Tuesday, 19 March 2019

सरफरोश

#सरफरोश_मुहब्बत
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" वाह पिताजी  वाह ! अब तो लगता है अपनी बेटीयों को भी आपकी गन्दी सोच और गन्दी नीयत से बचाना होगा ...शर्म आनी चाहिये आपको  !"

मेरा बेटा विनय बस बोलता रहा , और मेरी 10 साला पोती सुशीला उसकी कमर पर रखे हाथ के कारण बने त्रिभुजाकार छिद्र से लगातार मुझे घूरती रही ,, बाहर सारा सम्भ्रांत मुहल्ला मेरे ऊपर थूत्कार कर रहा था ,,

लेकिन मुझे जिसकी नजरें ज्यादा पीड़ा पहुँचा रही थी ,,,वो थी शान्ति ...मेरी बहू .. कोई सहसा विश्वास नही करेगा लेकिन एक बेटी से भी अधिक सम्मान , स्नेह और सहृदयता मुझे शांति से मिली है ... एक मिथक जो बहुओं से सम्बंधित है कि बहू कभी बेटी नही बन सकती उसे तोड़ती शांति विश्वास नही कर पा रही थी उसका पिता तुल्य ससुर इतना नीच भी हो सकता है ....

तभी मेन डोर खुला और मेरी 16 साला बड़ी पोती आस्था तुनकती हुई अंदर दाखिल हुई और अपना स्कूल बैग सोफे में फेंककर मुझपर घिन की नजरें डालकर बोली -

" दादु वो मेरे ही स्कूल में पढ़ती थी ..छी ..आई हेट यू "

सरिता मेरी  स्वर्गवासी पत्नी की तस्वीर के इतर मेरे लिए अब किसी की नजरों  और हृदय में कोई सम्मान और कोई स्थान न बचा था ....और जहाँ सम्मान न हो उस स्थान का त्याग अनिवार्य हो जाता है ...

मैं सीधे बाहर निकल गया ..किसी ने रोका भी नही ..किसी ने सोचा शाम ढ़ले तक लौट आऊँगा तो किसी ने सोचा कि आखिर जाऊँगा कहाँ ...?

हाँ ..मुझे भी ज्ञात नही कि कदम अब किस राह ले जायेंगे ..लेकिन इतना जरूर था कि अब आगे की राह मुश्किल जरूर होगी ...घर से कुछ कदम ही निकाले थे कि छुटकी पोती सुशीला दौड़ के पैरों में आकर लिपट गई ...और बोली -

" दादु आपका ये फिश-फिश ...जल्दी आ जाना ...."

आस्था ने उसका हाथ पकड़कर खींचा ...और मेरे हाथ में अब कुछ बचा था तो अस्थमा इन्हेलर ....

कदम तेज किये ताकि जल्दी से जल्दी फिकरों ..तानों और घिनयाती नजरों से दूर जा सकूँ ... लेकिन इस जल्दी के चलते साँस उखड़ने लगी .लेकिन दूर निकल ही गया.. और  एक म्यूनसिपालटी की बैंच में जाकर बैठ गया ...साँस को मशीन ने नियंत्रित किया ..और आँसूओं को आँखों ने ....

एक ऐसी ही बैंच थी उस दौर जहाँ मैंने पहली दफा अमीना को देखा था ....और पहली ही नजर में उसपर दिल हार बैठा ,, तब मैं सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था उम्र यही कोई 24 -25 के आस -पास थी मेरी   ...तभी हल्की -हल्की बारिश शुरू हो गयी ...

मैंने जिंदगी में न इससे खूबसूरत बारिश कभी देखी न ही देखी अमीना से खूबसूरत लड़की ....

मैं सामने एक पेड़ की ओट के नीचे खड़ा था और वो मेरे सामने बारिश की बूँदे चख रही थी ....

तभी किसी को अपनी और आता देखा वो दौड़ी ...और  बूँदों की पाजेब पहने वो लड़की आँखों से ओझल हो गई ...

मैं दर्शन की किताब हाथ में लेकर ईश्वर से ये प्रार्थना करने लगा कि मुझे एक बार फिर उस लड़की के दर्शन करवा दे ....दुआ कुबूल कुछ 7 दिन बाद हुई और हमारी मुलाकात एक बस में हुई वो भी 7 किमीं. के सफर में सिर्फ  डेढ़ किमी. तलक ...दरअसल वो मेरी बगल में ही बैठी थी और वो भी बुर्खा पहनें... जब उसने पानी पीने के लिए नकाब उठाया ...मैं उसके गलों की सुर्ख सफेद नसों में पानी को उतरता देख बस खो सा गया ...

" मैं अवनीश सिंह..आपका नाम क्या है ...?"

" अमीना ...! उठिये मेरा स्टॉप आ गया !"

उसके बाद हर दिन वो ही बस पकड़ता ..हर दिन उसी बैंच पर घण्टो बैठता मगर अमीना फिर मुझे कभी दिखाई न दी ...

अमीना इस नाम ने मेरी जिंदगी और जिस्म के मायने बदल दिए ...मुझे उससे प्यार हो गया था ..वो प्यार जो जीने -मरने और खोने-पाने की हद से भी आगे निकल चुका था ..उस दिन मेरा रिजल्ट अनाउंस हुआ ...मैं यू.पी.एस.सी मैं 13 वी रैंक लेकर पास हुआ ...जैसे ही मैंने  अपने पिताजी को फोन लगाने के लिए जेब में पड़े सिक्के को बटोरने के लिए हाथ डाला ...सामने अमीना खड़ी थी ...

वो भी  किसी बस के इन्तेजार में ...बेपर्दा ...मैंने उसकी जानिब दौड़ लगा दी ...वो बस मैं चढ़ी और मैं पागलों की तरह उसका पीछा करता हुआ दौड़ता रहा ...क्यूँकि इस बार मैंने ठान लिया था कि मैं अमीना को अपने दिल की बात बोलकर ...उससे कहूँगा कि मुझसे शादी कर लो ...साहब बन गया हूँ मैं अब ...तुम्हें बहुत खुश रखूँगा ...

पसीने से तर बतर था मैं ...तभी बस यात्रियों हेतु रुकी और मुझे लगा मेरी जिंदगी भी ...आव-देखा न ताव मैं बस पर चढ़ गया ...

और अमीना का नाम चिल्लाने ही वाला था तभी अमीना मुझे देख कर घबरा सी गई और अपने बगल में बैठे हुए आदमी के कन्धे पर सर टेक कर बोली ....

" सुनो जी ! यहीं उतर जाते हैं ....बस में घुटन हो रही है ..."

सुनो जी ! सुनते ही मेरी साँस और आस दोनों दरकने लगी ...और मैं जिन्दा लाश बना बस का डंडा पकड़ कर बस के साथ बढ़ता गया ....

बस रुकी  और मैं उतरा ...कुछ दूर चला था कि तभी पीछे से आवाज आई -

" खुदा के लिए अब हमारा पीछा न कीजियेगा ..हमारा निकाह हो चुका है .... "

इसके बाद अब कुछ न बचा लेकिन कुछ लफ्ज बटोर कर मैं कह उठा -

" लेकिन मुझे आपसे कुछ कहना है अमीना "

" जी ! कभी आगे मिलूँ तो कह दीजियेगा ..फ़िलहाल इस वक्त इजाजत दें मेरे वो मेरा इन्तेजार कर रहें हैं ..."

40 साल बीत गए इस बात को ... रिटायरमेंट भी हो चुका है ...ऐसे ही शिमला मिर्च परख रहा था एक रेहड़ी पर तभी मैंने सनसनाती हुई बू से लबरेज अमीना को देखा ... कल का शफ्फाक ..और नफासत से भरा उसका वुजूद खण्डहर हो चुका था ...मेरे बूढ़े कलेजे में अचानक एक जवान दिल धड़कने लगा ...मैं आगे बढ़ा तभी -

" आइये दादीजान रास्ता यहाँ से है "

मेरी आँख से आँसू उतर आये कल जिसकी आँखें नूर बुनती थी आज उनमें एक बूँद रौशनी नही ...मैंने उनका पीछा किया ..और पता चला वो हमारे मुहल्ले से पीछे वाले मुहल्ले में शिफ्ट हुए हैं ...मुझे अमीना से मिलना था क्यूँकि कुछ था जो मुझे अब भी उससे कहना था ...मैं हर वक्त हर दिन उनके फ़्लैट के नीचे  चक्कर काटने लगा ...अमीना का बेटा और बहू दोनों जॉब करते थे और पोती ..मेरी ही पोती आस्था के साथ पढ़ती थी ...घर में एक मेड अमीना का ख्याल रखती थी ....उस दिन फिर बारिश शुरू हुई ...और मैंने ठान लिया कि आज अमीना से मिलकर रहूँगा .... मैंने मेड को कुछ सामान के वास्ते बाहर जाते देखा और तुरंत फ़्लैट के डोर के सामने पहुंचा जैसे ही दस्तक देने की सोची ...मैंने पाया दरवाजा खुला है ...मैं अंदर दाखिल हुआ ..और मैंने देखा अमीना बिस्तर पर मुँह ढाँके लेटी हुई है ...मैं डरते-डरते उसके करीब पहुँचा और हौले-हौले उसका नाम लेकर उसको जगाने लगा ...जब वो नही जागी तो मैंने उसकी चादर उसके मुँह से हटाई ...और देखा कि वो अमीना नही बल्कि उसकी पोती थी .....

उसकी आँख खुली और वो मुझे देखकर चीखी ..मैं डर गया मैंने अपना हाथ उसके मुँह पर रखा लेकिन इतने में पड़ोसी आ गए ...
उनका हाथ मुझपर उठने की वाला था कि तभी मेरे बेटे का एक दोस्त मामला शांत करके मुझे वहाँ से ले गया ...अमीना मुझे एक कोने में सन्न होकर खामोश खड़ी दिखाई दी ..उसे मेरे नाम और मेरी तड़प ने महसूस करा दिया था कि मैं लौट आया हूँ ...पुलिस कम्प्लेन नही हुई ...बेटे और बहू ने बड़ी मुश्किल से मामला सुलझाया ...लेकिन तब तलक ये बात जंगल की आग की तरह हर दिशा में फ़ैल चुकी थी ....

शाम ढ़ल चुकी थी ...और हल्की- हल्की बूँदें फिर आसमान से उतरने लगी ...लेकिन उस दिन मेरे मुँह से एक शब्द नही निकला क्यूँकि अमीना की इज्जत मुझे अपनी जान से ज्यादा प्यारी थी ...लेकिन वो बात जो मैं अमीना से कह न पाया वो बात फिर बात ही रह गई ....

काश जिंदगी से विदा होने से पहले उससे कह सकता -

" अमीना ! मेरे अगले जनम में तुम्हारा खुदा क्या सिर्फ एक बार तुम्हे मेरे लिए दुबारा बना सकता है ...?"

जवाब आज भी नही मिला लेकिन एक मासूम आवाज मिली ...

" सॉरी दादा जी ! मुझे अमीना दादीजान ने सब सच बता दिया ... आई डोंट नो ऐसा लव होता है या नही लेकिन आज ऐसा लव पॉसिबल नही ..."

उसके बोलते ही मुझे तालियों की आवाज सुनाई दी ...मेरा पूरा परिवार मेरे साथ खड़ा था ... सबको ,,सब कुछ अमीना ने बता दिया था ...फिर भी मन बैचैन था ..तभी दूर धुंधलके से एक लाठी के सहारे आती अमीना दिखाई दी ...मेरी पोती सुशीला उसको सहारा देकर मेरे करीब ला रही थी ...ये बकवास लिखा है लिखने वाले ने कि सच्चा प्यार किसी को नही मिलता मुझसे सिर्फ कुछ कदम की दूरी पर मेरी मुहब्बत मेरी ही तरफ बढ़ती जा रही थी .... मेरा इश्क मुकम्मल हो रहा था ...मुझे मेरी अमीना मेरा पहला और आखरी इश्क मिलने ही वाला था ...दिल ..दुनिया से जीतने ही वाला था कि तभी दिल ने धड़कना छोड़ दिया ...लेकिन मजाल नही आँखों की ..कि झपक जाये ...अमीना दिल में जिंदगी भर रही और आज उसे आँखों में लेकर उससे विदा हो गया ...पता नही कब तक रोई होगी उसकी अँधेरी आँखें लेकिन मुझे बस ये मलाल हमेशा उसके इन्तेजार में रहेगा कि मेरा आखरी सवाल अधूरा और बेजवाब ही रह गया ...

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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