Thursday, 3 January 2019

राम_मन्दिर

#राम_मन्दिर
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" अब्बू ....अब्ब्बू.."

" हें ...हें ..क्या हुआ मेरी बच्ची ...? क्या फिर कोई बुरा सपना देखा ....?"

" नही ...अ...अ...अब्बू राम -मन्नन्नन्न......."

पास ही खटोले में लेटी उसकी की नानी चरमरा कर उठी और बोली -

" मनहूस ...क्या राम ..राम कर रही है ... पहले ही क्या कम जुल्म गिराया है इस नाम ने हमपर ....छिनाल मेरी बेटी को खाकर भी तेरे कलेजा न थका ...हरामजादी ...."

" बस नुसरत बेगम बस ! बहुत हुआ अब हम एक पल यहाँ नही रुकेंगे ....बच्ची के ख्वाब में राम -मन्दिर क्या आ गया तुमने तो बच्ची को ...अब खबरदार मेरी बेटी की शान में गुस्ताखी की तो ....उठो बेटी ....और चलो यहाँ से ......"

" माफ़ कर दो बेटा ....मैं हाथ जोड़ती हूँ ....कहीं न जाओ ख़ुदा के लिए ....तुम्हें रसूल का वास्ता... करबला के शहीदों का वास्ता ......"

खैर हाफिज रहमत तो जाते -जाते रुक गए लेकिन दो कदम जो खिड़की के बाहिर खड़े थे उन्होंने तेजी से चलना शुरू किया ......

इस घटना के कुछ 30 मिनट बाद...मैं दिल्ली मेट्रो में जैसे ही चढ़ा और फेसबुक लॉगिन किया तो मेरे होश उड़ गए ....

हर तरफ बस ये ही खबर वायरल थी कि -

" अयोध्या के एक हाफिज की बेटी ने साक्षात रामलला को स्वप्न में देखा और साक्षात श्री राम ने उसे भव्य मन्दिर बनवाने का माध्यम चुना है   "

मैं कुछ समझता इससे पहले ही ...मेरे फोन में रिंग बजी .....

" हैलो ...हैलो ...हाँ अभि ! तुम्हे अभी अयोध्या निकलना होगा ....बाकि हमारी टीम मूव कर रही है ....दिस इज़ द आर्डर ऑफ़ चीफ ....बाकि क्यूँ जाना है मैं तुम्हे व्हाट्सएप में डिटेल दे रहा हूँ ....."

" आई नो वर्मा साहब ...मुझे पता है  कि क्या वजह है ....मैं आप लोगों से अयोध्या में मिलता हूँ ..."

अयोध्या जहाँ से मैंने अपने पेशे यानि पत्रकारिता का श्रीगणेश किया ...मैं उस वक्त वहीँ था जब बाबरी मस्जिद  विध्वंस हुआ .... अयोध्या से मेरा रिश्ता गहरा है क्यूँकि हर साल मेरे देश में चुनाव होते है और हर साल मुझे अयोध्या जाना होता है ...... लेकिन इस बार पता नही था कि मुझे देश की जनता को आखिर बताना , सुनाना और दिखाना क्या है ....? एक अनजाना डर मेरी आत्मा को कँपकँपा रहा था ...मुझे पता नही क्यूँ लग रहा था कि देश फिर एक साम्प्रदयिक रंग में रंगने वाला है ...एक बच्ची का सपना वो झूठा हो या सच ये उसका व्यक्तिगत विषय है ...लेकिन ये भी सच है कि जब बात राम की होती है तो फिर देश में कुछ भी व्यक्तिगत नही रहता ....

मैंने घर जाकर अपनी बीवी को गले लगाया ...मासूम 3 साला बेटी को गोद में लेकर  उसे बेहद चूमा और बीवी को मुश्किल से बताया और वचन दिया कि जल्द लौटूँगा ....वो फूल के कुप्पा हो गयी लेकिन मैंने जब कर स्टार्ट की तो खिड़की के शीशे के पीछे उसके वुजूद को खड़ा पाया ...मैंने उसके होंठो को कुछ बुदबुदाता और उसकी आँखों में कुछ सरसराता पाया ....

घर से कुछ 15-20 मील ही आगे बढ़ा था कि मैंने पूरी दिल्ली को जैसे अयोध्या की जानिब दौड़ते पाया ...भीड़ के मुँह पर माइक ठूँसे पत्रकार दिखे ....भगवा आँधी में राम के नारों का जोश- खरोश था ....जितना आगे बढ़ता रहा उतना ही और उतने ही प्रकार का साधू -सन्तों का रेला मिलता रहा ...लगातार मिलती खबरों में एक ये  खबर भी मिली कि बच्ची का घर भीड़ के सैलाब के बीच खड़ा है .....

मुझसे एक वृद्ध दम्पति ने लिफ्ट माँगी ....मैंने गाड़ी रोकी और पूछा -

कहाँ जाओगे बाबा ..?

" बेटा अयोध्या जायेंगे ..."

" क्यूँ ...मत..मतलब अयोध्या ही रहते हैं क्या ...?"

" नही बेटा यहीं गांव में रहते है पास के ...सुना है अयोध्या में एक बालिका को साक्षात श्री राम ने दर्शन दिए हैं... बस उसी देवी के दर्शन करने जा रहे हैं ..."

ठिठक सा गया मैं ...मैं मानता हूँ मेरा देश बहुत धार्मिक है लेकिन इतनी कोमल भावनायें .... मैंने उनको लिफ्ट दी ...मैं चाहता था उनसे बात करूँ लेकिन वो दोनों आत्मलीन होकर राम का जप कर रहे थे ...अयोध्या कोई 5 मील दूर खड़ा था  कि ट्रैफिक जेम हो गया...गाड़ी वहीँ रोककर वृद्ध दम्पति को उताकर कार  लॉक करकर मैं आगे बढ़ा ....

सामने का नजारा देखकर मेरी रूह में झनझनाहट हो पड़ी  .....चारों तरफ एक हुजूम एक भीड़ से लबालब समन्दर तैर रहा था .....जगह -जगह बैठे मासूम लोग ..सिर्फ राम के नाम पर अयोध्या उमड़ने लगे थे ....ये वैसा ही दौर था जैसा 6 दिसम्बर को मैंने देखा था ...लेकिन इस भीड़ और उस भीड़ में अंतर मात्र ये था कि उस भीड़ का मिजाज दूसरा था और  इस भीड़ में सिर्फ भक्ति का नशा है .....

ये नशा भी अजब था ...छोटे -बड़े हर आयु के लोग सिर्फ इस बिना पर चले जा रहे थे कि उन्हें उन आँखों को देखना था जिसने राम की छवि को अपने स्वप्न में निहारा था ....

सोशियल मीडिया और भारतीय पत्रकारिता ने इस खबर को सच बनाने में एड़ी -चोटी एक कर दी ...और उनका मोबाईल और न्यूज़ में किया सड़कों पर तैर रहा था ....

मैंने घूर के इंसान के अंदर तक के इंसान को पढ़ा तो पाया कि इस भीड़ में ..सिर्फ गरीब और असहाय दीन लोगों का जमावड़ा है .... कसम पैदा करने वाले की ..इतनी मासूम श्रद्धा सड़को पर उमड़ रही थी कि जिसका कोई मोल नही था ...मैंने लोगों को राम के नाम पर सुबकते और आँसू बहाते हुए देखा....

मैं भी छलक पड़ा क्यूँकि राम से जुड़ी मेरी श्रद्धा का भी कोई तोड़ नही ....लेकिन अगले ही पल मंजर तब जन्नत से जहन्नम लगने लगा जब मैंने नेताओं की आवाजाही देखी ....वो इस भीड़ को वोट बैंक में बदलने को आतुर और लालायित दिखे ....अब भड़काऊ  भाषण भी कानों पर गिरने लगे ....और भड़काऊ नारे भी .....

स्थिति बदल रही थी और मैं अब भी उस बच्ची के घर से काफी दूर था....

जितना आगे बढ़ता गया उतना ही राम के नाम पर आस्था को चखता गया ....

तभी पैरा मिलट्री के जवानों ने रोक लिया ...और बोले इससे आगे जाना निषेध है ....मैंने लाख चिल्लाया कि मैं पत्रकार हूँ उन्होंने एक न सुनी .....

मुझे लौटने के निर्देश दिए ...फोन की बैटरी गिरने लगी ....टीम से सम्पर्क नही हो पा रहा रहा था ....मैं वापस जैसे -तैसे अपनी कार तलक पहुँचा ... जैसे ही लॉक खोला ....एक आवाज पीछे से सुनाई दी ....

" भैया ! क्या अयोध्या से लौटे रहे हैं .....?"

" न ..नही तो ..."

" हम लोगों को थोड़ा आगे छोड़ देंगे ...?"

" आप तो अकेले दिख रहें है फिर ये हम लोग से मतलब ...?"

तभी बगल वाली कार के पीछे से दो  आकृति निकली ....

" ओह्ह्ह ! लेकिन जब पूरा देश अयोध्या उमड़ रहा है तो आप क्यूँ यहां से लौटना चाहते है ...?"

" इस बच्ची की तबियत बहुत खराब है .... इसे जल्द दिल्ली ले जाना होगा ..."

" सॉरी मैं आपकी कोई मदद नही कर सकता ..मैं यहां काम से आया हूँ "

" जिस काम से आप आयें है वो काम मैं आपका पूरा कर दूँगा ...जुबान देता हूँ "

" कौन हैं आप ...?"

" सब बता दूँगा आप चलने की हामी तो भरिये .."

एक पल सोचा और न जाने क्यों लगा कि दिनभर धूप -धक्का खाने और नम्बर बढ़ाने से बेहतर किसी मासूम की जान बचाना जियादह जरुरी है और वो जान जब एक बेटी की हो तो ...मैं एक बेटी का बाप पीछे कैसे हट सकता हूँ ...

" बैठिये "

वो बैठ गये ....और मैंने कुछ दूर चलने के बाद सवाल दागा ...

" कौन है आप लोग ..."

" मैं हाफिज रहमत ...ये मेरी सास अम्मी और ये मेरी बेटी ....."

" आप ने कहा था कि आप मेरा काम बना देंगे ...क्या मतलब समझूँ इसका ..?"

" पहले आप जुबान दीजिये कि आप ये बात न किसी को बतायेंगे ..न गाड़ी रोकेंगे !"

" ओके ...मैं जुबान देता हूँ "

" ये वो ही बच्ची है जिसके लिए पूरा देश आज अयोध्या में जमा हुआ है "

"कय्य्य्य्या...? "

कार दूसरी कार से टकराते -टकराते बची

" मैं कैसे मान लूँ ..कि ये वही बच्ची है ...?"

" मैं मुसलमान हूँ और पाक कुरआन की कसम खाता हूँ ..."

" ओके ...ये बताइये ये सब चक्कर क्या है ..? ये राम-मन्दिर ..ये सपना ..ये आपकी बेटी ...? "

" राम -मन्दिर से मेरी बेटी का नही बल्कि मेरी बेटी के बाप का गहरा नाता है ...."

" व्हॉट ...?आर यू ...मियाँ जी इसके बाप तो आप हैं न ...?"

" नही ! इसका सगा बाप मैं नही हूँ ....बल्कि ये मेरी बीवी के मुँह बोले भाई राम सेवक  जनाब आत्माराम की बेटी है .... आत्माराम जिन्हें जब पता चला कि मेरी बीवी यानि उनकी बहन कभी माँ नही बन सकती तो अपनी इस इकलौती बेटी को पैदा होते ही  हजार आँसू पीकर रात के अँधेरे में दरवाजा पीट कर मेरी देहलीज में रख गए ..... उनकी इस कुर्बानी को मैं दबी आँख अपनी खिड़की से निहारता रहा .... लेकिन बच्चे के लालच और बीवी की बेऔलादगी का गम मुझे जुबान सिलने पर मजबूर कर गया .....मैंने अगले दिन ही शहर बदल दिया और  अयोध्या चला आया ..बीवी को सब सच बताया तो छलक पड़ी ...किस्मत ने यहाँ भी चैन से न जीने दिया ..और एक दिन बच्ची खेल रही थी कि यकायक एक बस तेजी से दौड़ती आई ...मेरी बीवी ने इस मासूम को धक्का देकर अपनी जान दे दी  .... ....लेकिन जब आज मेरी बेटी पूरे मुल्क में मशहूर हो गई तो मुझे डर लगने लगा कि कहीं आत्माराम भी यहां न चले आये और इसे मुझसे न छीन ले सो इसको लेकर दूर बहुत दूर जा रहा हूँ ....मैं जानता हूँ ये गलत है लेकिन मैं इसे खोना नही चाहता ....

एक गहरी साँस ली मैंने ...और सब कुछ जानकर बच्ची की नानी भी बच्ची को सीने से लगाकर फफक उठी ......

" लेकिन ये राम मन्दिर का और बच्ची का क्या कनेक्शन है ...?"

" सिर्फ इतना कि मैंने इसे गोद में लेकर सिर्फ शहर बदला ....जब नाम बदल रहा था तो मेरी बीवी अड़ गई कि ये मेरे भाई की अमानत है .. ...और मैं हरगिज इस अमनात में खयानत नही होने दूँगी ....मुझे सिर्फ औलाद की तड़प है ...उसके नाम या मजहब की नही ..... राम की कहानी इसे सोने से पहले मेरी बीवी सुनाती थी और मन्दिर आत्माराम जी का एक इकलौता सपना था ..... और जब बच्ची ने माँ और बाप दोनों ही  खो दिए तो फिर भी कुछ बचा रहा और वो है राम -मन्दिर .....

गाड़ी चलती रही और मैं बैक मिरर में उस बच्ची यानि राम - मन्दिर को देखकर ...श्रीराम का नाम लेकर अपने प्रभु का स्मरण कर कहता रहा कि  -

" "हे प्रभु ! तेरी लीला अपरम पार है ..आखिर तूने बनवा ही दिया राम मन्दिर ""

नवाजिश

Junaid Royal Pathan

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