Tuesday, 19 February 2019

दहशतपरस्ती

#दहशतपरस्ती
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" काट डालो हरामजादे को  "

" पुलवामा का बदला लेकर रहेंगे "

मैं अक्सर जब भी रघुनंदन शास्त्री के घर के बिलकुल बाजू से निकलता हूँ तो कोई आवाज नही लगाता ,,,आवाज क्या मैं तो कोशिश भी ये करता हूँ कि उनको मेरा दाढ़ी वाला चेहरा न दिखाई दे ....एक होती है ईर्ष्या और दूसरा भाव जिसे घिन कहते हैं ...इन दोनों भावों के सम्मिलित प्रभाव को यदि 10 से गुणा कर दिया जाए तो फल में जो भाव हाथ लगेगा  बस वो ही भाव रघुनन्दन के मन में हम मुसलमानों के लिए है ।।।।

मैंने कई दफ़ा उनके मुँह से अपनी कौम के लिए जहरीले बयान सुने हैं ...कई दफा उनको पीर (सोमवार) बाजार में सस्ता धंधा करते अपने मुसलमान व्यापारी भाइयों पर अपने "शक्ति दल " से डंडे पिलवाते तक देखा है ...उनका मानना है कि मुसलमानों के बाहर से आकर व्यापार करने से क्षेत्र के अन्य हिन्दु मझोले व्यापारियों के व्यापार
में कमी आयेगी ।।।

निःसंतान हैं ...और मेरा मानना है भला ही हुआ अपितु साँप से सँपोले ही उतपन्न होते और जहर ही उगलते .....

लेकिन उनकी बेगम ...मतलब मेरी मुँहबोली बहन ...क्या कहने उस औरत का ...रत्ती भर भी विषैली नही ..और तो और बड़ी नेक खातून है ..बड़ी दिलवाली ..5000 रूपये उधार लिए थे शास्त्री के पीछे और आज तलक न लौटा सका ..कसम नम्बर 786 की ..कि 786 बार ही टकराई होगी लेकिन कभी नेक मेहरबां ने तकादा न किया ....

जम्मू -कश्मीर से हूँ मैं,, हर साल ठण्ड बढ़ते ही कम्बल , दुशाले लेकर महादेवपुर इसलिए आता हूँ क्यूँकि ये ससुरे सिर्फ कश्मीर से नफरत करतें है ...उसके बारे में और कुछ नही जानते ...थोड़ा कश्मीरी बोल दी ...सत्रह -अठरह झूठी कसम  खा दी ... तो झक से माल खरीद लेते हैं ...

कुछ तो एक- दूसरे को नीचा दिखाने के लिए शेखी में मुँहबोला दाम चुकाते हैं तो कोई शेखी में जौहरी बन जाते हैं कम्बल और दुशालों के ...और दिल्ली के मेरे माल को खुद कश्मीर के किसी गाँव से जोड़ कर धंधा और चमका देते हैं ....

लेकिन अब वो बात नही रही ...जब से माहौल खराब हुआ ...मसलन जब से दहशतगर्दी ...पत्थरबाजी और ये बेलगाम नारे -वारे शुरू हुए ....तब से मुझसे माल खरीदना तो दूर कोई सीधे मुँह बात नही करता ...मैंने इस कस्बे की हर गली ..हर घर का पानी और नमक चखा है ...हर जवान को बूढ़ा और हर बच्चे  को जवान होते देखा है .....

लेकिन अगर मैं कुछ नही देख पाया तो इनके मन में जवान होती नफरत को ....पहले " खान भाई " का लक़ब था मेरा ...जैसे ही बस से उतर पहला कदम  बस्ती में डालूँ तो लगता था जैसे अपने दूसरे घर दाखिल हो गया ....

बड़ी इज्जत करते थे सयाने ..बड़ा रूतबा देते थे बुजुर्ग ...और बेपनाह मुहब्बत करते थे बच्चे ....

हाँलाकि आज भी इस बस्ती का एक भी बाशिंदा मुझसे नफरत नही करता लेकिन मेरे मजहब ..मेरी मादरे जमीन कश्मीर से इनकी नफरत हर सर्दी कुछ बढ़ती ही जा रही है ...

जब 19 का था तब इस कस्बे में इत्तेफाक से माल बेचने उतर गया था ...और गाड़ी से उतरते ही धक्का लगा था ...लेकिन आज जब धर्म के जोश में तर एक नौजवान ने मुझे काँधा मारकर गिरा दिया और कहा -

" देख खान ! आइंदा से अब इस बस्ती में न घुसियो वरना इज्जत -विज्जत सब भूल के बारह कर दूँगा "

जिंदगी ने बेशुमार धक्के दियें हैं मुझे ... इकलौता बेटा सरहद लाँघ कर दहशतगर्द बन या और एक दिन फौज की टुकड़ी पर बम बाँधकर फट गया ... ... खैर आम पाकिस्तान परस्त कश्मीरी इस वास्ते मेरे लौंडे की इज्जत करते है ...और उसे शहीद कहतें हैं .....लेकिन मैंने उसपर आखरी बात तभी फक्र किया था जब वो बोला था -

" अब्बू मिलटरी में दाखिल होकर मिलटरी बाला बनूँगा "

पीछे छोड़ गया चार बहनें और एक खामोश माँ ....खैर

तभी जलेबी चासनी में डुबोते ...नंदलाल भाई उठ खड़े हुए और उस लौंडे के आगे तन के खड़े होकर उसके मुँह पर एक करारा तमाचा देकर बोले -

" नीच ! काश तेरे पैदा होते ही मैंने तेरा गला घोंट दिया होता ...तेरे बाप की उम्र से भी ज्यादा उम्र है इनकी ....खान भाई हैं ये ...गोद में खिलाया हैं इन्होंने तुझे ...शरीर में आग से चकत्ते छप गए थे तेरे ...तो कम्बल यूँ ही दुकान में फेंक सीधे लौटे थे कश्मीर और पहले तेरे लिए जड़ी लाये थे ये ....माफ़ी माँग इनसे ..अभी के अभी "

नौजवान था ..और आज
का नौजवान ...और कुछ एक हमउम्र लड़किया भी देख रहीं थी उसकी वरना जरूर माफ़ी माँग लेता ....

नंदलाल भाई की दुकान पर बैठने वाली स्टूल से पानी की कुछ बूँदे झाड़ी और जैसे ही बैठा तभी रघुनंदन हाजिर हुए और बोले -

" देखो खान ! हम तुम्हारी इज्जत करतें है ...लेकिन तुम भी हमारी इज्जत बना के रखो ...आगे से मैं नही चाहता तुम बस्ती में वापस कभी दिखो "

बड़ा मुश्किल था सब सुनना ...क्यूँकि रघुनन्दन को ये महज एक बस्ती लगे  लेकिन मेरी जवानी और खड़ा बुढ़ापा सब इसपर कुर्बान हो गया ....अब इस उम्र में और कहाँ जाऊँ ...लेकिन रघुनंदन से उलझना या कोई सवाल करना पत्थर पर सर सेंकना था ....

चाय पी ...और आगे बढ़ने लगा ...सोचा अब वैसे भी यहाँ कुछ नही रह गया ...न पुराने लोग ..न पुरानी मुहब्बत ..और न यकीन ।।

और इनमें इन लोगों की कोई गलती नही ...अल्लाह जहन्नम नसीब करे मेरे बेटे और उस जैसे उन तमाम दहशत परस्तों को जिन्होंने एक आम से मुसलमान की भी जिंदगी बारूद के ढेर में बैठा दी ...

वतन हिन्दुस्तान छपा है मेरे कागजातों में ...और यही मेरा मुल्क है ...मेरा बाप बेहतर वतनपरस्त था और चचा फौज में ...लेकिन पता नही कौन जहर घोल गया मेरी मादरे जमीन में कि आज वहाँ उन लोगों की तादाद बढ़ती ही जा रही है जो न मुल्क से मुहब्बत करतें है ...न फौज से ...न उन लोगों से जो हिन्दुस्तान को अपना मुल्क मानते है ...

सिर्फ मुसलमान ही नही ...इनकी वजह से मेरा मजहब ..मेरी किताब..मेरे मजहब के  पैगम्बर पर भी लोग अँगुली उठाने लगे है जबकि जियादह दूर न जाऊँ तो वही किताब हमीद ने भी पढ़ी ..अशफ़ाक ने भी ...डाक्टर कलाम साहिब और मैंने भी तो ....और उन तमाम मुसलमानों ने जो आज वतनपरस्ती के मद्देनजर इन दहशतगर्दो की बम -बन्दूक का शिकार हो रहें है .....

खैर !  जैसे ही बस अड्डे पहुँचा ...अफरा-तफरी का माहौल लगा दिखा ....

" ये साला मुल्ला है ...मारो इसे "

"कश्मीरी है हरामखोर छोड़ना मत "

" काट डालो हरामजादे को "

" पुलवामा का बदला लेकर रहेंगे "

एक भीड़ का गुच्छा मेरी जानिब तेजी से बढ़ा ...न मेरे पैरों में इतनी जान थी और न मेरे जिस्म में की भाग सकूँ या इनसे खुद को बचा सकूँ....

मौत सिर्फ कुछ कदम की दूरी पर थी मेरी ...उनके हाथ में हाँलाकि कोई धारदार हथियार नही था ...लेकिन वो जवान थे ,,उनके कुछ मुक्के और लातें मुझे खत्म करने के लिए काफी थे .....मैंने काँधे से कम्बल गिराये ...और घुटनों के बल बैठ गया ... आँख बन्द की और याद आया अपनी बेगम का चेहरा ...फिर अपनी चार बिन ब्याही बेटियों का चेहरा जिनकी इस वजह से अच्छे घर में शादी न कर पाया क्यूँकि कोई इज्जतदार मोमिन दहशतगर्द के परिवार से रिश्ता नही जोड़ना चाहता था....और किसी और से इसलिए नही क्यूँकि वो दहशतगर्दी में फिर कभी भी राख हो सकते थे ....

भीड़ की आवाज बेहद करीब पहुँच गई और मैंने वहीँ अल्लाह की बारगाह में सजदा करके कलमा पढ़ा और अपने और  अपने बेटे के तमाम गुनाहों के लिए खुदा से माफ़ी माँगी ।।।

" रुक जाओ ! ....लौट जाओ !... वरना खान से पहले तुम्हे मेरी लाश गिरानी होगी "

एकदम से सन्नाटा तारी हो गया ...मैंने सजदे से उठ कर उस शख्स का चेहरा देखा और होंठ बुदबुदाये

" रघुनन्दन भाई आप ...?"

खैर मजमा छँट गया ...रघुनन्दन ने मुझे  सहारा देकर उठाया और बोले -

" खान इसलिए कह रहा  था कि अब वापस मत आना अब ...क्यूँकि सब बदल चुका है अब ...मैं जानता हूँ तुम निर्दोष हो ..बहुत मुहब्बत करते हो मुल्क और मुल्कवासियों से ...लेकिन कोई इसलिए मानने को अब तैयार नही क्यूँकि तुम्हारे ही हुलिये और मजहब के लोग इस मुल्क से उसके बच्चे ..उसका भविष्य छीन रहें है ... खान बेऔलाद नही हूँ मैं ...मेरा भी एक बेटा था ...जो तुम्हारी तरह मुल्क से बेहद मुहब्बत करता था ...फौज में भर्ती हुआ ...और अपनी शादी के महज 3 दिन पहले दहशतगर्दो की गोलियों का शिकार हो गया ....तब से मेरी जिंदगी ही बदल गई ....खैर जाओ ...जल्दी अपनी मादर ए जमीन पहुँच जाओ "

मैं बस रघुनन्दन को देखता ही रह गया ... और समझ गया कि दहशतगर्दी  जहाँ मासूम इंसानों की जिंदगी छीन लेती है वहीं समाज में कुछ  इंसानों से उनकी भली आत्मा  को रघुनन्दन बनने पर मजबूर भी कर देती है ....

और जो इसके बाद ये चिल्लाये कि रघुनंदन जैसे लोग इस्लाम के दुश्मन है तो उनसे सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा कि रघुनंदन नही बल्कि इस्लाम का इस वक्त  अगर कोई सबसे बड़ा दुश्मन है तो वो है सिर्फ दहशतगर्द और दहशतपरस्ती .......

बाकि 5000 थे जेब में जो रघुनंदन की बेगम का कर्ज था मुझपर सिर्फ ये सोच कर वापस नही किये कि इसी बहाने कभी फिर इस बस्ती में क्या पता लौटना आसान हो सके

नवाजिश

Junaid Royal Pathan

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