Saturday, 9 February 2019

थैंक्स_तहमीना_माँ

#थैंक्स_तहमीना_माँ
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" ममा ! अलहान और दीनत तो भी बड्डे मैं बुलायेंदे न ?"

" नो ! आई सेड नो ...चलो गौरव  स्कूल बस आने वाली है .."

" त्यूँ ममा ...त्यूँ नही बुलायेंदे ? "

" बिकॉज़ वो मुस्लिम है ..डेट्स इट ...नाउ नो क्वेश्चन ..गो "

" व्हाट द हेल ...ये क्या गन्दगी भर रही हो एक मासूम के दिमाग में अंजली ...ये हिन्दू-मुसलमान का जहर कम से कम बच्चे के दिमाग में तो मत बोओ ...गौरव आज शाम को तुम्हारे सभी फ्रैंडस आयेंगे ओके ...प्लीज पापा को बॉय किस्सी करो "

" ओके ! डेट्स क्लियर ...अगर एक भी मुस्लिम बच्चा.. मेरे बच्चे के जन्मदिन में मुझे दिखा तो मैं अपने बच्चे के साथ ये घर छोड़ दूँगी राजीव ..और ये कोई धमकी नही मेरी कसम है "

सन्न सा रह गया मैं ...मन तो किया एक जोरदार तमाचा अंजली के गाल पर मार दूँ ..लेकिन बस दब सा गया ,, जब भी कोई कदम आगे बढ़ाने की सोचता हूँ ..अंजली के पिता के एहसान याद आने लगते हैं...अध्यापक थे वो , और बहुत नेक इंसान ,,आज अगर वो जिन्दा होते तो अंजली को जरूर फटकारते ..मेरे एक डॉक्टर बनने में उनका तन, मन , धन सब कुछ समाहित है .. एक गरीब किसान का बेटा था मैं ..माँ तो पहले ही बीमारी से चल बसी बाप को कर्जा खा गया ...आत्महत्या कर ली उन्होंने.. इकलौता बेटा था अपने पिता का .. ...मेधावी था पढ़ने में ..अंजली के स्वर्गीय पिता ने अपना लिया ....शादी से दो दिन पहले एक साम्प्रदायिक  दंगे में बेटी का दहेज खरीदते वक्त उनकी जान चली गई ...

और अंजली को खबर मिली कि उसके पिता को मुसलमानों ने मार गिराया ...जबकि उस दिन कई बेटियों के पिता दंगे की भेंट चढ़े थे..और जब मैं अंजली के पिता की देह की शिनाख्त करने गया तो मैंने कई मुसलमान बुजुर्ग और जवान भी मोर्चरी में बेजान लेटे देखे ...

ये एक हादसा था लेकिन अंजली के दिमाग में इस घटना ने मुसलमानों के प्रति एक रोष भर दिया था ..वो रोष जो अब नफरत में तब्दील हो चुका था ,,,,

शाम को बर्थ डे पार्टी सेलिब्रेट हुई गौरव की लेकिन मैं अपने बच्चे की नजरों से बचता रहा ...उसकी नजर  बस एक सवाल  पूछ रही थी कि पापा उसके स्कूली फ्रेंड्स अरहान और जीनत कहाँ है ?

खैर अगले दिन सूरज फिर जमीन में उतरा और मैं क्लीनिक को रवाना हुआ ...एक अधेड़ पेसेंट मेरे पास आई ...मैंने उसके सभी कागजात देखे और फिर उसका चेहरा ...पता नही क्यूँ उसका चेहरा मुझे मेरी माँ की याद दिला गया ...तहमीना खान ब्लड कैंसर की लास्ट स्टेज ..चाहकर भी नही बचा सकता था उसे ...दो बेटियों की शादी के बाद इस शहर में तन्हा रहती है ...पति का साया सर से काफ़ी पहले उठ चुका था ..

" वो ...आप ..मतलब ..आप ..अपनी सेहत का ख्याल रखियेगा ..ज..ज..जल्द ठीक हो जायेंगी ..मैं कुछ दवाइयाँ लिख दे.."

मेरी आवाज की काँप और मेरी हड़बड़ाहट सुनकर वो औरत मेरा जुमला सुनने से पहले ही बीच में बोल पड़ी

" कितना वक्त है मेरे पास बेटा ..?"

कुछ न बोल सका मैं ...और न जाने क्यूँ आँख भर आई

" बेटा ! मेरी पूरी जिंदगी  सिर्फ इलाज में गुजर गई..पति का साया उठने के बाद  ...पेट काट-काट कर ..लोगों के बर्तन मांझकर ..उनके कपड़े ..उनकी गालियाँ सुन-सुनकर कुछ हाथ लगा कमा कर दो बेटियाँ ब्याह दी ...अब कोई जिम्मेदारी नही है सर पर ...कई डॉक्टर देखे इन आँखों से मैंने लेकिन जो दूसरे का दर्द देख  अपनी आँखों से कतरे उतार दे ...वो डॉक्टर सिर्फ आज देखा है मैंने ...आँसू पोंछ दो बेटा ..ये जिंदगी मौत तो लगा धंधा है कोई पहले गया तो कोई बाद में "

मैं सिर्फ उस औरत की जिंदादिली देख रहा था ...मरने के आखरी घर पर खड़ी थी वो लेकिन मजाल कि उसकी आँख में एक कतरा भी डर का मचल जाए ....हँसमुख इतनी कि मैं भी उसके साथ मुस्कुराह उठा ..और एक रिश्ता सा जुड़ गया उससे !

लेकिन शाम को घर पर वही खिट-पिट ...

" राजीव सुनते हो ..परसों से संगीत सीख रही हूँ मैं ..मिसेज नय्यर आयेंगी सीखाने ..और वैसे भी काम का बर्डन बहुत हो जा रहा है ...न गौरव को टाइम दे पा रही हूँ न ...तुम्हें ...प्लीज कोई कामवाली अरेंज कर दो "

भाड़ में जाये संगीत ..मैं क्या कोई खाली बैठा हूँ जो तुम्हारे लिए काम वाली ढूँढ कर लाऊँ ...मन तो यही किया बोलने का लेकिन  क्या करता ..तो सीधे उठा और क्लीनिक गया ...

अगले दिन जैसे ही फिर अंजली ने मुझपर काम वाली को लेकर चढ़ाई की तभी डोर बेल बजी ...अंजली ने डोर ओपन किया !

" जी आप ..?"

" राधे -राधे ..मेमसाहब ..मैं शारदा ..साहब ने बात की थी "

और मैं अंजली की तरफ देखकर मन्द -मन्द मुस्कुराया ....और अकड़ के न्यूज़ पेपर पढ़ने लगा

जैसे ही शारदा ने अंदर इंट्री की मेरे हाथ से अखबार झरझराहने लगा ...ये तो अंजली से भी ज्यादा ऑर्थोडॉक्स मेटीरियल था ...साड़ी का पल्लू सर पर ..ये माथे पर बड़ी बिंदी ..हर बात पर राधे -राधे !

खैर अपने को क्या ,, सुबह से शाम क्लीनिक में गुजरती ...लेकिन रात का खाना अंगुलियाँ खाने पर मजबूर कर देता ...घर काफी दूर था शारदा का ...इसलिए ड्राइंग रूम में वो सोने लगी ...हम सब उसे शारदा माई कहने लगे...माई के आते ही घर जन्नत सा लगने लगा ..पता नही क्यूँ मुझे ऐसा लगता कि मेरी माँ मेरी जिंदगी में लौट आई है ...अब मेरा और अंजली का किसी बात पर कोई झगड़ा नही होता ...गौरव की तो सबसे पक्की दोस्त अब शारदा माई ही थी ...ये 25 दिन मेरा घर जैसे शारदा के प्रवेश से जगमगाने लगा ...मुझे भी अब लौटने की जल्दी होती तभी एक शाम जैसे ही मैंने घर का दरवाजा खोला -

" कहाँ सीखा ये सब कुछ ..मैं पूछती हूँ कहाँ सीखा ये सब कुछ गौरव ..?"

" बच्चा है मेमसाहब आते-जाते किसी मुसलमान पर नजर पड़ी होगी ...छोड़िये न ..."

बात पता चली तो मैं खटाक से बोला -

" अरे कल मेरे साथ सवेरे को बाजार गया था तो वो ईदगाह में लोगों को नमाज पढ़ते देख लिया था..अब छोड़ो अंजली चलो आज तुम्हे एक फ़िल्म दिखा कर लाता हूँ ...बहुत रोमेंटिक है ..और वो भी फोन घर में रखकर ताकि कोई डिस्टर्ब न करे !"

खैर मामला टालने के लिए ..मैंने तीन घण्टो का टॉर्चर झेला और दोनों आँख बन्द कर ..कुछ खर्राटे भर पूरी फ़िल्म देखी ....जैसे ही घर लौटे तो देखा ....घर पर भीड़ लगी थी

" क्या राजीव भाई ..फोन तो ले जाया करो ...देखो तो आपका बच्चा ..."

इतना सुनते ही अंजली चीख पड़ी -

"क्या हुआ मेरे बच्चे को ...?"

" भाभी आपके बच्चे को तो कुछ नही बल्कि आपकी कामवाली "

मैं कमरे के अंदर दौड़ा और पता चला कि खेल -खेल में गौरव ने घर पर आग लगा दी थी और उसके बीच फँस गया था ...शारदा ने अपनी जान पर खेलकर खुद जलकर गौरव को बचा लिया ...बहुत झुलस गयी थी वो ...मैं सीधा उन्हें लेकर हॉस्पिटल गया ...अंजली भी मेरे साथ गई ...और शारदा से लिपट गई और उन्हें माँ के रुतबे से नवाजा ...और अपने बेटे की जिंदगी बचाने के लिए उनका रो-रोकर आभार प्रकट किया ...और वायदा ये भी किया कि उनके ठीक होते ही वो अब उनसे घर का कोई काम नही करायेगी ..और उनकी खूब सेवा करेगी.....

लेकिन अंजली की किस्मत में ये पुण्य नही था ...शारदा के मुँह से लगातार खून बहता जा रहा था ..और उन्हें साँस वापस नही आ रही थी..मैं हिम्मत हार चुका था ...खून जम चुका था मेरी नसों का ...शारदा शायद अब कुछ पलों की मेहमान थी ....तभी मुझे होश आया और मैं चिल्लाया -

" सिस्टर ..तहमीना माँ को ऑक्सीजन चढ़ाओ जल्दी ...जल्दी करो !"

मेरा ये जुमला अंजली के कान से उतर कर  उसका दिल तक चीर गया ....और वो जम सी गई ...तभी तहमीना माँ ने उसको आँखों से अपनी और बुलाया और काँपते हाथों से अपना ऑक्सीजन मास्क खुद अपने हाथों से हटाकर कहा --

उ..उ.उस ..दंगे में .मैं ..मैं ...मैंने भीइइइ ..अ..अ..पना ..शौहरररर ..खो...या ..था ..जिस्स्स..में तूम्म्म..ने अ..प..ने पि..तआआआआ "

तहमीना माँ नही रही ...और मुझे याद आया वो वो पल जब अंजली ने मुझसे कामवाली के  बारे में बात की थी और  उसी दिन जब माँ तहमीना मुझे फिर दिखाने क्लीनिक आई थी तो मैंने उनसे बातों ..ही बातों में  अंजली और उसकी नफरत के बारे में उन्हें बताया था उन्होंने मुझे यकीन दिलाया था कि उनका बेहद घना तजुर्बा है कामवाली का और कहा था देखना एक कामवाली तुम्हारी घरवाली को अपने बचे वक्त में न बदल दे तो तहमीना उसका नाम नही

इस घटना के दो दिन बाद जब शाम को मैं घर लौटा और दरवाजा खोला तो सामने ड्राइंग रूम की दिवार पर मुझे तहमीना माँ की तस्वीर लगी दिखी ....जिसपर उनका असली नाम खुदा था और फूलों की माला चढ़ी थी ....लेकिन अब नजर जिस चीज पर पड़ी तो फिर मेरी आँख से ख़ुशी के आँसू छलछला उठे ...

अरहान और जीनत ...गौरव के साथ खेल रहे थे और उसके मम्मी -डैडी अंजली से बाते कर रहे थे ... अंजली ने उन्हें डिनर पर इन्वाइट किया था ...

मैं कुछ नही बोला बस तहमीना माँ की तस्वीर की तरफ देखकर सिर्फ ये बुदबुदाया कि

" माँ तुम जीत गईं ...माँ इंसानियत और मुहब्बत जीत गई ....थैंक्स तहमीना माँ "

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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