मैं कायर हूँ , बेहद डरपोक हूँ , और घुटनों में आ गया ..!
ये लफ्ज उनके हैं जो अक्सर मेरी कहानी पर मेरी पीठ ठोकते हैं ..और कहते हैं कि मैंने ये तुर्रम कारनामा कर दिया वो तुर्रम कारनामा कर दिया ....
लेकिन मुझे कायर बनाने वाले ..डरपोक घोषित करने वाले ..मुझे घुटनों पर लाने वाले आप ही मेरे अजीज हैं .... वगरना और किसी की क्या मजाल ...
हमारे वहाँ एक कहावत है कि -
" घुटनों पर वो बैठता है कि जिसकी माँ ने उसे हल्का गाढ़ा दूध पीलाकर मुकम्मल किया "
जबकि ऐसा नही हुआ मेरे साथ ...और मेरा इस कहावत से इतर ये मानना है कि घुटनों पर सदा जंग ,धैर्य और आत्मविश्वास से हारा व्यक्ति ही नही बैठता ..बल्कि कभी वो व्यक्ति भी घुटनों पर बैठ जाता है ...जो लड़ते -लड़ते थकान से चूर हो जाता है ...या फिर दुश्मन को फनाह करके दो साँस चैन की लेता है ...
या फिर वो व्यक्ति घुटनों पर बैठता है , जो असहाय और बेउम्मीद हो जाता है ..या वो जिसके अपने ..जिसके चाहने वाले चुप्पी इख़्तियार कर उसे रण और समाज में अकेला छोड़ देते हैं ....
मैं बेशक घुटनों पर आ गया ..और इस बीच कई बार ...और मेरा घुटनों पर आना प्रारम्भ हुआ " पुलवामा अटैक " के बाद !
पुलवामा अटैक के बाद वो हुआ जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नही की थी ..
एक सस्ते वेतन ..एक छोटी नौकरी ..और एक सीमित परिवेश के मास्टर को " पुलवामा अटैक " ने एकदम से सुपरस्टार बना दिया ... जो मैं कितनी भी कलम रगड़ लेता नही बन पाता ...
जब टेलीफोन और मोबाइल नम्बर अपनी वॉल पर लगाकर ..बहन ..बेटियों ..बेटों ..पोते -पोतियों के अभिभावकों ने एक नये भारत की रूपरेखा प्रस्तुत की ...
ये हरगिज नाटकीय नही था ..बल्कि ये डरावना अनुभव था ... जब बड़े -बड़े सेलिब्रिटीज के साथ मेरा भी एक नम्बर छिट-पुट रूप से टाँका गया ...और मुनादी करवाई गई कि वैसे तो ये एक फेसबुकिया लेखक मात्र है लेकिन भविष्य में खतरा बन सकता है ...
बहुतेरे ग्रुप में मेरा नम्बर दौड़ा ... और ये नम्बर दौड़ाया उन लोगों ने जिन्होंने मुझे विश्वास में लेकर ..मेरी प्रशंसा कर ..याचना कर मुझसे मेरा नम्बर प्राप्त किया ...बड़ी आड़ से इन्होंने मेरा शिकार किया कि अपनी फेक फेसबुक आई डीज से इन्होंने मुझे साँस लेने तक की मोहलत नही दी ।।
लेकिन मेरे शुभचिंतक मुझे इसकी सूचना देते रहे ...लेकिन मात्र सूचना ... किसी ने भी आगे बढ़कर अपनी वॉल ...किसी कमेंट ..किसी पोस्ट पर ये प्रतिक्रया देने का प्रयास न किया और न ये सवाल पूछने की हिम्मत की ..कि
" जुनैद का कसूर तो बताओ ..?"
खैर ! " अम्मी -मुबारक " की तबियत उस दौर बेहद नासाज थी ..और जब वो हॉस्पिटल में दर्द से कराह रही थी ..तब मैं फोन की घण्टी बजने से सशंकित था ...या भयाकुल ...
इनबॉक्स ..मोबाइल मैसेजेज ..व्हाट्सअप मैसेजेज ..और फोन पर उसी माँ को गाली दी जा रही थी जो खुद अस्पताल के एक बैड में दर्द से कराह रही थी ....
हाँ मैं घुटनों पर आ गया था ...क्यूँकि अकेला मैं इस भीड़ का सामना करने में अक्षम था ... फिर भी मेरे घुटनों में आने की वजह ये भीड़ नही थी बल्कि वजह थी एक सभ्य भीड़ की चुप्पी !
बड़े -बड़े सयाने साहिबान जिनकी मैं तहे दिल से इज्जत करता था ..वो अपनी वॉल पर नफरत बाँट रहे थे उस नाजुक दौर में जब हमारी एकजुटता आतंक को पहला करारा जवाब होती ।।
फिर आई शिवरात्रि जब मेरी एक सामान्य कहानी की रिपोर्ट की गई ...और साथ ही साथ रिपोर्ट हुई मेरी आई डी की ....हाँ मैं घुटनों पर आ गया क्यूँकि आप चुप रहे ....मेरी उस कहानी में भी एक प्यारा संदेश और जोड़ने की बात ने उन लोगों के एजेंडे पर करारी चोट की जो ये समझ बैठे हैं कि हर जोड़ने वाला अब छद्म सेक्यूलर माना जाने लगा है .....
वो कहानी आगे बढ़ रही थी और फिर ब्लैक आउट ...
कल की मेरी कहानी विशुद्ध रूप से एकता और भाईचारे को समर्पित थी ...ये जानते -बूझते कि अब कोई इन लफ्जों और जज्बात की कद्र नही करता ये जानते -बूझते कि कोई इसपर लाइक्स -कमेंट्स नही गिराता फिर भी मैंने वो कहानी एक खैरख्वां मित्र की सलाह के विपरीत जाकर पोस्ट की और मैंने देखा कि मैं फिर घुटनों पर आ गया ...
सामाजिक कहानियाँ लिखूँ आप मुझे नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं ...सामाजिक बुराइयों पर कुछ कहूँ आप मेरी कैटगिरि फिक्स्ड करने की होड़ में लग जाते हैं ...रिश्तों पर कुछ कलम चलाऊँ तो आप मुझे मर्यादाओं की दुहाई देकर मेरा मेयार मुझे याद दिलाते हैं ....
खैर ये आपकी अभिव्यक्ति की आजादी...लेकिन फिर मेरी अभिव्यक्ति की आजादी का गैंग रेप करने पर क्यूँ भीड़ बना लेते हैं ...?
असल में ...आप प्रयासरत हैं कि मैं लिखना छोड़ दूँ ...लेकिन आप जवाब नही देते कि क्या आपने मुझे कलम खरीद कर दी थी ..?
कोई साहिबान कह दे कोई साहिबा कह दे कि कभी मैंने उनके निमित्त या उनकी वॉल पर उनके लफ्जों को बेईमाना और सस्ता कहा हो ...कोई कह दे कि मैंने कभी किसी किसी के इनबॉक्स में नॉक किया हो .... फेसबुक महिला मित्रों के फोन नम्बर होने पर भी उनको कभी अनावश्यक मेसेज या कॉल की हो ....क्यूँकि मैं आपकी राईट टू प्रिवेसी का सम्मान करता हूँ ...और कोशिश ये करता हूँ भीड़ सा आचरण न करूँ ....
1800 लोग मित्र सूची से विदा करना आपके लाइक्स ..कमेंट्स और प्रसिद्धि प्रभावित करता है लेकिन 1800 की एक सेट विचारधारा से ग्रसित भीड़ क्या मित्र सूची में रखा आर .डी .एक्स नही ..?
लेकिन फिर भी वो आस्तीन में रखा इकलौता साँप अब तक पकड़ में नही आ रहा या पहचाना नही जा रहा जो मेरे विरुद्ध मेरे साथ रहकर निरन्तर मेरे सापेक्ष भीड़ का निर्माण कर रहा है ...जो मेरी आई . डी और कुछ विशेष कहानियों की रिपोर्ट कर रहा है ....
लेकिन मल कितना भी सोचे कि वो जल समाधी लेकर अपना रूप अपनी गन्ध और अपना स्वभाव छिपा सकता है लेकिन उसकी नियति में भेद खुलना ही अंतिम सत्य है ।।।
भीड़ ...को भीड़ से बचाने ..और शिक्षित ..बेरोजगार युवाओं को भीड़ न बनने देने के एक विचार ने मुझे कहानी को लिखने पर विवश किया ... और ये साधु संकल्प भी है कि यदि भीड़ कम होगी तो सबके पास काम होने और रोजगार होने की गारन्टी होगी ... मजहबी एकता और आपसी भाईचारे को समर्पित मेरी ये कहानी फिर मेरी अपकीर्ति कैसे बन गई इसका अध्धयन जारी रहेगा ... और अंतिम फैसला कि यदि भीड़ मुझ पर यूँ ही हावी होती रही और दूसरी भीड़ की चुप्पी ऐसे ही बरकरार रखती रही तो घुटनों पर बार -बार बैठने से घुटने दर्द करने लगते है ...फेसबुक लेखन से परम्परागत विदाई कम से कम मेरी हार की अंतिम अपकीर्ति होगी ...लेकिन मेरी हार मात्र उनकी जीत होगी जो मुझे फिजूल में अपना शत्रु मानते हैं ...लेकिन मेरी पराजय फिर उनकी गहरी शिकस्त होगी जिन्होंने चुप्पी को अपनी नियति ..अपना जेवर ..अपनी भद्रता ..और अपना स्वभाव मान लिया है .....
लेकिन अपनी इस हार से पूर्व मुझे तब तलक दो मोर्चों पर लड़ना होगा एक उनसे जो समाज और इसके सद्भाव के खिलाफ है ...और एक उनसे जिनकी चुप्पी मेरे खिलाफ है ।।।।
नवाज़िश
Junaid Royal Pathan
No comments:
Post a Comment