#मूरत
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" ओ हलुमान ...आ ...मेले पीछे आ ...पतल मेले तो पतल "
भारत जिस वक्त सिर्फ सरदार पटेल की मूर्ती के इर्द -गिर्द जमा था ...और वो विशाल परन्तु निर्जीव मूर्ती जब राजनीति और एक दूसरे को ऊँचा -नीचा करने का तराजू भर बन गई तब मैं बजरंगपुर का एल.आई.यू सब इंस्पेक्टर था ,,, और विवादों का केंद्र बजरंगपुर उस दौर सिर्फ एक मूर्ती के कारण जल रहा था ....
वो मूर्ती जो अचानक ईदगाह पर एक ही रात में खड़ी हो गई या फिर प्रकट हो गई ...खुदा बेहतर जाने ...लेकिन जो भी हुआ उसके बाद अलीनगर का नाम बजरंगपुर हो गया ,,, सियासत के सूरमा बजरंगपुर की जमीन चूमकर अपनी सियासत चमकाने को आतुर दिखने लगे ...नये -नये नेता भी त्रेता के रामभक्त के नाम से कसमें खाने लगे ....
इसमें सियासत सिर्फ सनातन की नही चमकी बल्कि इस्लाम के नुमाइंदे भी अपनी जमीन तलाशने लगे ...फिर शुरू हुई छींटाकशी ..और नफरत की बारिश ....
मैं रहमत बख्श ,, अर्जी और मर्जी से भी खुद को बजरंगपुर तबादला होने से न बचा पाया ... और फिर भारत एक और विवादास्पद भूमि का केंद्र बन गया ....
बाबरी विध्वंस की तर्ज पर इस बार कुछ ऐसा न घटे इसलिए प्रशासन ने पूरी पकड़ और तैयारी से इस मसले को गम्भीरता से ले रखा था और ईदगाह फिर ईदगाह न रहकर छावनी में तब्दील हो गई ....
सिर्फ सेना ही वो सन्तुलन था जिसपर भरोसा किया जा सकता था ...लेकिन मुझे ये जिम्मेवारी मिली थी कि आखिर मैं हनुमान की इस मूरत का सच पता कर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करूँ ....
हाँलाकि मैं एक मुसलमान हूँ और महकमें में बहुतेरे लोगों ने इस बात पर ऐतराज किया कि मेरी नियुक्ति और उक्त विषय में रिपोर्ट अवश्य पूर्वाग्रह से सम्बंधित होगी परन्तु मेरे साहब जनाब नीलकंठ शास्त्री को मेरी निष्पक्षता और योग्यता पर पूरा भरोसा था ...
मैंने शुरुवात की ईदगाह से और हनुमान की उस मूरत का सम्पूर्ण जायजा लिया ...मुझे प्रथमया ही लग गया था कि मूर्ती यहाँ लाकर रखी गई है ...क्यूँकि मूर्ती के जमीन से निकलने के प्रमाण कुछ भी नही थे ....ये बात मुझे मेरे एक अजीज पुरातत्व विभाग के साथ आये कर्मचारी मित्र गणेश परमार ने भी कही ...
लेकिन ये कहना और अपनी रिपोर्ट में इसे शामिल करना मेरे लिए ही नही बल्कि एक हिंदू ऑफिसर के लिए भी कठिन होता क्यूँकि देश का माहौल और राजनीति अब हनुमान के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गई थी .....
लेकिन मैंने अपने साहब को मिलकर ये बताया तो उन्होंने मेरे कन्धे पर हाथ धरा और बोले -
" चैन की साँस लो रहमत ये प्रकरण अब न्यायालय में पहुँच चुका है और अब न्यायालय द्वारा निर्धारित जाँच कमेटी ही इस प्रकरण पर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी ...बाकि अब तुम माहौल पर नजर रखो "
मैंने मन ही मन सोचा कि कैसे एक जरा सी मूरत ने देश को फिर एक नया मुद्दा दे दिया ....मैंने मन ही मन "नीच" और "वतनफरामोश" कहा उस शख्स को जिसने भगवान को भी अपनी सस्ती राजनीति का मोहरा बना दिया ...
शाम को जब मैं बजरंगपुर की गश्त पर था तो मैंने पाया अब बजरंगपुर दो समुदायों को अलग से चिन्हित करने का अड्डा मात्र बन गया ...
हर दुकान का नाम बजरंग बलि के विभिन्न नाम के पर्याय में बदल चुका था ...तो दूसरा खेमा अली के नाम पर अपनी जमुना,, गंगा से काट चुका था ....
" भगवन अविनाशी है अमर हैं और कलयुग में भी अपनी उपस्थिति देने हेतु पधारें है ...तो बोलो रामभक्त हनुमान की ...."
भक्तों ने जय का नारा तो दिया लेकिन मैंने एक पिद्दे टोपी लगाये मुसलमान लौंडे को भी जय बोलते सुना ....
हाँलाकि बचपन का न कोई मजहब होता है न कोई ठोस अक़ीदा लेकिन वो बच्चा मुझे बेहद प्यारा लगा ..क्यूँकि वो इस पूरे मुहल्ले में सिर्फ एक इंसान था जिसे इस फालतू के मजमें से कोई लेना -देना नही था ....मैं उसकी तरफ बढ़ा तभी एक औरत ने आकर उसका हाथ पकड़ा और उसे अपने साथ ले गई ....
वो औरत जिसके एक काँधे में हाथ की बुनी टोकरियाँ थी ....और दुसरे में उस नन्हें मासूम का हाथ ....
अगले दिन आग तब और लग गई जब शहर से 12 मील दूर के एक हनुमान मन्दिर से हनुमान की मूर्ती चोरी होने की सूचना मिली और शहर काँप सा गया .....
जिले के कप्तान और जिलाधिकारी के हाथ-पैर फूल गए ...और मिनटों में भारत की पत्रकारिता ने इस खबर को भारत के हर गली -मुहल्ले में पहुंचा दिया ....
मेरे लिए बजरंगपुर अब दंगों की सम्भावित जमीन बनने वाला था ....जिस घड़ी भारत के राजनेताओं को जनता से शांति और भाईचारे की अपील करनी थी उसी घड़ी में वो जनता को बाँटने वाला जहर उगलने लगे ...
मैंने बजरंगपुर के माहौल की खबर जब जिले के पके हुए पुलिस कप्तान को दी तो उन्होंने सर पर हाथ टेक लिया और कुछ देर की ख़ामोशी के बाद बोले -
" रहमत भगवान नही हूँ मैं ..वरना पूछ लेता बजरंगबलि से कि अब आप के पास कोई रास्ता हो तो बताओ ...?
रहमत पता नही क्या होगा अब ..? मैं चाहुँ तो मिनटों में इन दोनों और के जहरीले नागों के फन को कुचल कर इन्हें पिटारे में डाल कर माहौल खामोश कर दूँ लेकिन मुझे ऊपर से बस स्थिति पर नजर बनाये रखने के आदेश मिलें हैं "
मैं समझ चुका था ये पूरा राजनैतिक प्रपंच है....और बड़े से बड़ा अधिकारी इस प्रकरण में शक्ति विहीन ।।।
छिटपुट झड़प की घटना भी प्रकाश में आने लगी ...और भारत की तमाम सामाजिक और आर्थिक समस्याएँ मीडिया से रिक्त और लावारिस हो गयीं ...पूरा दिन भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया इस घटना को राष्ट्रीय घटना बना चुका था ...
खैर ! अगले दिन जब मैं शहर से बाहर का माहौल जाँचने गया ... तो मैंने पाया वो औरत मलिन दो चार घास -फूँस के कंजड़ मकानों के अहाते में बैठी है और उसका वो पिद्दी लौंडा ...पत्थर का एक बेजान अवशेष एक घेरे के अंदर रखकर उससे कहता है कि -
" ओ ! हलुमान ...आ मेले पीछे आ...पतल..मेले तो पतल "
बड़ा मुस्कुराया मैं.... ठहाका लगाने ही वाला था तभी एक आवाज सुनाई दी .....
" अरे मनहूस ! पूरे शहर में बवाल करवाने के बाद भी तेरे कलेजे को सुकून न मिला ...आज तेरी खबर लेती हूँ ...रुक तू रुक ..."
उसकी माँ ने एक पक्की लकड़ी उठाई और उस मासूम की और दौड़ी और मैं भी
जैसे ही उसकी माँ उस तलक पहुँची और उसने संटी उसकी और लहराई वैसे ही मैंने एक हाथ से उस मासूम को गोद में उठाकर दूसरे हाथ से लहराई वो संटी पकड़ ली !
पागल हो गई हो क्या ...भला कोई अपने बच्चे पर इतना बेरहम होता है
" साब आप नही जानते छोड़ दीजिये इसे ...पूरा शहर इस शैतान ने करबला बनाने की ठान ली है ...और अब भी ..."
" क्या मतलब ...? कय्या ...क्या मतलब क्या है तुम्हारा ..?"
वो औरत अपनी कही बात पर काँप सी गई ....
" बताओ बहन ..वायदा करता हूँ किसी से नही कहूँगा वरना पुलिस का आदमी हूँ ...पूछने के सौ तरीके हैं मेरे पास !"
वो घुटनों पर बैठ गई और अपनी और अपने बच्चे की जान की भीख माँगने लगी ....और बोली
" साहब ये मेरा बेटा रिहान है ... साहब उस दिन में टिकरी गई थी ..टोकरी बेचने वास्ते ...हुनमान जयंती के दिन ...जब टोकरी बेच कर घर आई तो देखा मेरी एक टोकरी में हनुमान की मूर्ती है ...वो मूर्ती उस मन्दिर की थी ...जिसको इस शैतान ने चुपके से चुरा लिया ...मैं देखकर सन्न रह गई सोचा अगली दफा फिर वहीँ चुपके से छोड़ आऊँगी...लेकिन ये उस मूर्ती को अपना दोस्त मानने लगा...गरीब से हद गरीब हूँ साहब और इसके अब्बू भी बीमारी के चलते न रहे ...इसका भी कोई कुसूर नही ..इसका हुलिया और गरीबी देख कोई इसके साथ खेलता नही ..यहाँ दो चार घर हैं लेकिन किसी का कोई बच्चा नही ...ये मासूम जहाँ अपने बचपने के लिए तरसता है वहां अपनी उम्र की संगत के लिए भी .इसलिए हनुमान की उस मूरत को अपना दोस्त मान दिन -भर उसके साथ खेलता और उसी के साथ सोता ... उस दिन ईदगाह में उसी मूर्ती के साथ खेलने लगा और वहीँ भूल आया ....और फिर "
वो बात पूरी नही कर पाई और मैं सब समझ गया ...लेकिन अगर मैं ये किसी को समझाऊँ तो कोई नही समझेगा ....बहरहाल जेब में जो कुछ पड़ा था वो छोड़ आया और वापस लिए वो लफ्ज जो मैंने उस शख्स के लिए निकाले थे ...जिसने मूर्त चोरी की थी।।।।
रिहान और हनुमान की दोस्ती तो समझ में आई लेकिन जो अब तलक समझ से परे है वो है ...उस सोच का समझ में न आना जिसे लोग अपना -अपना मजहब कहते है.....
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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