई कि वो कन्या को मुझे हस्तगत करने के एवज में 10 लाख लेंगे ....और हजूर 10 लाख लेकर हमें पकड़ा दिया हिजड़ा....हजूर हम लूट गए ...."
कोतवाल संग पूरी कोतवाली ठहाके लगाकर हँस रही थी ...फिर कोतवाल बड़ी मुश्किल से शांत हुए और हमें देख कर बोले ...
" हाँ तो मुल्ला जी आप की क्या समस्या है ..?"
" हजूर बस यही जो पंडत की है बस साड़ी, ..मंगलसूत्र ,घूँघट की जगह बुरखा लिख दियो ..."
इस बार उनकी हँसी के साथ मुझे लगा कोतवाली की ईंटें भी हँस रही है ....
पंडत और हम रपट लिखवाकर साथ कोतवाली से बाहर निकले ...और हमें चीरता हुआ एक पादरी अंदर कोतवाली में घुसने लगा ...
कुछ देर बार हँसी -ठिठल्ली का बम फिर फूटा और बाहर खड़े हम दोनों समझ गए कि पादरी भी उसी कश्ती का मुसाफिर निकला जिससे अभी -अभी हम उतरे है ...
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
No comments:
Post a Comment