#ड्रिंक_रिलेशन_SHRINK
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"पहले उन्होंने मेरे कूल्हे पर हाथ फेरा और फिर छाती को मसल दिया ..."
मैं सन्न रह गई ...और कुछ आवाज जमा करके चीख कर बोली -
" छोड़िये ससुर जी .."
मैं सुमन लता , आयु 25 वर्ष ... रंग मोती के खोल सा ..बहुत ही नखरीली और तूफ़ानी हूँ ,, गाँव में सबसे सुंदर और बाँकी रही हूँ ..बहुत मनचले मेरे प्रेम में मन्दिर-मदिरालय भूले हैं ..विश्वास नही होता तो सुनिए सीनियर स्कूली बच्चे भी मेरे अंगों की सुगंध से अपरिचित नही ...गाँव में कोई ऐसा नही जो मुझे देख आँहें न भरता हो .. लेकिन किसी की हिम्मत नही कि मेरे ऊपर फिकरा कस सके ..क्यूँकि मेरे पिता एक समाजसेवी हैं .. मैं क्यूँ बिगड़ गई इसका सीधा सा जवाब ये कि मेरी माता ग्राम प्रमुख का पद वर्षों से सम्हालती रहीं है और पिता अक्सर घर से बाहर समाज सेवा में संलिप्त हैं... लेकिन मैं सिर्फ जलाना जानती हूँ ...ऐसा कोई मर्द नही कि जिसको मैंने अपनी जवानी सौंपी हो ....लोग मेरे बारे में किस्से खूब उछालते हैं ..अपनी बेटियों को मेरी संगत से रोकतें हैं ...लेकिन लोगों में सिर्फ औरतें शामिल है जबकि उनके पिता खुद मेरी जवानी के चस्के गॉंव के एक मात्र मदिरालय में चने ,पापड़ के साथ चबाते और गटकते हैं ...गाँव का मेला हो ..या कोई दूर -पार का बाजार सब मुझसे ही महकता है सब मुझसे ही गुलजार ।।
गाँव की रामलीला में सबकी नजरें राम के अभिनय पर कम और मेरे स्वांग पर ज्यादा टिकी होती ..मैं शर्तिया जानती हूँ कि एक सेकेण्ड में आँखों से आग कैसे लगाई जाती है ..
लेकिन शहर कभी नही देखा मैंने ..मतलब गयीं हूँ गाड़ी -बस से और जाकर लौट आई ...लेकिन उतर कर उसको बाँहों में भरने का सौभाग्य मुझे कभी नही मिला ...लेकिन मैंने अपने गाँव को अपने इकलौते दम पर शहर बनाया हुआ था ...
मैं पहली लड़की रहीं हूँ अपने गाँव की ..कि जिसने पहली बार जीन्स पहनी ..और वो भी चिपकी वाली ... गाँव की साँसों और नसों में आग लगाने के बाद मुझे ये लगने लगा कि मैं शहर चली जाऊँ तो क्या नही कर सकती ...
हीरोइन बनना मेरी पहली ख्वाहिश रही है ...लेकिन इसका ये मतलब हरगिज नही कि मैं पढ़ने-लिखने में पीछे रही ..शहर की खराब हवा के चलते बी.ए प्राइवेट किया ...बाबूजी परीक्षा दिलाने अपने साथ ले जाते और अपने साथ ही लाते .....बाबूजी बहुत नेक इंसान हैं लेकिन एक खराबी है उनमें वो रात को शराब जरूर पीते है....और उसके बाद माँ की बुरी हालत ...ही ही ही ...मतलब कभी -कभी तो मेरे सामने भी माँ के गाल चूम लेते हैं ...
इसी बीच मेरे लिए शहर से एक रिश्ता आया ... आकाश नाम था उसका ,, मेरे ही जोड़ का था ...पता नही क्या जादू था उसमें कि मैंने अपने रूप के अहंकार का कलश उसके प्रेम के सागर में विसर्जन कर दिया ...रात-रात भर हमारी फोन में बाते होती ...लेकिन आकाश जितना सुंदर.. सँजीला था उतना ही संकोची और बेहद शर्मिला भी ...मैं चाहती थी कि वो मुझसे मेरे अंगों के बारे में पूछे ...मेरा साइज ..मेरा रंग ...सब कुछ जाने ...कभी मुझसे किस माँगे तो कभी मेरे कपड़ों के बारे में कहे कि -
" क्या पहना है अंदर ..?"
लेकिन वो भोंदू था .. जब भी मैं उसको खदेड़ कर काम के रण पर लाती वो रण छोड़ कर समर्पण कर कहता कि " गुड नाईट "
वो सदैव अपनी स्वर्गीय माँ को याद करके मुझे बोर करता ..हमेशा उसकी विशेषता और महानता बखान कर मुझे पकाता ...हमेशा अपने पिता के धार्मिक एवं आध्यात्मिक स्वभाव पर सत्संग करता ....और जब मुझसे ये सब झेलना असम्भव हो जाता तो मैं झर्रा कर हड़बड़ाहट में कहती -
" अक्की बाबू जी जाग गयें हैं " गुड नाईट "
मुझे ये भी लगता कि अक्की और उसके पिता शहर के लायक ही नही इनका तो हिमालय या गाँव में होना ही न्यायिक है .....
खैर शादी हुई और सुहागरात से ही लगने लगा कि इस घर में मेरी और मेरे पति की भूमिका मात्र कठपुतली की है ....सुहागरात के दिन भी बुड्ढा रात को बेटे को आवाज लगा कर बोलता है कि ब्रह्ममूर्त में उठ जाना एवं स्नान के पश्चात अपनी माता की तस्वीर पर माल्यार्पण एवं दीया -बत्ती करने के उपरांत ही पूजा करना ....
भाड़ में जाए ये धर्म -कर्म ,, मैं जितना प्रेम अपने पति से प्राप्त करना चाहती थी उसका एक चौथाई तो बूढ़ा मनहूस खा गया ...और हाय मेरी फूटी किस्मत घूंघट उठाने की जगह आकाश मुझे अपनी माता के स्वप्न सुनाने लगा कि वो अपनी बहू के प्रति क्या भाव रखती थी बेवकूफ़ पति ने उस रात सिर्फ एक बार ही मुझे बिस्तर पर मसला और सुहाग की उस रात का असम्मान करके अपने को इतिहास में अमर कर लिया ...
मेरा स्वभाव चिढ़चिढ़ा सा होने लगा ...और इसके पीछे था मनहूस ससुर ...मैंने शादी के दो महीने बाद ही ठान लिया कि इस मनहूस को एक दिन सबक सीखा कर रहूँगी ...हमेशा घर में रहता ...इस वजह से जो प्रेम के वो अनुपम पल कभी किचन , कभी बाथरूम , कभी अँधेरी बॉलकनी में घटते हैं वो भी मुँह चिढ़ाते रहे ...अक्की से कहा हनीमून में चलते हैं तो बुड्ढे की अस्थमा बीमारी का रोना ..रो-रोकर हमेशा टालते रहते ...
इस नर्क में एक दिन मुझे स्वर्ग सी अनुभूति हुई ...जब मैंने सुना कि पिताजी गाँव से आ रहें हैं ..
पिताजी के लिए मैंने मन से 56 भोग बनाये ...और आते ही सर्वप्रथम वो मेरे गले लग गए ...मुझे लाड़ किया आशीर्वाद दिया ...और ससुर से गप्पे लड़ाने लगे ....गप्पे लड़ाने के उपरांत मैंने देखा पिताजी अपने रुकने वाले कमरे में जाकर शराब पीने लगे ...शराब उनकी कमजोरी है ये मैं जानती थी लेकिन यहाँ ...?ससुर जी और अक्की क्या सोचेंगे ...?
खैर सब ने खाना खाया और सब अपने -अपने कमरे में चल दिए ..तभी अक्की का ऑफिस से फोन आया कि आज उनका रोमैंस का मूड है... और उन्होंने मुझे मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी खबर दी कि ....पिताजी कल तुम्हारे पिता जी अर्थात मेरे ससुर के साथ तुम्हारे गाँव कुछ दिन के लिए जा रहें हैं ...
मैं ख़ुशी से झूम उठी ...और मैंने आज की रात को ही अपनी असली सुहागरात मान लिया ...सबसे पहले मैंने पिताजी को देखा वो नशे में धुत होकर आधी खुली आँखों से बड़बड़ा रहे थे ...मैंने दरवाजा चुपचाप बन्द किया ...और ससुर का मैं जानती थी कि आँधी आये या तूफ़ान बुड्ढा अब सुबह 4 बजे ही जिन्दा होगा ...
अक्की चुपचाप कभी-कभी ड्रिंक करते हैं ...मैं सीधे उनके कमरे में गई और चुपचाप इस पल को नशीला बनाने के लिए मैंने उनकी बोतल निकाली और एक पैग बनाकर खुद पी गई ...ये मेरे जीवन की शायद सबसे बड़ी भूल रही ...और उसके बाद मैं नहाने चल दी ...नशा हल्का-हल्का अपना असर दिखाने लगा ..लेकिन मुझे मदमस्त कर रहा था ...मैंने अपने जिस्म के हर अंग को चमकाया ..और खुद को दर्पण में निर्वस्त्र निहारा ...उसके बाद मैंने शरीर में तौलिया लपेटा ...गीले बालों को खुला छोड़ दिया ...और फिर नशे के कम लगने के कारण एक पैग और बना कर पीया ...इस दूसरे पैग ने मुझे कटी पतंग बना दिया ...मेरे पैर मेरे काबू में नही थे ...चक्कर आने लगे तभी मैंने किचन की स्लैब को पकड़ लिया और तभी मुझे एहसास हुआ कि ससुर जी पीछे खड़े हैं ।
पहले उन्होंने मेरे कूल्हों पर हाथ फेरा और फिर मेरी छाती को मसल दिया
मैं सन्न सी रह गई और आवाज जमा करके चीख कर बोली -
" छोड़िये ससुर जी "
तभी एक भीनी डोर बेल मेरे कानों पर गिरी ....और उसके बाद मैं फर्श पर गिर पड़ी
अगले दिन आँख आकाश की बाँहों में खुली .. और सब याद आते ही मैंने उस नीच ..बुड्ढे को खूब -खरी खोटी आकाश के सामने सुनाई ...पिताजी भी वहीँ खड़े थे ...और ससुर की इस नीचता से वो सन्न और खामोश हो गए ....अक्की ने अपने पिता की ओर घिन की दृष्टि डाली और ससुर ने अपनी नजर अपने सामान पर ...और वो घर छोड़ कर निकल पड़े ....
आज इस घटना को पूरे 10 दिन बीत चुकें है लेकिन मैं इस सदमे से अब तक नही उबर पाई ...हाँलाकि अब अक्की और मैं अकेले हैं जो मैं चाहती थी लेकिन फिर भी इस घटना ने मेरे अंदर की वासना को मार डाला..मैं मन से चाहती थी कि उस मनहूस बुड्ढे का ये पाप सार्वजनिक हो ताकि कोई ससुर अपनी बेटी सरीखी बहु पर बुरी नजर न डाले ..लेकिन मेरे पास कोई सबूत नही था ...तभी मेरी नजर छत पर गई और सी .सी टी.वी कैमरे में जाकर अड़ गई जो सामने किचन भी कवर कर रहा था ...और मैं एकदम से खड़ी हो गई ...सवाल ये नही कि अब तलक ये कैमरा मुझे क्यूँ नजर नही आया ..? सवाल ये नही कि इसको किसने लगाया ..? जवाब ये था कि इसमें उस दिन की सारी घटना रिकॉर्ड अवश्य हुई होगी ...और मैंने जल्दी से मॉनिटर ऑन किया ...और दृश्य को 10 दिन पहले रिवर्स किया ....मैं बिलकुल वहीँ पहुँच गई जब मैं नशे में चूर थी और मेरे हाथ स्लैब पर टिके हैं ...तभी अगले पल जो मैंने देखा वो देखकर मेरी आत्मा मुझपर ही मोम बनकर गिरने लगी ...नशे में धुत मेरे पिता मेरे शरीर से ...छी ...उसके बाद मैं गिर पड़ी ...ससुर जी तभी प्रकट हुए और उन्होंने एक थप्पड़ मेरे पिता के गाल पर मारा और मुझे गोद में उठाकर मेरे बैडरूम में छोड़ आये ..और उसके पश्चात मेरे पिता को ....
मैं रोती .. बिलखती रही ...ससुर जी से माफ़ी माँगती रही ...और थूकती रही अपने पशु पिता पर ..तभी किसी नेमेरे काँधे पर हाथ धरा ...और अक्की को देखते ही मैं उनकी छाती से लगकर बिलख पड़ी ...तभी अक्की बोले -
" पिताजी ने मुझे चुप रहने के लिए कहा था और कहा था बहू जैसे ही मुझपर आरोप लगाये तुम मुझे घिन की दृष्टि से देखना और मैं चला जाऊँगा "
" क्यूँ अक्की ..क्यूँ ...क्यूँ किया ससुर जी ने ऐसा ..?"
" क्यूँकि पिताजी ने कहा था कि...न मानो तो ससुर फिर भी बाप नही लेकिन मानो या न मानो पैदा करने वाला बाप ..हर दशा में बाप ही कहलायेगा ...बहू इस सदमे को एक दिन बर्दाश्त कर लेगी कि.. ये सब उसके ससुर ने किया है लेकिन इसको कभी नही कि ये सब उसके पिता ने किया ..बल्कि मैं कहूँगा कि उस क्षण उसके पिता के शरीर और मन का रथ हाँकने वाली शराब ने "
मुझे नही पता ससुर पिता होता है या नही लेकिन मेरा ससुर भगवान है ये ज्ञात हो गया ....
" मैंने आँसू पोंछें और अक्की से कहा चलो भगवान को उसके मन्दिर ले आयें ...मुझे भगवान के पास ले चलो अक्की "
कदम बढ़ते रहे ..और दो इंसानों ने मिलकर भगवान को खोज ही लिया .....
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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