#जन्नत
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" डेमिट ..फक ...स्टॉप दा कार ....हे गाइज तुमने अभी देखा ...वो ..वो ..सामने ..."
" अबे आकाश तभी कहा था इस फट्टू को मत दिया कर पीने को ....क्या हुआ बे ..?"
" अपनी जुबान सम्हाल रोहन ....साले तेरी भी फट के हाथ पर आ जाती अगर तू भी देख लेता ..."
" अबे क्या देख लेता ...व्हाट डू यू मीन ..?"
" अबे मैंने अभी देखा ..वो सड़क के किनारे एक सफेद कपड़ो में लिपटी औरत को ....उसकी गोद में एक बच्चा भी था "
" हा हा हा हा हा ...अबे सुना रोहन ...हा हा हा ..इस झान्टू को पालयट बनना है ....अबे फट..फट..फट्टू ...देख तेरी फ़टी तो नही चुड़ैल देखकर ..."
" हे गाइज चिल ...कहाँ देखी तूने वो औरत नंदलाल शर्मा .."
" ओये आकाश ! पूरा नाम मत ले ..नील बोल कमीने ...वो वहाँ पीछे माइल स्टोन के पास ...."
ड्राइविंग सीट पर बैठे आकाश ने कार बैक की ...और कार माइल स्टोन के पास ले जाकर रोकी ..
" बता ...नही बोल कहाँ है वो औरत ..साले सड़ी हिन्दी हॉरर मूवी देखेगा तो ऐसा ही होगा ...बता कहाँ हैं ..?"
तभी रोहन बोला -
" ही ही ही ...अबे बोल रामसे की औलाद कहाँ है ..? साले हॉलीवुड देखा कर कम से सब कुछ खुला देखने को तो मिलता है ...यहाँ तो सी ग्रेड हीरोईन नहाती भी है तो कपड़े पहनकर ...."
" हा हा हा हा हा हा ..."
कुछ नही था उधर और नन्दलाल उर्फ़ नील ने भी अपनी अच्छी किरकिरी करवा ली .....गाड़ी आगे बढ़ी अचानक से कार पर फिर ब्रेक लगे ...और इस बार ड्राइविंग सीट पर बैठे आकाश ने उस औरत को देखने का दावा किया ....लेकिन रोहन ने फिर बात हवा में उड़ा दी ....
कौन थी ये औरत ...? जो मुझे भी दिखाई दी थी ..ये सवाल मैं यानि एक बैंकर उम्र 30 साल भी आज तलक खुद से पूछ रहा हूँ ..मेरा रास्ता यही है आने -जाने का ...रात को क्लोजिंग के बाद ..दिन के स्ट्रेस के चलते .. थोड़ा बार में वक्त गुजारता हूँ तो अक्सर घर पहुँचने में लेट हो जाता हूँ ... लेकिन मेरे कान तब खड़े हो गए जब एक दिन मैं कैश काऊँटर में कैश डिस्ट्रिब्यूट कर रहा था ...और नंदलाल शर्मा नाम का ये युवा यही कहानी फोन में किसी को सुना रहा था ....
जब उसकी बारी आई तो मैंने उससे उसका नम्बर और घर का एड्रेस लिया ...और ऑफिशियल छुट्टी पर उसके घर गया और उससे इस बारे में बात की ...वो हैरत में पड़ गया और उसने मुझे जो घटा वो सब सच बता दिया ...अब उस औरत पर जहाँ नील को कोई शक नही था वहाँ मैं भी सन्तुष्ट था कि उस औरत का भी कोई वुजूद है ,,
अब मैं अक्सर रात को घर लौटते वक्त चौकस रहता ..लेकिन वो औरत मुझे फिर कभी दिखाई नही दी ...और ये बात मेरे जहन से उतर गई ...भूत-प्रेत पर मैं हरगिज विश्वास नही करता ... लेकिन न जाने क्यूँ मुझे ऐसा लगने लगा था कि कुछ होता तो जरूर है .....
बॉस की फेयरवेल पार्टी रात के 1 बजे खत्म हुई ....धुत नशे में , मैं फिर उसी सड़क से गुजरा ....तभी मुझे लगा कि मैंने कुछ देखा ....मैंने आव देखा न ताव और गाड़ी को जल्दी में बैक किया ....माइल स्टोन में पहुँचने तक वो औरत जंगल में आगे बढ़ चुकी थी ....नशे ने मुझे साहस दिया ..और मैं उसके पीछे हो लिया ...लेकिन अजीब बात आज वो औरत अकेली थी ,,,
पेड़ों का झुरमुट खत्म हुआ ,,और मेरे उसके बीच फासला भी ...वो औरत भागते हुए कुछ पलटी ..तभी चाँद की रौशनी उसके चेहरे से टकराई ....मैंने किस्सों में सुना था कि चुड़ैल बहुत जवान और खूबसूरत होती है लेकिन ये तो अधेड़ और सामान्य सी थी .....तभी सामने एक खण्डर दिखाई दिया ...मैंने आँख का व्यास बढ़ा कर देखा तो पाया ..कि वो अंग्रेजो के ज़माने की हथियार रखने की कोई इमारत है ...जो अब खस्ताहाल है ...वो औरत उस इमारत में दाखिल हुई .....
शराब का नशा काफी हद तक उतर चुका था ...और एक अनजाने डर ने मेरे मन और जिस्म में दस्तक दी ..मेरी साँसों के साथ मेरे रोम भी फूलने लगे ...मैंने इरादा कर लिया कि अंदर दाखिल होकर पता लगाऊँगा आखिर ये सब क्या माजरा है ....
मैं जैसे ही अंदर दाखिल हुआ एक सड़ते हुए गोश्त की बू मेरी नाक में दाखिल हुई ....मेरा जी मचल गया ...और वहीं मैंने उलटी करना शुरू कर दिया ...जब कुछ सम्हला तो मैंने नाक में रुमाल रखा और आगे बढ़ा ....और सामने देखते ही मेरी रूह में दर्जनों सुराग हो गए ....एक बच्चे और एक मृत बूढ़े की देह जमीन पर गिरी- बिछी थी ...और उनमें तेज बदबू भरी थी ....मैं कुछ समझता तभी वो औरत सामने आई और बोली -
" डरिये मत साहब ...मैं कोई चुड़ैल नही ...बल्कि किस्मत की मारी एक इंसान हूँ......"
मैं कुछ समझता या कोई सवाल करता इससे पहले ही वह फफक कर रो पड़ी ...
मैंने उसके काँधे पर हाथ रखा और बोला -
" ये सब क्या है ...?"
" ये मेरी किस्मत है ...और मेरे बेटे के किये का सरमाया ...आज अगर मैं इस कदर मजबूर और बदतर नजर आ रही हूँ तो ये सब मेरे बेटे ने मुझे मेरी नेक तरबियत के एवज् में नजर किया है ..."
" मेरी कुछ समझ में नही आ रहा है ..."
" मैं सब बताऊँगी लेकिन पहले वायदा करो ...कि मेरे शौहर और और इस मासूम का बाइज्जत कफ़न-दफन करवाओगे ..."
" आप मुसलमान हो ...?"
" हाँ ...और एक काश्मीरी मुसलमान ...."
मेरे पैरों तले जमीन खिसक गई ...सोचा यहाँ से कट लूँ ...न जाने किस फछड़े में फँस गया हूँ ...लेकिन उस बच्चे की मृत देह देखकर ...कदम वापस पीछे न खींच पाया ...
" हाँ जुबान देता हूँ ...सब सच बताइये "
" मेरा इकलौता बेटा जाहिद आलम .... आई .पी.एस ऑफिसर बनना चाहता था ...रात- दिन पढ़ता रहता था ...उसे सिर्फ एक ही जूनून था कि उसे किसी तरह अपने अम्मी-अब्बू और मुल्क का नाम रौशन करना है ... लेकिन फिर एक दिन आर्मी की गोली से उसका एक जिगरी दोस्त अनवर मारा गया ...आर्मी को किसी ने एक मकान में दहशत गर्दो के छुपे होने की खबर दी ...और वो मकान अनवर का था ....अनवर भी एक ऑफिसर बनना चाहता था ...लेकिन आर्मी के मकान घेरे जाने पर दहशतगर्दो ने अंदर से फायरिंग शुरू कर दी और पटलवार में आर्मी ने सबको मार गिराया .....उसके बाद जाहिद फिर हमेशा के लिए बदल गया ...अनवर सिर्फ जाहिद का सच्चा दोस्त ही नही जाहिद की तरह एक सच्चा वतनपरस्त भी था .... और फिर जाहिद से दहशतगर्दो ने राब्ता कायम किया ...उनके आकाओं ने कल के होने वाले ईमानदार और वतनपरस्त ऑफिसर को जन्नत और हूर के ख्वाब दिखा कर वो करवा दिया जिसके बाद हम खानाबदोश और सजायाफ्ता हो गए ...."
" मतलब ..?"
" उसने अपने जिस्म में बम बांधकर आर्मी के एक बेस कैम्प को उड़ा दिया ....लाख समझाया था उसको कि अनवर की मौत इत्तेफ़ाकन हुई थी . जाहिद तो आकाओं की दिखाई जन्नत में दाखिल हो गया ...और टी.वी मीडिया और पुलिस ने हमारा जीना जहन्नम कर दिया ...हर जगह हमारे चेहरे पर लोग थूकने लगे ...जिसे पता नही था उसे भी मुल्क की मीडिया ने दिखा दिया कि मैंने एक दहशतगर्द को अपनी कोख में पाला है ....फिर न कोई रिश्तेदार रहा और न कोई सहारा ...हर जगह मुँह छिपाते -छिपाते यहाँ इस वीराने में आकर पनाह ली ...."
मैंने एक ठण्डी साँस भरी और आँखों से आँसुओं को जुदा किया और हकलाते हुए पूछा -
" ये ..ये ..ये..बच्चा ...? "
इस बार वो औरत शर्म और जिल्लत से मचल उठी और दीवार पर मुँह जोड़ कर नाखूनों से दीवार के पत्थर खुरचने लगी ..और फिर चीखकर बोली -
" तुम्हारे जैसे ही कई इंसानों की हवश का नतीजा है ये मासूम .... वो हैवान जो औरत की उम्र नही ..सिर्फ उसका बदन देखते हैं ...जिससे भी मदद माँगी उसने मदद के बदले जिस्म नोंच डाला...हर मजहब का नुमाइंदा इस चलती सड़क पर मुझे रौंद गया ...रात ढलने पर इसलिए बाहर निकलती हूँ कि हम पेट की भूख मिटा सकें ...लेकिन किसी ने चुड़ैल समझा तो किसी ने अय्याशी का सामान ....लेकिन आज इसलिए बाहर सड़क पर आई ताकि इन दोनों का कफ़न -दफन हो सके ..और इनको तो कम से कम कब्र नसीब हो !"
" बस करो ...भगवान के लिए बस करो...."
कफन -दफन बाइज्जत हुआ ...शादी नही की है अभी ...और माँ-बाप एक हादसे में खो चुका हूँ ...खैर सन्डे के दिन गार्डन की गुनगुनी धूप में अख़बार पढ़ रहा था तभी -
" बेटा अविनाश खाना लग गया ...जल्दी आ जाओ वरना ..मैं भी नही खाऊँगी .."
" आया अम्मीजान ..."
कल की एक चुड़ैल आज मेरी " माँ " है ...वो माँ जिसके पैरों के नीचे जन्नत होती है ....काश जाहिद जैसे नौजवान ...मुफ़्त में मिली इस जमीनी जन्नत की इज्जत करते और आकाओं की दिखाई जन्नत से नफरत.. तो यकीनन खुदा उसकी जमीन और आसमान दोनों जन्नत बना देता ......
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan