#सईदा
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" माँ......... माँ ......
मैं तब तलक फूट -फूट कर रोता रहा उस कब्र में गिरकर ...जब तलक मेरी आँखे रेगिस्तान न हो गई ..
मैंने आखरी बार फिर उनकी कब्र में कान लगाया और पहले ही की तरह इस दफा भी फिर कोई आवाज न सुन पाया ...
मैं रोहित शास्त्री , अपनी माँ का वो बदनसीब बेटा जो उसको आखरी बार मिल भी न पाया .....
लेकिन जब वो 14 की थीं तो उन्हें किसी एक लड़के से बेहद लगाव हो गया ..जैसा हमको भी अक्सर हो जाता है ... अक्सर मेरे सामने अपनी जिंदगी के पन्ने खोल-खोल कर खुद ब खुद कभी जलती तो कभी बुझती थी वो ....
14 की ही उम्र में खुद से 10 साल बड़े लड़के के साथ रिश्ता जुड़ा उनका ....उस दिन वो बेहद खुश थीं ...उनका लगा कि जिंदगी भी गुड्डे -गुड़ियों सा कोई खेल है ...शादी भली चीज होती है ...और उन्हीं की होती है जिनका कोई रुबाब होता है ....
जब विदा हो रही थी घर से तो फूट-फूट कर रोई ...शायद वो कुछ घण्टों में बड़ी हो गयी थी ....
सुहागरात के किस्से को अक्सर पॉज कर जाती थी वो ....क्यूँकि बहुत शर्म उन्हें थी और कुछ शर्म मुझमें भी पलती है ....
लेकिन मैंने अनुमान लगाया कि किस कदर एक मासूम बच्ची को जिंदगी का सबसे बड़ा और वयस्क तजुर्बा बेहद दर्द पीकर हुआ होगा ....खैर
सास सौतेली थी ...तो पहले दिन से ही हाथ की मेहँदी धुलने लगी ...खुद बताती थी वो फिर उसके बाद कभी उसकी हथेलियों में कुछ चढ़ा तो सिर्फ पतीली की कालिक ।।।
पति बेटा चाहता था और उन्होंने भी उसे दो बेटे ही दिए .... वो अक्सर अपने बनाने वाले को धन्यवाद देती कि अच्छा किया कि मुझे बेटी न दी वरना फिर 14 की सीढ़ी से उसका खून ..फिसल कर मुकद्दर चटका लेता ...
पति गाँव से बाहर रहते और सास हमेशा उनपर सवार ... मैंने कहा उनसे कि जब इतना जुल्म होता था तो पति को बताया क्यूँ नही ...?
बोलती कि क्या बताना था हमारे बकत में सास दूजी माँ होती थी और माँ कि बुराई कम से कम हमारे बकत में तो हराम और पाप थी ,,,,
शादी के महज 10 साल गुजरे और उनकी उम्र और चेहरा भी उन दस सालों में 30 साल सा बदल गया .. पति उनकी शक्ल और हुलिया देख अब न दुलार करता और न मीठी बात ....बच्चों में जिंदगी जीना सीख लिया था उन्होंने ...चूल्हे ..रहट ..मवेशी और खलियान बाकि जिंदगी का हिस्सा बन गए थे ...
बच्चे तेजी से जवान हुए और वो तेजी से बूढ़ी ...सास गुजरी तो उस दिन वो बहुत ही फूट-फूट कर रोई ...जैसे सगी माँ खो दी हो ....
बशीर भाई की लुगाई ने समझाया भी कि सईदा ...सब्र करो ...कम से कम तुमपर जुल्म गिराने वाली तो चली गई .....
न मानी वो किसी कि बात ,,, क्या था इक आदत सी पाल ली थी उन्होंने कि जब तक सास दो ताने तीन गाली न दें तब तलक उनका दिन मुबारक नही होता ...वो इन्हें दुआ समझती थी और मैं उनकी इस कहानी को सुनकर उनको अक्सर कहता हूँ कि माँ तुम भी न इंसान की शक्ल में भगवान का ही कोई रूप हो ......
बेटे जवान हुए तो पति भी लुढ़क लिए ...खैर खुदा का कि दोनों बेटे पढ़- लिख लिये ....और अपने पैरों में खड़े हो गए ....
औरत के लिए वक्त तब बदलता है जब आदमी उसको बदलने दे...सईदा माँ सेहरा बुनने लगी थी उस जाहिल औरत को ये लगने लगा था कि उसके बेटे उसी की कोख से पैदा है ....गर् पैदा होते तो माँ को अपनी शादी में जुरूर बुलाते या थोड़ी सुई बराबर खबर तो करते ही...दोनों ने शहर में ही ...शहरवाला बनकर.. शहर की दो औरतों से निकाह किया ....
और इक औरत गाँव में ...अपना बचपन .. अपनी जवानी और अपना खून देकर अरमान सजाती रही ....
अच्छा माफ़ भी कर दिया दोनों को ....लालच बहुओं का कम अब पोते -पोतियों का जो जियादह था ......
जिस दिन शहर से बड़ा बेटा उन्हें लेने आया...जाने से पहले पूरे गाँव में नाच गई बेसब्री औरत ...क्यूँकि गाँव में औरतें कहने लगी थी कि ...जो माँ को शादी में न बुलाये वो अपने साथ क्या ले जायेंगे ....
बेटा कुछ अदब करता था माँ का इसलिए पहले दिन घर के झूठे बर्तन और झाड़ू न पकड़ाये ...जबकि बहू इस जाहिल औरत की परछाई से भी घिनयाती थी ....
माँ के शहर आने की खबर जब छोटे बेटे को लगी और पता चला बड़का और उसकी लुगाई ...ऐश में है ...तो तुरंत बड़े पर चढ़ाई कर बोला कि या तो छः-छः महीने में बाँटो या फिर माँ पर ही छोड़ो कि वो किसके साथ रहेगी ....
आखिर में बात छमाही में बनी ...अब माँ छः-छः महीने अलग-अलग घरों के बर्तन माँझा करेगी...और वो भी बिना नौकरानी वाले एहसास को अपने जहन में पाले ।।।।
सईदा के दिन बदले और खुदा ने उसकी दशा पर तरश खाया ...छुटका बेटा संग बीवी बच्चों विदेश चला गया ....अब जो बड़ा रहा वो ही सेवा लेता और बदलें में सिर्फ रोटी और कभी कुछ कपड़े देता रहा ....छोटे की आराम परस्त और रईशी जिंदगी देख बड़े की बीवी को जलन हुई ....और वो भी तब तलक रूठी रही जब तक बड़े ने भी विदेश जाने का इंतजाम न कर लिया ....
अब सिर्फ बची तो फिर सईदा ....लकड़ी जलकर फिर पीछे आ गई .. वो दिन रात हर पहर अपने बच्चों के लौटने का इन्तेजार करती ....और बच्चों ने फिर कभी पीछे मुड़कर नही देखा ....हाँ इतना खून बाकि था उनके अंदर कि कुछ पैसे भेज देते ....लेकिन मैंने दिमाग लगाया तो पाया बड़े वाले को इसकी जियादह परवाह थी कि उसके फ़्लैट के लिए कोई तो देख-रेख वाला हो ...बाकि जिस दिन इसका कोई ग्राहक मिल गया तो जहाज का पंछी फिर जहाज पर जा लगेगा ....
लेकिन सईदा माँ को मैं इक बाजार में मिला ...वो क्या हुआ कुछ बुखार था उनको तो लड़खड़ा कर गिर पड़ी .....मैंने घर तक पहुँचाया ..तो आँख में लाड़ भर आया उनकी ....रोजगार की तलाश में यहाँ आया था ....और सर पर न छत थी न जेब में कुछ जियादह गर्मी ....
सईदा माँ ने सिर्फ रहने की जगह भर न दी बल्कि माँ के साथ होने का एहसास भी दिया .....
उनकी पड़ोस वाली सरला अम्मा से कुछ बनती थी क्यूँकि दोनों एक ही डाल के पंछी थे ....सरला अम्मा की मौत ने उन्हें तोड़ दिया था .....लेकिन मुझे देखकर ज़िंदा रहने लगी ......
जल्द ही फ़्लैट का ग्राहक मिल गया ...और सईदा माँ को मिला पेट का कैंसर ....
बहुत बीमार रहने लगी थी ...अब गाँव भी वापस नही जाना चाहती थी ....उन्हें ये भी पक्का यकीन था कि फ़्लैट बिकने के बाद उनके बच्चे फिर उन्हें दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंकेंगे ....
मैं भी रोज किस्मत चमकाने निकलता अब जियादह कोशिश करता क्यूँकि माँ सईदा को भी अपने साथ रखना था ...उनके पास कुछ ही दिन थे और मेरे पास भी ।।।।
उस दिन जब मैंने उनको बताया कि एक शहर इंटरव्यू देने जा रहा हूँ नौकरी पक्की है ...इस दफा ....तो मेरे मुँह में हाथ रख दिया और माथे का बोसा लिया ....फिर अधमरी हालत में उस बेमुकद्दर औरत ने कहा -
" बेटा जब तलक तुम वापस नही आओगे ...और जब तलक तुम्हे कामयाबी नही मिलेगी ...मैं तब तलक मुसल्ले में बैठी रहूँगी और खुदा से तुम्हारे और तुम्हारे मुस्तकबिल के लिये दुआ करुँगी ....."
लाख समझाया जिद्दी औरत को न मानी ....उस मजलूम की दुआ रंग लायी ...नौकरी भी मिली और घर भी ....तेजी से घर लौटने की जल्दी थी ....भीड़ से लड़ कर माँ तक पहुँचा तो भीड़ ने रोककर कहा ...सईदा बीबी न रही .....
दोनों बेटों में से एक का फोन नही लगा तो दूसरे को फ्लाईट नही मिली ....
मगर मुझ अनाथ की बड़ी किस्मत से बड़ी खूबसूरत और बड़ी दुलार वाली सच्ची माँ मिली थी ....
आज जब कब्रिस्तान से लड़खड़ाता हुआ लौट रहा हूँ तो रास्ते के एक पत्थर से टकराकर गिर पड़ा ....यकीन करे न करे कोई मुझे लगा कि जैसे किसी ने कहा -
" बेटा चोट तो नही आई "
माँ की इक कहानी में ये जुमला सुना था कहीं.. कि माँ अपने बच्चे के हर दर्द पर मचल उठती है
....
आज यकीन हुआ कि माँ ही वो शय है कायनात में ...जो अपनी औलाद की बुझी-फँसी किस्मत बदल सकती है .........नवाज़िश
#जुनैद...........
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