#सन्दूक
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" तुम भी न पंडत घण्टा हिला कर ..चार चौपाइयाँ गुनगुना कर ...सोचते हो तुमने कद्दू में तीर घोंप दिया ...साला बच्चे भूखे मर रहे हैं...बीवी के गहने आधे बिके , आधे गिरवी पड़े हैं ...घर की मरम्मत तुमसे सन् पाँच से न हुई ,, और बात करते हो कि भगवान ये करता है वो कर देगा ....लानत है ऐसी भक्ति और ऐसी जिंदगी पर ! "
" नही अजीज भाई ... नही !.... मैं जानता हूँ आप अगाध स्नेह रखते हैं मुझसे ... आपके ये शब्द मेरे खिलाफ नही अपितु मेरी दशा पर मेरे हित को समर्पित है .....आप सद्..."
" अबे चुप करो ! घण्टा भी कुछ न समझते तुम ,,, जब तुम्हे सब मालूम है तो क्यूँ नही कुछ माल कमाते हो ..? ...क्यूँ नही बहती नदी से कुछ लोटे पीकर अपनी और अपने बच्चों की जिंदगी को रेगिस्तान होने से बचाते हो ..? "
" काश ऐसा कर पाता अजीज भाई ..तो कब का आत्महत्या कर लेता ...अजीज भाई मेरा विश्वास है कि बहती नही में कुछ लोटे लूटने से अच्छा है कि बहती नदी की दिशा को ही बदला जाए ताकि मुझे जैसे समस्त दरिद्र लाभान्वित हो सके ...और यदि मैं ये नही कर सकता तो मात्र अपने लिए लोटे लूटना पाप ही नही अपितु अपने पूर्वजों के पुण्य कर्मों का विनाश भी होगा "
" अच्छा पंडत मैं अक्ल और हाजिरजवाबी में तुमसे नही जीत सकता मैं चला ...कल शरीफा की बारात आ रही है तो काम दसियों हैं सर पर ..आना पंडत ..धर्म भ्रष्ट न होगा ! "
" सब फिजूल की बाते कर गए लेकिन जो असली बात थी उसे जाते-जाते बता रहे हो ....शरीफा मेरी भी बच्ची है... ये लो मेरे मुरलीधर का प्रसाद और ये पुष्प ....मेरी बेटी को दे देना ....मैं उसे आशीष देने अवश्य आऊँगा "
इन दोनों की बाते सुनकर मुझे लगा कि साले ये टी.वी न्यूज वाले ..ये नेता ..ये बागड़बिल्ले कितना गलत पेश करते हैं सामाजिक ताने -बाने को ,,, लेकिन इनकी बात में सच्चाई है या ये मुँहदेखी बाते है इसे जाँचने हेतु मैंने पहले पण्डित का पीछा किया ,,, और दाब लिया एक ऐसे बूढ़े जर्जर खण्डर इंसान को जो पण्डित ओमनाथ की पूरी खाता -खतौनी जानता था उन्होंने बताया -
पंडित ओमनाथ शास्त्री ,, जो पीढ़ियों से राधा कृष्ण मन्दिर के पुजारी हैं ...लोग तो यहाँ तक कहते है . ...भागवत धर्म का उदय ही इनकी पीढ़ियों के प्रयास से हुआ ...गुप्तों के विशेष पुरोहित थे इनके पूर्वज ,, गुप्त परम्परा से ही कभी इन्होंने किसी के आगे हाथ नही फैलाया और तब से अब तक बस यही एक बुराई इनके जीन्स में घुसकर
क्रोमोसोम डिस्टर्ब कर गई
...
पण्डित ओमनाथ शास्त्री के पिता इनसे जियादह घोर आस्तिक थे ...उनका तो ये तलक विश्वास था कि ब्राह्मण इसलिए भी ब्राह्मण है कि वो कभी याचक नही हो सकता क्यूँकि समूल धरा उनके तप- जप एवं पुनीत कर्मों से ही अस्तित्व में आई है ..... वो सदैव ऊँची आवाज में बोलते थे और अपने व्याख्यानों में इंगित एवं सूचित करते थे ...कि सत्यवान ब्राह्मण दरिद्र तो हो सकता है परन्तु अस्वाभिमानि नही । अतः हाथ को फैलाना नही उठाना सीखो...इतना नेम अर्जित करो कि साक्षात श्री हरि तुम्हारी दरिद्रता दूर करने हेतु प्रकट हों ...लोभ त्यागो और इतना धैर्यवान और सात्विक बनो कि हरि पर अर्पण दरिद्रों पर अर्पण कर सको ! "
इतना बोलते ही बुजुर्ग खाँसने लगे ...मुझे लगा आगे बोलने में कोई 17 मिनट लेंगे तो सोचा तब तलक पण्डित ओमनाथ के घर का नक्शा ही देख आऊँ ....
" भाईसाहब ..ये पण्डितजी ...ये ओमनाथ जी का घर कहाँ हैं ...?"
"ये क्या देखते हो ...यही तो है !"
जो देखा तो पता चल गया ,, कि अजीज भाई कितने सही थे ...मैंने खिड़की से झाँककर देखा .. एक गरीब और लाचार..एड़िया फ़टी औरत एक बच्चे को धोती के पर्दे के पीछे स्तनपान करवा रही थी ... बाकि दो और थे ...एक पुस्तक पढ़ रहा था दूसरा पतीली से चावल की खुरचन नोच रहा था..तभी पण्डित जी अंदर वाले कमरे से प्रकट हुए ...
" अरे इंदु ! हमारा छोटा सन्दूक नही दिख रहा ...जरा बताओ तो कहाँ रखा है तुमने ...? "
" जी...ईई..जी ...वो ...वहाँ..नही जी ...पता नही ..मैंने नही देखा ....."
" क्या बकवास है ये ...कहाँ गया ..ढूंढों उसे !"
" जी आई ..."
चार बर्तन उठा के देखा गया ...दो बासी उन्धली चद्दरों के नीचे खंगाला ..एक टुट्याई कुर्सी को सरकाया ,, दरियों ..चटाइयों के नीचे भी कुछ न मिला ...तब झल्ला कर पण्डित जी बोले -
" इंदु ! बताओ कहाँ है हमारा सन्दूक .?..बोलो ...उसमें अत्यंत बहुमूल्य वस्तु रखी थी.."
" जी ! आपका सन्दूक कोई नही छूता ...वैसे भी ताला पड़ा रहता है उसमें ...पता नही कहाँ गया ..? मुझे कुछ भी नही पता ! "
पण्डित जी ने एक क्रोध का घूँट पीया ...और द्रुत वेग से घर की चौखट से बाहर निकले .....
मैं उनके पीछे निकलने ही वाला था कि तभी एक आवाज मेरे कान से टकराई ....
"माँ बाबा तौन छे सन्दूत ते बाले में बोल लहे थे ...?"
"अरे बेटा वो जो यहाँ चारपाई के नीचे रखा था ..?"
" वो तो बाबा तल रात ले दए ...मैं छो लहा था दब मेली आँथ थूलि तब देथा मैंने "
अब ये क्या ड्रामा है ...जितनी पण्डित की लुगाई को आश्चर्य था उससे ज्यादा मुझे ....पण्डित जी पता नही कौन सी गली में कौनसे कोने मुड़ गये ....तभी अजीज भाई आते दिखे ,,,मैंने पण्डित को छोड़ कर अजीज का पीछा किय ...वे एक घर में दाखिल हुए ...और मैं वहीँ उनकी खिड़की पर कान लगाकर सूर्ती घिसने लगा
" अरे नजमा कहाँ हो बेगम ...देखो ये ..कैसा लगा ये माँग टीका ,,?और ये देखो ये चूड़ियाँ ..ये गहने अरे देखती क्यूँ नही ...?"
" हाय अल्लाह ! ओ जी क्या कोई बैंक लूट लिया ...ये कहाँ से ले आये ..."
" तुम इसकी परवाह न करो ..ये चोरी का माल नही है ...अब मेरी बेटी रानी लगेगी ...इंसाअल्लाह बारात इज्जत से विदा हो जायेगी ...देखना ऐसा इंतेजाम करूँगा कि पूरा मुहल्ला देखेगा ...."
शरीफा और उसकी दो बहनें भी पर्दे के पीछे से देख रही थी ...दोनों बहनों के मुँह पर चमक का नशा था लेकिन शरीफा के चेहरे पर एक उलझन .....
पण्डित से ज्यादा अच्छे हालात न दिखे अजीज के घर के बस ये कुछ भला लगा कि अजीज की बेटी कल इज्जत से विदा हो लेगी .....
लेकिन उधर जब पण्डित देर शाम घर लौट तब ..इंदु चौखट पर खड़ी दिखी ....
" क्यूँ जी मिला सन्दूक ..?"
" नही ! पुलिस स्टेशन रिपोर्ट लिखवा दिए हैं ...जल्दी ही मिल जायेगा तुम चिंता मत करो ...हम दिया -बत्ती कर लें तुम जब तक भोजन परोसो ..."
भोजन परोसते -परोसते ममियाती हुई पंडिताइन बोली -
" दीपक ने कल रात आपको सन्दूक ले जाते हुए देखा था ....."
" क्या....अवश्य उसे कोई भ्रम हुआ होगा ...सम्भवतः उसने चोर को देखा होगा ...(सकपकाते हुए )
पण्डिताइन मान गई ...उसे पण्डित की जुबान और चरित्र पर रत्ती भर भी सन्देह नही था ....परन्तु कुछ तो था जो पण्डिताइन के चेहरे पर तैर रहा रहा
खैर..
अगले दिन बारात अजीज के दरवाजे पर पहुँची ....सब भले से निपटने लगा ....पण्डित भी पधारे ,, धोती ऊँची करके आगे बढ़े ....और शरीफ़ा के सर पर हाथ धरा ....
उनके हाथ धरते ही ...शरीफ़ा उनके पैरों में गिर पड़ी .....और फूट-फूट कर रोई... सबको ये मंजर कुछ अस्वाभाविक लगा ....दूल्हे के पिता ने नाक चढाई ..और माँ ने होंठ पीसे ....पण्डित ने विवेक से काम लिया और बेटी को चरणों से उठाकर उसका हाथ दूल्हे के हाथ में दिया .....
बारात विदा हुई ....और पण्डित ने घर की राह ली ....
कुछ दिन बाद ...जब पण्डित पौ फटते ही बिस्तर से उठे और अपनी चप्पल ढूंढने जैसे ही पलंग के नीचे झाँके ...उन्हें तुरंत एक झटका लगा ....
" अरे इंदु ...इंदु उठो ...!
" जी ! क्या हुआ ...?"
" अरे ये संदूक यहाँ कैसे आया ..?..कौन लाया इसे ... ?"
" मैं लाई इसे ....ये सन्दूक मैं लाई पण्डित जी.... बेटी की बारात विदा करने के बाद इस संदूक का काम ही क्या था अजीज भाई के वहाँ ...क्षमा करना पण्डित जी ,, आपके पूर्वजों का अपमान किया कुछ माँगकर ...परन्तु ये सन्दूक मेरे पिता ने मुझे दिया था ....जब मुझे आप ब्याह कर लाये थे "
पण्डित जी आँखों में अश्रु भरकर बोले -
" मुझे क्षमा करना प्रिय इंदु ! क्या करता ..अगर इसके अंदर संरक्षित अपनी माता के आभूषण यदि बचा कर रखता तो शरीफा यानि मेरी बेटी की बारात लौट जाती ...बारात से दो दिन पूर्व ...जब मैं शाम को घर लौट रहा था तो मैंने अजीज को शरीफा के ससुर के पैरों में गिरा गिड़गिड़ाता पाया ...उन्हें स्वर्ण और धन चाहिये था ...और अजीज भाई के पास इन दोनों में से कुछ भी नही था ...इसलिए रात के अँधेरे में ये संदूक चुपचाप अजीज भाई की खिड़की के अंदर रख आया ....लेकिन बेटी शरीफा ने देख लिया ....उसको हाथ जोड़कर कहा कि किसी को कभी कुछ न बताना .....लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि संदूक अजीज भाई के यहाँ पर है .....?
" क्यूँकि पण्डित जी ! उस रात दीपक के साथ मैं भी उठी थी जब आप संदूक लेकर चुपचाप घर से निकल रहे थे ......मैं भी आपके पीछे -पीछे आई ...?"
" क्यूँ ....?"
" क्यूँकि पण्डित जी सन्दूक बिना चाबी के नही खुलता और चाबी आप घर पर ही भूल गए थे ....जहाँ जिस खिड़की पर आपने संदूक अंदर किया आपके हटते ही मैंने वहीँ चाबी गिराई और बिजली से भी तेज आपसे पहले लौट आई "
और लौट आई मुझमें भी इंसानियत ...मैं भी बाहर खड़ा था ...मेरे एक हाथ के झोले में सूअर का कटा सर और दूसरे में गाय का गोश्त था .... आया था यहाँ दंगा भड़काने लेकिन एक सन्दूक ने बन्दूक से भी तेजी से मेरे अंदर के जानवर को मार डाला..ओमनाथ किसी को किस्से का नायक लगे लेकिन बरसों बाद जब इस किस्से को दुबारा खोदा जायेगा ....यकीनन ओमनाथ फिर दरिद्र तो हरगिज नही कहलायेगा ।
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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