Tuesday, 15 January 2019

मैं_और_साहब

#मैं_और_साहब
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" कौन हो तुम ...विथआऊट परमिशन कैसे अंदर आ गए..? ...विनोद बाहर ले जाओ इसे !"

चपड़ासी अंदर आकर ममियाते हुए बोलता है ...

" साहब हमनें कहा था कि साहब व्यस्त हैं और उनसे परमिशन लेकर ही मिलयेगा ...लेकिन ...."

तभी वह युवक बोला -

" इनकी कोई गलती नही है सर ...मैं अभिजीत सिंह हूँ ..मास्टर विश्वनाथ जी का बेटा ....वो...."

कलेक्टर साहब कड़क कर बोले ...

" तो...बाहर जाइए अपने समय पर आइयेगा .."

" सर ..टाइम नही है हमारे पास ...4 घण्टे हो गए बाहर बैठे ...ये महोदय कह रहे थे कि आप व्यस्त हैं लेकिन आप तो यहाँ खाली बैठें है ...सर कल परीक्षा है मेरी ...सर पिताजी को भी दमा है तो सर ....."

" बाहर जाओ ...अभी के अभी ....तुम्हारे बाप के नौकर नही हैं ..कि जब तुम चाहोगे हम तब मिल लेंगे ....समझे ...ले जाओ इसे बाहर विनोद और आगे से फिर ऐसी ग़लती की तो तुम्हें निलम्बित कर देंगे ....."

जैसे ही दरवाजे को खोल युवा और विनोद बाहर आये ...वैसे ही एक मरगिल्ला , बीमार दमें से साँसे फुलाता हुआ बूढ़ा .. दरवाजे के सामने खड़ा मिला ......बूढ़े और युवा की आँखें आपस में मिली ...और युवा की आँखों में आँसू उतर आये ....बूढ़े ने उसके काँधे पर हाथ रखा और  कहा -

" चलो अभि... चलो बेटा ! "

मैं दूर दरवाजे तलक उस युवा और उसके बीमार पिता को जाता देखता रहा ...मैं खोजी पत्रकार हूँ ...कलेक्टर साहब से आबकारी आबंटन में हुए घोटाले पर कुछ जानकारी एकत्रित करने आया था..

कलेक्टर नवीन देशराज..जब से जिलें में आयें है तब से ही आकर्षण का केंद्र बने हैं ..सदैव सुर्ख़ियों में रहतें हैं ...बुद्धि और रूप की एक  साक्षात सुंदर मूरत ..लेखन में भी कमोबेश 48 पुस्तकें अब तक लिख चुकें हैं ...विराट अध्ययन के साथ बहुभाषाविद् ...समाज में पंथनिरपेक्षता के केंद्र ...उर्दू -अदब के एक लोकप्रिय शायर भी और साथ ही साथ राजनेताओं से अवसरवादी गहरे सम्बन्ध भी ....सिविल सर्विसेज में रैंकिंग भी अंडर 10 ....मतलब मैं इनका अभी कुछ देर पहले तलक कट्टर भक्त या मुरीद था ...तभी आधुनिक कवियित्रियों का एक जमघट आता दिखाई दिया ..सुंदरता ..मादकता और शोखी का एक नायाब जखीरा ....और बिना परमिशन कलेक्टर साहब के रूम में प्रवेश कर गया ....अंदर से आती हँसी -ठिठल्ली की आवाजें ये बताने के लिए काफी थी कि दौर लम्बा चलेगा .....मैं भी अपना पैन अपनी शर्ट की जेब में लगाकर अन्य प्रतिक्षारत लोगों की भाँति उठ कर वापस लौट गया .....

इस घटना को कोई 5 या 6 साल बीत गयें हैं और मैंने भी गंगानगर कुछ पारिवारिक एवं आर्थिक कारणों से छोड़ दिया लेकिन आज भी अख़बार में कलेक्टर देशराज का नाम ..आलेख और साहित्य की प्रसिद्धियाँ आये दिन छपती ही रहती है ....तभी मैंने अचानक से अपनी कार का ब्रेक लगाया -

सामने से दो मासूम स्कूली बच्चे रोड क्रॉस कर रहे थे
...तभी एक आदमी दौड़ता हुआ आया और उन दोनों को अपनी गोद में उठाया और उन्हें पास ही खड़ी उनकी माँ को सौंप दिया ...माँ की आँख में आँसू थे क्यूँकि उसके सब्जी-फल खरीदते हुए दोनों बच्चे चुपचाप आइसक्रीम के लालच में भागती सड़क  पर बेरवाह  निकल गए ...उस औरत के हाथ जोड़ने से पहले ही वो आदमी आगे बढ़ गया .....

शाम को जब वाइन की सिप ले-लेकर फ़िल्मी अभिनेत्री होलो का 17 वाँ अफेयर सन्डे विशेषांक के लिये लिख रहा था ...तभी मेरे पास सम्पादक का फोन आया कि ..होलो ने सत्रहवें को छोड़ अठारवें को पकड़ लिया है ....इसलिए 17 का प्रयोग अखबार की प्रसिद्धि के लिए खतरा पैदा कर सकता है .....मैंने दो माँ की चार बाप की गाली   फोन डिस्कनेक्ट करके उसको दी और बॉलकनी में आ गया ....थोड़ा अँधेरा था ....तभी मैंने एक आदमी को देखा जिसके हाथ में ब्रेड के पैकेट थे ..उसने रोड के किनारे सो रहे लोगों को वो ब्रेड बाँटे ..तभी एक कार की हेडलाइट उस आदमी पर पड़ी ....और मेरी सारी उतर गई ...मैं नीचे उतरा चेहरा जाना पहचाना लगा ....लेकिन सड़क पर पहुँचते ही वो आदमी नही मिला ....मैंने ब्रेड खाते एक मैले बुड्ढे से पूछा -

" बाबा कौन था ये जो आप को ब्रेड बाँट गया ..?"

" पता नही बेटा होगा कोई भला इंसान ....जिसे हम गरीबों के हाल में तरस आ गया होगा "

निशब्द होकर मैं वापस लौटा लेकिन अब अभिनेत्री होलो नही बल्कि कुछ और लिखने को कलम उठाने लगा ..लेकिन कुछ न लिख सका ....

अगले दिन सुबह ही मुझे फोन आया ..कि मुझे सन्डे के दिन सचिव महोदय श्री नवीन देशराज का इंटरव्यू लेना है ...इतना शीघ्र कलेक्टर से सचिव बनना सिर्फ नवीन देशराज के बस की ही बात  थी .....

दिन भर उनके आवास में एक गद्देदार सोफे पर बैठा रहा लेकिन वो गोल्फ खेलने ...नेताओं की खातिरदारी में व्यस्त दिखे ...उनकी पत्नी महोदया डांस सीख रही थी ...और बिटिया माइक्रो मिनी पहन कर अभी बाहर निकली ....

जब रहा नही गया तो मैं उनके पास जाकर बोला -

" सर वो इंटरव्यू ...?"

" कल आना ....अभी टाइम नही है "

टाइम तो पूरा मेरा खराब हो गया ...और मैं बुझे हुए मन से बाहर निकला ...तभी मेरी नजर सामने  के मंजर पर टिकी .....

" अरे भैया तुमसे न निकलेगा ...हीरो मत बनो ..गया साला ये भी खड्डे में "

मैं उस भीड़ के पास पहुंचा -

" क्या हुआ भाईसाहब .."

"  अरे भैया एक मासूम बच्चा अभी बोरवेल में गिर गया है ....उसे निकालने एक पगला नीचे कमर में रस्सी बाँधे घुसा है ..."

मैंने चारों तरफ नजर दौड़ाई ...पुलिस महकमा ..फायर यूनिट और अन्य सहायक दल सब किंकर्तव्यविमूढ़ बनकर शांत खड़े थे  ..परन्तु कोईं थे जिनमें  इस जिंदगी और मौत के खेल से पैसा बनाने की होड़ लगी थी  ...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ...।

कुछ 20 मिनट बाद वो आदमी बच्चा सकुशल ऊपर ले आया ...और ऊपर आते ही उस बच्चे और आदमी पर गिद्ध भीड़ अर्थात आधुनिक पत्रकार टूट पड़े ....बड़ी मुश्किल से वो आदमी उस भीड़ से बाहर निकला ..उसने मुँह रुमाल से ढाँक रखा था ,,, मैंने कुछ दूर तलक उस आदमी को देखा तभी उसने अपना रुमाल हटाया और मैं उसकी तरफ दौड़ गया ....ये वही आदमी था जो मुझे लगातार एक अंतराल के बाद मिलता ही रहता है ......लेकिन मेरे ,उस तलक पहुँचने तक वो आदमी ऑटो में बैठकर चला गया .....

कौन है ये आदमी .?...जिसका काम ही सिर्फ इंसानियत है ...हर जरूरतमन्द की मदद ही जिसका पेशा है ....मेरे दिमाग में ये उधेड़बुन चलती ही रही .....

कुछ दिनों बाद सड़क निर्माण विभाग में सड़क बजट से सम्बंधित कुछ अनियमितताएं प्रकाश में आईं और मुझे सम्पादक महोदय का फोन आया कि मैं जिलाधिकारी से मिलकर इस सम्बन्ध में कुछ सूचनाएँ एकत्रित कर एक आर्टिकल अख़बार के लिए लिखूँ ....पहली बार मुझे गर्व हुआ कि मुझे कोई आवश्यक और सामाजिक सरोकारों से जुड़ें काम का दायित्व मिला ...वरना अब तो सिर्फ फ़िल्मी अफेयर ..सास -बहु .. मेट्रिमोनियल ही लिखने और छापने को मिलता था ....

अगले दिन मैं पौने दस पर कलेक्टर साहब के ऑफिस पहुँचने से 15 मिनट पहले ही पहुंच गया ...और जैसे ही जाकर उनके केबिन के सामने लगे सोफे पर बैठा  -

" आप अंदर जा सकते हैं सर ..?"

" लेकिन साहब के आने में तो अभी पन्द्रह मिनट है ...?"

" साहब 8 बजे ही ऑफिस आ जाते हैं ...जल्दी करिये फिर आजाद बस्ती के लोग साहब से मिलने आने वाले हैं वो क्या है उनकी बस्ती को बिल्डर ढहाने वाले हैं ...."

मैंने हल्के से दरवाजे का लॉक खोला-

" मैं आई कम इन सर ..?"

" जी आइये सर ...बैठिये "

तभी मेरी नजर कलेक्टर साहब के चेहरे पर पड़ी ...और मैं देखता ही रह गया ...ये वही आदमी था जो मुझे हर गरीब और मासूम की सहायता करते मिलता ही  रहता था ....और झटका तब लगा जब मैंने एक वृद्ध की तस्वीर उनके टेबल पर लगी देखी ..

" सर माफ़ कीजियेगा लेकिन ये ...?."

" जी ! ये मेरे  स्वर्गीय बाबूजी हैं ...पेशे से अध्यापक थे ...श्री विश्वनाथ सिंह जी "

सारी पुरानी याद एक पल में ताजा हो गई ...

" सर आप वो ही युवा हैं न जिन्हें आज से तकरीबन 5 सा पहलें गंगानगर के तत्कालीन कलेक्टर ...श्री नवीन देशराज जी ने अपने केबिन से बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया था ..."

" जी ! मैं वही हूँ ... श्री देशराज जी को मेरे ही पिताजी ने शिक्षा दी थी ...और उस दिन वो उसी विद्यालय के हितपरक किसी काम से अपने शिष्य से बड़े गर्व से मिलने पहुँचे थे ... आप शायद उस वक्त वहीं थे ...खैर वक्त बहुत कीमती है कृपया आप अपने सवाल पूछिये "

क्या पूछता ये कि ढह चुके समाज में आपके अंदर इतनी इंसानियत इतनी विनम्रता कैसे जीवित है ..? या ये कि आप में अहंकार क्यूँ नही दौड़ता जबकि आज तो जरा सा नाम पाने वाले इसकी सरिता में तैरते है ...? ये या कि आप को नाम और सम्मान की भूख क्यूँ नही है ...?

कुछ न पूछ सका ...बस आँखे भीग गई ..उम्र में छोटे थे लेकिन न जाने क्यों उनके पैरों में गिर पड़ा ...उन्होंने बड़े स्नेह से मुझे उठाया और मेरे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर दिया .....और जब विदा हुआ तो लगा जैसे साक्षात कैलाशपति के दर्शन कर लौट रहा हूँ .....मेरे दरवाजा खोलते ही वो अचानक से बोले -

" एक विनती है आप से सर ...कि आप कभी मेरी प्रशंसा न छापियेगा...वो इसलिए कि मेरे अंदर का मानव जीवित रहे और वो आम आदमी तक सुलभता से पहुँच सके ...."

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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