Monday, 28 January 2019

शंकर_भाईजान

#शंकर_भाईजान
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" नही ..मतलब ..देखा ..हें ...मतलब टूटा नही अपना बजरंगी ....मतलब लौंडिया को उसकी अम्मा से मिलाकर ही दम लिया .."

" घुत्ता ..शंकर दा न तुम भी पूरे फ़िल्मी हो यार ...अबे पिच्चर है ..सच में घण्टा भी न होता ऐसा .."

" अबे ! पता है पिच्चर है लेकिन ...क्या नाक ऊँची की मतलब बजरंगी ने ..पाकिस्तान के फौजी और पुलिस दोनों को दिखा दिया एक हिंदुस्तानी ने ....."

" बस ..बस.. दादा चलो अब सच्ची दुनिया में आओ ...आपका कमरा आ गया ......

मोटरसाईकिल रुकी और मैं नीचे उतरा ...हथियार बीड़ी के बण्डल से एक सिट्टा निकाला और उसे होंठों में रखा ... मैं शंकर नाथ ...पूरा भोलापुर मुझे शंकर दादा बोलता है ..चिप्स फैक्ट्री  में काम करता हूँ ...मुँह पर चेचक के उतने ही दाग हैं जितने आज बजरंगी भाईजान के फर्स्ट शो में पब्लिक थी ...ब्याह हुआ था लेकिन निभ नही पाई लुगाई से ...वो खबसूरत थी और मैं पैदाइशी बदसूरत ...छूने ही न दिया कोरटा ने पहली रात ...तीन रातें मुझसे अलग गुजारने के बाद ...हम गए आलू से चिप्स  निकालने और वो निकल गई अपने प्रेमी संग ....मैंने रिपोर्ट न की पुलिस में ...क्यूँकि उससे कुछ फायदा भी न कमा पाता .. ..लेकिन फ़िल्म देखते हुए आँख से आँसू झबरा के गिर गए ....46 की उम्र लग गई है मेरी ..लेकिन आज पहली बार ये एहसास जिगर में उछला की ..कि काश मेरी भी कोई बेटी होती वैसी ही जैसी बजरंगी की पीठ पर थी ....तभी

" हैलो अंतल "

मैं पर्दे से जमीन पर आया ...और घूर के देखा ...तो पाया एक बेहद मासूम और खूबसूरत  बच्ची मुझ बदसूरत को हैलो बोल रही थी ...चिंगोटी अपने पिछवाड़े पर काटी ..वो क्या है कमजोर हूँ  तो माँस नही पकड़ आता और कहीं का .. ...लेकिन ये सच था कि वो मुझसे यानि शंकर से हैलो बोल रही थी .....मैं भगवान से सारे शिकवे भूल गया ...और बोला -

" हैलो प्यारी परी ...आप कौन हो ..?"

" अंतल मेला नाम आछिफा है "

तभी एक औरत सर पर पल्लू ढाँक कर आई और तैश में बोली -

" अंदर चलो आसिफा ...कितने बार कहा है अजनबियों से बात नही करते "

फिर उस औरत ने मेरी शक्ल में देखा और घिनयाते हुए मासूम परी का हाथ पकड़ घर के अंदर घसीट ले गई ...

आज रात पहले जैसी नही रही ...आज मैं भगवान से इतना नाराज नही था ...बल्कि आज मुझे उसको धन्यवाद बोलने का मन किया ...लेकिन लज्जावश  न बोल पाया ...आज मैंने सर के तकिये को अपने बगल की करवट में लगाया ..और न जाने क्यूँ उसको थपकियां देने लगा ...पता नही क्यूँ लेकिन उस बच्ची का चेहरा आँख से धुंधला ही नही हो रहा था ....

दो दिन बाद फिर वो बच्ची मुझे एक शॉपिंग मॉल में नजर आई ...सुपरवाईजर साहब के साथ गया था ..कुछ कागजी हिसाब-किताब  था फैक्ट्री का  ..वो मिलने गए और मैं खिलौनों के एक स्टॉल पर जम गया ...वो जो सामने एक गुड़िया थी पता नही क्यूँ उससे नजर हटती ही नही थी ...तभी

" हैलो अंतल ...आप तो भी वो डॉल पछन्द है न ..?"

वो ...वो...ये ..ये तो वही प्यारी परी थी ...मन किया गोद में उठा कर सीने से लगा लूँ ..लेकिन डर था कहीं उसकी माँ आस -पास न हो ....लेकिन रहा न गया तो सीधे उसे गोद में ले लिया ...और भैया से पूछा बताओ तो ये गुड़िया कितने की है ..?

उसने मेरी तरफ बड़ी हिकारत से देखा और बोला -

" पूरे चार हजार की "

" शर्मिंदा सा हो गया मैं जेब में चार सौ भी पूरे नही थे ....तभी "

"अरे वाह तुम तो पीछे ही पड़ गए मेरी बच्ची के ..उतारिये उसे नीचे ...कहीं तुम बच्चा चोर तो नही "

मेरे मुल्क की पब्लिक वैसे बहुत नेक है लेकिन जिम्मेदारियों से इस तरह पिचकी है कि हमेशा उन्हें कुछ देर उतारने के लिए कुछ न कुछ उपाय ढूँढती ही रहती है .....चार थप्पड़ पड़े...कुछ एक लात..लेकिन किसी ने घूँसा भी मार दिया..जिससे जबड़ा हिल गया और खून गिरने लगा ...सुपरवाईजर साहब आ गए और बात टली ....

लेकिन मेरी नजर अब भी उस गुड़ियाँ पर थी जो परी को पसन्द थी .....खैर अब इरादा कर लिया कि परी के आस-पास भी न फटकूँगा ..वरना अगली बार हालत और उधड़ जायेगी ....

तीन दिन फिर बीते ...तभी वो चिड़िया मुझे एक सरकारी बाग़ में चहचहाती और खिलखिलाती नजर आई ....मैंने सख्त होकर खुद से बात की और उससे नजर फेरकर दो कदम आगे बढ़ाये लेकिन फिर खुद से ही हार गया ...और उसे ताँकने लगा ... और दुनिया ही भूल गया ....तभी मेरी नजर उसकी माँ से टकराई ..वो जैसे मुझे खा जाने वाली नजरों से देख रही थी ...मैंने तुरन्त वहाँ से कलटी काटी ....

घर जाकर बेड़ का गुल्लक फोड़ा ...और सीधे गया उस शॉपिंग मॉल ...और वो गुड़िया खरीदी ...और अगले दिन बड़ी सावधानी से इधर-उधर की टोह लेकर उस पार्क में पहुँचा ....लेकिन रात -भर तलक इन्तेजार रहा और वो न आई .....रहा न गया ..इरादा कर लिया ..जो होगा देखा जायेगा ....खटका करके गुड़िया छोड़ भाग जाऊँगा ....

मैं परी के दरवाजे पर पहुँचा ...और देखा दरवाजे पर ताला टँगा था ..,वापस कमरे में धुत शराब संग पहुँचा ...और जब तलक आँख जिंदाबाद रही ..उस गुड़ियाँ से बाते करते रहा ...आँख तर थी मेरी और आवाज में कँपकपाहट ...कब आँख लगी कुछ पता न था ...भगवान से फिर मेरा बैर प्रारम्भ हो चुका था ....

6 दिन निकल गए लेकिन ताला न खुला ...पैग बना रहा था कच्ची का एक रात तभी दरवाजे में भड़-भड़ हुई ...फौरन बोतल खटिया नीचे लगाई और दरवाजा खोला -और रूह में सिहरन दौड़ गई -

"आ..आ..आप ....य ..यैय ..यहाँ .."

" जी भाईजान ...मैं ...दरअसल आसिफा मेरी बेटी नही है ...ये कानपुर में किसी शेख आलम की बेटी है ...मुझे रेलवे स्टेशन में मिली थी .. अब मुझसे और नही पाली जाती ...आप इसे इसके घर छोड़ सको तो मेहरबानी होगी ..क्यूँकि मेरे पीछे पुलिस पड़ी है ..ये पर्चा जिसमें कानपुर का पता लिखा है ..और ये दूसरा आप मत खोलना इसके घर वालों को दे देना .... वो इसे पहचान लेंगे ...अच्छा खुदा हाफिज भाईजान में चलती हूँ "

मैं सिर्फ जड़ था ...इस तरह थमा जैसे मुझसे मिलने मौत आई थी ...वो मौत जो मुझे मेरी जिंदगी दे गई थी .....सब भूल गया उस रात ..उस परी को गोद में लेकर ढेर सी तुतलाई बातें की ...उसका घोड़ा ..गधा ..हाथी सब बना ...उसको जब मैंने उसकी पसन्द की वो गुड़ियाँ दी तो उसने मेरे गाल चूम लिए ....आँसू भर आये एकदम आँख में ...मेरी माँ के बाद किसी को मेरे चेहरे से प्यार न था ...जिसने देखा सिर्फ घिन से देखा ...एक करवट सोया और वो पूरी रात मेरे फैले बाजू में ....मुकम्मल हो गया था मैं ...या फिर ज़िंदा ...लेकिन तभी नजर उस चिट्ठी पर पड़ी और एक मायूसी मेरे कलेजे से निकल मेरी आँखों में तैरने लगी .....

सुबह परी को तैयार किया और कानपुर की गाड़ी पकड़ी ....रास्ते भर उस मासूम की हर जिद पूरी की ....पैसा खत्म होने लगा तो इकलौती सोने की पतली अँगूठी भी कानपुर पहुँच कर बेच दी ...लेकिन पूरा दिन उसके साथ रहा ...वो जिसपर हाथ रखती वो उसका ...उसे अपने हाथों से खिलाया ...और एक -एक पल जीता रहा जिंदगी के साथ ....तभी उसकी नाक बहने लगी और मैंने जेब से रुमाल निकाला और वो पता भी निकल आया जिसे शायद मैं भूल गया था ....मन पक्का किया जिंदगी को गोद में उठाकर एक आदमी को रोक कर पता पूछा ...,फिर दूसरे ...फिर तीसरे ...हर किसी से ...लेकिन किसी को ये पता न पता था ....रात ढलने लगी ....और रहा न गया तो दूसरी चिट्ठी हाथ में लेकर खोलने लगा ताकि कुछ पता तो चले ....

" भाईजान आसिफ़ा मेरी ही बेटी है ...मैं वही हूँ जिसने इसको आप को सौंपा ...मैं इस चिट्ठी पढ़ने तक आपके आस-पास ही हूँ ...लेकिन इसके पढ़े जाते ही मैं हमेशा के लिए गुम हो जाऊँगी ....भाईजान आज से आप आसिफा के अब्बू हैं...अगर न होते तो अब तलक आसिफा को आपसे छीन लेती और आप ये चिट्ठी कभी न खोल पाते ....भाईजान मुझे एड्स है ...और ये तोहफा मुझे मिला अपनी मुहब्बत जिसके लिए मैंने घर ...इज्जत सब छोड़ डाली ...मेरे पति का मुझसे भी अलग गैर औरतों से सम्बन्ध था ....वो गुजर गए लेकिन मेरे पेट में आसिफा को छोड़ गए ...घबराइये मत इसे ये बीमारी नही है ....मैं आसिफा को इसके ननिहाल भी छोड़ सकती थी लेकिन अब्बू ने मुझे बेदखल कर दिया है ...और पति के घरवाले इसको कभी प्यार  क्या हमदर्दी भी न दे पायेंगे .....आप को देखा तो पाया ...कि वाकई बिना किसी रिश्ते और स्वार्थ के एक इंसान मेरी बेटी को पागलों की तरह प्यार करता है ..आप पर हमेशा मेरी नजर रही ..और ये सब कुछ इसलिए था कि मुझे पता चले कि मेरी बेटी को आप मुकाम तक ले जाते हैं या कोई फायदा उठाते है ..... बाकि आपकी आँखे ही मुझे बता देती है कि आसिफा आपकी जिंदगी है ...हवश और मुहब्बत मुझसे बेहतर भला कौन पढ़ सकता है ..माँ हूँ न..मेरे पास सिर्फ कुछ दिन बचे हैं ..आसिफा का और अपना ख्याल रखना ....खुदा हाफिज ... शंकर भाईजान !

..कुछ देर तलक उस मासूम को सीने से लगाकर बस ऐसे ही एक बैंच में बैठा रहा ...आँख और गला दोनों झिलमिला रहे थे लेकिन आज जिंदगी मिल गई थी और जिन्दा रहने की एक ज़िंदा वजह ...अब मुझे लगने लगा था कि मुझसे खूबसूरत और किस्मत वाला कोई दूसरा इंसान इस जमीन -आसमान ने पहले कभी नही देखा होगा .....काश होता मेरा यार तो मैं रुतबे में चिल्लाकर बोलता-

" देख बे नंदू ...पिच्चर नही ये सच है साले  ....असली में भी होता है ....देख... देख मेरी परी को और मुझे "

.......आसिफा को पूरा भोलापुर अब  परी बोलता है  .....और मुझे ...
" शंकर भाईजान "

नवाज़िश

Junaid Royal Pathan

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