#नाउ_प्लीज_डोंट_डिस्टर्ब_अस
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" शर्म कीजिये ! मैं आपकी बेटी की उम्र की हूँ "
मैं सिर्फ गजलों का शौकीन हूँ ..और वो भी सिर्फ उन गजलों का जिनके अशआर मुझे समझ में आते हैं ..संगीत की परख-वरख नही है और फ़िल्में देखना मुझे बेवकूफी से भरा काम लगता है ..पढ़ने की बचपन से कट्टर सनक है ..इसलिए अक्सर दूध में ब्रेड डुबोना अब मेरी नियति और मेरा डिनर है ..अविवाहित हूँ न इसलिए !
बचपन अभावों के साथ संघर्ष में बीता और एक डिग्री कॉलेज का प्रोफ़ेसर बनते-बनते पता ही नही चला कि कब उम्र रेत की तरह जिस्म से फिसल गई !
आज 55 की उम्र के मयार पर खड़ा हूँ ..सफेदी चढ़ गई है बालों में ..पेट भी निकला है ..और खाल पर हल्की तो कहीं गहरी झुर्रिया चढ़ गई हैं ..सुबह योग से शुरू होती है मेरी और दिन कब्ज पर बन्द होता है ..लेकिन न जाने क्यूँ दिल हमेशा खुला रहता है मेरा .. एक उम्मीद शायद मेरे दिल को अब तक जिन्दा रखे है ..वो उम्मीद जिसका न रंग मुझे पता है ..न कद और न वुजूद ..लेकिन महसूस करता हूँ कि कुछ तो है ..जो होना अभी बाकि है ।।
स्टूडेंट्स को फिजिक्स प्रैक्टिकल करवा रहा था ..कान्वेक्स लैंस वाला तभी उसे एडजस्ट करके मैं पीछे पलटा और और मेरा जिस्म नम्रता के जिस्म में धँस गया ...और मेरे जिस्म की नस-नस में एक नंगा करंट दौड़ गया ..ये एहसास ये छुअन मेरे अब तक के जीवन के समस्त एहसासों में नई ..अनूठी और बेहद अंतरंग थी ...
हाँलाकि नम्रता ने इसे लाईट ट्रीट किया ..मगर मेरी रातों की नींद उड़ने लगी थी ..पता नही क्यूँ एक पल में मुझे अपने आप से घृणा होने लगी ..कि क्यूँ अब तलक इस एहसास से मैंने स्वयं को अपरिचित रखा .?.अब सब बदलने लगा था बोझिल गजलों की जगह हिंदी फिल्मों के रोमेंटिक गाने लेने लगे थे ..बालों की सफेदी आँखों में चुभने लगी थी ..फूले हुए पेट को ढाँकने के लिए जिम ज्वाइन कर लिया और एक न्यू फेब्रिक कलेक्शन के साथ अब मैं भी नया सा लगने लगा था ...
अब किताबें नही नम्रता सिर्फ नम्रता की फेसबुक प्रोफाइल खुलती थी ..जब भी वो मेरे वादन में होती मैं उसके रूप की ही वन्दना करता ... दिन भर चोर नजरों और स्थानों से उसको ताँकता ...नम्रता का छरहरा शरीर परन्तु सुडौल अंग मेरी आँखों में बसने लगे थे .. अब रात को तकिया सर के नीचे नही बल्कि नम्रता के ख्यालों में कभी छाती तो कभी टाँगों के मध्य में होता ..लेकिन जितना नम्रता में शामिल होता गया ये भावनाएँ निश्छल प्रेम में बदलती गईं .. अब किसी के अंकल कहने पर भी ऐतराज होने लगा और स्टॉफ की अधेड़ लॉबी से अब कटने लगा ...और मन युवा मौज की जल तरंग में नाचने लगा ...,
अब नम्रता भी मेरी तरफ आकर्षित होने लगी ..जब भी मुझे देखती स्माइल देती ..हमेशा मेरे पास बने रहने के अवसर ढूँढती रहती ...कभी -कभी मन झल्ला जाता जब कॉलेज के लड़के नम्रता को देख लार टपकाते ...काबू न रहता खुद पर और लगता जा कर कह दूँ नम्रता से कि तुम ये टाइट जीन्स और शार्ट टॉप पहनना छोड़ दो ....
लेकिन एक दिन जादू हुआ जो बात जुबान न कह पाई उसे शायद मेरी आँखों ने नम्रता से कह दिया ...वो सलवार कमीज में आते हुए मुझे दूर से दिखाई दी ...और उसे देख मेरे हाथों में जकड़े आइन्स्टाइन और न्यूटन भर्रा के नीचे गिर पड़े ....जब मैंने किताबों को उठाया तो नम्रता ठीक मेरे सामने खड़ी थी ....और जुल्फों के रेशों को बाँयें कान पर चढ़ाती हुई बोली -
" कैसी लग रही हूँ सर ..?"
हाय ! मैं उसको कैसे कहता कि तुम जलता हुआ एक माहताब लग रही हो ...
लेकिन अब ये पक्का था कि आग दोनों तरफ बराबर लगी हुई है ...अब मैंने मन ही मन सपने सँजोने शुरू कर दिए ...और सोच लिया कि नम्रता हो हासिल करके रहूँगा..,कुछ 3-4 साल बचें है नौकरी के तो स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले लूँगा ...और नम्रता को अपने साथ कहीं दूर लेकर चला जाऊँगा ...लेकिन अब सवाल ये कि नम्रता को कहूँ कैसे ...?
हर वक्त रिहर्सल मॉड में रहता ...हमेशा मिरर को डेमो देता ...और आखिर वो दिन आ ही गया ..जिसका मुझे इन्तेजार था ....स्टूडेंट्स फेयरवेल ...नम्रता का आज कॉलेज में आखरी दिन था जब वो कॉलेज के प्रोग्राम देख रही थी ....तभी मैंने उसको व्हाट्सअप मेसेज किया और अपने मन की सारी बात उसे मेसेज कर दी
उसका रिप्लाई कुछ देर बाद आया
" शर्म कीजिये ! मैं आपकी बेटी की उम्र की हूँ "
उसको पढ़ते ही मेरे एहसासों के परखच्चे उड़ गए ..मैं जगह -जगह बिखर गया ...आत्मग्लानि से मैं स्वयं के भीतर ही मोम की तरह पिघलने लगा ...
आज इस घटना को 10 साल हो गयें है ...इस घटना के बाद मैंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली ...और आज एक अनजान जगह अपनी जिंदगी के बासी दिन काट रहा हूँ ...मैं हर रोज खुद को मारने की कोशिश भी करता हूँ लेकिन पता नही क्यूँ मैं अपनी जान नही ले पाता ...घर से निकलना पूरी तरह छोड़ दिया है ..ये आत्मग्लानि मेरे शिक्षक जीवन पर एक कलंक बनके मेरे साथ पल रही है ....एक गुरु होकर क्या मुझे हक था अपनी ही शिष्या से प्रेम करने का .?..कोई भी इसका जवाब देगा तो कहेगा ..ऐसे शिक्षक को तो सूली पर चढ़ा देना चाहिये ... मैं नम्रता का एहसानमन्द रहा कि उसने इसके बारे में कभी , किसी को कुछ नही बताया ...लेकिन मैं अपने आप को रोज बताता हूँ कि मैं पापी हूँ .....इसी उधेड़बुन में एक दिन जब मैंने साहस बटोर कर अपनी कनपटी पर गन रख कर अपने को शूट करना चाहा ....
तभी दरवाजे पर किसी ने धमक दी ..मैंने दरवाजा खोला और देखा सामने पोस्टमैन खड़ा था ...उसके हाथ में एक खत था -
मैंने उसके हाथ से खत लिया और पढ़ना शुरू किया -
" सर मुझे माफ़ कर दीजियेगा ..सर मेरा नाम नकुल है ...आपका स्टूडेंट नकुल ...सर मैं नम्रता से बेहद प्यार करता था ..लेकिन वो पता नही क्यूँ आप से प्रेम करने लगी...इतना प्रेम कि उसने मेरे प्रेम प्रस्ताव को भी ठुकरा दिया ...वो आपके साथ जीना चाहती थी ...लेकिन वो आपसे कभी ये कह न सकी ...उसे लगा कि आप न जाने क्या रियेक्ट करेंगे ...सर ! उस दिन जब आप ने नम्रता को मेसेज किया तो वो परफॉर्मेंस के लिए स्टेज पर थी और उसका मोबाईल मेरे पास था ...और मैंने ही आपको वो मेसेज किया था ... सर नम्रता ने शादी नही की ...उसे हमेशा आपके लौटने का इन्तेजार था ...आप बिन बताये कहीं चले गए ...और मैंने नम्रता से कहा मैंने सर को सब कुछ सच बता दिया और वो सच सुनकर सर हमेशा के लिए तुझसे दूर चले गए ....मैंने उससे ये भी कहा कि सर ने कहा है कि अगर तूने कभी उनको फोन करने या मिलने की कोशिश की तो वो खुद को खत्म कर लेंगे ....सर बहुत देर हुई आपका पता लगाने में .. सर नम्रता आज इस दुनिया में नही है ...उसके दिल में छेद था ...वो छेद जिसे आपके प्रेम ने भर सा दिया था ....सर मैं माफ़ी के लायक नही हूँ लेकिन क्या ये रिश्ता सही था ...?"
"मैं नही जानता कि ये रिश्ता कैसा था ...मैं नही जानता कि ये सब कैसे और क्यूँ हुआ ...लेकिन मैं सिर्फ नम्रता को जानता था ..वो नम्रता जो मुझसे यानि एक उम्र के हाँफते इंसान से प्यार करती थी ...वो नम्रता जिसने मेरे बाद फिर कभी प्रेम नही किया ...समाज इसे किसी भी नजरिये से देखे लेकिन प्रेम का कोई नजरिया नही होता ...समाज इस प्रेम को पाप कहे लेकिन पाप तो वहाँ होता है जहाँ प्रेम न हो ...जहाँ प्रेम उपस्थित होता है वहाँ तो फिर ईश्वर होता है ...और जहाँ ईश्वर हो वहाँ पाप का कोई अस्तित्व नही होता ... समाज इसे कभी समझ नही पायेगा ...फिर समाज ने प्रेम को समझा ही कब है ..?"
गोली नही मारी खुद को ...बस बहुत देर तलक रोता रहा ...नम्रता का वो हँसता चेहरा ...वो सूट-सलवार में खिला उसका वुजूद मेरी आँखों में घूमने लगा ...आत्मग्लानि नही ..बल्कि आज आत्म संतुष्टि थी क्यूँकि मेरा प्रेम पाप नही अपितु एक त्याग था ....वो त्याग जिसने न फिर मुझे कभी चैन से मरने दिया और न नम्रता को चैन से जीने ....लेकिन मैं उसको अब अपने पास महसूस कर रहा हूँ ..किसी को ये मजाक सा लगे लेकिन सच्चा प्रेम मुर्दों में जान डालने की हैसियत रखता है .... नम्रता मेरे सामने बैठी है और मैं उसके सामने .....
"नाउ प्लीज डोंट डिस्टर्ब अस "
नवाजिश
Junaid Royal Pathan
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