#नंदिनी
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हरिनगर अर्थात सन्तों का नगर , मैंने सन्तों के ही मुँह से सुना है कि इस नगर के वृक्षों पर पल्लव , कुसुम, रसाल फल , एवं मधुकर भी हरि नाम का जाप करते हैं ...कलकल बहती देविका नदी भी इतनी निर्मल एवं शांत है कि भक्तों को उसके घाट पर जाप-नेम में विघ्न की अनुभूति ही नही होती ....सनातन संस्कृति के इस सांस्कृतिक नगर का हजारों सालों से ,,हजारों आक्रमणों के बाद भी कोई आक्रांता रूप विकृत एवं परिवर्तित नही कर पाया ।मन्त्रमुग्ध था मैं इस नगर की शोभा देखकर ....चित्त शांत कर जैसे ही मैंने आम्रवृक्ष के नीचे कुछ देर ध्यान हेतु अपनी आँखें बन्द की तभी सामने के शास्त्री जी के मकान की ओर मैंने हाँफते हुए दिवाकर को भागता पाया ...वो बाहर से ही चिल्लाया -
" जीजा जी ! अरे ! ओ जीजा जी ...."
" क्या हुआ अशुभ दिवाकर ..?..अबे बोलता क्यूँ नही "
" अशुभ तो अब होगा जीजा जी .....नंदिनी भाग गई ...." ( आँखों में आँसू भरकर सुबकते हुए )
" अबे राहु ! क्या अनाप -सनाप बोल रहा है ...यदि हमारी बहन का भाई न होता तो आज हम जीव हत्या करने में किंचित भी न हिचकते "
" मैं झूठ नही बोल रहा जीजा जी ...विश्वास कीजिये वो भाग गई "
तभी घर अंदर से जानकी अर्थात शास्त्री जी की भार्या प्रकट होती है -
" क्या हुआ दिवाकर आज सुबह -सुबह क्यूँ शोर मचा रहे हो ...?..और ये रो क्यूँ रहे हो ...?"
" दीदी .. नंदिनी हमें छोड़ के चली गई ...अर्थात भाग गई ..बू ..हू ..बू..हू "
" हे भगवान ..मैं लूट गई ..सुनते हो जी ...हम बर्बाद हो गए ...पूरा हरिनगर अब हम पर थूत्कार करेगा ..अब क्या होगा ...हमारी इकलौती ...."
" अबे चुप कर ...रोने -चीखने से क्या वो वापस आ जायेगी ...."
" सब आपने ही किया ...आप ही की वजह से वो भाग गई ...आपने ही उसकी स्वतन्त्रता छीन ली थी आपने ...."
" चलो दिवाकर मोटरसाइकिल निकालो ...सीधे पुलिस स्टेशन चलते हैं "
" क्या कह रहे हो जीजा जी ...पुलिस में बात जायेगी तो पूरे हरिनगर में ये बात जंगल की आग की तरह फ़ैल जायेगी ...."
" तो चल उसे खुद ढूँढ़ते है ...अबे असुर बाइक तो स्टार्ट कर "
शास्त्री जी और दिवाकर बाइक पर निकल पड़ते हैं ...तभी रास्ते में शुक्ला जी मिलते है ..
" अरे शास्त्री जी आज सुबह -सुबह ..."
" आप घर के आदमी हैं शुक्ला जी ...इसलिये बता रहें है ....शुक्ला जी नंदिनी भाग गई है ."
" राम ...राम ....शास्त्री जी नंदिनी तो बहुत घेरलू और मासूम है ...जरूर कोई दुष्ट बहला-फुसला के अपने साथ ले गया होगा ....चलिए हम भी साथ चलते हैं आप के ..थोड़ा आगे सरकिये .."
" क्या कद्दू सरकिये शुक्ला जी ...चालान हो जायेगा आगे ...आप अपने वाहन से दूसरी दिशा में खोजिए हम बस अड्डे को जा रहें हैं .....( दिवाकर बोला )
मोटर साईकिल बस अड्डे पहुँची और शास्त्री जी और दिवाकर दो दिशाओं में बँट गए ...कुछ पच्चीस मिनट खोज-बीन के बाद दोनों फिर पुनः मिले -
" क्या हुआ दिवाकर कुछ पता चला ..?."
" नही जीजा जी ....कुछ खबर नही । "
तभी शंकर नाथ आते दिखाई दिये जो बस कंडक्टर हैं ....
" राधे -राधे ...पण्डित जी आज सुबह -सुबह बस अड्डे ...कहीं जा रहें हैं या कहीं से आ रहे हैं ? "
" यमलोक से आ रहें है ...यमदेवता आपके चक्कर में हमें धर ले गए ...संध्या तक आ जायेंगे आप को लेने "
" चुप कर दिवाकर ! शंकर बाबू बड़ा परेशान है मित्र ...वो क्या है नंदिनी भाग गई है ...मतलब उसे कोई दुष्ट भगा कर अपने साथ ले गया "
" राधे ..राधे ....तभी कहूँ आज सुबह -सुबह जब हमने नंदिनी को देखा तभी समझ गए थे कि कोई रहस्य अवश्य है .."
" क्या कह रहें है ..?.कहाँ देखा आपने ? "
तभी दिवाकर तपाक से बोला-
" किन्नरलोक की बातें कर लोगे ..लेकिन काम की अंत में कहते हो .."
" चुप हो जा श्रापित दिवाकर ...बोलिये न शंकर बाबू कहाँ देखा मेरी नंदिनी को आपने ..?"
" जी.. वो.. जो सामने वट वृक्ष है न.. उसी के नीचे खड़ी थी ...क्षमा कीजियेगा फिर अचानक से एक मुस्लिम लौंडा आया और वो उसके साथ चल दी !"
" शंकर लाल ! क्या बकवास कर रहे हो ....?"
" हमनें पहले ही कहा था जीजा जी ...चरस चूसे हैं ये ..."(दिवाकर बोला)
" छोटा मुँह बड़ी बात ..क्षमा कीजियेगा शास्त्री जी उसके साथ एक मुसलमान लौंडा ही था ...उसके सर पर टोपी भी थी ...."
" हे भगवान ! कहाँ को गए दोनों ...?"
" जी वो अलीनगर को जाते देखा हमनें "
दिवाकर फिर बीच में बोला -
" और तुम खड़े रहे चरसी नाथ ...देखते रहे ....चलिए जीजा जी अपने आदमी बुला कर लाते है ...वहाँ ऐसे घुसना ठीक नही ...."
" नही दिवाकर ...देरी से कोई अशुभ न हो जाए ...चलो "
बाइक अलीनगर के अंदर प्रवेश करती है ....अंदर का माहौल एक पल में हरि और अली को अलग करने हेतु काफी था ......कदम -कदम पर मस्जिदें ...दाढ़ी -टोपी वालों का रेला ...बिरयानी की महकती खुशबू ...मदरसों से कुरआन के विर्द की आवाजें ...कोयलों में सींक कवाबों का जमघट ...पर्दा नशीन खातूनों का जमावड़ा ....कहीं टेलरिंग मशीन के चलते पैर- पलटे ...तो कहीं हज्जाम की दुकानों से कव्वालीयों का संगीत ....
शास्त्री जी अपने मुँह और नाक पर राम- नाम का अपना पीताम्बर ठूंस लेते है..तभी -
" अब क्या करें जीजाजी ..?"
शास्त्री जी कुछ देर सोचते हैं फिर बोलते हैं-
" तेरे फोन में नंदिनी की कोई फोटो है ...?"
" हाँ है न ..एक फैमली फोटो ..."
" निकाल तो ! "
शास्त्री जी अपने मन में पत्थर रखकर एक राहगीर को रोककर पूछते हैं ..
" मुल्ला जी ..इसको कहीं देखा क्या ..?"
" अल्लाह झूठ न बुलवाये मियाँ ...तकरीबन आधे घण्टे पहले एक लौंडे के साथ ..दिखी थी यहीं पर ...फिर वो दोनों ...बियांबा में निकल लिए "
तभी दिवाकर बोला -
" मुल्ला जी ...क्या अलीनगर में बीयर बार भी है ..?"
" चुप कर महिषासुर ...उनका मतलब एकांत ..निर्जन स्थान से है ...मुल्ला जी रास्ता बतायेंगे ..?"
" जी मियाँ वो सामने जो ..जांघियों की छुट्टली दुकान देख रिये हो न ...उसकी पल्ली वाली सड़क पर निकल जाइए बस "
" चल दिवाकर ...जल्दी चल ....."
" जीज्जा जी ! कसम से बाइक न घुसेगी वहाँ "
" अमवास के चन्द्र जिह्वा ठीक कर अपनी ...और यहीं रोक बाइक को ...पैदल ही चलेंगे ...चल जल्दी चल... "
" जीजा जी ...मुझे एकांत में भय लगता हैं .... आप होकर आइये मैं यहीं रुकता हूँ ...."
" ठीक है कायर तू यहीं रुक..मैं नंदिनी को लेकर आया ...."
शास्त्री जी ...एकांत में 100 कदम चलने के बाद देखते हैं कि ...एक जर्जर ..खस्ताहाल मकान सामने है और उसी के दरवाजे के बाहर नंदिनी खड़ी है .....शास्त्री जी की आँख भर आती है ....परन्तु फिर वो एक निर्णय कर पर वहीँ पड़ी एक लकड़ी के डंडे को उठाते है ...और तेजी से उस मकान के करीब बिना आवाज किये पहुँचते हैं ..तभी मकान के अंदर से एक किशोरी की आवाज आती है ..और वो वहीँ खिड़की के साथ चिपक कर खड़े हो जातें है ....
" जाहिद इसे क्यूँ ले आया तू ...बोलता क्यूँ नही ...?"
" अप्पी (दीदी) मुन्नी भूथ से मल लही है ...3 महीने पेले अब्बू मल दए और तीन दिन पहले अम्मी ...हमाले पास थाने को पेछे नही तो मुन्नी के लिए दूद तहाँ से लायेंदे ....?.अप्पी मैं मुन्नी ते लिये दूद लेने बाजाल दया था ..मैंने छोचा था ती बस अड्डे ते पाछ वाली बाजाल छे दूद चुला लाऊँदा ...वहाँ मुझे ये दाय अतेली मिली तो मैं इछको अपने छाथ ले आया ..हम इछको पालेंदे अप्पी ...आज छे यही हमाली अम्मी है ..."
जाहिद की अप्पी फूट -फूट कर जाहिद से चिपटकर रोने लगी ....और बाहर खड़े शास्त्री जी के हाथों से डंडा जमीन पर गिर गया ....शास्त्री जी भूल गए कि वो उन बच्चों की तरह बच्चे नही ....और वहीँ दिवार से सट कर होंठ चबा-चबा कर उन्होंने साँसे भर -भरकर सिसक- सिसककर आँखों में सैलाब भर लिया .....तभी
" लेकिन जाहिद ये जिसकी गाय है अगर वो आ गया और उसने हमें चोर समझकर पुलिस को दे दिया तो ...?"
" वो अब कभी नही आएगा बेटी ....कभी नही ...आज से नंदिनी ही तुम्हारी अम्मी है .....और मेरे बच्चों आज से तुम्हे किसी चीज की कमी नही होगी .....मैं रोज यहाँ आता रहूँगा ....ये लो कुछ पैसे रख लो ....और जाओ कुछ खाना खरीद लाओ ...."
जाहिद और उसकी अप्पी की सिट्टी -पिट्टी गुल हो गई ...आवाज बटोरकर उसकी अप्पी बोली -
" आप कौन है ...?"
" मैं इस गोमाता का सेवक हूँ ..वो गोमाता जो अब से तुम्हारी भी अम्मी है .... आओ मेरे बच्चों आओ एक बार मेरे गले लग जाओ "
जाहिद खाना लेकर आया ...और तीनों का पेट भरकर और उन्हें आशीष देकर शास्त्री जी जब दिवाकर के पास पहुँचे तो उन्हें देखकर दिवाकर बोला -
" जीजा जी नंदिनी कहाँ है ...?"
" वहीं दिवाकर जहाँ वो खूंट तुड़वाकर जाना चाहती थी ....जहाँ उसके बच्चे अपनी अम्मी की राह देख रहे थे .....चलो दिवाकर ....."
दिवाकर की अक्ल आज तक शास्त्री जी के ये अनमोल वचन नही समझ पाई ....मगर दिवाकर इतना तो समझ गया कि शास्त्री जी नंदिनी का दान कर आये ....और गोदान से बड़ा दान धरती पर फिर कोई नही "
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
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