Thursday, 28 March 2019

न्याय

#न्याय
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" आह ! ससुर जी ..आपने तो आज मुझे तृप्त कर दिया ...."

" ओह्ह्ह्ह.. मधु मेरी जान तुमसी गर्म कच्ची जवानी नही ......"

तभी दरवाजे पर भड़-भड़ होती है ...और हम सकपका के जागते हैं... इतना मीठा ..रसीला ..और कामुक स्वप्न अवश्य मेरी मनहूस धर्मपत्नी ने ही तोड़ा होगा ...ये साढ़े साती जौंक जब से मेरे जीवन में चिपकी तब से आज तलक बस मेरा खून ही पीती जा रही है....

भांग -भसड़ .. नफरत हो चुकी है मुझे धर्म-कर्म से भला इतना भी कोई आस्तिक होता है ..इतना पूजा-पाठ नेम वाला ...

मुझे यानि आत्माराम चौबे को आज भी वो सुहागरात भूले से नही भूलती जब मैंने लाजवंती के बीज   ..काजू की सूरखी ..खस-खस का घोटा दूध में फेट कर निगला था ...और तत्पर था बिस्तर पर एयर स्ट्राइक के लिए .. जैसे ही गाढ़े कत्थे का पान रम्पुरिया  132 संग अफीम चबा कर मैंने निर्मला का घूँघट खोला ये फूँकनी की लज्जा छोड़ किसी मन्त्र का जाप करती नजर आई ...

मैंने सोचा शुभ के संगत ये कोई यन्त्र होगा परन्तु पता चला उसने तीन दिवस का पुरुष  स्पर्श रहित कोई व्रत लिया है ...और लग गई लंका ..मिन्नत की ..जबरन साढ़े तीन चुम्मा टेके ...लेकिन इरोटा न खुद गर्म हुई न बिस्तर को गर्म होने दिया ....बल्कि दीनानाथ  की ठण्डी लस्सी ने मेरे भी अरमान और शौक ठंडे कर दिए ....

सुहागरात की लंका लगते ही हमनें सोच लिया कि आगे की जिंदगी अजन्ता -एलोरा की पच्चीकारी देखकर ही गुजरने वाली है ...

जब स्वाधीन लोहा ढाल न बन सके तो उसे तलवार बनाना न्यायिक होता है ..तो हमनें जबरदस्ती अपने हिस्से का हक लूटा ..और इसी जबरदस्ती का परिणाम ये रहा की सूखे पेड़ पर दो फल लटके ...

मेरा बड़ा बेटा नकुल और छोटी पुत्री राधिका ...मेरी कामुकता के शीर्ष का एक समय ये रहा कि पत्नी की उपेक्षा से मैंने वो सब हथकंडे अपनाये जिसकी एक भद्र पुरुष मात्र कल्पना करता है ....कल्पना में ही नही बल्कि वास्तविकता में भी मैंने कई गोल दागे ...जिले और सदर जिले का कोई कोठा नही ..कोई छिनाल नही जो मुझसे होकर न गुजरी ...लेकिन फिर जब 60 का हुआ तो लगा बस ये ही मेरा स्टॉप पॉइंट है ...

ये कोई हृदय परिवर्तन नही अपितु जिस्म में जोश की समाप्ति का अलार्म था ...खैर बड़े पुत्र की शादी करवाई और वो भी एक अत्यंत सुंदर चरित्र और देह की युवती से...नकुल दुबई में जॉब करता था और फिर बेटी राधिका भी पराये घर की हो चली ...

जिंदगी शांत और आम सी थी.. बहू में मुझे राधिका ही नजर आती थी ..और वो भी मुझमें अपना पिता ही तलाशती थी ..समझ में नही आता था कि ये सब कुछ तूफान से पहले की शांति थी या  मस्तराम की कहानी की तरह जिंदगी सिर्फ किसी एक घटना से बदलने वाली थी ....

उस दिन मेरी मनहूस अर्धांग्नी सत्संग में गई हुई थी ...और गर्मी इस कदर भड़क रही थी कि मैं पंखे के नीचे लेट कर भी पता नही क्यूँ गर्म होता जा रहा था ....

तभी मैंने सोचा नहा लिया जाये ताकि शरीर को तरावट और ठंडक मिले ...जैसे ही मैंने अपने रूम का दरवाजा खोला ...मुझे बाथरूम से बहू निकलती हुई दिखाई दी ...

जिस्म में उतना ही बड़ा  तौलिया चिपकाये जितना मैं कमीज का कपड़ा दर्जी को देता हूँ ...सुर्ख सफेद और गुलाबी बदन ...उसमें नाचती बूंदों की रिमझिम ...गीले रेशमी बाल और वो भी देह पर चिपके हुए ...

तभी मधु की नजर मेरी नजर से टकराई और उसने अपने जिस्म में मेरी नजरों को लपलपाता पाया हम दोनों सिहर उठे ...मधु शर्म से और मैं उत्तेजना से ...ये आखरी दिन था जब तलक मधु मेरी बेटी रही क्यूँकि इसके बाद न ही कभी मैंने फिर उसको बेटी की नजर से देखा और न किसी रिश्ते के नयन से ...

अब वो मेरे लिए मात्र एक भोग मूरत थी ...शरीर में जोश पुनः लौटने लगा ...खून नसों में दुगने बहाव से दौड़ने लगा ...हर वक्त मधु की देह दर्शन मेरे लिए रिटायरमेंट के बाद  पुनः एक रोजगार  सा बन गया ...

कल्पनाओं में मधु सदैव मेरी देह से लगी होती और उष्ण कल्पनाओं में  समाधि से सम्भोग की ओर ...

मधु भी मुझसे बचने लगी थी ...क्यूँकि एक स्त्री होने के नाते वो समझ चुकी थी कि मेरी नजरें उसके किन-किन अंगो का शिकार करने हेतु अभ्यस्त हो चुकी है ....वो कम से कम मेरे सामने आती ...कम बोलती ..इतना कुछ होने पर भी कभी मधु ने न कभी मुँह बनाया न कोई प्रतिरोध दर्ज किया ...

ये मेरे लिए नैसर्गिक चिंतन का अवलम्बन था ...और स्वतः ही परिस्थितियों का आंशिक मूल्यांकन कि पति विरह ने उसके भी नेम और धैर्य को ध्वस्त कर दिया है ...अब वो भी व्याकुल और उत्तेजित है ..लेकिन लज्जा और मर्यादाओं की छद्म कच्ची डोर से उसने स्वयं का खूँट टिका रखा है ....

लेकिन मैं औरतबाज और रंगबाज आदमी रहा हूँ ..और निश्चित रूप से जानता हूँ कि पहल सदैव पुरुष का ही कर्म है ...तो मैंने आते-जाते उसकी देह से अपनी देह का घर्षण करना प्रारम्भ कर लिया ...उसके सुकुमार अंगों को भी अप्रत्यक्ष रूप से छेड़ना प्रारम्भ कर दिया ....परन्तु एक दिन -

" बस बहुत हो गया ससुर जी ! आप को नीच भी नही कह सकती क्यूँकि आप को अपना पिता जैसा नही अपितु पिता ही माना है ...बचपन में ही अपने पिता को खो चुकने के बाद मुझे लगा था कि अवश्य मुझे ससुर के रूप में मेरे पिता मिले है ...लेकिन आप तो  ...अगर आप ने अब कोई बदतमीजी की तो मैं सब कुछ सासु माँ और नकुल को बता दूँगी "

कव्वे की बीट सी शक्ल हो गई मेरी और पहली बार लगा कि मेरी स्त्री के इतर और भी स्त्रियां वुजूद में हैं जिनको काम विचलित नही कर सकता..मधु का ये टेढ़ा लेक्चर मेरे अंदर के जोश
और उमंग को साप्ताहिक तोड़ गया ...पूरे सात दिन मधु से नजरें मिलाने की मेरी हिम्मत नही हुई ...लेकिन माँसाहारी पशु की भूख मात्र माँस ही शांत कर सकता है ...और मधु का गुदाज जिस्म मेरे लिए मेरी भूख के साथ मेरा काम ज्वर निवारण भी बन चुका था ....

मैंने अंतिम फैसला करने में पूरे सात घंटे लिए और इरादा कर लिया कि ऐसी देह भोगने के लिए यदि मुझे प्राणदण्ड भी मिल जाए तो ये मेरे लिए एक प्रशस्ति से कम नही ....

अपने ही हमउम्र ठरकी से मैंने बेहोशी की गोलियाँ ली ...और बड़ी सावधानी से उसे पकते भोजन में मिला दी जिसे मधु तैयार कर रही थी ...इससे दो फायदे निश्चित थे एक तो बेसुध मधु का जिस्म और दूसरा मेरी मनहूस पत्नी को भी सुबह तक की गहरी कुम्भकर्ण नींद  ...

गोलीयों ने अपना असर दिखाया और मैं अपने कमरे में वैसे ही तैयार होने लगा जैसे मैं अपनी सुहागरात में तैयार हुआ था ...बस पान चबा न सका क्यूँकि नकली दाँत इसकी अनुमति नही देते ....लेकिन उसमें रखी अफीम चूस ली ....

खुशबू से सराबोर ..देह में उत्तेजना लिए में मधु के कमरे की ओर बढ़ने लगा ...मधु पूर्ण रूप से बेहोश होकर अपने बिस्तर पर पड़ी थी ..मैंने देहलीज से उसके जिस्म के आरोह -अवरोह पर अपने जिस्म को फूलता सा पाया ...और उत्तेजना का ज्वर लेकर जैसे ही मैं मधु को रौंदने आगे बढ़ा तभी लैंड लाइन फोन की घंटी बजी -

मैंने बेमन से रिसीवर उठाया-

" हैलो ! "

" पापा में लुट गई ...पापा आप जल्दी आ जाइए ..प्लीज पापा ..मेरे ससुर जी ने मेरे साथ बलत्कार ....."

फोन का रिसीवर मेरे हाथ से छूट गया ...और मेरा गर्म शरीर एक पल में उत्तरी ध्रुव बन गया ...सब कुछ घूमने लगा ..मैं फ़टी आँखों से कभी मधु को निहारता कभी दिवार पर लगी उस आदियोगी शिव की तस्वीर को ...

पैर जड़ता को प्राप्त हो गए ...रिसीवर से छनती राधिका के रोने की आवाज मुझे जता रही थी कि जिस साँप ने मुझे ये नींद की गोलियाँ दी उसी ने इसी जहर से डश कर मेरी बच्ची को निगल लिया ....

तभी हवा का एक तेज झोंका खिड़की से अंदर आया और एक किताब का सफा खुला जिसमें एक सूफी की तस्वीर के नीचे लिखा था

" अपनी ही करनी का फल है नेकियाँ रूसवाइयां,,,,

आपके पीछे चलेंगी आप की परछाइयाँ ....."

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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