#कड़ी_चावल
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" अबे भैय्ये खाँ कड़ी -चावल कितने में खिलाओगे ?"
" चालीस रूपये लेंगे भैय्या जी ...आधा पेट भरो चाहे पूरा ही ही ही "
" हँस क्यूँ रिये हो बे...लाओ लगाओ एक पलेट ...."
" कैसी लगी भैया जी ..?"
" मर्ची जियादह छोंक दी बे ...लाओ थोड़ा चीनी फाँकने को दियो तो "
" ई लो भैया "
" एक बीड़ी चूसवाओ जिरा ..?"
" लो "
" अच्छा लाओ कलम दियो तो अब "
मैंने जेब से कागज निकाला और उसपर कुछ लिखकर कड़ी-चावल वाले को दिया
ई का है भैयाजी ....?
" अबे अनपढ़ हो किया ..?"
" हाँ भैय्या जी ...?"
"लाओ दियो इधर ...इसमें मैंने लिखा है कि अगले साल जब मैं फिर जनवरी में शहर आऊँगा तो तुम्हारा हिसाब कर दूँगा ...साइन भी चेप दियें है नीचे दीदे फाड़ के देख लियो ...रामपुर से हूँ समझे !"
" अबे ! चूतिया समझा है बे ...पहले काहे नाही बताया बे ..तोहार पास पईसे नाही है .."
" तो क्या खिलाते कड़ी- चावल फिर..?.भैय्ये खाँ दिमाग से पैदल समझा है मुझे ...?"
खैर 12 उसने बकी 4 हमनें और बात रफा -दफा हुई .... मुन्ना रम्पुरिया नाम है मेरा ..रामपुर से हूँ ..पैदा होते ही माँ -बाप खा गया ...और लौंडा होते ही जायदाद ...अब सड़क पर हूँ ...लेकिन चालू मुझसे बड़ा कोई हो तो घुय्यों चील का पेशाब पिला दियो ....रोज ऐसे ही खाने-पीने और ठहरने का जुगाड़ बनाकर अपनी खूब कट रही है ....तभी एक औरत टकराती है हमसे ....
" क्या दीदे गुलाम की गुल्ली में उड़ा दिए मोहतरमा ...?"
" सॉरी ...माफ़ कीजियेगा ...पैदाइशी अंधी हूँ देख नही सकती .."
" ओह्ह्ह माफ़ कीजियेगा.. जुबान कपड़े नही पहनती न मेरी इस वजह से जब देखो नंगी दौड़ने लगती है सुसरी ...वैसे कहाँ जायेंगी ...?"
" जी हल्का पुल ...वहीँ रहती हूँ ..."
" चलो मैं छोड़ देता हूँ ...मना मत करियो ..उधर ही जा रिया हूँ ...."
" जी ! थैंक्स ..."
10 कदम साथ चले थे कि वो बोली -
" मेरा पर्स ...मेरा पर्स कहाँ गया ....?"
" कहाँ क्या घण्टा गया ...मिल्खा सिंह है क्या ...कोई बदमाश उड़ा लिया होगा ...या कहीं भूल गई होंगी ....वैसे कितनी रकम थी उसमें "
" जी ! रकम नही उसमें 5 तोला सोना था ...अब क्या होगा ...हाय मैं लुट गई ..."
" अबे चुप करो ...लुट गई ..लुट गई ...पब्लिक सोचेगी तुम्हारी इज्जत लुट गई ...और घेर के सुतड़ा मुझे खोल देगी ...रुको मैं कुछ सोचता हूँ "
कुछ देर सोचने के बाद अच्छा ये बताओ ..किस रंग का था और तुमने आखरी बार उसको कहाँ खोला या बन्द किया था ? "
" जी रंग का तो नही मालूम ...अंधी हूँ न ..लेकिन मेरी सहेली अंजू कहती है उसका रंग पीला है और उसके ऊपर रुस्तम लिखा है और एक बाज़ की तस्वीर बनी है ...और मैंने उसे आखरी बार शर्मा ज्वैलर्स के वहां खोला और बन्द किया था .."
"कय्यूँ ..?"
" जी वो मेरे पापा के दोस्त है ...और पापा मरने से पहले वो सोना उनके वहाँ सुरक्षित रख गये थे ....शादी तो मुझसे कोई करेगा नही तो मैंने सोचा उसे वापस ले आऊँ ....और बाद में उसे बेच कर अपनी आँख का ऑपरेशन ही करवा लूँ "
"ओह्ह्ह...कितनी दूर है यहाँ से शर्मा ज्वैलर्स ...?"
" जी 3 किमी . पुंगी चौराहे के सामने !"
" चलो फिर खड़े -खड़े क्या ...सौतन रोना रो रही हो "
" जी चलिए ..."
तभी दिमाग की घण्टी बजी-
" बेटा 5 तोला सोना है किस्मत बदल जायेगी "
और एक साँस खींचकर मैं बोला -
" मोहतरमा आपको साथ लेकर जाऊँगा तो हो सकता है देर हो जाए ....और सोना हाथ से निकल जाये ....आप यहीं इस बैंच में बैठिये में ये गया और ये सोना लेकर आया "
" ठीक है ! आप भले आदमी लगते है ....प्लीज जल्दी आइयेगा ...लाखों का सोना है प्लीज ...."
अब घंटा आऊँगा मैं ...चिड़ी का छक्का समझा है क्या मुझे ...सोना हथिया के सीधे रामपुर निकलूँगा ...ही ही ही ...मन ही मन मैंने जीनत के 84 महल बनाये और सीधे पहुँचा शर्मा ज्वैलर्स
जाते ही मेरी नजर पड़ी उसी पर्स जो मोहतरमा ने बताया था ....जैसे ही मैंने वो पर्स उठाया ...तभी किसी ने बोला ....
"आप उस लड़की के साथ के हैं ...जो बेचारी देख नही सकती ? "
" जी ...उन्हीं ने भेजा है "
" अच्छा...अच्छा ये पर्स भूल गयीँ थी वो ...ले जाइये आप ..."
धड़कते कलेजे से हौले -हौले दूकान से बाहर निकला ...बाहर निकलते ही थोड़ी चाल तेज की ...फिर रुका एक गहरी साँस ली ...और फिर लगा दी पी. टी उषा वाली कलटी ...और इंजन बन्द किया बस अड्डे में जाकर ....तुरन्त एक टिकट रामपुर का कटवाया ....और जाकर बस में बैठ गया ....गहरी -गहरी साँसे लेने लगा .... पर्स अभी भी सीने में चिपका था ....तभी एक फोन की रिंग बजी ...
" अबे भैय्या जी तोहार बज रही है ...इधर-उधर का देख रहे हो !"
रिंग की आवाज उसी पर्स से आ रही रही ...डरते-डरते मैंने पर्स खोला ...उसमें से फोन निकाला ...ओके करके कान पर लगाया ....और बोला -
"हैलो "
" क्यूँ बे रम्पुरिये ....पहुँच गया बस अड्डे ...अब सुन पर्स वहीँ छोड़ कर गाड़ी से उतर जा ...क्यूँकि पर्स में एक टाइम बम है जो अबसे 10 मिनट बाद ब्लास्ट हो जायेगा ...किसी को कुछ बताया तो साले बहुत लम्बा अंदर जायेगा ....."
मैंने पर्स को आग के अंगार से झुलसा कोई कोयला समझ कर उसे अपने से अलग किया और गाड़ी से नीचे उतर गया ....गाड़ी में मासूम बच्चे , औरतें और वृद्ध भी थे ....स्टेशन से बाहर आने में दो मिनट लगे ...फिर एक हराम की बीड़ी माँगकर पी और अपना पसीना पोछा तभी किसी ने कन्धे में हाथ रखा -
" भाईसाहब ये अपना पर्स भूल आयें है आप गाड़ी में ,, मैं आपकी बगल में ही बैठा था "
मन किया हरामखोर के 4 चाँटे खींचदूँ ....लेकिन कण्ट्रोल किया पार्टी मुझसे जियादह स्ट्रांग थी ...लेकिन अब पर्स फिर हाथ में था और बम ब्लास्ट में बचे थे कुछ 6 मिनट ....क्या करूँ ...कहाँ जाऊँ ...सोचने में एक मिनट और सरक गया ...मेरे चालू दिमाग को लकवा मार गया ,,, और मैंने तुरन्त एक फैसला किया .....शायद मेरे अंदर मौत के ख़ौफ़ ने इंसानियत भर दी थी -
" भागो सब भागो इस पर्स में बम है ... ये फटने वाला है "
देखते ही देखते अफरा -तफरी भागम-भाग मच गई ..मैं सन्न सा पर्स हाथ में लेकर खड़ा था ...तभी एक धक्का मुझे लगा और पर्स मेरे हाथ से गिरा और मैं पर्स के ऊपर ....और मैंने आँखे बन्द करके अपनी मौत और रामपुर को याद करना शुरू किया ...
तभी मेरी आँख खुली .और वो भी पुलिस स्टेशन में पिछवाड़े में पड़ते लगातार डण्डों की बरसात से
" क्यूँ बे चिलमचोर ...क्यूँ भगदड़ मचवाई बे ...बस अड्डे में बोल ...? ...कहाँ था बम बोल ....?"
" वो ...वो ...पर्स में ..."
" भूतनी के उसमें बम नही ... एक मोबाईल और एक लॉलीपॉप है .... चुसवाओ बे इसे "
कुछ दिनों तक हिसाब-किताब बराबर सेंक -फुलाव किया पुलिस ने ...और जब उनको यकीन हुआ तो पिछवाड़े पर लात गेरकर थाने से बाहर फेंककर दारोगा साहब बोले -
" बेटा ! ज्यादा चालाक हमेशा पॉटी खाता है ...समझ गया ...तुरन्त रामपुर निकल ले वरना अगली बार शहर में दिखा तो बेटा गोली वहीँ दूँगा जहाँ डण्डे दिए थे "
भूख लगी थी ...सोचा जाने से पहले कुछ खा लूँ ..कड़ी चावल वाले भैय्या के पास फिर पहुँचा और उन्हें पुराना हिसाब करके नए का पैसा थमाया और सर झुका कर खाने लगा तभी भैय्या बोले -
" क्यूँ नवाब साहब....पर्स महँगा पड़ा न ..ही ही ही "
" भैय्ये खाँ बस ये बता दो कि आखिर ये सब चक्कर क्या था ..? वरना जिंदगी भर हमारी रूह हमारे जिस्म में मुजरा करती रहेगी ....कौन थी बे वो अंधी ...और ये सब क्या ड्रामा था ...?"
" भैय्या जी पहिले तो वो अंधी नाही थी ....जबकि अंधे हो तुम जो ये सोचता हो कि हर इंसान को बेवक़ूफ़ बनाया जा सकता है ...भैय्या जी तुम बात -बात में जो रामपुर का नाम लेकर राम और पुर दोनों को बदनाम करते हो ...उसके लिये तुम्हें सबक मिलना चाहिये था ...वो औरत भी उसी रामपुर की है जहाँ से तुम नालायक हो ... लेकिन तुम भूल गए कि ई बनारस है और इहाँ आकर हर गिरेकट को उसकी औकात पता चल जाती है ...."
" माना लेकिन वो पर्स वो ज्वैलर्स शॉप ...वो ...?"
" देखो भैय्या जी वो पर्स और उसके अंदर रखा मोबाईल उसे.. तुम्हारे जाते ही मिल जाएगा वो उसी थाने जायेगी और कहेगी की उसका फलां पर्स और मोबाईल चोरी हो गया ... पुलिस उसे वो थमा देगी ...और रही वो ज्वैलर्स शॉप की बात ...तो भैय्या जी वो बेचारी उसी दिन अपने भाई से मिलने शर्मा ज्वैलर्स शॉप गई थी ...जहां उसका भाई काम करता है ...उसी ने तुम्हे वो पर्स दिया ....क्यूँकि उसको पहले ही फोन में सारा प्लान बता दिया गया था .......और उसे पता था कि तुम लालची पर्स लेकर उसके पास नही बल्कि बस अड्डे जाओगे और फिर तुम्हे फोन आया ...बम का ...ही ही ही ...."
" घुय्यों ...अबे भैय्ये खाँ ...चोर पे मोर चेप दिया तुमने ..लेकिन तुम्हे ये सब कैसे पता ..?..और भैय्ये खाँ कौन है वो औरत ....?."
" रुक्मिणी !...जरा बाहर आना ...देखो तुम्हारे शहर से कोई मिलने आया है तुम्हें ही ही ही ...."
दुकान के पीछे सटे मकान का पर्दा हटा और भैय्ये खाँ बेहोश होते -होते बचे
" ई है हमार पढ़ी -लिखी जोरू रुक्मणी... कैसी राही इसकी एक्टिंग अंधी वाली....? ही ही ही ..."
तभी पुलिस की जीप का सायरन सुनाई दिया और भैय्ये खाँ ने पलेट नीचे रख दौड़ लगाई दिया ......
नवाजिश
Junaid Royal Pathan
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