#संकल्प
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" कसम जवानी और उसके जोश की , कि अगर... इस्स्स.... बस दो इंच और नीचे होती तो मैं अभी यहाँ नही वाशरूम में होता "
" अबे तेरे स्टेमिना को मानना पड़ेगा ...वरना मैं तो वाशरूम पहुँचने से पहले ही सरेंडर कर देता "
" और साले फुद्दुओं ...अपन तो यहीं वाशरूम बना देता .....
" हा हा हा हा हा ..."
तभी मिसेज सोनिया बोली -
" प्लीज साइलेंट...नाउ वी विल डिस्कस अबॉउट टॉमसन थ्योरी ऑफ़ एटम "
ये इस क्लास में रोज कि बात है ...मैं सुधाकर हूँ ...दोनों बैल बेचे हैं बाबा ने ..झुमरू और पंखी ।
जमीन का एक हिस्सा भी गिरवी रख दिया ताकि मैं शहर के इस सबसे बड़े कॉलेज में शिक्षा लेकर डॉक्टर बन सकूँ ....कक्षा 12 में 90 % अंक रहे मेरे ...100 % हो जाते अगर अंग्रेजी थोड़ी कमजोर न रही होती ...गाँव के सरकारी विद्यालय में कोई अंग्रेजी शिक्षक भी नही था ..तो जो किया अपने दम पर ....आगे भी सोचा है जो करूँगा वो अपने दम पर .....माँ को कोई खून की खराबी वाली बिमारी निगल गई ...बच जाती अगर बाबा के पास पैसा होता ...या फिर हमारे गाँव में कोई अच्छा अस्पताल ...बाबा को सब नामुमकिन लगता है लेकिन मैंने उनको विश्वास दिलाया है कि मैं एक दिन डॉक्टर बनकर रहूँगा ....और फिर गाँव में कोई मौत बिना इलाज के नही होगी .....लेकिन जितना सरल और मौलिक मेरा खस्ताहाल विद्यालय था ...उतना ही भड़कीला और महँगा शहर का ये कॉलेज ...यहाँ एजुकेशन के नाम पर सिर्फ और सिर्फ खाना -पूर्ती होती है ...राजनीति यहाँ हर विद्यार्थी की नस -नस में भरी है ...आये दिन स्ट्राइक ..हल्ला ...विवाद ....इनसे जूझना सीख लिया है मैंने लेकिन ये भद्दी -अश्लील बातें ...मुझसे नही सही जाती तो आज इरादा कर लिया कि मैं मिसेज सोनिया से मिलकर बात करूँगा -
" मे आई कम इन मेम ..?"
" यस ...हैव योर सीट ..."
" थैंक्स मेम ..वो मेम मैं ..."
" बी कम्फर्टेबल ...एंड से .."
" मेम.. वो ...न आप ये गन्दे कपड़े पहनना छोड़ दो प्लीज "
" स्टैंड अप ...हु आर यू ...आर यू मेड ....दिस इज माय राईट ओके ...गेट आउट अदरवाइस आई विल कम्प्लेन दा डीन ...एन्ड लिसन विलेजर ....ये कॉलेज है ...मेट्रो सिटी है ..यहाँ गांव का घघरा -पल्लू नही चलता ...ओके ..सो लेट लेफ्ट माय रूम ......"
भारत गाँव में बसता है ...किसी महात्मा ने कहा था ...मगर ये शहर लगता है अब भारत में नही ...या फिर अब गाँव भारत का अंग नही ....इसी उधेड़बुन से जूझता में लाईब्रेरी में जाकर बैठ गया ...जैसे ही किताब खोली तभी -
" अबे ...देख ...देख ..देख सब दिख रहा है ...अबे मोबाइल निकाल ..."
दूसरी सीट में जाकर बैठा तभी बाजू से आवाज आई -
" ओन्ली वन किस ...ओन्ली स्मूच बेबी ..."
किताब बन्द की और बाहर जाकर गार्डन में बैठ गया ...दो पंक्ति पढ़ी थी कि तभी -
" प्लीज रिमूव योर टॉप ..."
मैं ऐसे वहां से उठा जैसे किसी अंगार में बैठ गया हूँ ....चारो तरफ झाड़ियों से सरगोशी की खुशबू ...और शिक्षा के पावन मन्दिर में भोग-विलास का ये दृश्य मेरे लिए अकल्पनीय था ....गाँव में हाँलाकि ये सब कुछ होता था लेकिन मन्दिर ,शिक्षा और सार्वजनिक स्थानों में तो कतई नही ......मेरे मित्र ये सब देखने और लुत्फ़ लेने के लिए 4-5 किलोमीटर की बीहड़ यात्रा करते थे ...बाकि टी.वी के फ़िल्मी बरसाती गाने ही हमारे लिए काफी होते थे ....
ऐसा नही कि यहाँ पवित्रता राख हो गई है ...नेहा मुझे बेहद पसन्द है ...मेरी ही क्लासमेट है ...मुझे वो पूरे कपड़ो में नजर आने वाली इस कॉलेज की पहली लड़की दिखी ... इसलिए मैं उसकी ओर खिंचता चला गया ....हम दोनों एक दूसरे को पसन्द करने लगे ....अब कॉलेज में दिल लगने लगा ...बहुत सारी बातें होती थी हमारे बीच ...तभी एक दिन पता चला कि नेहा सेक्स रेकेट दबिश में पकड़ी गई .....
उस रात मैंने पहली बार शराब को हाथ लगाया ...इतनी पी ली कि आँख से शराब आँसू की शक्ल में निकलने लगी .....रात भर रोता तड़पता रहा मैं ...3 दिन से कॉलेज नही गया ....आखिर इसी उतार-चढ़ावों में मैंने परीक्षा दी ....और रिजल्ट ने बताया कि मैं डॉक्टर क्या कम्पाउडर बनने के भी लायक नही रहा ....शराब अब कमजोरी बन गई ....और धीरे-धीरे औरत और उसका बदन शौक .....
बाबा जब भी शहर मिलने आते तो कोई बहाना बनाकर उनसे नही मिलता , दोस्तों से मिलने लगा था ...वो दोस्त जो कभी मुझे अपने और समाज के सबसे बड़े दुश्मन लगते थे .......
आज जब बाबा नही रहे तो पता चला कि अब मेरा न कोई अपना बचा न कोई सपना और न कोई संकल्प ......मिसेज सोनिया के बदन और कपड़ों पर अब पहला फिकरा मेरा ही उड़ता था ...अब सब कुछ बदल गया लेकिन क्लास न बदल सका ...रेगुलर से प्राइवेट हो गया .. बाबा के मरने के बाद सारी जमीन बेच कर जो पैसा मिला था वो भी मेरा सगा न रहा ...कुछ् साल यूँ ही हराम की खा -पीकर कट गए .....उस रात जब पीकर धुत था तो सड़क पर एक कार टक्कर मार निकल गई और आँख खुली अस्पताल के ऑपरेशन थियेटर में ......सामने जो चेहरा था उसे देखकर मेरे मुँह से खून के साथ निकला -
" नेहा तुम ...?"
नेहा जानती थी कि मैं अब सिर्फ कुछ घड़ियों का मेहमान हूँ ....और वो ये भी जानती कि अगर सच सुने बिना मेरे प्राण निकले तो मेरी आत्मा कभी चैन न पाएगी तो वो बोली -
" हाँ सुधाकर मैं नेहा ... तुम्हारी तरह मेरा न कोई अपना था न कोई आजीविका का सहारा ...मुझे एक जिस्मफ़रोश औरत ने पाला ....जिसने मेरे साथ एक सौदा किया कि दिन में तू अपने लिए जी सकती है लेकिन रात को मेरे लिए जीयेगी....मुझे बचपन में ही कोई उसके कोठे में बेच गया था ....लेकिन मैंने संकल्प लिया था कि मेरी जवानी कोठे में नही बल्कि एक डॉक्टर बनकर मुकाम पायेगी ...मेरा कोई बाबा नही था ...जो मुझे पढ़ा सकता था ...मेरी कोई माँ नही थी जो मुझे आँचल में छुपा सकती थी ... जब मेरा जिस्म पहली बार लुटा तो मेरी उम्र भी इतनी नही थी कि मैं खुद को बचा सकूँ ....लेकिन आज मैं डॉक्टर हूँ ...खुद अपने पैरों पर खड़ी ...एक ऐसे मुकाम पर जहाँ न अब मुझपर किसी का बस है न रोक ...मैंने तमाम मजबूरियों के चलते ...रोज जहर पीकर ..हजार दर्द सहकर..अपना संकल्प याद रखा .... दिन में कॉलेज में मरहम पाती थी और रात को बिस्तर पर नोची जाती थी ..फिर भी अडिग रही और तुम जिंदगी के सिर्फ एक ढ़लान पर हार मानकर अपने ...अपने पिताजी के संकल्प को शराब में डुबो गए ......माना कॉलेज तुम्हारे गाँव सा नही था लेकिन सोचो फिर भी कोठे से तो भला था ...अब मेरी ईश्वर से बस यही प्रार्थना है कि या तो गाँव से कोई सुधाकर शहर न आये या फिर आये तो कोई संकल्प अपने साथ न लाये...
अलविदा सुधाकर ! "
और मेरी गर्दन एक ओर लुढ़क गई ....जैसे मेरा संकल्प !
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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